भर्तृहरिविरचितम् नीतिशतकम् मंगलाचरणम् दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये । स्वानुभूत्येकमानाय नम: शान्ताय तेजसे ।। १ ।। अर्थ: दशों दिशाओं और तीनो कालों से परिपूर्ण, अनंत और चैतन्य-स्वरुप अपने ही अनुभव से प्रत्यक्ष होने योग्य, शान्त और तेजरूप परब्रह्म को नमस्कार है । यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता, साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः। अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या, धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च ।। २ ।। अर्थ: मैं जिसके प्रेम में रात दिन डूबा रहता हूँ - किसी क्षण भी जिसे नहीं भूलता, वह मुझे नहीं चाहती, किन्तु किसी और ही पुरुष को चाहती है । वह पुरुष किसी और ही स्त्री को चाहता है । इसी तरह वह स्त्री मुझे प्यार करती है । इसलिए उस स्त्री को, मेरी प्यारी के यार को, प्यारी को, मुझको और कामदेव को, जिसकी प्रेरणा से ऐसे ऐसे काम होते हैं, अनेक धिक्कार हैं । अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्य्ते विशेषज्ञ: । ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरं न रञ्जयति ।। ३ ।। अर्थ: हिताहितज्ञानशून्य नासमझ को समझाना बहुत आसान है, उचित और अनुच...