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जैन साहित्य और संस्कृति की समृद्ध परम्परा : इसका इतिहास संजोने की आवश्यकता

जैन साहित्य और संस्कृति की समृद्ध परम्परा : इसका इतिहास संजोने की आवश्यकता
                         प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी,
 पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, जैनदर्शन विभाग,
सम्पूर्णानन्द संस्कृतविश्वविद्यालय,वाराणसी। 
       
        भारतीय इतिहास का अध्ययन जब शैशव अवस्था में था, तब कुछ तथाकथित इतिहासकारों की यह भ्रान्त धारणा थी कि जैनधर्म कोई बहुत प्राचीन धर्म नहीं है अथवा यह हिन्दू या बौद्ध धर्म की एक शाखा मात्र है। किन्तु जैसे-जैसे प्राचीन साहित्य, कला, भाषावैज्ञानिक अध्ययन तथा पुरातत्व आदि से सम्बन्धित नये-नये विपुल तथ्य सामने आते गये तथा इनके तुलनात्मक अध्ययन-अनुसन्धान का कार्य आगे बढ़ता जा रहा है वैसे वैसे जैनधर्म-दर्शन, साहित्य एवं संस्कृति की प्राचीनता तथा उसकी गौरवपूर्ण परम्परा को सभी स्वीकार करते जा रहे हैं । 
    अब तो कुछ इतिहासकार विविध प्रमाणों के आधार पर यह भी स्वीकृत करने लगे हैं कि आर्यों के कथित आगमन के पूर्व भारत में जो संस्कृति थी वह श्रमण या आर्हत् संस्कृति होनी चाहिए । इतना ही नहीं वैदिक तथा बौद्ध साहित्य में उपलब्ध अनेकों प्रमाणों के आधार पर जैनधर्म के चौबीस तीर्थंकरों की लम्बी परम्परा में से प्रथम तीर्थंकर ऋषभ, बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ, तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ तथा चौबीसवें एवं अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान महावीर को विद्वान् ऐतिहासिक महापुरूष सिद्ध कर चुके हैं। इसी तरह जैसे-जैसे ऐतिहासिक तथ्यों के अध्ययन अनुसन्धान का कार्य आगे बढ़ेगा, वैसे ही अन्य सभी तीर्थंकर तथा उनकी विशाल परम्परा के गौरवपूर्ण इतिहास को सभी स्वीकृत करेंगे । साहित्य समाज और संस्कृति का दर्पण होता है, इसीलिए समाज एवं संस्कृति की आत्मा साहित्य के भीतर से अपने रूप लावण्य को अभिव्यक्त करती है। इसी कारण साहित्य सामाजिक भावनाओं क्रान्तिमय विचारों एवं जीवन के विभिन्न उत्थान-पतन की विशुद्ध अभिव्यंजना है। इसीलिए साहित्य को सनातन उपलब्धि का साधन माना गया है। कतिपय मनीषियों ने आत्म तथा अनात्म भावनाओं की भव्य अभिव्यक्ति को साहित्य कहा है। यह साहित्य किसी देश समाज या व्यक्ति का सामयिक समर्थक नहीं, बल्कि सार्वदेशिक और सार्वकालिक नियमों से प्रभावित होता है । 
          वस्तुतः महान् जैनाचार्यों ने स्व-पर कल्याण हेतु संयममार्ग पर चलते हुए अपने अनुभूत उच्च तत्त्वज्ञान-विज्ञान, धर्म-दर्शन, साहित्य, संगीत, इतिहास, पुराण, काव्य, गणित, आयुर्वेद, ज्योतिष, कला, कोष एवं व्याकरण तथा बहुमूल्य व्यावहारिक एवं नैतिक जीवन की पद्धतियों से सम्बन्धित एक से बढ़कर एक सहस्रों ग्रन्थों का सृजन किया। अपने देश के ही नहीं, अपितु विश्व के साहित्य मनीषी जिन्होंने जैन साहित्य का गहराई से अवलोकन किया है, वे जैनाचार्यों के समुज्वल ज्ञान एवं अद्भुत प्रतिभा के समक्ष नतमस्तक हुए बिना नहीं रहते। उनका मानना है कि सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति, सभ्यता, समाज, धर्म, राजनीति, और अर्थनीति आदि विभिन्न विधाओं का सम्पूर्ण ज्ञान जैन साहित्य के अध्ययन के बिना अधूरा है.
   बीसवीं शताब्दी के अंतिम पांच-छः दशकों एवं इक्कीसवीं के आरम्भिक दो दशकों तक के काल में जैन साहित्य पर अनुसंधान, अध्ययन-अध्यापन एवं सम्पादन तथा लेखन का कार्य जिस तेजी से हुआ, और जिसके परिणामस्वरूप अप्रकाशित दुर्लभ विशाल साहित्य तथा उसमें निहित ढेर सारी सामग्री की दुर्लभ सूचनायें, विपुल ज्ञान-विज्ञान के नये क्षितिज सामने आये हैं। बहुत सारा प्रकाशित-अप्रकाशित साहित्य भी उपयोगी नये रूप में प्रकाश में आया है। उसकी महत्ता भी निर्विवाद है, किन्तु यह भी सत्य है कि जितना व्यापक उसका अध्ययन-अध्यापन, वह नहीं हुआ प्रचार-प्रसार तथा साहित्य जगत में उसके यथोचित मूल्यांकन होना चाहिए था, । इतना ही नहीं अभी भी बहुत अप्रकाशित साहित्य शेष है। इस सबके बावजूद भारतीय साहित्य के विकास एवं समृद्धि में जैनाचार्यों द्वारा सृजित विपुल एवं विविध विधाओं में उपलब्ध विपुल साहित्य के  अद्वितीय योगदान के यथोचित मूल्यांकन और अध्ययन -अनुसंधान के प्रति कम अरुचि भी चिन्ता का विषय है। अन्यथा क्या बात है कि विविध भाषाओं के सम्पूर्ण भारतीय साहित्य का जो इतिहास उपलब्ध है अथवा लिखा जाता है, उसमें जैन साहित्य की चर्चा नगण्य जैसी ही है, अथवा होती ही नहीं है ।

