ये एक सरल चित्र है, लेकिन बहुत ही गहरे अर्थ के साथ। आदमी को पता नहीं है कि नीचे सांप है और महिला को नहीं पता है कि आदमी भी किसी पत्थर से दबा हुआ है। महिला सोचती है: - ‘मैं गिरने वाली हूं और मैं नहीं चढ़ सकती क्योंकि साँप मुझे काट रहा है।" आदमी अधिक ताक़त का उपयोग करके मुझे ऊपर क्यों नहीं खींचता! आदमी सोचता है:- "मैं बहुत दर्द में हूं फिर भी मैं आपको उतना ही खींच रहा हूँ जितना मैं कर सकता हूँ! आप खुद कोशिश क्यों नहीं करती और कठिन चढ़ाई को पार कर लेती । आदमी को ये नहीं पता है कि औरत को सांप काट रहा है । नैतिकताः- आप उस दबाव को देख नहीं सकते जो सामने वाला झेल रहा है, और ठीक उसी तरह सामने वाला भी उस दर्द को नहीं देख सकता जिसमें आप हैं। यह जीवन है, भले ही यह काम, परिवार, भावनाओं, दोस्तों, के साथ हो, आपको एक-दूसरे को समझने की कोशिश करनी चाहिए, अलग अलग सोचना, एक-दूसरे के बारे में सोचना और बेहतर तालमेल बिठाना चाहिए। हर कोई अपने जीवन में अपनी लड़ाई लड़ रहा है और सबके अपने अपने दुख हैं। इसीलिए कम से कम जब हम अपनों से मिलते हैं तब एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करने के बजाय एक...
जैन दर्शन में प्रमाण सभा के मध्य विराजमान थे पूज्य आचार्यश्री विद्यानंद। नगर के प्रसिद्ध विद्वान पंडित देवदत्त वहाँ पहुँचे। वे तर्कशक्ति में प्रखर, शास्त्र-अध्ययन में निपुण और वाद-विवाद में विख्यात थे; पर अपने ज्ञान पर उन्हें बड़ा गर्व भी था। देवदत्त ने कहा— “आचार्य, मेरी एक जिज्ञासा है। मनुष्य सत्य को पहचाने कैसे? मेरी समझ में तो वही बात सत्य कही जा सकती है, जिसे हम अपनी आँखों से देखें, कानों से सुनें या किसी न किसी इंद्रिय से ग्रहण कर सकें। जो दिखाई ही न दे, उसे सत्य कैसे मान लिया जाए? क्या जो प्रत्यक्ष है, वही अंतिम प्रमाण नहीं है?” सभा में हल्की-सी सरगर्मी फैल गई। सभी की दृष्टि आचार्यश्री पर टिक गई। आचार्यश्री ने अत्यंत शांत स्वर में सामने रखे एक घड़े की ओर संकेत किया और बोले— “पंडित जी, पहले मेरे एक प्रश्न का उत्तर दीजिए। यह घड़ा आपको कैसा दिखाई दे रहा है?” देवदत्त ने सहज भाव से कहा— “गुरुदेव, यह तो खाली दिखाई दे रहा है।” आचार्यश्री ने पूछा— “अच्छा, यदि यह खाली है, तो क्या इसमें कुछ भी नहीं है?” देवदत्त ने उत्तर दिया— “जो आँखों से दिख रहा है, उसी के अनुसार तो यही कहूँगा कि इस...