यदि आप मांस का भोजन करते हैं, तो यह मनुष्यता से बाहर है. क्योंकि आप जिस भी प्राणी का मांस खायेंगे, वह प्राणी भी किसी न किसी की तो संतान होगा ही. क्या हम अपनी संतान को मार कर खा सकते हैं ? यदि नहीं, तो हमें दूसरे की संतान को मार कर खाने का क्या अधिकार है ? क्या मानव अधिकार आयोग सिर्फ मानवों के अधिकार की ही रक्षा के लिए बना है ? क्या पशु पक्षियों के अधिकारों की रक्षा की चिंता उसको नहीं करनी चाहिए. क्या पशु पक्षियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोई आयोग बनाने की हिम्मत करेगा ? सम्पूर्ण मानवता की ओर से स्वागत है उन महापुरुषों का, जो पशु पक्षियों के अधिकारों की रक्षा के लिए आयोग बनायेंगे.
ब्राह्मी लिपि : उद्भव और विकास - श्रीमती डा. मुन्नी पुष्पा जैन, वाराणसी भाषा के बाद अभिव्यक्ति का सबसे अधिक सशक्त माध्यम ‘लिपि' है। ‘लिपि' किसी भाषा को चिन्हों तथा विभिन्न आकारों में बांधकर दृश्य और पाल्य बना देती है। इसके माध्यम से भाषा का वह रूप हजारों वर्षों तक सुरक्षित रहता है। विश्व में सैकड़ों गाषाए तथा सैकड़ों लिपियों हैं। भाषा का जन्म लिपि से पहले होता है, लिपि का जन्म बाद मे। प्राचीन शिलालेखों से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में ब्राह्मीलिपि ही प्रमुखतया प्रचलित रही है और यही बाह्मी लिपि अपने देश के समृद्ध प्राचीन ज्ञान-विज्ञान ,संस्कृति,इतिहास आदि को सही रूप में सामने लाने में एक सशक्त माध्यम बनी। सपाट गो मापवं ने/ इस ब्राह्मी लिपि में शताधिक शिलालेख लिखवाकर ज्ञान लिाप और भाषा को सदियों तक जीवित रखने का एक क्रांतिकारी कदम उठाया था। सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में ब्राह्मी लिपि के रहस्य को समझने के लिए पश्चिमी तथा पूर्वी विद्वानों ने जो श्रम किया उसी का प्रतिफल है कि आज हम उन प्राचीन लिपियो को पढ़-समझ पा रहे है...
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