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अनेकांत और स्याद्वाद के संबंध में कुछ आधुनिक मनीषियों के उद्गार

 अनेकांत और स्याद्वाद के संबंध में कुछ आधुनिक मनीषियों के उद्गार

जिन आधुनिक मनीषियों ने अनेकांत और स्याद्वाद प्रणाली पर मनन कर उनके संबंध में निष्पक्ष भाव से उनकी यथार्थता, उपयोगिता तथा महत्व पर जो अपने उद्गार समय—समय पर प्रकट किये है उनमें से कुछ का संकलन उन्हीं के शब्दों में निम्नलिखित है— गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज बनारस के भूतपूर्व प्रिंसिपल श्री मंगलदेवजी शास्त्री ने लिखा है कि—

‘भारतीय दर्शन के इतिहास में जैन दर्शन की एक अनोखी देन (अनेकान्त) है। यह स्पष्ट है कि किसी तत्व के विषय में कोई भी तात्विक दृष्टि एकान्तिक नहीं हो सकती, प्रत्येक तत्व में अनेकरूपता स्वाभाविक होनी चाहिये और कोई भी दृष्टि उन सबका एक साथ तात्विक प्रतिपादन नहीं कर सकती। इसी सिद्धांत को जैन दर्शन की परिभाषा में अनेकांत दर्शन कहा गया है। जैनदर्शन का तो यह आधार स्तम्भ है ही, वास्तव में इसे प्रत्येक दार्शनिक विचारधारा के लिये भी आवश्यक मानना चाहिये। बौद्धिक स्तर पर इस सिद्धांत के मान लेने पर मनुष्य के नैतिक और बौद्धिक व्यवहार में भी एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आ जाता है। चरित्र ही मानव जीवन का सार है। चरित्र के लिये मौलिक आवश्यकता इस बात की है कि एक ओर तो मनुष्य अभिमान से अपने को पृथक् रखे साथ ही हीनभावना से भी अपने को बचाये। स्पष्टत: यह मार्ग कठिन है।

वास्तविक अर्थों में जो अपने स्वरूप को या मान्यताओं को समझकर आत्मसम्मान करता है और साथ ही दूसरे व्यक्तित्व को भी उतना ही सम्मान देता है वही उपर्युक्त दुष्कर मार्ग का अनुगामी बन सकता है। इसी से सारे नैतिक समुत्थान में व्यक्तित्व का समादर एक मौलिक महत्व रखता है। जैनदर्शन के उपर्युक्त अनेकांत दर्शन का महत्व इसी सिद्धांत के आधार पर है कि उसमें एक व्यक्ति का उसके विचारों या अभिप्रायों का सम्मान निहित है।
जहाँ व्यक्ति का समादर होता है वहाँ स्वभावत: साम्प्रदायिक संकीर्णता संघर्ष या किसी भी छल, जाति, वितंडा जैसे असदुपाय आदि से पराजय की प्रवृत्ति बनी रह सकती। व्यवहारिक जीवन में भी खण्डन पर समन्वयात्मक निर्माण की प्रवृत्ति ही वहाँ रहती है। साध्य ही पवित्रता के साथ—साथ साधन की पवित्रता का महान् आदर्श भी उक्त सिद्धांत के साथ ही रह सकता है। इस प्रकार अनेकांत दर्शन नैतिक उत्थान के साथ—साथ व्यवहार शुद्धि के लिये भी जैन दर्शन की एक महान देन है।
‘विचार जगत का अनेकांत दर्शन ही नैतिक जगत में आकर अिंहसा के व्यापक सिद्धांत का रूप धारण कर लेता है। इसीलिये जहाँ अन्य दर्शनों में परमत खण्डन पर बल दिया गया है वहाँ जैन दर्शन का मुख्य ध्येय अनेकांत सिद्धान्त के आधार पर वस्तु स्थिति मूलक विभिन्न मतों का समन्वय रहा है। वर्तमान जगत की विचारधारा की दृष्टि से जैनदर्शन के अिंहसा मूलक सिद्धांत का अत्यन्त महत्त्व है आजकल के जगत की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि अपने परम्परागत वैशिष्टय को रखते हुए भी विभिन्न मनुष्य जातियों एक दूसरे के समीप आवें और उनमें एक व्यापक मानवता की दृष्टि का विकास हो। अनेकांत दर्शन (समन्वय दृष्टि) से ही यह संभव हो सकता है।’ इसमें संदेह नहीं कि न केवल भारतीय दर्शन के विकास का अनुगमन करने के लिये, अपितु भारतीय संस्कृति के स्वरूप के उत्तरोत्तर विकास को समझने के लिये भी जैन दर्शन का अत्यन्त महत्व है। भारतीय विचारधारा में अिंहसावाद के रूप में अथवा समन्वयात्मक भावना के रूप में जैन दर्शन और विचारधारा की यह देन है इसको समझे बिना वास्तव में भारतीय संस्कृति के विकास को नहीं समझा जा सकता है।
प्रोपेसर आनंदशंकर बाबूभाई ध्रुव स्याद्वाद के संबंध में लिखते हैं कि—

