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शाकाहार क्यों ?

नमस्कार मित्रों मैं बोल रहा हूँ
 प्रो अनेकांत  
भारत से 

आज आप से कुछ बात करना चाहते हैं। आजकल मन की बात कहने का दौर चला है। इसलिए मेरी भी इच्छा हुई कि कुछ मन की बात आप लोगों के साथ करूँ। यदि आप के पास समय हो पाँच मिनिट की फुर्सत हो तो आज मेरे मन की बात सुन लीजिए। हो सकता है ये मेरे मन की बात आपके मन की बात भी बन जाए। बहुत समय से बात कहने की इच्छा थी लेकिन पता नहीं ऐसा परिवेश ऐसी परिस्थितियां खड़ी हुई है कि हम कभी धर्म के नाम पर, कभी जातियों के नाम पर, कभी संप्रदाय के नाम पर, कभी क्षेत्र के नाम पर इतने ज्यादा विभाजित है कि आज सही बात करना भी गुनाह हो गया है। हर सच्चाई किसी ना किसी मतलब से सामने निकल रही है।
 कभी सच्चाई को इस रूप में भी हमें देखना चाहिए कि यह  मेरे लिए है इसका किसी संप्रदाय से, धर्म से, मज़हब से जाती से कोई मतलब नहीं है। हम मनुष्य है, मानव है और एक सच्चे मानव के रूप में भी कभी हमें उन चीजों पर विचार करना चाहिए जो हमारी आत्मा से जुडी हुई है। किन कारणों से हमारी आत्मा दूषित होती है। हम अपनी आत्मा की शुद्धि कैसे कर सकते हैं?
 मनुष्य के रूप में जन्म लेकर हम अपने जन्म को सार्थक किस रूप में कर सकते हैं?
 आइए कुछ विचार करते हैं, सोचते हैं मेरे साथ। आप भी सोचिए हमें मौत पसंद नहीं है। ना मुझे खुद की मौत पसंद है और ना मुझे अपने लोगों की मौत पसंद है। कोई अपना चला जाए, किसी अपने को दुःख हो, चाहे हमारे बच्चे हो, चाहे हमारे माँ बाप हो, चाहे हमारे रिश्तेदार हो तो हमें बहुत तकलीफ होती है। हम किसी कीमत पर नहीं चाहते कि उनको खरोच भी आए। अपनी मृत्यु और अपनों की मृत्यु बहुत डरावनी लगती है ना। लेकिन आश्चर्य है कि दूसरों की मौत का हम उत्सव मनाते हैं, उसको Celebrate करते हैं। कभी किसी मज़हब के उत्सव के नाम पर, कभी किसी जश्न में, कभी मनोरंजन के लिए हम दूसरों की मौत का आनंद लेते हैं। क्या हम ऐसे मनुष्य है? मौत के स्वाद का चटकारा लेते हैं
 थोड़ा कठिन कह रहा हूँ पर मन की बात है सुन लेना हमें मौत से प्यार नहीं है लेकिन मौत के स्वाद से प्यार है बकरे का, तीतर का, मुर्गे का, हलाल का, बिना हलाल का ताजा बच्चे का भुना हुआ छोटी मछली, बडी मछली अरे हलकी आँच पर सिखा हुआ Leg Piece चाहिए ना जाने कितने बल्कि अनगिनत स्वाद है हमारे पास मौत के क्यों?
 क्योंकि मौत किसी और की है और स्वाद हमारा है। स्वाद का एक व्यापार बन गई है - "मौत" | हम मौत से स्वाद का कारोबार करते हैं। मुर्गीपालन मछली पालन, बकरीपालन, पोल्ट्री फॉर्म, नाम पालन का और मकसद हत्या! स्लॉटर हाउस तक खोल दिए। कारखाने चल रहे हैं और वो भी अफिशल अनुमति पूर्वक गली गली में खुले Non Veg Restaurant मौत का कारोबार नहीं है तो क्या है?
