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भारतवर्ष नामकरण - परम्परा एवं प्रमाण

भारतवर्ष नामकरण - परम्परा एवं प्रमाण
(एक प्रामाणिक आलेख)

डॉ शुद्धात्मप्रकाश जैन
निदेशक, के जे सोमैया जैन अध्ययन केंद्र, सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय, मुम्बई

भारत हमारा देश है और हम सब भारतवासी हैं. इस भारत के निवासियों को भारतीय कहा जाता है. यद्यपि हमारी भारतभूमि को प्राचीन काल से ही विविध नामों से अभिहित किया जाता रहा है, यथा-इंडिया, हिंदुस्तान हिन्दुस्तां आदि. लेकिन यह नाम हमारे देश को या तो दूसरों के द्वारा दिए गए हैं या एकांगी है, जैसे कि इस देश में प्रवाहित सिंधु नदी को इण्डस कहने के कारण इंडिया नाम दिया गया. इसी प्रकार पुराकाल में - 'स' वर्ण को 'ह'  के रूप में उच्चारित करने के कारण इसे हिन्दु कहा गया और मुस्लिम शासकों ने इसे हिन्दुस्तां कहकर पुकारा.  यह सभी नाम सर्वांगीण ना होने के कारण हमारे देश के गौरव को कम करते रहे.

यही कारण है कि हमारे देश का नाम भारत ही अधिक श्रेष्ठ और गौरवपूर्ण होगा, क्योंकि इसका हमारे प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास से सीधा संबंध है. इसका सविस्तार उत्तर इस आलेख में स्पष्ट किया ही जा रहा है. आज हमारे देश को पूरे विश्व में इंडिया के नाम से जाना जाता है, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है.

देश का नाम इंडिया से बदलकर भारत करने के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट में WP(C) क्रमांक 000 422/ 20202 को स्वीकार करके तदनुसार देश का वास्तविक नाम भारत रखने की अपील की गई है.  इस केस की सुनवाई चल रही है.  यद्यपि इस बारे में कहा गया है कि हमारे देश का पहले से नाम भारत है,  किन्तु अब इस नाम को ही बढ़ावा दिया जाएगा.

तो आइए!  यह जानने का प्रयास करें कि इसका नाम भारतवर्ष ही क्यों होना चाहिए. जैसा कि 'भारत' शब्द से ही यह स्पष्ट होता है कि इसका नाम किसी न किसी भरत के नाम से सुनिश्चित हुआ क्योंकि भरत से संबंधित को ही भारत कहा जाता है.

उपर्युक्त संदर्भ में भारत नामक तीन महापुरुषों के साथ इसका संबंध बताया जाता है जो कि निम्न हैं :
1. ऋषभ पुत्र भरत
2. दशरथ पुत्र भरत एवं
3. दुष्यंत पुत्र भरत.
यद्यपि यह सच है कि उक्त तीनों ही भरत महान पराक्रमी, शूरवीर और महापुरुष के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन यह निर्णय करना आवश्यक है कि किस भरत के नाम से हमारे देश का नाम भारत पड़ा.  इस संदर्भ में डॉक्टर प्रेम सागर जैन का कथन उल्लेखनीय है -"राम के भाई भरत कभी राज सिंहासन पर नहीं बैठे अतः उनके आधार पर इस देश के नामकरण का प्रश्न ही नहीं उठता. कतिपय विद्वानों ने दौष्यन्ति भरत के नाम को मूलाधार स्वीकार किया है. यह स्वाभाविक था. कालिदास के 'शाकुंतलम्' की विश्वविख्याति ने दौष्यन्ति भरत को जनमानस में प्रतिष्ठित कर दिया. उसी को लोग इस देश के 'भारत' नाम का मूलमंत्र मान बैठे."

