जन्मकल्याणक महोत्सव के उपलक्ष्य में- तीर्थंकर ऋषभदेव : ‘कृषि करो और ऋषि बनो’ सूत्र के मन्त्रदाता – प्रो. फूलचंद जैन प्रेमी, वाराणसी जैन परम्परा के अनुसार जैनधर्म को शाश्वत अर्थात् अनादि, अनन्त और अनिधन माना गया है। यह धर्म शाश्वत रूप में सनातन परम्परा से सदा से चला आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा।वैदिक तथा कुछ अन्य परम्पराओं के साहित्य में अनेक तीर्थंकरों के साथ ही विविध रूपों में श्रमण संस्कृति, जिसे निर्ग्रन्थ या आर्हत् संस्कृति भी कहा जाता था, के अनेक प्राचीन साहित्यिक उल्लेख, सिन्धुघाटी और मोहनजोदड़ो आदि की सभ्यता तथा देश के विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्यों आदि ने यह सिद्ध कर दिया है कि जैनधर्म एक अतिप्राचीन, मौलिक और एक स्वतंत्र धर्म है। प्राचीन जैन साहित्य में जैनधर्म के प्रवर्तक त्रैकालिक अर्थात् भूत, भविष्यत् और वर्तमान-इन प्रत्येक काल के चौबीस-चौबीस तीर्थंकरों के नामोल्लेख और उनका विवरण प्राप्त होता है। वर्तमान काल की अपेक्षा प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव से लेकर अन्तिम और चौबीसवें ती...
*डॉ. हरमन जैकॉबी: जैन धर्म के प्रसिद्ध पश्चिमी दूत* @@@@@@@@@@ डॉ. हरमन जैकॉबी का संक्षिप्त परिचय: डॉ. हरमन जैकॉबी (11 सितंबर 1850 – 15 फरवरी 1937) जर्मनी के प्रसिद्ध इंडोलॉजिस्ट थे। उन्होंने प्रसिद्ध बर्लिन विश्वविद्यालय से संस्कृत, प्राकृत और तुलनात्मक भाषाविज्ञान में विशेषज्ञता प्राप्त की। उन्होंने ये भारतीय भाषाएं इसलिए सीखीं ताकि वे प्राचीन ग्रंथों के ज्ञान को मूल रूप में समझ सकें। भारतीय दर्शन के अध्येता के रूप में उन्होंने जैन आगमों के गहन अध्ययन को प्राथमिकता दी। जैन धर्म से उस समय उस समय पश्चिम के विद्वान अपरिचित थे। जीवनभर जैन साहित्य पर शोध कर, वे जैन धर्म को वैश्विक पटल पर लाए। जैन धर्म के प्रति उनका अमूल्य योगदान: जैकॉबी ने जैन प्राकृत ग्रंथों—आचारांग सूत्र, सूत्रकृतांग, कल्पसूत्र आदि—का जर्मन- अंग्रेजी भाषाओं में अनुवाद किया। 1884-1895 में "Sacred Books of the East" (खंड 22, 45) में प्रकाशित Jaina Sutras उनका प्रमुख कार्य है (Archive.org पर मुफ्त उपलब्ध)। उन्होंने स्पष्ट किया: _"जैन धर्म बौद्ध धर्म से अलग है एवं महावीर के पहले भी जैन तीर्थंकर थे"_...