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बारस अणुवेक्खा की सर्वोदया टीका

बारस अणुवेक्खा की सर्वोदया टीका का वैशिष्ट्य और इसके कुछ चिन्तन बिन्दु : –प्रोफेसर फूलचंद जैन प्रेमी, वाराणसी        तीर्थंकर महावीर क वाणी को अपने द्वारा रचित अनुपम शास्त्रों के माध्यम से हम तक पहुचाने वाले प्राचीन जैनाचार्यों में प्रथम शती के महान् आचार्य कुन्दकुन्द का विशिष्ट स्थान है। इसीलिए तो तीर्थंकर महावीर की परम्परा में गौतम गणधर के बाद आचार्य कुन्दकुन्ददेव का नाम स्मरण करते हुए मंगलाचरण किया जाता है- मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ।। शौरसेनी प्राकृत साहित्य के पंचास्तिकाय, प्रवचनसार, समयसार, नियमसार, अष्टपाहुड़, बारस अणुवेक्खा तथा दस भक्तियाँ जैसे अनेक उत्कृष्ट आगमिक ग्रन्थरत्नों के सर्जक हैं आचार्य कुन्दकुन्द। इनमें भी इनका समयसार ग्रन्थ तो एकमात्र अध्यात्म प्रधान ऐसा उत्कृष्ट ग्रन्थ है, जिसकी सम्पूर्ण विश्व साहित्य में कोई तुलना ही नहीं है। इसी तरह इनके अन्य सभी ग्रन्थ अपने-अपने विषय के बेजोड़ ग्रन्थरत्न  हैं। इनके प्रमुख ग्रन्थों पर आचार्य अमृतचन्द्र, आचार्य जयसेन, आचार्य प‌द्मप्रभ मलधारीकृत बड़ी ही महत...
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एक सरल चित्र और जीवन का अर्थ

ये एक सरल चित्र है, लेकिन बहुत ही गहरे अर्थ के साथ। आदमी को पता नहीं है कि नीचे सांप है और महिला को नहीं पता है कि आदमी भी किसी पत्थर से दबा हुआ है। महिला सोचती है: - ‘मैं गिरने वाली हूं और मैं नहीं चढ़ सकती क्योंकि साँप मुझे काट रहा है।"  आदमी अधिक ताक़त का उपयोग करके मुझे ऊपर क्यों नहीं खींचता! आदमी सोचता है:- "मैं बहुत दर्द में हूं फिर भी मैं आपको उतना ही खींच रहा हूँ जितना मैं कर सकता हूँ! आप खुद कोशिश क्यों नहीं करती और कठिन चढ़ाई को पार कर लेती । आदमी को ये नहीं पता है कि औरत को सांप काट रहा है । नैतिकताः- आप उस दबाव को देख नहीं सकते जो सामने वाला झेल रहा है, और ठीक उसी तरह सामने वाला भी उस दर्द को नहीं देख सकता जिसमें आप हैं। यह जीवन है, भले ही यह काम, परिवार, भावनाओं, दोस्तों, के साथ हो, आपको एक-दूसरे को समझने की कोशिश करनी चाहिए, अलग अलग सोचना, एक-दूसरे के बारे में सोचना और बेहतर तालमेल बिठाना चाहिए। हर कोई अपने जीवन में अपनी लड़ाई लड़ रहा है और सबके अपने अपने दुख हैं। इसीलिए कम से कम जब हम अपनों से मिलते हैं तब एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करने के बजाय एक...