 मौत से प्यार और उसका कारोबार इसलिए क्योंकि मौत हमारी नहीं है। वो जानवर, वो जीव जंतु जो हमारी तरह बोल नहीं सकते, अपने दर्द को हम से कह नहीं सकते, अपनी सुरक्षा स्वयं करने में समर्थ नहीं हो पा रहे हैं और उनकी इस कमजोरी को हमने अपना बल मान लिया है। हमने कैसे मान लिया कि उनमें भावनाएं नहीं होती या उनकी आहे  नहीं निकलती। डाइनिंग टेबल पर हड्डियाँ नोचते हुए बाप बच्चों को सिख देता है बेटा कभी किसी का दिल मत दुखाना, किसी की आहे मत लेना। किसी की आँख में तुम्हारी वजह से आंसू नहीं आना चाहिए। बच्चों में झूठे संस्कार डालते माँ बाप उनको अपने हाथ में वो हड्डी दिखाई नहीं देती जो इससे पहले शरीर थी। जिसके अंदर इससे पहले एक आत्मा थी उसकी भी कोई माँ थी जिसे काटा गया होगा, जो कर रहा होगा जो तडपा होगा जिसकी
 आहे निकली होंगी जिसने बद्दुआ भी दी होगी कैसे कैसे मान लिया कि जब जब धरती पर अत्याचार बढेंगे तो भगवान सिर्फ तुम इंसानों की रक्षा के लिए अवतार लेंगे। भगवान को लेकर भी कितने स्वार्थी हो तुम?
 क्या मूक जानवर उस परम पिता परमेश्वर को खुदा को गॉड को पसंद नहीं है क्या ये उनकी संतान  नहीं है?
 क्या उन्हें इन की रक्षा की चिंता नहीं है?
 जब करोना वाइरस उन जानवरों के लिए ईश्वर के अवतार से कम नहीं था। जब से इस तरह के वायरस ने कहर बरसाया आपने देखा होगा जानवर स्वच्छंद घूम रहे थे। पक्षी चहचहा रहे थे। उन्हें पहली बार इस धरती पर अपना भी कुछ अधिकार जैसा नजर आया था। पेड़ पौधे ऐसे लहरा  रहे थे जैसे उन्हें नई जिंदगी मिल गई हो। पूरी पृथ्वी को सांस लेना आसान हो गया था क्योंकि तुम ने उनका जीना दूभर कर दिया था। श्रृष्टि के द्वारा रचित करोड़ों करोड़ों योनियों में से एक करोना ने हमें हमारी औकात बता दी। घर में घुस घुस के मारा अभी भी मार रहा है और उसका हम सब कुछ नहीं बिगाड़ सकते। आज
 हमने देखा कि करोना से पीड़ित लोग भगवान के घरों में घंटियां बजा रहे थे। उनके दर पर इबादत कर रहे थे, प्रेयर कर रहे थे, भीख मांग रहे थे कि हमें बचा लो! लेकिन वो बचा नहीं पा रहे थे। हम किस मुँह से उनके सामने भीख मांग रहे थे। धर्म की आड़ में उस परम पिता के नाम पर अपने स्वाद के लिए कभी ईद पर बकरे काटते हो। कभी दुर्गा माँ या भैरव बाबा के सामने बकरे की बलि चढाते हो। कभी God को खुश करने के लिए उनके सामने क़त्ल करते हो। कभी तुम अपने स्वाद के लिए उस भगवान के सामने मछली का भोग लगाते हैं। कभी उनको शराब चढाते हो, कभी सोचा है
 क्या ईश्वर, खुदा, अल्लाह या भगवान का कोई स्वाद होता है?
 क्या है उनका भोजन? वो क्या खाते हैं?
 अरे हम किसको ठग रहे हैं भगवान को खुदा को, ईश्वर को अल्लाह को ? या सिर्फ खुद को। मंगलवार को मैं नॉनवेज नहीं खाता। अभी आज शनिवार है। मैं इसलिए नहीं खाता हूँ। अरे मैं हज पर गया, वहाँ पे इहराम की हालत में पशु पक्षी तो छोड़ो पेड़ पत्तों को भी कष्ट देना गुनाह है। नवरात्रि! नवरात्री में तो कान पकड़ो, कभी शराब, अंडा, मांस को हाँथ भी नहीं लगाता हूँ। झूठ! झूठ पर झूठ कब तक?
 कब तक झूठ पर झूठ बोलते रहो। कैसे कैसे कुतर्क करते हो?
 अरे तुम तो कहते हो फल सब्जियों में भी जान होती है फिर उसको क्यों खाते हो?