इस विषय पर गंभीर विचार करने पर और अनेक उद्धरणों को देखने पर स्थिति एकदम साफ हो जाती है कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती के नाम पर ही हमारे देश का नाम भारत पड़ा है.  भरत चक्रवर्ती ने जम्बूद्वीप के संपूर्ण भरतक्षेत्र (पृथ्वी) को जीतकर उसका स्वामित्व प्राप्त किया, जिसके कारण उस सम्पूर्ण भरतक्षेत्र का एक नाम भारतवर्ष पड़ गया.

यहां ध्यातव्य है कि उस सम्पूर्ण क्षेत्र का एक नाम भरत तो जैनदर्शन के अनुसार अनादि से ही सुनिश्चित रहा है. और यह संयोग ही कहा जाएगा कि प्रथम चक्रवर्ती ऋषभपुत्र का नाम भी भरत था, अतः उस क्षेत्र का नाम भी भरत और उस चक्रवर्ती के नाम भी भरत था. जैसा कि यह स्पष्ट किया जा चुका है कि भरत से संबंधित को भारत कहा जाता है. यह घटना असंख्य वर्षों पूर्व होने के कारण कालक्रम से भारत की सीमा भी संकुचित होती चली गई और आज हम भारत को एक निश्चित भौगोलिक भूभाग के रूप में जानते हैं.

अब यह अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि भारत तो ठीक लेकिन उसके साथ वर्ष क्यों लिखा जाता है. इस संदर्भ में मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि पुराकाल में क्षेत्र के लिए वर्ष शब्द का प्रयोग किया गया है.  जम्बूद्वीप में स्थित छह पर्वतों से विभाजित होने के कारण उसके सात क्षेत्रों को वर्ष कहा गया है.  जैसा कि आचार्य उमास्वामी के द्वारा आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व रचित तत्वार्थसूत्र में इसका प्रयोग इस प्रकार हुआ है -
(1) भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैहैरण्यवतैरावतवर्षा: क्षेत्राणि ।।10।।
(2) तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनीलरुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वता ।।11।।

ये दोनों सूत्र तत्वार्थसूत्र के तृतीय अध्याय के दसवें और ग्यारहवें सूत्र हैं. दसवें सूत्र में जम्बूद्वीप के साथ क्षेत्रों को 'वर्ष' के नाम से कहा गया है, जैसे भरतवर्ष, हेमवतवर्ष, हरिवर्ष, विदेहवर्ष आदि. ग्यारहवें सूत्र में इन क्षेत्रों के विभाजन के आधारभूत छह पर्वतों को 'वर्षधर' कहा गया है.  जैसा कि आपको विदित होगा कि पृथ्वी का एक पर्यायवाची 'क्षिति' भी होने के कारण पर्वतों को क्षितिघर कहा जाता है.  उसी प्रकार यहां उन पर्वतों को वर्षधर कहा गया है. स्पष्ट हो जाता है कि यहां क्षेत्र का नाम वर्ष है.

इस प्रकार उस क्षेत्र को वर्ष तथा उसके भरत से संबंधित होने के कारण भारतवर्ष कहा गया. यह नाम बहुत वर्षों तक चलता रहा. किंतु मध्य-मध्य में परिस्थितिजन्य और भी अनेक नामों का प्रयोग इस देश के लिए हुआ, जैसे आर्यावर्त, आर्यखण्ड,  हिन्दुस्तान आदि. किन्तु जब सन 1949 में भारतीय संविधान का निर्माण हुआ और इसके प्रचलित विभिन्न नामों में से किसी सर्वाधिक उपयुक्त नाम का चयन करना था, तब देश के उपयुक्त नाम के लिए प्रमाण एकत्रित करने का प्रयास किया गया. और उसी क्रम में विविध साक्ष्यों, पुस्तकीय आधारों और शिलालेखों को प्रमाण के रूप में खोजा गया तो उड़ीसा राज्य की
हाथीगुंफा में उल्लिखित सम्राट खारवेल के एक शिलालेख में इसका नाम भारतवर्ष प्राप्त हुआ जो कि ब्राह्मी लिपि और प्राकृतभाषा में होने के कारण वहां 'भरदवस्स' शब्द लिखा था.  उस समय हिंदुस्तान नाम को इसलिए स्वीकार नहीं किया गया] यह नाम हमें मुस्लिम शासकों ने दिया. अतः भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भारत शब्द का ही प्रयोग कियाा गया है।

