जैनधर्म में दानतीर्थ के प्रवर्तन का पर्व है अक्षयतृतीया डॉ. पंकज जैन शास्त्री,इन्दौर वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाए जाने वाले अक्षय तृतीया पर्व का जैनधर्म में विशेष महत्त्व है। इस पवित्र दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव ने दीक्षा ग्रहण करने के उपरान्त एक वर्ष के बाद हस्तिनापुर नगरी में इक्षुरस का प्रथम आहार ग्रहण किया था और इस युग के प्रारंभ में सर्वप्रथम यथार्थ दान की परम्परा का दिग्दर्शन कराया था । भगवान् ऋषभदेव दीक्षा के उपरान्त उपवास की प्रतिज्ञा के साथ कायोत्सर्ग मुद्रा में छह माह तक ध्यानस्थ हो गए थे। छह माह तक ध्यान करने के उपरान्त उन्होंने विचार किया कि बड़े-बड़े राजवंशों में उत्पन्न अनेक राजाओं ने मेरे साथ दीक्षा ग्रहण की थी, लेकिन उन्हें आहार ग्रहण करने की उचित विधि का ज्ञान न होने से वे अपने मार्ग से भ्रष्ट हो गए थे। मोक्ष की सिद्धि के लिए साधना करना आवश्यक है और शरीर से ही मोक्ष मार्ग की साधना की जाती है। शरीर की स्थिति बनाए रखने के लिए आहार अनिवार्य है। भगवान् ऋषभदेव चिंतन करने लगे कि - मोक्षमार्ग पर चलने वाले मुनियों के लिए शरीर को ...
अल्पसंख्यक जैन समुदाय का योगदान 1. जैन संस्कृति विश्व की महान एवं प्राचीन संस्कृतियों में से एक है। 2. हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो की खुदाई में प्राप्त मुद्रा एवं उस पर अंकित ऋषभदेव का सूचक बैल तथा सील नं.449 पर स्पष्ठ रूप से जिनेश्वर शब्द का अंकन होना तथा वेदों की 141 ऋचाओं में भगवान ऋषभदेव का आदर पूर्वक उल्लेख इस संस्कृति को वेद प्राचीन संस्कृति सिद्ध करती हैं। 2. हमारे देश भारत वर्ष का नाम ऋषभदेव के पुत्र चक्रवर्ती भरत के नाम से विख्यात है जो कि जग जाहिर प्रमाण है। विष्णु पुराण में भी इसका ऊल्लेख मिलता है। हमारे देश के प्रधान मंत्री स्व. जवाहर लाल नेहरु ने उड़ीसा के खंडगिरी स्थित खारवेल के शिला लेख पर "भरतस्य भारत" रूप प्रशस्ति को देख कर ही इस देश का संवैधानिक नामकरण भारत किया था। 3. राजा श्रेणिक, सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य , कलिंग नरेश खारवेल एव सेनापति चामुंडराय , सम्राट संप्रति, सम्राट बिंबिसार, कर्नाटक की रानी अब्बक्का चौटा जैन इतिहास के महान शासक हुए है। 4. जैन पुराणों के अनुसार सती चंदन बाला, मैना सुंदरी एवं रानी रेवती आदि अ...