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आचार्य श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तदेव कृत द्रव्य संग्रह

*आचार्य श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तदेव कृत द्रव्य संग्रह*                     *मुख्य बिन्दु*   _(1) द्रव्य संग्रह ग्रंथ विक्रम संवत 1125 के लगभग प्राकृत भाषा में लिखा गया है।_   _(2) द्रव्य संग्रह ग्रंथ के रचयिता आचार्य श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तदेव हैं।_   _(3) द्रव्य संग्रह ग्रंथ में तीन अधिकार व 58 गाथायें हैं।_   _(4) द्रव्य संग्रह ग्रंथ में षड् द्रव्य , सप्त तत्व , नव पदार्थ , पंचास्तिकाय , पंच परमेष्ठि, ध्यान और मोक्षमार्ग का विवेचन संक्षिप्त व सुबोध शैली में किया गया है।_   _(5) द्रव्य संग्रह ग्रंथ का प्ररूपण लाक्षणिक शैली में किया गया है।_   _(6) द्रव्य संग्रह ग्रंथ में प्रत्येक लक्षण द्रव्य और भाव , निश्चय और व्यवहार दोनों दृष्टियों से किया गया है।_   _(7) द्रव्य संग्रह ग्रंथ लक्षण ग्रंथ होते हुए भी अध्यात्म ग्रंथ के रूप में मान्यता प्राप्त है।_   _(8) तत्वबोध करने के लिए द्रव्य संग्रह ग्रंथ भी जैन समाज में तत्त्वार्थसूत्र और छहढाला के समान महत्वपू...
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श्रमणाचारगत चिंतन का वैशिष्टय

  श्रमणाचारगत चिंतन का वैशिष्टय :      समयदेशना के परिपेक्ष्य में                              प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी,वाराणसी                    ( राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित) पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, जैनदर्शन विभाग, सम्पूर्णानन्द संस्कृतविश्वविद्यालय,वाराणसी।            सम्पूर्ण विश्व साहित्य में अध्यात्म का यदि कोई शिरोमणि ग्रन्थ है तो वह आगम ग्रन्थ है, प्रथम शताब्दी के आचार्य भगवन कुंदकुन्द प्रणीत समयपाहुड, जैसे हम समयसार के नाम से जानते हैं.इस शास्त्र पर आध्यात्मिक चिंतन-मनन पुरोधा आचार्यश्री विशुद्धसागर जी मुनिराज के बहुत ही सरल-सुबोध भाषा में श्रृंखलाबद्ध रूप में दिये गए प्रवचनों का वृहदाकार संग्रह पंद्रह खण्डों में समयदेशना नाम से प्रकाशित है. अनेक खण्डों में प्रकाशित इस समयदेशना जैसे विशाल शास्त्र के चिन्तन-वैशिष्ट्य पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, किन्तु संगोष्ठी में अपनी समयसीमा के कारण मात्र निर्धा...

आचार्य भद्रबाहु को ही आचार्य कुन्दकुन्द का गुरु मानना अधिक उपयुक्त

*आचार्य भद्रबाहु को ही आचार्य कुन्दकुन्द का गुरु मानना अधिक उपयुक्त* :  डॉ. फूलचन्द्र जैन प्रेमी, वाराणसी *आचार्य कुन्दकुन्द और उनका दिव्य अवदान* तीर्थंकर महावीर और गौतम गणधर के बाद की उत्तरवर्ती जैन आचार्य परम्परा में अनेक महान् आचार्यों का नाम श्रद्धापूर्वक लिया जाता है; जिनके अनुपम व्यक्तित्व और कर्तृत्व से भारतीय चिन्तन, अनुप्राणित हो कर चतुर्दिक प्रकाश की किरणें फैलाता रहा है, किन्तु इन सब में अब से दो हजार (अथवा लगभग 2400) वर्ष पूर्व युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द ऐसे प्रखर प्रभात के समान महान् आचार्य हुए, जिनके महान आध्यात्मिक चिन्तन से सम्पूर्ण भारतीय मनीषा प्रभावित हुई और उसने एक अद्भुत मोड़ लिया। यही कारण है कि इनके परवर्ती भी आचार्यों ने अपने को उनकी परम्परा का आचार्य मानकर उनकी सम्पूर्ण विरासत से जुड़ने में अपना गौरव माना तथा उनकी मूल-परम्परा तथा ज्ञान-गरिमा को एक स्वर से श्रेष्ठ मान्य करते हुए कहा - *मंगलं भगवदो वीर, मंगलं गोदमो गणी।* *मंगलं कोण्डकुंदाइं, जेण्ह धम्मोत्थु मंगलं॥* [ मंगलं भगवान् वीरो, मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो, जैनधर्मो$स्तु मंगलम्॥ ] अर्थात् त...