हमारे देश के नाम भारत की प्रामाणिकता प्रस्तुत करते हुए आचार्य अकलंक ने तत्वार्थवार्तिक में लिखा है, जिसका हिंदी भाव है --"अभिप्राय यह है कि भरत क्षत्रिय के योग से यह क्षेत्र भरत कहलाया है.  अयोध्या नाम की नगरी में सर्वराजलक्षण से संपन्न भरत नाम के चक्रवर्ती हैं, छह खण्ड के अधिपति हुए हैं, जिन्होंने इसे सर्वप्रथम भोगा है, अतः इस क्षेत्र को भारतवर्ष -- ऐसा कहते हैं.

इसी प्रकार का भाव आचार्य जिनसेन ने महापुराण में अभिव्यक्त किया है "भरत से पूर्व इस देश का नाम भरत के पिता नाभिराय के नाम पर 'नाभिखण्ड' या 'अजनाभवर्ष' कहा जाता था.  पुरुदेवचम्पू में भी इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हुए -- महाकवि अहर्दददास ने लिखा है कि --"उसके नाम से (भरत के नाम से) यह देश भारतवर्ष प्रसिद्ध हुआ --ऐसा इतिहास है. हिमवान  कुलाचल से लेकर लवणसमुद्र तक का यह क्षेत्र चक्रवर्तियों का क्षेत्र कहलाता है. 

सूरसागर में भी सूरदास जी ने लिखा है कि-
बहुरो रिषभ बड़े जब भये,
नाभिराज दे वन को गए।
रिषभ राज पर जा सुख पायो,
जस ताको सब जग में छायो।।
रिषभदेव जब वन को गए,
नवसुत नवौ खण्ड नृप भए।
भरत सो भरतखण्ड को राव,
करे सदा ही धर्म अरु न्याव।।