 अरे नादान तुझे फल सब्जियों में और जानवरों में अंतर नजर नहीं आता है। इतने मूर्ख और  भोले हो तुम? सुनो फल सब्जियाँ संसर्ग नहीं करती, ना ही वो किसी प्राण को जन्म देती है। इसलिए उनका भोजन गलत नहीं है। ईश्वर ने बुद्धि सिर्फ तुम को दी, मनुष्यों  को दी किस लिए दी? ताकि तमाम योनियों में भटकने के बाद इस मानव योनि में जन्म लेने के बाद तुम इस जन्म मरण के चक्कर से दूर हो सको, उसका रास्ता निकल सको, अपनी आत्मा को प्राप्त कर सको, परमात्मा बन सको, तुम सुखी हो सको। लेकिन तुम ने इस मनुष्य योनि को पाते ही स्वयं को भगवान समझ लिया। तुम सोचते हो तुम जो करोगे, वही होगा। अब तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाए। किस अहंकार में मनुष्य जी रहा है हमने करोना जैसे रूप में मौत अपने सामने देखी है। प्रकृति का
 बदला देखा है उसका दंड देखा है। तुम ही कहते थे ना कि हम जो प्रकृति को देंगे वही प्रकृति हमें लौटाएगी। सुनो मौत दी है हमने प्रकृति को तो वो मौत ही लौटा रही है आज! चलो बढ़ो गले लगा लो उस मौत को क्योंकि वो तुम्हारे घर के अंदर घुस गई है। इसके बाद भी बुद्धि  नहीं आ रही है। समझ में नहीं आ रहा है जीव के स्वाद के लिए कितने निष्ठुर अब कितने निर्दयी हो गए हो तुम तुम्हें ये भी नहीं समझ में आ रहा है कि ये संकेत है उस खुदा का, उस ईश्वर का, उस अल्लाह का, भगवान का, गॉड का वो ये कह रहा है की प्रकृति के साथ रहो तुम प्रकृति से शाकाहारी हो मैंने तुम्हारे दांत नुकीले नहीं बनाए।
 मैंने तुम्हारी लार टपकती हुई जीभ नहीं बनाई। मैंने तुम्हें पानी पीने को कहा है लीलने को नहीं कहा क्योंकि ये सब मांसाहारी हैं! जानवर करते हैं ! शाकाहारी लोग नहीं करते। तुम प्रकृति से शाकाहारी हो। मांसाहार तुम्हारा स्वभाव नहीं है, तुम ने जबरदस्ती उसको अपने जीवन में ओढ़ लिया है और अपने जीवन का अंग बना लिया है। इसलिए, प्रकृति को स्वीकार करो! यदि तुम प्रकृति के साथ चलोगे, प्रकृति के होकर रहोगे तो प्रकृति तुम्हारी सहायता करेगी। तुम्हें सुखी होने में तुम्हारी मदद करेगी। नहीं तो भगवान अपनी ही बनाई कई योनियों को धरती से हमेशा के लिए विलुप्त कर चुका है। ये प्रकृति जिसने समस्त योनियों का निर्माण किया, उसने अपनी ही कई योनियों को धरती से विलुप्त कर दिया
 और ऐसा उसे करने में  वक़्त नहीं लगेगा। तुम्हें पता है जब भूकंप आता है, तुम्हारे घर टूटते हैं, अब तुम उसमें दब के मर जाते हो तो तुम सोचते हो भूकंप क्यों आ रहा है?
 जो सुनामी आती है तुम्हारा सबकुछ डुबो देती है। जब बाढ़ आती है, तुम्हारा सब खत्म कर देती है, तुम्हारे बनाए महल ढहा देती है, सब कुछ डुबो के रख देती है। अब तुम सोचते हो, रीसर्च करते हो, अनुसंधान करते हो, ऐसा क्यों हो रहा है?