जैन ज्ञान मीमांसा

जैनदर्शन में ज्ञानमीमांसा                  प्रो० फूलचन्द जैन प्रेमी, वाराणसी. ज्ञान का स्वरूप और महत्त्व--    सामान्यतः "जो जाणदि सो णाणं "(प्रवचनसार गाथा 35) अर्थात् जो जानता है. वही ज्ञान है। आचार्य वीरसेन स्वामी के अनुसार "भूतार्थ प्रकाशनं ज्ञानम्" (धवला1/143) अर्थात् सत्यार्थ का प्रकाश करने वाली शक्ति विशेष ज्ञान है। सर्वार्थसिद्धि (1/6) में आचार्य पूज्यपाद कहते हैं."जानाति ज्ञायतेऽनेन ज्ञातिमात्र वा ज्ञानम्"- अर्थात जो जानता है, वह ज्ञान है (कर्तृ साधन), जिसके द्वारा जाना जाये, वह ज्ञान हैं (करण साधन), अथवा जानना मात्र ज्ञान है (भावसाधन)। इस प्रकार "येन-येन प्रकारेण जीवादयः पदार्था व्यवस्थितास्तेन तेनावगमः सम्यग्ज्ञानम्"  (सर्वार्थसिद्धि 1/5) अर्थात् जिस-जिस तरह से जीव-अजीव आदि पदार्थ अवस्थित हैं, उस उस प्रकार से उनका जानना सम्यग्ज्ञान है। ज्ञान के पहले “सम्यक्" विशेषण संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय (विमोह) जैसे मिथ्या ज्ञानों का निराकरण करने हेतु रखा गया है। आ. अकलंकदेव ने तत्त्वार्थवार्तिक (1/1/2) में "नयप्रमाणविकल्पपूर...

चित्तौड़गढ़ : जैन धर्म, राजपरंपरा, आचार्य-साधना और जिनालयों का गौरवशाली इतिहास

🙏 चित्तौड़गढ़ : जैन धर्म, राजपरंपरा, आचार्य-साधना और जिनालयों का गौरवशाली इतिहास 🙏 चित्तौड़गढ़ के निकट स्थित प्राचीन मध्यमिका नगरी, जिसे वर्तमान में नगरी क्षेत्र से जोड़ा जाता है, पुरातात्त्विक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। मथुरा के प्राचीन जैन अभिलेखों में उल्लिखित ‘ *मज्झिमिल्ल* ’ गण-शाखा को कुछ विद्वान मध्यमिका से संबंधित मानते हैं। आठवीं शताब्दी में आचार्य *हरिभद्रसूरि* के चित्तौड़ आने के समय यहाँ अनेक जैन मंदिर विद्यमान थे। आचार्य हरिभद्रसूरि भारतीय दर्शन के महान विद्वानों में गिने जाते हैं। उन्होंने योग, दर्शन-समीक्षा और विभिन्न दार्शनिक मतों का अध्ययन करते हुए अनेक ग्रंथों की रचना की। षड्दर्शनसमुच्चय, योगबिन्दु और धूर्ताख्यान उनके प्रसिद्ध ग्रंथों में हैं। जैन सिद्धान्त-साहित्य की परंपरा में आचार्य *ऐलाचार्य* का नाम उस गुरु के रूप में आता है, जिनसे आचार्य *वीरसेन* ने चित्तौड़गढ़ में सिद्धान्तशास्त्रों का अध्ययन किया। आचार्य वीरसेन ने आगे चलकर षट्खण्डागम पर *धवला* टीका तथा कषायपाहुड़ पर *जयधवला* टीका की रचना-परंपरा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। जयधवला को उनके शिष्य आचा...