आज भी आपको ऐसे इतिहास के ग्रन्थ और शोध-प्रबन्ध आदि देखने को मिलेंगे जो महाकाव्य, चम्पूकाव्य, पुराण, आगम, ज्योतिष, गणित, कला एवं संस्कृति आदि विषयों से सम्बन्धित है और अपने आपमें उस विषयक “सम्पूर्ण अध्ययन" की वकालत करते हैं, किन्तु उनमें तद् विषयक जैन-ग्रन्थों तथा उनके रचयिता जैनाचार्यों और उनके योगदान की चर्चा तक नहीं है थोड़ी बहुत होगी भी तो वह दूसरे माध्यमों से उधार ली हुई, अल्प एवं भ्रामक सूचनाओं पर आधारित है। ऐसे कुछ लेखक सीमित लेखन या अनुसंधान में ही अपने कार्य की सम्पूर्णता का अनुभव कर लेते हैं प्रमुख आधारभूत जैन । तथा भारतीय वाङ्मय के ग्रन्थों की उपेक्षा कर देते हैं ।
    मुझे चम्पूकाव्य एवं महाकाव्य तथा पुराण आदि से संबंधित ऐसे स्वीकृत अनेक शोध-प्रबन्ध देखने का अवसर मिला है, जिन्हें शोधकर्ताओं ने अपने सीमित ज्ञान के आधार पर सबकुछ लिखा है, किन्तु उसे यह भी ज्ञात नहीं है कि जैन साहित्य में भी आ० सोमदेव सूरि कृत' यशस्तिलक चम्पू, महाकवि हरिचंद्र कृत 'जीवन्धर चम्पू' तथा आ० जिनसेन कृत पार्श्वोभ्युदय जैसे अनेक महाकाव्य तथा आगम शास्त्र, पुराण, ज्योतिष, गणित,आयुर्वेद आदि अनेक विषयों के एक से बढ़कर एक ग्रन्थ जैन साहित्य के भी उपलब्ध हैं? जब भी संस्कृत गद्य साहित्य के अध्ययन की बात होती है तो मात्र एक बाणभट्ट द्वारा लिखित “कादम्बरी” तक ही चर्चा सीमित रह जाती है, किन्तु जैन साहित्य में संस्कृत गद्य के प्रतिनिधि ग्रन्थ महाकवि धनपाल (१०वीं शती) द्वारा रचित "तिलकमज्जरी” तथा “वाणोच्छिष्टं जगत्सर्वम्” की उक्ति को मिथ्या सिद्ध करने वाले महाकवि वादीभसिंह (ओडयदेव, नवीं शती) द्वारा रचित “गद्यचिन्तामणि’” का नाम लेने वाला भी कोई नहीं है। इसी तरह महाकाव्यों में मात्र कुछ प्रसिद्ध महाकाव्यों को ही सर्वत्र पाठ्यक्रम में स्थान प्राप्त है, जबकि महाकवि हरिचन्द्र(१३वीं शती) द्वारा २१ सर्गों में रचित "धर्मशर्माभ्युदय",आ० जिनसेन के पार्वाभ्युदय तथा बीसवीं शती के महाकवि आ० ज्ञानसागरजी द्वारा लिखित 'जयोदय महाकाव्य' जैसे और भी अनेक उत्तमोत्तम महाकाव्यों की इसलिए उपेक्षा कर देते हैं, चूंकि वे जैन परम्परा के हैं। 