जैन दर्शन में प्रमाण

जैन दर्शन में प्रमाण  सभा के मध्य विराजमान थे पूज्य आचार्यश्री विद्यानंद। नगर के प्रसिद्ध विद्वान पंडित देवदत्त वहाँ पहुँचे। वे तर्कशक्ति में प्रखर, शास्त्र-अध्ययन में निपुण और वाद-विवाद में विख्यात थे; पर अपने ज्ञान पर उन्हें बड़ा गर्व भी था। देवदत्त ने कहा— “आचार्य, मेरी एक जिज्ञासा है। मनुष्य सत्य को पहचाने कैसे? मेरी समझ में तो वही बात सत्य कही जा सकती है, जिसे हम अपनी आँखों से देखें, कानों से सुनें या किसी न किसी इंद्रिय से ग्रहण कर सकें। जो दिखाई ही न दे, उसे सत्य कैसे मान लिया जाए? क्या जो प्रत्यक्ष है, वही अंतिम प्रमाण नहीं है?” सभा में हल्की-सी सरगर्मी फैल गई। सभी की दृष्टि आचार्यश्री पर टिक गई। आचार्यश्री ने अत्यंत शांत स्वर में सामने रखे एक घड़े की ओर संकेत किया और बोले— “पंडित जी, पहले मेरे एक प्रश्न का उत्तर दीजिए। यह घड़ा आपको कैसा दिखाई दे रहा है?” देवदत्त ने सहज भाव से कहा— “गुरुदेव, यह तो खाली दिखाई दे रहा है।” आचार्यश्री ने पूछा— “अच्छा, यदि यह खाली है, तो क्या इसमें कुछ भी नहीं है?” देवदत्त ने उत्तर दिया— “जो आँखों से दिख रहा है, उसी के अनुसार तो यही कहूँगा कि इस...

आचार्य भद्रबाहु को ही आचार्य कुन्दकुन्द का गुरु मानना अधिक उपयुक्त* : डॉ. फूलचन्द्र जैन प्रेमी, वाराणसी

*आचार्य भद्रबाहु को ही आचार्य कुन्दकुन्द का गुरु मानना अधिक उपयुक्त* : डॉ. फूलचन्द्र जैन प्रेमी, वाराणसी *आचार्य कुन्दकुन्द और उनका दिव्य अवदान* तीर्थंकर महावीर और गौतम गणधर के बाद की उत्तरवर्ती जैन आचार्य परम्परा में अनेक महान् आचार्यों का नाम श्रद्धापूर्वक लिया जाता है; जिनके अनुपम व्यक्तित्व और कर्तृत्व से भारतीय चिन्तन, अनुप्राणित हो कर चतुर्दिक प्रकाश की किरणें फैलाता रहा है, किन्तु इन सब में अब से दो हजार (अथवा लगभग 2400) वर्ष पूर्व युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द ऐसे प्रखर प्रभात के समान महान् आचार्य हुए, जिनके महान आध्यात्मिक चिन्तन से सम्पूर्ण भारतीय मनीषा प्रभावित हुई और उसने एक अद्भुत मोड़ लिया। यही कारण है कि इनके परवर्ती भी आचार्यों ने अपने को उनकी परम्परा का आचार्य मानकर उनकी सम्पूर्ण विरासत से जुड़ने में अपना गौरव माना तथा उनकी मूल-परम्परा तथा ज्ञान-गरिमा को एक स्वर से श्रेष्ठ मान्य करते हुए कहा - *मंगलं भगवदो वीर, मंगलं गोदमो गणी।* *मंगलं कोण्डकुंदाइं, जेण्ह धम्मोत्थु मंगलं॥* [ मंगलं भगवान् वीरो, मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो, जैनधर्मो$स्तु मंगलम्॥ ] अर्थात् तीर्थं...