उपर्युक्त हिंदी छंद का अर्थ अति सरल है कि भरत ने भरतखंड के राजा बनकर धर्म और न्याय से प्रजा को सुख प्रदान किया.  
यहां अभी तक कुछ प्रमुख जैन ग्रन्थों के प्रमाण प्रस्तुत किये गये, लेकिन न केवल जैनग्रन्थों में, अपितु हिन्दू ग्रन्थों में भी इस बात के प्रबल प्रमाण उपलब्ध होते हैं, जो इसप्रकार हैं-
 अग्निपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
सर्वप्रथम ‘अग्निपुराण’ का निम्नलिखित कथन द्रष्टव्य है-
जरामृत्युभयं नास्ति धर्माधर्मौ युगादिकम्।
नाधमं मध्यमं तुल्या हिमादेशात्तु नाभितः।।
ऋषभो मरुदेव्यां च ऋषभाद् भरतोऽभवत्।
भरतात् भारतं वर्षं भरतात् सुमतिस्त्वभूत।। 
अर्थात् उस हिमवत् प्रदेश में जरा और मृत्यु का भय नहीं था, धर्म और अधर्म भी नहीं थे, सर्वत्र मध्यम भाव- समभाव था। वहां नाभिराजा की पत्नी मरूदेवी से ऋषभ का जन्म हुआ। ऋषभ से भरत हुए। ऋषभ ने भरत को राज्यश्री प्रदान कर संन्यास ले लिया। तब भरत से ही इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ हुआ।
श्रीमद्भागवत में भरत से भारत नामकरण का उल्लेख-
इसीप्रकार श्रीमद्भागवत के अनुसार भी ऋषभपुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम भारत सुनिश्चित हुआ- ‘‘अजनाभं नामैतद्वर्षं भारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति।’’  अर्थात् ‘अजनाभवर्ष’ ही आगे चलकर ‘भारतवर्ष’  संज्ञा से अभिहित हुआ। यहां अजनाभ भगवान ऋषभदेव के लिए प्रयुक्त शब्द है, जो भारतदेश पहले ऋषभ के नाम पर था, वही भारतदेश पश्चात् भरत के नाम से कहा जाने लगा। अथवा ‘‘येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठः श्रेष्ठगुण आसीत् येनेदं वर्षं भारतमिति व्यपदिशन्ति।’’  अर्थात् श्रेष्ठ गुणों के आश्रयभूत, महायोगी भरत अपने सौ भाइयों में श्रेष्ठ थे, उन्हीं के नाम पर इस देश को ‘भारतवर्ष’ कहते हैं।
आग्नीध्रसूनोर्नाभेस्तु ऋषभोऽभूत् सुतो द्विजः।
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताद् वरः।।
सोऽभिषिच्यर्षभः पुत्रं महाप्राव्राज्यमास्थितः।
तपस्तेपे   महाभागः   पुलहाश्रमसंश्रयः।। 
अर्थात् अग्नीध्र-पुत्र नाभि से ऋषभ उत्पन्न हुए। उनसे भरत का जन्म हुआ, जो अपने सौ भाइयों में अग्रज था। महाभाग्यशाली ऋषभ ने ज्येष्ठ पुत्र भरत का राज्याभिषेक कर महाप्रवज्या ग्रहण की और ‘पुलह’ आश्रम में तप किया। 
 मार्कण्डेयपुराण के अनुसार-  
आग्नीध्रसूनोर्नाभेस्तु ऋषभोऽभूत् सुतो द्विजः।
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताद् वरः।।
सोऽभिषिच्यर्षभः पुत्रः महाप्राव्राज्यमास्थितः।
तपस्तेपे महाभागः पुलहाश्रमसंश्रयः।।
हिमाह्वं दक्षिणं वर्षं भरताय पिता ददौ।
तस्मात्तु भारतं वर्षं तस्य नाम्ना महात्मनः।।
अर्थात् अग्नीध्र-पुत्र नाभि से ऋषभ उत्पन्न हुए। उनसे भरत का जन्म हुआ, जो अपने सौ भाइयों में अग्रज था। महाभाग्यशाली ऋषभ ने ज्येष्ठ पुत्र भरत का राज्याभिषेक कर महाप्रव्रज्या ग्रहण की और ‘पुलह’ आश्रम में तप किया। ऋषभ ने भरत को ‘हिमवत’ नामक दक्षिण प्रदेश शासन के लिए दिया था। उस महात्मा ‘भरत’ के नाम से इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ हुआ।
ब्रह्माण्डपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
नाभिस्त्वजनयत् पुत्रं मरुदेव्यां महाद्युतिम्।
ऋषभं पार्थिवश्रेष्ठं सर्वक्षत्रस्य पूर्वजम्।।
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताग्रजः।
सोऽभिषिच्यर्षभः पुत्रं महाप्रव्रज्यया स्थितः।। 
अर्थात् नाभि ने मरुदेवी से महाद्युतिवान् ‘ऋषभ’ नाम के पुत्र को जन्म दिया। ऋषभदेव ‘पार्थिव श्रेष्ठ’ और ‘सब क्षत्रियों के पूर्वज’ थे। उनके सौ पुत्रों में वीर ‘भरत’ अग्रज थे और ऋषभ ने उनका राज्याभिषेक कर महाप्रव्रज्या ग्रहण की। 
स्कन्दपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
नाभेः पुत्रश्च ऋषभः ऋषभाद् भरतोऽभवत्।
तस्य नाम्ना त्विदं वर्षं भारतं चेति कीत्र्यते।। 
अर्थात् नाभि का पुत्र ऋषभ हुआ, ऋषभ का पुत्र भरत हुआ। उसी भरत के नाम से यह देश ‘भारत’ कहा जाता है।
लिंगपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख--
नाभिस्त्वजनयत् पुत्रं मरुदेव्यां महामतिः।
ऋषभं पार्थिवश्रेष्ठं सर्वक्षेत्रसुपूजितम्।।
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताग्रजः।
सोऽभिषिच्याथ ऋषभो भरतं पुत्रवत्सलः।।
ज्ञानवैराग्यमाश्रित्य जित्वेन्द्रियमहोरगान्।
सर्वात्मनात्मनि स्थाप्य परमात्मानमीश्वरम्।।
नग्नो जटी निराहारोऽचीवरो ध्वान्तगतो हि सः।
निराशस्त्यक्तसन्देहः शैवमाप परं पदम्।। 
महामति नाभि को मरुदेवी नाम की धर्मपत्नी से ‘ऋषभ’ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह ऋषभ नृपतियों में उत्तम था और सम्पूर्ण क्षत्रियों द्वारा सुपूजित था। ऋषभ से भरत की उत्पत्ति हुई, जो अपने सौ भ्राताओं में अग्रजन्मा था। पुत्र-वत्सल ऋषभदेव ने भरत को राज्यपद अभिषिक्त किया और स्वयं ज्ञान-वैराग्य को धारण कर, इन्द्रियरूपी महान् सर्पों को जीत सर्वभाव से ईश्वर परमात्मा को अपनी आत्मा में स्थापित कर तपश्चर्या में लग गये। वे उस समय नग्न थे, जटायुक्त, निराहार, वस्त्ररहित तथा मलिन थे। उन्होंने सब आशाओं का त्याग कर दिया था, सन्देह का परित्याग कर परमशिवपद को प्राप्त कर लिया था। 
वायुपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख--
नाभिस्त्वजनयत् पुत्रं मरुदेव्यां महामतिः।
ऋषभं पार्थिवश्रेष्ठं सर्वक्षत्रस्य पूर्वजम्।।
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताग्रजः।
सोऽभिषिच्याथ भरतं पुत्रं प्रावाज्यमात्थितः।। 
अर्थात् नाभि के मरुदेवी से महाद्युतिवान् ‘ऋषभ’ नाम के पुत्र को जन्म दिया। ऋषभदेव ‘पार्थिव श्रेष्ठ’ और ‘सब क्षत्रियों के पूर्वज’ थे। उनके सौ पुत्रों में वीर ‘भरत’ अग्रज थे और ऋषभ ने उनका राज्याभिषेक कर महाप्रव्रज्या ग्रहण की।
नारदपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
आसीत् पुरा मुनिश्रेष्ठः भरतो नाम भूपतिः।
आर्षभो यस्य नाम्नेदं भारतं खण्डमुच्यते।।
स राजा प्राप्तराज्यस्तु पितृपैतामहं क्रमात्।
पालयामास धर्मेण पितृवद्रंजयन् प्रजाः।। 
अर्थात् पूर्व समय में मुनियों में श्रेष्ठ भरत नाम के राजा थे। वे ऋषभदेव के पुत्र थे। उन्हीं के नाम से यह देश ‘भारतवर्ष’ कहा जाता है। उस राजा भरत ने राज्य प्राप्त कर अपने पिता-पितामह की तरह से ही धर्मपूर्वक प्रजा का पालन-पोषण किया था।
शिवपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
नाभेः पुत्रश्च ऋषभः ऋषभाद् भरतोऽभवत्।
तस्य नाम्ना त्विदं वर्षं भारतं चेति कीत्र्यते।। 
तात्पर्य यह है कि नाभि का पुत्र ऋषभ हुआ, ऋषभ का पुत्र भरत हुआ। उसी भरत के नाम से इस देश को ‘भारत’ कहा जाता है।
वराहपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
नाभिर्मरुदेव्यां पुत्रमजनयत् ऋषभनामानं तस्य भरतः
पुत्रश्च तावदग्रजः तस्य भरतस्य पिता ऋषभः।
हेमाद्रेर्दक्षिणं वर्षं महद् भारतं नाम शशास।। 
तात्पर्य यह है कि नाभि ने अपनी स्त्री मरूदेवी से ऋषभ नाम के पुत्र को उत्पन्न किया। वह अपने सहोदरों से ज्येष्ठ था, उसके पिता स्वयं ऋषभ थे। उसी भरत ने हिमालय से लेकर दक्षिण पर्यन्त सम्पूर्ण क्षेत्र को शासित किया, इसलिए यह क्षेत्र भारतवर्ष के नाम से जाना जाता है। 
 
