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संस्कृत कवि धनपाल

संस्कृत कवि धनपाल                                प्रो फूलचंद जैन प्रेमी  कवि धनपाल ११वीं शताब्दी के संस्कृत साहित्य के एक देदीप्यमान नक्षत्र और राजा भोज के अत्यंत प्रिय दरबारी कवि थे।  व्यक्तिगत परिचय और कालखंड  समय:उनका मुख्य कालखंड १०वीं शताब्दी का उत्तरार्ध और ११वीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है। वे परमार वंश के राजा मुंज और उनके भतीजे राजा भोज के समकालीन थे। पारिवारिक पृष्ठभूमि:  धनपाल का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सर्वदेव था। हालांकि उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था, लेकिन अपने छोटे भाई शोभन मुनि के प्रभाव में आकर उन्होंने जैन धर्म स्वीकार कर लिया था। साहित्यिक योगदान धनपाल अपनी विलक्षण कल्पना शक्ति और संस्कृत एवं प्राकृत भाषाओं पर समान अधिकार के लिए जाने जाते हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं: तिलकमंजरी: यह उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना है, जो संस्कृत गद्य काव्य (कथा) की श्रेणी में आती है। इसकी तुलना बाणभट्ट की 'कादंबरी' से की जाती है। राजा भोज ने इस ग्रं...
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गौतम बुद्ध पर जैन धर्म का प्रभाव

गौतम बुद्धपर जैन धर्म का प्रभाव                                                                                                                      मयूर मल्लिनाथ  वग्यानी , सांगली, महाराष्ट्र                                          + 91 9422707721 बौद्ध ग्रंथों से पता चलता है कि जैन धर्म से बुद्ध प्रभावित थे. बौद्ध ग्रंथ मज्जिमा निकाय में दर्ज है कि बुद्ध के तपस्वी जीवन के दौरान (ज्ञान प्राप्ति से पहले) उन्होंने कई उपवास, और तपस्या की थी. जिनका वर्णन अन्यत्र केवल जैन परम्परा में ही मिलता है.   जैन मुनि जिस  प्रकार आहार लेते है , इसी प्रकार बुद्ध अपने अनुभव के बारे में कहते हैं,...

जैनधर्म में दानतीर्थ के प्रवर्तन का पर्व है अक्षयतृतीया

जैनधर्म में दानतीर्थ के प्रवर्तन का पर्व है अक्षयतृतीया डॉ. पंकज जैन शास्त्री,इन्दौर वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाए जाने वाले अक्षय तृतीया पर्व का जैनधर्म में विशेष महत्त्व है। इस पवित्र दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव ने दीक्षा ग्रहण करने के उपरान्त एक वर्ष के बाद हस्तिनापुर नगरी में इक्षुरस का प्रथम आहार ग्रहण किया था और इस युग के प्रारंभ में सर्वप्रथम यथार्थ दान की परम्परा का दिग्दर्शन कराया था ।  भगवान् ऋषभदेव दीक्षा के उपरान्त उपवास की प्रतिज्ञा के साथ कायोत्सर्ग मुद्रा में छह माह तक ध्यानस्थ हो गए थे। ​छह माह तक ध्यान करने के उपरान्त उन्होंने विचार किया कि बड़े-बड़े राजवंशों में उत्पन्न अनेक राजाओं ने मेरे साथ दीक्षा ग्रहण की थी, लेकिन उन्हें आहार ग्रहण करने की उचित विधि का ज्ञान न होने से वे अपने मार्ग से भ्रष्ट हो गए थे। मोक्ष की सिद्धि के लिए साधना करना आवश्यक है और शरीर से ही मोक्ष मार्ग की साधना की जाती है। शरीर की स्थिति बनाए रखने के लिए आहार अनिवार्य है। ​भगवान् ऋषभदेव चिंतन करने लगे कि - मोक्षमार्ग पर चलने वाले मुनियों के लिए शरीर को ...

अल्पसंख्यक जैन समुदाय का योगदान

 अल्पसंख्यक जैन समुदाय का योगदान  1. जैन संस्कृति विश्व की महान एवं प्राचीन संस्कृतियों में से एक है।  2. हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो की खुदाई में प्राप्त मुद्रा एवं उस पर अंकित ऋषभदेव का सूचक बैल तथा सील नं.449 पर स्पष्ठ रूप से जिनेश्वर शब्द का अंकन होना तथा वेदों की 141 ऋचाओं में भगवान ऋषभदेव का आदर पूर्वक उल्लेख इस संस्कृति को वेद प्राचीन संस्कृति सिद्ध करती हैं। 2.   हमारे देश भारत वर्ष का नाम ऋषभदेव के पुत्र चक्रवर्ती भरत के नाम से विख्यात है जो कि जग जाहिर प्रमाण है। विष्णु पुराण में भी इसका ऊल्लेख मिलता है। हमारे देश के प्रधान मंत्री स्व. जवाहर लाल नेहरु ने उड़ीसा के खंडगिरी स्थित खारवेल के शिला लेख पर "भरतस्य भारत" रूप प्रशस्ति को देख कर ही इस देश का संवैधानिक नामकरण भारत किया था। 3.    राजा श्रेणिक, सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य , कलिंग नरेश खारवेल एव सेनापति चामुंडराय , सम्राट संप्रति, सम्राट बिंबिसार, कर्नाटक की रानी अब्बक्का चौटा जैन इतिहास के महान शासक हुए है। 4.     जैन पुराणों के अनुसार सती चंदन बाला, मैना सुंदरी एवं रानी रेवती आदि अ...