​एक जर्मन जैन साधिका : लेडी शर्लेटी ब्राउन

👣*​एक जर्मन जैन साधिका*:  *लेडी शर्लेटी ब्राउन*👣 ​‼️‼️💐‼️‼️ 🦋​जैन समाज में शायद ही आज कोई ऐसा श्रावक होगा जिसे इस सच्ची कहानी का पता हो? यह उन दिनों की बात है जब भारत पर अंग्रेजी सत्ता राज कर रही थी। 🦋​जर्मन निवासी *मिस शर्लेटी ब्राउन* एक ईसाई युवा महिला विदुषी थीं, जो आज से लगभग 100-110 वर्ष पूर्व भारत आई थीं। उन्हें जर्मन सरकार से 'प्राच्य विद्या' (Oriental Knowledge of Spirituality) पर भारत में शोध करने के लिए छात्रवृत्ति (स्कॉलरशिप) मिली थी। ​प्राच्य विद्या पर अपने शोध-कार्य के दौरान उन्होंने जैन धर्म के ग्रंथों का भी गूढ़ अध्ययन किया। अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए उन्हें कई जैन श्वेतांबर साधु- साध्वियों के संपर्क में आने का अवसर भी प्राप्त हुआ।  🦋जैसे-जैसे उनका अध्ययन आगे बढ़ा, जैन धर्म और संस्कृति के प्रति उनका लगाव और गहरा होता गया। सत्संग के लाभ तथा जैन साध्वियों के जीवन को निकट से जानने के लिए उन्होंने श्वेतांबर साध्वियों के साथ शिवपुरी, ग्वालियर आदि से गुजरात की पदयात्राएं भी की थीं और सत्संग के साथ-साथ जैन तीर्थों के दर्शन का पुण्य लाभ लिया था। 🦋​जब उनकी ...

​एक जर्मन जैन साधिका : लेडी शर्लेटी ब्राउन

👣*​एक जर्मन जैन साधिका*:  *लेडी शर्लेटी ब्राउन*👣 ​‼️‼️💐‼️‼️ 🦋​जैन समाज में शायद ही आज कोई ऐसा श्रावक होगा जिसे इस सच्ची कहानी का पता हो? यह उन दिनों की बात है जब भारत पर अंग्रेजी सत्ता राज कर रही थी। 🦋​जर्मन निवासी *मिस शर्लेटी ब्राउन* एक ईसाई युवा महिला विदुषी थीं, जो आज से लगभग 100-110 वर्ष पूर्व भारत आई थीं। उन्हें जर्मन सरकार से 'प्राच्य विद्या' (Oriental Knowledge of Spirituality) पर भारत में शोध करने के लिए छात्रवृत्ति (स्कॉलरशिप) मिली थी। ​प्राच्य विद्या पर अपने शोध-कार्य के दौरान उन्होंने जैन धर्म के ग्रंथों का भी गूढ़ अध्ययन किया। अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए उन्हें कई जैन श्वेतांबर साधु- साध्वियों के संपर्क में आने का अवसर भी प्राप्त हुआ।  🦋जैसे-जैसे उनका अध्ययन आगे बढ़ा, जैन धर्म और संस्कृति के प्रति उनका लगाव और गहरा होता गया। सत्संग के लाभ तथा जैन साध्वियों के जीवन को निकट से जानने के लिए उन्होंने श्वेतांबर साध्वियों के साथ शिवपुरी, ग्वालियर आदि से गुजरात की पदयात्राएं भी की थीं और सत्संग के साथ-साथ जैन तीर्थों के दर्शन का पुण्य लाभ लिया था। 🦋​जब उनकी ...