जैन दर्शन में प्रमाण सभा के मध्य विराजमान थे पूज्य आचार्यश्री विद्यानंद। नगर के प्रसिद्ध विद्वान पंडित देवदत्त वहाँ पहुँचे। वे तर्कशक्ति में प्रखर, शास्त्र-अध्ययन में निपुण और वाद-विवाद में विख्यात थे; पर अपने ज्ञान पर उन्हें बड़ा गर्व भी था। देवदत्त ने कहा— “आचार्य, मेरी एक जिज्ञासा है। मनुष्य सत्य को पहचाने कैसे? मेरी समझ में तो वही बात सत्य कही जा सकती है, जिसे हम अपनी आँखों से देखें, कानों से सुनें या किसी न किसी इंद्रिय से ग्रहण कर सकें। जो दिखाई ही न दे, उसे सत्य कैसे मान लिया जाए? क्या जो प्रत्यक्ष है, वही अंतिम प्रमाण नहीं है?” सभा में हल्की-सी सरगर्मी फैल गई। सभी की दृष्टि आचार्यश्री पर टिक गई। आचार्यश्री ने अत्यंत शांत स्वर में सामने रखे एक घड़े की ओर संकेत किया और बोले— “पंडित जी, पहले मेरे एक प्रश्न का उत्तर दीजिए। यह घड़ा आपको कैसा दिखाई दे रहा है?” देवदत्त ने सहज भाव से कहा— “गुरुदेव, यह तो खाली दिखाई दे रहा है।” आचार्यश्री ने पूछा— “अच्छा, यदि यह खाली है, तो क्या इसमें कुछ भी नहीं है?” देवदत्त ने उत्तर दिया— “जो आँखों से दिख रहा है, उसी के अनुसार तो यही कहूँगा कि इस...