‘स्याद्वाद को कितने ही लोग संशयवाद कहते हैं—इसे मैं नहीं मानता। स्याद्वाद संशयवाद नहीं है, किन्तु वह एक दृष्टि बिन्दु हम को उपलब्ध करा देता है। विश्व का किस रीति से हमें अवलोकन करना चाहिये—यह हमें सिखाता है। यह निश्चित है कि विभिन्न दृष्टि बिन्दुओं द्वारा निरीक्षण किये बिना कोई भी वस्तु अपने संपूर्ण स्वरूप में नहीं आ सकती। अत: स्याद्वाद पर आक्षेप करना अनुचित है।’ सत्य संप्रदायाचार्य महामहोपाध्याय स्वामी श्रीराम मिश्र शास्त्री ने अपने व्याख्यान में जैन धर्म—दर्शन के विषय में जो कहा था उसके कुछ अंश इस प्रकार है— ‘मैं आपको कहाँ तक कहूँ बड़े—बड़े आचार्यों ने जो अपने ग्रंथों में जैनमत का खण्डन किया है उसे सुन और देख कर हँसी आती है। स्याद्वाद, यह जैन धर्म का अभेद्य किला है, उसके अन्दर वादी प्रतिवादियों के माया मय गोले प्रवेश नहीं कर सकते। जैन धर्म के सिद्धान्त प्राचीन भारतीय तत्वज्ञान और र्धािमक पद्धति के अभ्यासियों के लिये बहुत महत्वपूर्ण है, इसके स्याद्वाद से संपूर्ण सत्य विचारों के द्वार खुल जाते हैं।’
हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी के ही दर्शनशास्त्र (फिलासफी) के प्रोपेसर श्री फणिभूषण अधिकारी लिखते हैं—

‘जैन धर्म के स्याद्वाद सिद्धांत को जितना को जितना गलत समझा जाता है उतना किसी अन्य सिद्धांत को नहीं। यहाँ तक कि श्री शंकराचार्य भी इस दोष से मुक्त नहीं है। उन्होंने भी इस सिद्धांत के प्रति अन्याय किया। ऐसा जान पड़ता है कि उन्होंने इस धर्म के दर्शन शास्त्र के मूल ग्रंथों के अध्ययन करने की परवाह नहीं की।’ सुप्रसिद्ध दार्शनिक विद्वान एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. सम्पूर्णानन्द लिखते हैं— ‘अनेकान्तवाद या सप्तभंगी न्याय जैन दर्शन का प्रमुख सिद्धांत है। प्रत्येक पदार्थ के जो सात अंग या स्वरूप शास्त्रों में कहे गये हैं उनको ठीक रूप से स्वीकार करने में आपत्ति हो सकती है। कुछ विद्वान भी सात में से कुछ को गौण मानते हैं। साधारण मनुष्य को वह समझने में कठिनाई होती है कि एक वस्तु के लिये एक ही समय में ‘‘है और नहीं है’’ दोनों बातें कैसे कहीं जा सकती है ? परन्तु कठिनाई के होते हुए भी वस्तु स्थिति तो ऐसी ही है।’ नागपुर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एवं भूतपूर्व उपकुलपति डॉ. नियोगी लिखते हैं— ‘जैनाचार्यों की यह वृत्ति अभिनंदनीय है कि उन्होंने ईश्वरीय आलोक के के नाम पर अपने उपदेशों में ही सत्य का एकाधिकार नहीं बनाया। इसके फलस्वरूप उन्होंने साम्प्रदायिकता और धर्मांधता के दुर्गुणों को दूर कर दिया। जिसके कारण मानव इतिहास भयंकर द्वंद और रक्तपात के द्वारा कलंकित हुआ। अनेकांतवाद और स्याद्वाद विश्व के दर्शनों में अद्वितीय है।
स्याद्वाद सहिष्णुता और क्षमा का प्रतीक है। वह यह मानता है कि दूसरे व्यक्ति को भी कुछ कहना है। सम्यग्दर्शन और स्याद्वाद के सिद्धांत औद्योगिक पद्धति द्वारा प्रस्तुत की गई जटिल समस्याओं को सुलझाने में अत्यधिक कार्यकारी सिद्ध होंगे।’९ आदि। महात्मा गाँधी ने तो स्याद्वाद और अनेकांत को अपने जीवन में उतार कर अहिंसा के महत्व को उत्कर्ष की चोटी पर पहुँचा दिया था। इस प्रकार अनेकांतवाद और स्याद्वाद वस्तु के स्वरूप को यथार्थ ज्ञान कराने में सहायक तो होता ही है—साथ ही विश्व के एकांतवादी दर्शनों में व्याप्त संकीर्ण वृत्तियों का समन्वय कर उन्हें एकता के सूत्र में पिरोने की उदार पद्धति का अविष्कारक भी स्वयं सिद्ध हो जाता है। यदि विश्व के मतमतांतर अपनी संकुचित विचारधाराओं को उदार बनाकर अनेकांत की व्यापक और निष्पक्ष दृष्टि को अपना लें तो सांप्रदायिकता जन्य विद्वेषों और विवादों का अंत भी सहज संभव हो जाये तो विश्वशांति के लिये अनिवार्य है और आज जिसकी नितांत आवश्यकता है। यह अनेकान्त का सिद्धान्त अनेक वैज्ञानिक समस्याओं, उलझनों को समाप्त करने में भी सक्षम है। वर्तमान में वैज्ञानिक विसंगतियों को समझने में इसका प्रयोग होने लगा है, यह शुभ लक्षण है।

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