संस्कृत कोशों में मात्र “अमरकोश" का ही अध्ययन अध्यापन विशेष प्रचलन वहीं है,
 हेमचन्द्राचार्य (१३वीं शती) की “अभिधान चिन्तामणि नाममाला”, महाकवि धनंजय की ‘धनज्जय नाममाला’ ( १०वीं शती) एवं श्रीधरसेनाचार्य कृत (१३-१४वीं शती) विश्वलोचनकोश जैसे जैन कोश ग्रन्थों की उपेक्षा कर दी जाती है। इसी तरह संस्कृत, प्राकृत तथा हिन्दी भाषा के सैकड़ों ऐसे जैन ग्रन्थ हैं, जिन्हें विभिन्न पाठ्यक्रमों में रखे जाने से साहित्य जगत् में उन ग्रन्थों का सही मूल्यांकन होकर उनसे नैतिक मूल्यों का लाभ तथा अपने देश की गौरववृद्धि के पूरे अवसर हैं, किन्तु न मालूम क्यों ऐसी मानसिकता बन गयी है कि जो ग्रन्थ अन्य परम्पराओं के पहले से ही प्रसिद्धि और प्रचलन में हैं, वे भले ही साम्प्रदायिक हों, फिर भी वे ही सार्वजनिक एवं सर्वोच्च हैं तथा उन्हें ही इतिहास तथा पाठ्यक्रमों में अच्छा स्थान दिया जाना चाहिए, बाकी जैन- परम्परा श्रेष्ठ होकर भी उन्हें  उपेक्षित कर साम्प्रदायिकता का लेबल लगा दिया जाता है, भले ही वे कितने अच्छे हों।
     यद्यपि इसमें हम लोगों की भी कमी है। इसे दूर करने के लिए जैन साहित्य के व्यापक प्रचार-प्रसार और युगीन एवं आधुनिक ढंग से अच्छे सम्पादनऔर प्रकाशन के साथ-साथ सुव्यवस्थित रूप में इनके व्यापक प्रचार - प्रसार की अत्यन्त आवश्यकता है।

आज भी शताधिक पुस्तकालयों, संग्रहालयों, मन्दिरों, विभिन्न शास्त्रभण्डारों तथा निजी संग्रहालयों में हजारों हस्तलिखित ग्रन्थ नष्टप्रायः होने की स्थिति में पहुंच रहे हैं और अपने उद्धार की प्रतीक्षा में पड़े हुए हैं। हमारी उपेक्षा के चलते कितना ही साहित्य नष्ट हो गया और कितना निरन्तर नष्ट हो रहा है । यद्यपि इस अमूल्य निधि के संरक्षण की ओर केन्द्र सरकार का ध्यान भी पूरे देश के हस्तलिखित ग्रन्थों के सूचीकरण एवं शास्त्रभण्डारों के सर्वेक्षण की ओर गया है.इस कार्य को पूर्ण करने में केंद्र सरकार की ओर से कई योजनाएं चल भी रहीं  हैं। आज अनेक जैनाचार्यों की महत्वपूर्ण कृतियां ऐसी हैं, जिनके उल्लेख तो मिलते हैं, किन्तु अनुपलब्ध हैं अथवा कुछ अधूरी ही प्राप्त हैं। इनकी खोज विभिन्न शास्त्रभण्डारों में योजनाबद्ध रूप में किया जाना अपेक्षित है। 