वेदों में बलिप्रथा

वेदों में बलिप्रथा (पुनः प्रेषित) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ आज कल बहुत से लोग ऑडियो और वीडियो तथा बातचीत में यह बताने का प्रयास करते है कि बलि प्रथा या मांस भक्षण वेदकाल से होता रहा है। जानकारी के अभाव में या तो हम चर्चा नही करते या कन्नी काटने लगते है। ब्राह्मण होंने पर धर्म है की हम कुछ बाते जो आधार है अवश्य जाने और निश्चय ही उनका निवारण भी करें। हिन्दू -धर्म में सर्वत्र निर्दोषों के प्रति अहिंसा बरतने का ही प्रतिपादन किया गया है और सर्वत्र हिंसा का निषेध। वेदों से लेकर पुराणों तक में पशु-बलि का कहीं भी समर्थन नहीं मिलता। कुछ महाज्ञानी जिव्हा के प्रभाव में वैदिक साहित्य की ऐसी व्याख्या कर देते है कि अर्थ का अनर्थ हो जाता है, वैदिक साहित्य की जानकारी न होने की वजह से सामान्य जन उनकी बातों को सत्य मान लेते है। हम भारत मे प्रचलित बली प्रथा को समझने से पहले हम पहले ये देख लेते है कि क्या वास्तव में वैदिक साहित्यो में जीव हिंसा बलि प्रथा आदि बाते है  ।। जब कोई अंधा होता है तो सोचता है कि सभी अंधे हो जाये और यही कारण था कि पश्चिमी सभ्यता ने जब भारतीय सभ्यता पर अतिक्रमण करना शुरू किया तो सबसे पह...

शांति धारा

आइए हम शांति धारा को समझते हैं :- ॐ नमः सिद्धेभ्यः। श्री वीतरागाय नमः`   *अर्थ:* सभी सिद्ध भगवान को नमस्कार। जो राग-द्वेष से दूर हो चुके हैं उन वीतराग भगवान को नमस्कार। `ॐ नमो अर्हते भगवते, श्रीमते पार्श्वतीर्थंकराय...`   *अर्थ:* भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार जो 12 सभाओं से घिरे हैं, शुक्ल ध्यान से पवित्र हैं, सब कुछ जानने वाले हैं, स्वयं प्रकट हुए हैं, बुद्ध हैं, परमात्मा हैं, तीनों लोक में महिमा वाले हैं। *2. "छिंद - छिंद भिंद - भिंद" का मतलब क्या है* ये सबसे अहम हिस्सा है। यहां भगवान से प्रार्थना है कि हमारे सभी दुख *काट दो, तोड़ दो, नष्ट कर दो*। *किन चीजों को काटने को बोल रहे हैं:* - *मृत्यु छिंद* = मौत का डर खत्म कर दो - *अतिकामं छिंद* = हद से ज्यादा वासना नष्ट कर दो   - *रतिकामं छिंद* = गलत इच्छाएं खत्म कर दो - *क्रोध छिंद* = गुस्सा नष्ट कर दो - *अग्निभयं छिंद* = आग का डर खत्म करो - *सर्वशत्रु भयं छिंद* = सभी दुश्मनों का डर खत्म करो - *सर्वोपसर्गं छिंद* = सभी उपद्रव/संकट खत्म करो - *सर्वविघ्नं छिंद* = सारे काम में रुकावटें खत्म करो - *सर्वभयं छिंद* = हर...

संस्कृत कवि धनपाल

संस्कृत कवि धनपाल                                प्रो फूलचंद जैन प्रेमी  कवि धनपाल ११वीं शताब्दी के संस्कृत साहित्य के एक देदीप्यमान नक्षत्र और राजा भोज के अत्यंत प्रिय दरबारी कवि थे।  व्यक्तिगत परिचय और कालखंड  समय:उनका मुख्य कालखंड १०वीं शताब्दी का उत्तरार्ध और ११वीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है। वे परमार वंश के राजा मुंज और उनके भतीजे राजा भोज के समकालीन थे। पारिवारिक पृष्ठभूमि:  धनपाल का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सर्वदेव था। हालांकि उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था, लेकिन अपने छोटे भाई शोभन मुनि के प्रभाव में आकर उन्होंने जैन धर्म स्वीकार कर लिया था। साहित्यिक योगदान धनपाल अपनी विलक्षण कल्पना शक्ति और संस्कृत एवं प्राकृत भाषाओं पर समान अधिकार के लिए जाने जाते हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं: तिलकमंजरी: यह उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना है, जो संस्कृत गद्य काव्य (कथा) की श्रेणी में आती है। इसकी तुलना बाणभट्ट की 'कादंबरी' से की जाती है। राजा भोज ने इस ग्रं...