 मैंने क्या गलत किया? इतने भोले बन जाते हो तुम ने कभी नहीं सोचा कि तुमने मछलियों को मारा है जो नदियों में रहती है। नदी सिर्फ तुम्हारे लिए नहीं बह रही थी। समुद्र सिर्फ तुम्हारे लिए नहीं था, उनके लिए भी है जो लाखों करोड़ो जीवन में रहते हैं। तुम ने उनको अपने स्वाद के लिए मारा, अपने व्यापार के लिए मारा तो प्रकृति तुमसे नाराज़ हो गई। तुमने इस पृथ्वी पर लाखों करोड़ों जीवों को मारा है। असहाय और निर्दोष लोगों को मारा है, उनको खाया है तो प्रकृति तुमसे नाराज हो गई है । प्रकृति अपना बदला ले रही है। भगवान कुछ नहीं करता है, सिर्फ जानता है और देखता है कि तुम क्या कर रहे हो। ये सृष्टि का निर्माण किसी ने नहीं किया है। इस सृष्टि का निर्माण स्वयं हुआ है। सृष्टि ने स्वयं अपनी सृष्टि की है और उसने अपने नियम स्वयं बनाए और सिर्फ तुम्हारे लिए नहीं बनाए हैं। संपूर्ण जीव राशि के लिए बनाए हैं। सभी जानवरों के लिए बनाए हैं। सभी जंतुओं के लिए बनाए हैं। ये
 पृथ्वी सिर्फ  तुम्हारे लिए नहीं है। तुम धर्म के नाम पर, मज़हब  के नाम पर, प्रकृति की इन संतानों को खाते हो, इन्हें ख़त्म  करते हो तो इन संतानों की चींख  समुद्र भी सुनता है, धरती भी सुनती है, उसे दुख होता है। वो अपने अंदर का दर्द व्यक्त करते हैं। तब जाकर के भूकंप आते  है, सुनामी आती है। कभी सोचा है इसके बारे में नहीं क्योंकि हम इतने स्वार्थी हो गए अपने धर्म को लेकर अपने मज़हब को लेकर के हमारे यहाँ तो ये धर्म है हमारा तो ये मज़हब है कभी किसी खुदा ने किसी भगवान ने ईश्वर ने नहीं कहा कि किसी जीव को खाओ लेकिन हमने ऐसी परिभाषाएं गढ़ ली अपने स्वाद के लिए ऐसा करेंगे तो हमारा स्वाद बना रहेगा। सोचना! आज मैं अपने मन की बात आपसे कह रहा हूँ। सोचना इस बारे में कहीं हम इस जीवन में कोई बहुत बड़ी भूल तो नहीं कर रहे हैं?
 छोटे- छोटे बच्चे मांस की बोटियां नोच नोचकर खाते हैं। उनके इस भोलेपन में क्रूरता का बीज, संस्कार कौन दे रहा है?
 हम उन्हें क्या सिखा रहे हैं?
 हम उन्हें सिखाते हैं कि तुम मुझसे प्रेम करो, मेरा सम्मान करो, मेरा आदर करो लेकिन दूसरे जीवों को खाओ। उन्हें अपना भोजन बनाओ । प्रकृति अपना बदला जरूर लेती है। अब कोई अपना बदला ले ना ले। हमें ये सोचना है कि हम मनुष्य है और प्रत्येक  मनुष्य का धर्म होता है। ये ना हिंदू हैं, ना मुसलमान है, ना सिख है, ना इसाई है, ना बौद्ध है, ना जैन है, किसी भी धर्म का नहीं बल्कि  मनुष्य का धर्म है कि मैं अपने पेट को कब्रिस्तान ना बनाऊं। मैं जिंदा जीवों को मारकर या मरवाकर या मरे हुए जीवों को  खाकर अपना पेट ना भरूं। ये जो मेरा शरीर है मैं मनुष्य हूँ। मेरे अंदर एक परमात्मा विराजमान है। जब कभी भी भोजन करो तो ये बात सोचना की मुझे उस परमात्मा को अर्घ देना है
 और मैं उसको अर्घ  में क्या दूँ?
 मैं अपने मुँह के अंदर क्या डालूँ जो परमात्मा को स्वीकार हो। मेरे देह के अंदर एक आत्मा है जो परमात्मा बन सकती है। उस आत्मा  को कौन सा अर्घ दूँ! कितना शुद्ध अर्घ  दूँ ऐसा अर्घ  दूँ जो किसी को दुखी ना करता हो। किसी को कष्ट ना पहुँचाता हो, किसी को मौत ना देता हूँ। ये मेरा जीवन है। मुझे जीने का अधिकार है जिस तरह मुझे जीने का अधिकार है। इसी तरह इस संसार के सभी जीवों को जीने का अधिकार है। हमने मानव अधिकार आयोग बना दिए ताकि मानव के अधिकारों की रक्षा हो सके। लेकिन हम अभी तक जीवों की रक्षा के लिए कोई जीवाधिकार नहीं बना पाए। जीवाधिकार आयोग नहीं बना पाए। सभी जीव जंतुओं की रक्षा के लिए भी उनका अधिकार है। इसलिए, कभी विचारना! कभी सोचना! एक क्षण के लिए यदि जीवन में यह  बात उतर जाए तो मेरा जीवन बदल जायेगा। चलो प्रकृति की ओर चलते हैं। मांसाहार का जीवनभर के लिए त्याग करते हैं! और शाकाहारी बनते हैं! धन्यवाद।
 प्रस्तुति
प्रो अनेकांत जैन 

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