कूर्मपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
हिमाह्वयं तु यद्वर्षं नाभेरासीन्महात्मनः।
तस्यर्षभोऽभवत्पुत्रो मरुदेव्यां महाद्युतिः।।
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रः शताग्रजः।
सोऽभिषिच्यर्षभः पुत्रः भरतं पृथिवीपतिः।। 
उपर्युक्त श्लोक में भी इसी प्रकार का अर्थ व्यक्त किया गया है कि नाभि के मरुदेवी से महाद्युतिवान् ‘ऋषभ’ नाम के पुत्र को जन्म दिया। उनके शत पुत्रों में अग्रज भरत राज्याभिषिक्त होकर पृथ्वीपति हुए।
विष्णुपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
न ते स्वस्ति युगावस्था क्षेत्रेष्वष्टसु सर्वदा।
हिमाह्वयं तु वै वर्षं नाभेरासीन्महात्मनः।।
तस्यर्षभोऽभवत्पुत्रो मरुदेव्यां महाद्युतिः।
ऋषभाद्भरतो जज्ञे ज्येष्ठः पुत्रशतस्य सः।। 
इस श्लोक में भी उपर्युक्त अर्थानुसार ऋषभपुत्र भरत के नाम से ही भारतदेश के नामकरण की बात कही गई है। तथापि कुछ लोग अज्ञानवश कभी दशरथपुत्र भरत अथवा दुष्यन्तपुत्र भरत के नाम से भारतदेश के नामकरण की बात करते हैं, जो कि उपर्युक्त उद्धरणों से पूरी तरह खण्डित हो चुका है। 

