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जैन धर्म : समन्वय है, परंतु विलय नहीं (अल्पसंख्यक दर्ज़े पर उठते प्रश्न और जैन समाज की स्वतंत्र पहचान)

*जैन धर्म : समन्वय है, परंतु विलय नहीं* 

(अल्पसंख्यक दर्ज़े पर उठते प्रश्न और जैन समाज की स्वतंत्र पहचान)


डॉ.इंदु जैन 
सलाहकार अल्पसंख्यक आयोग


भारत की सांस्कृतिक परंपरा का सबसे बड़ा गुण उसकी विविधता और सहअस्तित्व की भावना है। यहाँ अनेक धार्मिक धाराएँ, संप्रदाय और दार्शनिक परंपराएँ हजारों वर्षों से साथ-साथ विकसित हुई हैं। इसी बहुलतावादी परंपरा ने भारतीय समाज को एक अनोखी पहचान दी है। जैन धर्म भी इसी प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक धारा की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट परंपरा है। किंतु समय-समय पर यह प्रश्न उठाया जाता रहा है कि जैन धर्म की स्वतंत्र पहचान क्या वास्तव में अलग है या वह केवल हिंदू धर्म की एक शाखा भर है। हाल के वर्षों में यह बहस फिर से सामने आई है, विशेषकर तब जब कुछ राजनीतिक व्यक्तित्व जैन समाज के अल्पसंख्यक दर्ज़े पर पुनर्विचार की बात कर रहे हैं और व्यर्थ की बयानबाजी कर रहे हैं । 

यह स्मरण रखना आवश्यक है कि जैन समाज को राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्ज़ा वर्ष 2014 में प्रदान किया गया था। यह निर्णय किसी आकस्मिक राजनीतिक घोषणा का परिणाम नहीं था, बल्कि लंबे समय से चली आ रही संवैधानिक और वैचारिक बहसों का निष्कर्ष था। जैन समुदाय की जनसंख्या भारत की कुल आबादी का लगभग 0.4 प्रतिशत है, जो कि देश के अनेक अन्य समुदायों की तुलना में अत्यंत कम है। इस दृष्टि से जैन समाज वस्तुतः एक अल्पसंख्यक समुदाय है। अतः यह निर्णय किसी विशेष सुविधा देने का नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक विसंगति को सुधारने का प्रयास था।

जब यह निर्णय घोषित हुआ, तब समाज में मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। जैन समाज में प्रसन्नता का वातावरण था, क्योंकि लंबे समय से चली आ रही एक मांग पूरी हुई थी। दूसरी ओर कुछ लोगों ने आशंका व्यक्त की कि इससे समाज में विभाजन की भावना उत्पन्न होगी। कुछ लोगों ने यह भी प्रश्न उठाया कि जैन तो हिंदू समाज का ही हिस्सा हैं, फिर उन्हें अलग अल्पसंख्यक दर्ज़ा देने की आवश्यकता क्यों पड़ी।

दरअसल इन प्रश्नों के पीछे एक मूलभूत भ्रम छिपा हुआ है—अल्पसंख्यक शब्द का अर्थ क्या है। भारत में “अल्पसंख्यक” का अर्थ किसी धर्म से अलगाव या राष्ट्र से दूरी नहीं है। बौद्ध, सिख, ईसाई और पारसी समुदाय भी भारत में अल्पसंख्यक हैं, लेकिन इससे उनकी भारतीयता या सांस्कृतिक पहचान पर कोई आंच नहीं आती। उसी प्रकार जैन समाज का अल्पसंख्यक दर्ज़ा भी केवल यह स्वीकार करता है कि उसकी अपनी स्वतंत्र धार्मिक परंपरा और पहचान है।

जैन धर्म की विशेषता उसके गहरे और विशिष्ट दर्शन में निहित है। अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह और आत्मशुद्धि की साधना उसके मूल स्तंभ हैं। चौबीस तीर्थंकरों की परंपरा, जैन आगम साहित्य, साधु-संघ की कठोर अनुशासन व्यवस्था और मोक्षमार्ग की विशिष्ट अवधारणा जैन धर्म को भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में एक अलग स्थान प्रदान करती है। यह केवल एक सांस्कृतिक धारा नहीं बल्कि एक पूर्ण विकसित धार्मिक और दार्शनिक परंपरा है।

निस्संदेह जैन धर्म और हिंदू समाज के बीच सांस्कृतिक निकटता रही है। अनेक सामाजिक परंपराएँ, त्योहार और जीवन-मूल्य दोनों समुदायों में समान दिखाई देते हैं। किंतु सांस्कृतिक समानता का अर्थ धार्मिक विलय नहीं होता। भारत की सभ्यता का स्वभाव ही ऐसा रहा है कि यहाँ विभिन्न धार्मिक धाराएँ एक-दूसरे के साथ संवाद करती रही हैं और एक-दूसरे से प्रेरणा भी लेती रही हैं।