जैन साहित्य के इतिहास का एक सर्वांगीण विवेचन महत्वपूर्ण कार्य है, किन्तु कठिन भी कम नहीं है। फिर भी हमारे दूरदर्शी कुछ प्रमुख आचार्यों ने अपने ग्रन्थों तथा शिलालेखों आदि में वह मूल्यवान ऐतिहासिक सामग्री संरक्षित कर रखी है, जिसका इतिहास- लेखन में व्यापक उपयोग आवश्यक है। यद्यपि आत्मप्रशंसा से बचने के लिए हमारे कुछ प्रमुख आचार्यों ने अपने एवं अपनी परम्परा के विषय में बहुत कम लिखा या कुछ भी नहीं लिखा है। अतः हमारे विद्वानों को इतिहास लिखने के लिए विशाल वाङ्मय तथा शिलालेखों, प्रशस्तियों आदि से यत्र-तत्र बिखरी हुई सामग्री तथा सन्दर्भों को जोड़कर किस प्रकार साहित्य और संस्कृति के इतिहास की रचना करनी पड़ी, ये कठिनाईयां ऐसे लेखक विद्वान् ही जान-समझ सकते हैं। इतना सब होने पर ही वे इस इतिहास को अभी अपूर्ण ही मानते हैं। साथ ही इसमें लेखन की अपार सम्भावनायें मानते हुए निरन्तर पूरा करने हेतु प्रयत्नशील रहना भी आवश्यक है ।

महामेघवाहन कलिंग नरेश खारवेल का, इस सन्दर्भ में हमें आभारी होना चाहिए कलिंग महाराजा जिन्होंने ईसा की प्रथम शती पूर्व में ही उदयगिरि खण्डगिरि के हाथी गुम्फा शिलालेख में जैन संस्कृति के गौरव को लिखवाकर अमर कर दिया था। इसी शिलालेख में अपने देश के भारतवर्ष नामकरण का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है. इसी प्रकार मथुरा के कंकाली टीला से प्राप्त आयागपट्टों, मूर्ति-शिल्पों आदि में उल्लिखित लेखों ने तथा श्रवणवेलगोल एवं यत्र-तत्र के सहस्रों शिलालेखों आदि के साथ ही अनेक पट्टावलियों, गुर्वावलियों आदि ने भी हमें अपने इतिहास को संजोने में बहुत मदद की । अन्यथा न मालूम जैन संस्कृति का इतिहास कितना पिछड़ जाता। हमारे विशाल जैन साहित्य ने भी हमें इतिहास के सूत्र इकट्ठे करने में बहुत सहयोग किया है।      
      हम दसवीं शती के आचार्य इन्द्रनन्दि और उनके श्रुतावतार ग्रन्थ के योगदान को कभी भूल ही नहीं सकते, जिसमें हमारी पूरी आचार्य परम्परा और ग्रन्थ लेखन का इतिहास भी उल्लिखित है। इसके साथ ही वैदिक तथा बौद्ध साहित्य में जो जैन परम्परा के उल्लेख मिलते हैं, उन्हें सुरक्षित रखने हेतु हम उनके भी बहुत आभारी हैं। इनसे हमारी जैन संस्कृति की प्राचीनता सिद्ध करने में बहुत मदद मिली । 
     जैनागमों में प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति से संबंधित बहुमूल्य सामग्री बिखरी हुई है।सम्पूर्ण प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन में इसका उपयोग किया जाना आवश्यक है। क्योंकि प्राचीन भारतीय इतिहास की अनेक अनिर्णीत तिथियों एवं घटनाओं के निर्धारण एवं सत्यापन में भी यह साहित्य अधिक सहायक सिद्ध हो सकता है। वस्तुतः साहित्येतिहास का सम्बन्ध राजनैतिक, आर्थिक, समाजशास्त्रीय, धार्मिक और मनोवैज्ञानिक इतिहास लेखन से कहीं न कहीं गहरा होता है। आज इन सभी ज्ञान-विज्ञानों के प्रामाणिक इतिहास भी सुलभ हैं। इन सबके आलोक में भारतीय संस्कृति और साहित्य के इतिहास के स्वरूप को पुर्नविश्लेषित और व्यवस्थित करके प्रस्तुत करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है, ताकि उसका यथोचित उपयोग और मूल्यांकन होता रहे। 
   इस दृष्टि से डॉ. ज्योतिप्रसाद जैन की एक दृष्टि में " "भारतीय इतिहास एक आदर्श एवं प्रशंसनीय पुस्तक है, जो भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली से प्रकाशित है। इसमें भारतीय इतिहास के लेखन में जैन सन्दर्भों का यथोचित उपयोग किया गया है।
     इतिहास के पुनर्लेखन हेतु इण्टरनेट आदि के उपयोगों सहित अद्यतन अध्ययन की, प्रामाणिक सामग्री एवं आवश्यक तथ्यों की आवश्यकता होती है। इसके लिए भारत के कोने-कोने में स्थित जैन शास्त्रभण्डारों, पुस्तकालयों द्वारा अलग-अलग सामग्री तालिका सहित प्रकाशित की जाए तो बहुत अच्छी सामग्री एकत्रित हो जायेगी। साथ ही सभी इतिहास लेखकों को वहां की मूल सामग्री का उपयोग करने की छूट के साथ ही घर बैठे इण्टरनेट आदि पर ये सुविधायें स्वतः उपलब्ध कराना चाहिए ।
   अब तो आधुनिक विज्ञान ने इण्टरनेट,ए. आई. जैसे अनेक संसाधनों के जरिये इस कार्य को और भी सुगम बना दिया है। अतः किसी अखिल भारतीय स्तर की संस्था के माध्यम से सभी तथ्यपूर्ण सामग्री, आदि को एकत्र कर वैज्ञानिक ढंग से उसका सम्पादन कराके ग्रन्थ रूप में इनका प्रकाशन किया जाना अपेक्षित है। इस हेतु कोई प्रामाणिक मासिक पत्रिका भी बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है, ताकि विद्वानों को निरन्तर घर बैठे नयी-नयी सूचनाएं प्राप्त होती रहें । 
   ये सब ऐसे कार्य हैं, जिसके बिना समग्र भारतीय संस्कृति और साहित्येतिहास के लेखन का हर प्रयत्न अधूरा और अपूर्ण बना रहता है। यदि योजनाबद्ध ढंग से प्रोजेक्ट बनाकर मान्य संस्थानों के माध्यम से इन्हें प्रस्तुत किया जाए तो सरकार भी इन्हें पूर्ण करने में पूरी मदद करती है।

