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जैन धर्म : समन्वय है, परंतु विलय नहीं (अल्पसंख्यक दर्ज़े पर उठते प्रश्न और जैन समाज की स्वतंत्र पहचान)

*जैन धर्म : समन्वय है, परंतु विलय नहीं*  (अल्पसंख्यक दर्ज़े पर उठते प्रश्न और जैन समाज की स्वतंत्र पहचान) डॉ.इंदु जैन  सलाहकार अल्पसंख्यक आयोग भारत की सांस्कृतिक परंपरा का सबसे बड़ा गुण उसकी विविधता और सहअस्तित्व की भावना है। यहाँ अनेक धार्मिक धाराएँ, संप्रदाय और दार्शनिक परंपराएँ हजारों वर्षों से साथ-साथ विकसित हुई हैं। इसी बहुलतावादी परंपरा ने भारतीय समाज को एक अनोखी पहचान दी है। जैन धर्म भी इसी प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक धारा की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट परंपरा है। किंतु समय-समय पर यह प्रश्न उठाया जाता रहा है कि जैन धर्म की स्वतंत्र पहचान क्या वास्तव में अलग है या वह केवल हिंदू धर्म की एक शाखा भर है। हाल के वर्षों में यह बहस फिर से सामने आई है, विशेषकर तब जब कुछ राजनीतिक व्यक्तित्व जैन समाज के अल्पसंख्यक दर्ज़े पर पुनर्विचार की बात कर रहे हैं और व्यर्थ की बयानबाजी कर रहे हैं ।  यह स्मरण रखना आवश्यक है कि जैन समाज को राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्ज़ा वर्ष 2014 में प्रदान किया गया था। यह निर्णय किसी आकस्मिक राजनीतिक घोषणा का परिणाम नहीं था, बल्कि लंबे समय से चल...