श्रमणाचारगत चिंतन का वैशिष्टय : समयदेशना के परिपेक्ष्य में प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी,वाराणसी ( राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित) पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, जैनदर्शन विभाग, सम्पूर्णानन्द संस्कृतविश्वविद्यालय,वाराणसी। सम्पूर्ण विश्व साहित्य में अध्यात्म का यदि कोई शिरोमणि ग्रन्थ है तो वह आगम ग्रन्थ है, प्रथम शताब्दी के आचार्य भगवन कुंदकुन्द प्रणीत समयपाहुड, जैसे हम समयसार के नाम से जानते हैं.इस शास्त्र पर आध्यात्मिक चिंतन-मनन पुरोधा आचार्यश्री विशुद्धसागर जी मुनिराज के बहुत ही सरल-सुबोध भाषा में श्रृंखलाबद्ध रूप में दिये गए प्रवचनों का वृहदाकार संग्रह पंद्रह खण्डों में समयदेशना नाम से प्रकाशित है. अनेक खण्डों में प्रकाशित इस समयदेशना जैसे विशाल शास्त्र के चिन्तन-वैशिष्ट्य पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, किन्तु संगोष्ठी में अपनी समयसीमा के कारण मात्र निर्धा...
*आचार्य भद्रबाहु को ही आचार्य कुन्दकुन्द का गुरु मानना अधिक उपयुक्त* : डॉ. फूलचन्द्र जैन प्रेमी, वाराणसी *आचार्य कुन्दकुन्द और उनका दिव्य अवदान* तीर्थंकर महावीर और गौतम गणधर के बाद की उत्तरवर्ती जैन आचार्य परम्परा में अनेक महान् आचार्यों का नाम श्रद्धापूर्वक लिया जाता है; जिनके अनुपम व्यक्तित्व और कर्तृत्व से भारतीय चिन्तन, अनुप्राणित हो कर चतुर्दिक प्रकाश की किरणें फैलाता रहा है, किन्तु इन सब में अब से दो हजार (अथवा लगभग 2400) वर्ष पूर्व युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द ऐसे प्रखर प्रभात के समान महान् आचार्य हुए, जिनके महान आध्यात्मिक चिन्तन से सम्पूर्ण भारतीय मनीषा प्रभावित हुई और उसने एक अद्भुत मोड़ लिया। यही कारण है कि इनके परवर्ती भी आचार्यों ने अपने को उनकी परम्परा का आचार्य मानकर उनकी सम्पूर्ण विरासत से जुड़ने में अपना गौरव माना तथा उनकी मूल-परम्परा तथा ज्ञान-गरिमा को एक स्वर से श्रेष्ठ मान्य करते हुए कहा - *मंगलं भगवदो वीर, मंगलं गोदमो गणी।* *मंगलं कोण्डकुंदाइं, जेण्ह धम्मोत्थु मंगलं॥* [ मंगलं भगवान् वीरो, मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो, जैनधर्मो$स्तु मंगलम्॥ ] अर्थात् त...