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175 जैन ग्रंथ और ग्रंथकार

1. षट्खंडागम - आचार्य पुष्पदंत, आचार्य भूतबलि 2. समयसार - आचार्य कुंदकुंद 3. नियमसार - आचार्य कुंदकुंद 4. प्रवचनसार - आचार्य कुंदकुंद 5. अष्टपाहुड़ - आचार्य कुंदकुंद 6. पंचास्तिकाय - आचार्य कुंदकुंद 7. रयणसार - आचार्य कुंदकुंद 8. दश भक्ति - आचार्य कुंदकुंद 9. वारसाणुवेक्खा - आचार्य कुंदकुंद 10. तत्त्वार्थसूत्र - आचार्य उमास्वामी 11. आप्तमीमांसा - आचार्य समन्तभद्र 12. स्वयंभू स्तोत्र - आचार्य समन्तभद्र 13. रत्नकरण्ड श्रावकाचार - आचार्य समन्तभद्र 14. स्तुति विद्या - आचार्य समन्तभद्र 15. युक्त्यनुशासन - आचार्य समन्तभद्र 16. तत्त्वसार - आचार्य देवसेन 17. आराधना सार - आचार्य देवसेन 18. आलाप पद्धति - आचार्य  देवसेन 19. दर्शनसार - आचार्य  देवसेन 20. भावसंग्रह - आचार्य  देवसेन 21. लघु नयचक्र - आचार्य  देवसेन 22. इष्टोपदेश - आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी) 23. समाधितंत्र - आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी) 24. सर्वार्थसिद्धि - आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी) 25. वैद्यक शास्त्र - आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी) 26. सिद्धिप्रिय स्तोत्र - आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी) 27. जैनेन्द्र व्याकरण - आचार्य पूज्य...
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दूरी

दूरी  दूरट्ठिओ ण दूरो, जो जस्स मणम्मि णिच्चं संठिओ। जो जस्स हिअए णत्थि, समीवट्ठिओ वि अइ दूरओ।। जो जिसके मन में सदा बसा है, वह दूर रहकर भी पास है। और जो जिसके हृदय में नहीं बसा, वह समीप रहकर भी अत्यन्त दूर है। अनेकांत  २३/०८/२६

Jain Scholar Dr Munnipushpa Jain

श्रीमती डॉ० मुन्नी जैन जन्म- 22 जून 1957, दमोह (म.प्र.)  शिक्षा– प्राकृताचार्य, जैनदर्शनाचार्य, एम. ए. (हिन्दी) पी-एच.डी.(बी.एच.यू.से) ,शिक्षाशास्त्री, पुस्तकालय- विज्ञानशास्त्री माता-पिता- श्रीमती संतोष रानी जैन एवं श्री हुकमचन्द जैन, दमोह (म.प्र.) धर्मपत्नी- प्रो० फूलचन्द जैन प्रेमी,  पूर्व जैनदर्शन विभागाध्यक्ष,सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय,वाराणसी परिवार - 1. ज्येष्ठ पुत्र- प्रो. अनेकान्त कुमार जैन, जैनदर्शन विभाग श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली  2. पुत्री -: डॉ० इन्दु जैन राष्ट्र गौरव, नई दिल्ली,  (राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय जैन प्रतिनिधि) 3. कनिष्ठ पुत्र - डॉ. अरिहन्त कुमार जैन,असिस्टेंट प्रोफेसर, के. जे. सौमय्या विद्याविहार  युनिवर्सिटी,मुम्बई. कार्यक्षेत्र -1) सत्र 2011 से 2022 तक सम्पूर्णानन्द संस्कृत वि. वि. वाराणसी के जैनदर्शन विभाग में अतिथि प्राध्यापिका। 2) देश के अनेक नगरों में एवं विश्वविद्यालयों आदि में आयोजित ब्राह्मी लिपि कार्यशालाओं में प्रशिक्षण दिया। 3) बीस से अधिक अखिल भारतीय संगोष्ठि‌यों में शोधालेख प्रस्...

बारस अणुवेक्खा की सर्वोदया टीका

बारस अणुवेक्खा की सर्वोदया टीका का वैशिष्ट्य और इसके कुछ चिन्तन बिन्दु : –प्रोफेसर फूलचंद जैन प्रेमी, वाराणसी        तीर्थंकर महावीर क वाणी को अपने द्वारा रचित अनुपम शास्त्रों के माध्यम से हम तक पहुचाने वाले प्राचीन जैनाचार्यों में प्रथम शती के महान् आचार्य कुन्दकुन्द का विशिष्ट स्थान है। इसीलिए तो तीर्थंकर महावीर की परम्परा में गौतम गणधर के बाद आचार्य कुन्दकुन्ददेव का नाम स्मरण करते हुए मंगलाचरण किया जाता है- मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ।। शौरसेनी प्राकृत साहित्य के पंचास्तिकाय, प्रवचनसार, समयसार, नियमसार, अष्टपाहुड़, बारस अणुवेक्खा तथा दस भक्तियाँ जैसे अनेक उत्कृष्ट आगमिक ग्रन्थरत्नों के सर्जक हैं आचार्य कुन्दकुन्द। इनमें भी इनका समयसार ग्रन्थ तो एकमात्र अध्यात्म प्रधान ऐसा उत्कृष्ट ग्रन्थ है, जिसकी सम्पूर्ण विश्व साहित्य में कोई तुलना ही नहीं है। इसी तरह इनके अन्य सभी ग्रन्थ अपने-अपने विषय के बेजोड़ ग्रन्थरत्न  हैं। इनके प्रमुख ग्रन्थों पर आचार्य अमृतचन्द्र, आचार्य जयसेन, आचार्य प‌द्मप्रभ मलधारीकृत बड़ी ही महत...