णमोकार महामंत्र का महात्म्य

*णमोकार महामंत्र का महात्म्य*   _जैन दर्शन में णमोकार महामंत्र जिसे नमस्कार मंत्र भी कहा जाता है, यह एक पवित्र मंत्र है। यह मंत्र जैन धर्म के मूल सिद्धांतों का प्रतीक है और इसे जैन परम्परा का सबसे प्रमुख एवं सर्व व्यापक मंत्र माना जाता है। इसका उच्चारण करने से साधक को शांति और आत्मिक बल की प्राप्ति होती है। इस मंत्र में किसकी स्तुति की गई है, इस मंत्र की विशेषता और महत्व क्या है ? इस विषय को समझते है।_  *णमोकार महामंत्र-*   *णमो अरिहंताणं,*  *णमो सिद्धाणं*  *णमो आइरियाणं*  *णमो उवज्झायाणं*  *णमो लोएसव्व साहूणं।।*   _अर्थात् नमस्कार हो लोक के सभी अरिहंतो को, नमस्कार हो लोक के सभी सिद्धों को, नमस्कार हो लोक के सभी आचार्यों को, नमस्कार हो लोक के सभी उपाध्यायों को और नमस्कार हो लोक के सभी साधुओं को।_  *णमोकार महामंत्र की विशेषता -*  *1- रचना -* _णमोकार महामंत्र की रचना किसी ने नहीं की है यह स्वयमेव रचा हुआ है, शाश्वत है, अनादिकाल से प्रवर्तमान अनादि अनिधन मंत्र है। इस मंत्र को ईसा की पहली शताब्दी में सर्वप्रथम आचार्य श्री पुष्...

जैन धर्म : समन्वय है, परंतु विलय नहीं (अल्पसंख्यक दर्ज़े पर उठते प्रश्न और जैन समाज की स्वतंत्र पहचान)

*जैन धर्म : समन्वय है, परंतु विलय नहीं*  (अल्पसंख्यक दर्ज़े पर उठते प्रश्न और जैन समाज की स्वतंत्र पहचान) डॉ.इंदु जैन  सलाहकार अल्पसंख्यक आयोग भारत की सांस्कृतिक परंपरा का सबसे बड़ा गुण उसकी विविधता और सहअस्तित्व की भावना है। यहाँ अनेक धार्मिक धाराएँ, संप्रदाय और दार्शनिक परंपराएँ हजारों वर्षों से साथ-साथ विकसित हुई हैं। इसी बहुलतावादी परंपरा ने भारतीय समाज को एक अनोखी पहचान दी है। जैन धर्म भी इसी प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक धारा की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट परंपरा है। किंतु समय-समय पर यह प्रश्न उठाया जाता रहा है कि जैन धर्म की स्वतंत्र पहचान क्या वास्तव में अलग है या वह केवल हिंदू धर्म की एक शाखा भर है। हाल के वर्षों में यह बहस फिर से सामने आई है, विशेषकर तब जब कुछ राजनीतिक व्यक्तित्व जैन समाज के अल्पसंख्यक दर्ज़े पर पुनर्विचार की बात कर रहे हैं और व्यर्थ की बयानबाजी कर रहे हैं ।  यह स्मरण रखना आवश्यक है कि जैन समाज को राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्ज़ा वर्ष 2014 में प्रदान किया गया था। यह निर्णय किसी आकस्मिक राजनीतिक घोषणा का परिणाम नहीं था, बल्कि लंबे समय से चल...

ऋषभनाथ/ आदिनाथ: भारत के युगपुरुष

  ऋषभनाथ/ आदिनाथ: भारत के युगपुरुष                  मयूर मल्लिनाथ वग्यानी, सांगली, महाराष्ट्र,                   9422707721 ऋषभनाथ जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे। वह मौजूदा चौबीस तीर्थंकरों में से पहले थे, जिन्हें आदिनाथ के नाम से भी जाना जाता है।  उनका जन्म अयोध्या शहर में नाभि और रानी मरुदेवी के घर हुआ था। वह क्षत्रिय इश्वकु परिवार से थे।  ऋषभनाथ ने मनुष्यों को छः मुख्य व्यवसाय सिखाये। ये थे: (1) असि (रक्षा के लिए तलवारें), (2) मसि (लेखन कौशल), 3) कृषि, 4) विद्या (ज्ञान), 5) वाणिज्य और 6) शिल्प (शिल्प)।जैन धर्म में, ऋषभनाथ को मनुष्य को जीवित रहने के लिए आवश्यक सभी कौशल सिखाने का श्रेय दिया जाता है. इतिहासकार पॉल डुंडा के अनुसार, जैन पौराणिक कथाओं में ऋषभनाथ न केवल एक आध्यात्मिक गुरु थे, बल्कि उन्होंने अपने ज्ञान के विभिन्न रूपों को भी स्थापित किया था.   ऋषभनाथ की दो पत्नियाँ थीं सुनंदा और यशस्वती। यशस्वती के सौ पुत्र और चक्रवर्ती भारती सहित एक पुत्री ब्राह्मी (जिसके ना...