डा. वासुदेवशरण अग्रवाल ने भी एक बार दुष्यन्तपुत्र भरत के नाम पर ‘भारत’ के नामकरण की बात लिखी थी, किन्तु बाद में उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी भूल को स्वीकार किया और लिखा कि- ‘‘मैंने अपनी ‘‘भारत की मौलिक एकता’’ नामक पुस्तक के पृष्ठ 22-24 पर दौष्यन्तिक भरत से भारतवर्ष लिखकर भूल की थी। इसकी ओर मेरा ध्यान कुछ मित्रों ने आकर्षित किया। उसे अब सुधार लेना चाहिए।’’
यहां भी ऋषभपुत्र भरत का ही उल्लेख है, किन्तु इतना स्पष्ट होने पर भी कुछ लोग अज्ञानवश कभी दशरथपुत्र भरत अथवा दुष्यंतपुत्र भरत के नाम से भारत देश के नामकरण की बात करते हैं जो कि उपर्युक्त उद्धरण से पूरी तरह खंडित हो चुका है. यह अत्यंत स्पष्ट हो चुका है कि ऋषभपुत्र भरत के नाम पर ही हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा. जैसाकि हम उपरि-उद्धृत अनेक ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं में देख चुके हैं. अतः यथा शीघ्र हमारे देश को भारतवर्ष नामकरण होना चाहिए क्योंकि यही नाम है जो हमें ब्रिटिश शासकों की दासता भरी यादों से मुक्त करता है और गौरवपूर्ण इतिहास की याद दिलाता है.

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