आइए हम शांति धारा को समझते हैं :- ॐ नमः सिद्धेभ्यः। श्री वीतरागाय नमः` *अर्थ:* सभी सिद्ध भगवान को नमस्कार। जो राग-द्वेष से दूर हो चुके हैं उन वीतराग भगवान को नमस्कार। `ॐ नमो अर्हते भगवते, श्रीमते पार्श्वतीर्थंकराय...` *अर्थ:* भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार जो 12 सभाओं से घिरे हैं, शुक्ल ध्यान से पवित्र हैं, सब कुछ जानने वाले हैं, स्वयं प्रकट हुए हैं, बुद्ध हैं, परमात्मा हैं, तीनों लोक में महिमा वाले हैं। *2. "छिंद - छिंद भिंद - भिंद" का मतलब क्या है* ये सबसे अहम हिस्सा है। यहां भगवान से प्रार्थना है कि हमारे सभी दुख *काट दो, तोड़ दो, नष्ट कर दो*। *किन चीजों को काटने को बोल रहे हैं:* - *मृत्यु छिंद* = मौत का डर खत्म कर दो - *अतिकामं छिंद* = हद से ज्यादा वासना नष्ट कर दो - *रतिकामं छिंद* = गलत इच्छाएं खत्म कर दो - *क्रोध छिंद* = गुस्सा नष्ट कर दो - *अग्निभयं छिंद* = आग का डर खत्म करो - *सर्वशत्रु भयं छिंद* = सभी दुश्मनों का डर खत्म करो - *सर्वोपसर्गं छिंद* = सभी उपद्रव/संकट खत्म करो - *सर्वविघ्नं छिंद* = सारे काम में रुकावटें खत्म करो - *सर्वभयं छिंद* = हर...
संस्कृत कवि धनपाल प्रो फूलचंद जैन प्रेमी कवि धनपाल ११वीं शताब्दी के संस्कृत साहित्य के एक देदीप्यमान नक्षत्र और राजा भोज के अत्यंत प्रिय दरबारी कवि थे। व्यक्तिगत परिचय और कालखंड समय:उनका मुख्य कालखंड १०वीं शताब्दी का उत्तरार्ध और ११वीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है। वे परमार वंश के राजा मुंज और उनके भतीजे राजा भोज के समकालीन थे। पारिवारिक पृष्ठभूमि: धनपाल का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सर्वदेव था। हालांकि उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था, लेकिन अपने छोटे भाई शोभन मुनि के प्रभाव में आकर उन्होंने जैन धर्म स्वीकार कर लिया था। साहित्यिक योगदान धनपाल अपनी विलक्षण कल्पना शक्ति और संस्कृत एवं प्राकृत भाषाओं पर समान अधिकार के लिए जाने जाते हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं: तिलकमंजरी: यह उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना है, जो संस्कृत गद्य काव्य (कथा) की श्रेणी में आती है। इसकी तुलना बाणभट्ट की 'कादंबरी' से की जाती है। राजा भोज ने इस ग्रं...