वास्तव में “हिंदू” शब्द कई बार एक व्यापक सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक होता है, जिसमें भारत में उत्पन्न अनेक धार्मिक परंपराएँ सम्मिलित हैं। इस दृष्टि से जैन, बौद्ध और सिख परंपराएँ भी भारतीय संस्कृति की धारा से जुड़ी हुई हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उनकी स्वतंत्र धार्मिक पहचान समाप्त हो जाती है या उन्हें किसी एक धर्म की शाखा मान लिया जाए।

आज जो लोग यह कहते हैं कि जैन धर्म को अलग अल्पसंख्यक दर्ज़ा देने की आवश्यकता नहीं है, उन्हें यह भी समझना चाहिए कि अल्पसंख्यक दर्ज़ा केवल आर्थिक लाभ का विषय नहीं है। भारतीय संविधान में अल्पसंख्यकों को जो अधिकार दिए गए हैं, उनका मुख्य उद्देश्य उनकी भाषा, संस्कृति और शिक्षण संस्थाओं का संरक्षण करना है। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई ताकि छोटे समुदाय भी अपनी परंपराओं और धरोहरों को सुरक्षित रख सकें।

कभी-कभी यह तर्क भी दिया जाता है कि जैन समाज आर्थिक रूप से समृद्ध है, इसलिए उसे किसी संरक्षण की आवश्यकता नहीं है। यह भी एक सामान्यीकृत धारणा है। समाज का एक छोटा हिस्सा भले ही आर्थिक रूप से संपन्न हो, किंतु पूरे समुदाय को उसी कसौटी पर नहीं आँका जा सकता। इसके अतिरिक्त किसी समुदाय की आर्थिक स्थिति उसके धार्मिक अधिकारों का आधार नहीं होती।

जैन समाज की पहचान उसके नैतिक मूल्यों से बनती है। अहिंसा, संयम, सादगी और शिक्षा के प्रति गहरा आग्रह जैन जीवन का मूल आधार है। यही कारण है कि जैन समाज ने व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा और सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है। लेकिन इन उपलब्धियों के साथ एक जिम्मेदारी भी जुड़ी है—अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के प्रति सजग रहना।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझने की आवश्यकता है—समन्वय और विलय में मूलभूत अंतर होता है। जैन धर्म ने सदैव समन्वय की भावना को अपनाया है। अनेकांतवाद का सिद्धांत ही यह सिखाता है कि सत्य को अनेक दृष्टियों से समझा जा सकता है। इसलिए जैन समाज ने कभी किसी अन्य धर्म या संस्कृति से संघर्ष का मार्ग नहीं अपनाया।

परंतु समन्वय का अर्थ अपनी स्वतंत्र पहचान को समाप्त कर देना नहीं है। यदि किसी समुदाय की विशिष्ट धार्मिक पहचान ही धीरे-धीरे विलुप्त होने लगे, तो उसकी परंपराएँ और दार्शनिक विरासत भी कमजोर पड़ सकती हैं।

भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में निहित है। यहाँ अनेक धार्मिक परंपराएँ मिलकर एक विशाल सांस्कृतिक वृक्ष का निर्माण करती हैं। इस वृक्ष की प्रत्येक शाखा का अपना महत्व है। यदि किसी शाखा को यह कहकर समाप्त कर दिया जाए कि वह उसी वृक्ष का हिस्सा है, तो इससे उस वृक्ष की समृद्धि ही घटेगी।

अतः आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय समाज विविधता के इस मूल सिद्धांत को समझे। जैन धर्म भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग अवश्य है, किंतु वह अपनी स्वतंत्र धार्मिक पहचान और दर्शन के साथ अस्तित्व में है। इस स्वतंत्रता का सम्मान करना ही भारतीय लोकतंत्र और सांस्कृतिक परंपरा की सच्ची भावना है।

समन्वय भारतीयता की शक्ति है, लेकिन विलय उसकी कमजोरी बन सकता है। इसलिए जैन समाज के लिए भी और व्यापक भारतीय समाज के लिए भी यही उचित होगा कि सहयोग, सम्मान और संवाद की भावना के साथ प्रत्येक धार्मिक परंपरा की स्वतंत्र पहचान को सुरक्षित रखा जाए। यही भारत की बहुलतावादी आत्मा का वास्तविक सम्मान होगा।

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