एक सरल चित्र और जीवन का अर्थ

ये एक सरल चित्र है, लेकिन बहुत ही गहरे अर्थ के साथ। आदमी को पता नहीं है कि नीचे सांप है और महिला को नहीं पता है कि आदमी भी किसी पत्थर से दबा हुआ है। महिला सोचती है: - ‘मैं गिरने वाली हूं और मैं नहीं चढ़ सकती क्योंकि साँप मुझे काट रहा है।"  आदमी अधिक ताक़त का उपयोग करके मुझे ऊपर क्यों नहीं खींचता! आदमी सोचता है:- "मैं बहुत दर्द में हूं फिर भी मैं आपको उतना ही खींच रहा हूँ जितना मैं कर सकता हूँ! आप खुद कोशिश क्यों नहीं करती और कठिन चढ़ाई को पार कर लेती । आदमी को ये नहीं पता है कि औरत को सांप काट रहा है । नैतिकताः- आप उस दबाव को देख नहीं सकते जो सामने वाला झेल रहा है, और ठीक उसी तरह सामने वाला भी उस दर्द को नहीं देख सकता जिसमें आप हैं। यह जीवन है, भले ही यह काम, परिवार, भावनाओं, दोस्तों, के साथ हो, आपको एक-दूसरे को समझने की कोशिश करनी चाहिए, अलग अलग सोचना, एक-दूसरे के बारे में सोचना और बेहतर तालमेल बिठाना चाहिए। हर कोई अपने जीवन में अपनी लड़ाई लड़ रहा है और सबके अपने अपने दुख हैं। इसीलिए कम से कम जब हम अपनों से मिलते हैं तब एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करने के बजाय एक...

जैन दर्शन में प्रमाण

जैन दर्शन में प्रमाण  सभा के मध्य विराजमान थे पूज्य आचार्यश्री विद्यानंद। नगर के प्रसिद्ध विद्वान पंडित देवदत्त वहाँ पहुँचे। वे तर्कशक्ति में प्रखर, शास्त्र-अध्ययन में निपुण और वाद-विवाद में विख्यात थे; पर अपने ज्ञान पर उन्हें बड़ा गर्व भी था। देवदत्त ने कहा— “आचार्य, मेरी एक जिज्ञासा है। मनुष्य सत्य को पहचाने कैसे? मेरी समझ में तो वही बात सत्य कही जा सकती है, जिसे हम अपनी आँखों से देखें, कानों से सुनें या किसी न किसी इंद्रिय से ग्रहण कर सकें। जो दिखाई ही न दे, उसे सत्य कैसे मान लिया जाए? क्या जो प्रत्यक्ष है, वही अंतिम प्रमाण नहीं है?” सभा में हल्की-सी सरगर्मी फैल गई। सभी की दृष्टि आचार्यश्री पर टिक गई। आचार्यश्री ने अत्यंत शांत स्वर में सामने रखे एक घड़े की ओर संकेत किया और बोले— “पंडित जी, पहले मेरे एक प्रश्न का उत्तर दीजिए। यह घड़ा आपको कैसा दिखाई दे रहा है?” देवदत्त ने सहज भाव से कहा— “गुरुदेव, यह तो खाली दिखाई दे रहा है।” आचार्यश्री ने पूछा— “अच्छा, यदि यह खाली है, तो क्या इसमें कुछ भी नहीं है?” देवदत्त ने उत्तर दिया— “जो आँखों से दिख रहा है, उसी के अनुसार तो यही कहूँगा कि इस...

आचार्य भद्रबाहु को ही आचार्य कुन्दकुन्द का गुरु मानना अधिक उपयुक्त* : डॉ. फूलचन्द्र जैन प्रेमी, वाराणसी

*आचार्य भद्रबाहु को ही आचार्य कुन्दकुन्द का गुरु मानना अधिक उपयुक्त* : डॉ. फूलचन्द्र जैन प्रेमी, वाराणसी *आचार्य कुन्दकुन्द और उनका दिव्य अवदान* तीर्थंकर महावीर और गौतम गणधर के बाद की उत्तरवर्ती जैन आचार्य परम्परा में अनेक महान् आचार्यों का नाम श्रद्धापूर्वक लिया जाता है; जिनके अनुपम व्यक्तित्व और कर्तृत्व से भारतीय चिन्तन, अनुप्राणित हो कर चतुर्दिक प्रकाश की किरणें फैलाता रहा है, किन्तु इन सब में अब से दो हजार (अथवा लगभग 2400) वर्ष पूर्व युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द ऐसे प्रखर प्रभात के समान महान् आचार्य हुए, जिनके महान आध्यात्मिक चिन्तन से सम्पूर्ण भारतीय मनीषा प्रभावित हुई और उसने एक अद्भुत मोड़ लिया। यही कारण है कि इनके परवर्ती भी आचार्यों ने अपने को उनकी परम्परा का आचार्य मानकर उनकी सम्पूर्ण विरासत से जुड़ने में अपना गौरव माना तथा उनकी मूल-परम्परा तथा ज्ञान-गरिमा को एक स्वर से श्रेष्ठ मान्य करते हुए कहा - *मंगलं भगवदो वीर, मंगलं गोदमो गणी।* *मंगलं कोण्डकुंदाइं, जेण्ह धम्मोत्थु मंगलं॥* [ मंगलं भगवान् वीरो, मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो, जैनधर्मो$स्तु मंगलम्॥ ] अर्थात् तीर्थं...