आज के युग की यह अत्यन्त जरूरी आवश्यकता है कि प्रत्येक आचार्य की समस्त कृतियों का अनुवाद सहित संग्रह अर्थात् उनकी ग्रन्थावली प्रकाशित हों। इन ग्रन्थों के सुसम्पादित पाठ तैयार कराके संग्रह रूप में प्रकाशित कराने की एक सुचिन्तित योजनाबद्ध योजना- कार्यक्रम, सामाजिक एवं प्रकाशन संस्थाओं, विश्वविद्यालयों एवं अन्यान्य सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों के माध्यम से अथवा स्वतंत्ररूप से भी इन्हें चलाया जा सकता है । विश्वविद्यालयों में इन क्षेत्रों के शोध के लिए प्रोत्साहन भी ज्यादा अपेक्षित है, ताकि ज्यादा से ज्यादा विद्वान् इस ओर आकृष्ट हों और पी-एच०डी० आदि शोधोपाधियों के माध्यम से अथवा स्वतंत्ररूप से मौलिक तथा स्तरीय कार्य हो सकें। ऐसा होने पर भावी साहित्येतिहास की आधारभूत अनिवार्य सामग्री सुलभ हो सकेगी और नये साहित्येतिहास की परिपूर्णता के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकेगा ।

साहित्येतिहास की आधारभूत सामग्री, चूंकि कहीं एकत्र सुलभ होने के बजाय पूरे भारत में बिखरी हुई है, इसलिए उसका अवलोकन, अध्ययन, विश्लेषण किसी एक व्यक्ति द्वारा असंभव है। इसके लिए कुछ विद्वानों की टीमें ( टोलियां) बनाकर कार्य कराना भी आवश्यक है। जो विभिन्न क्षेत्रों की बिखरी सामग्री का अलग-अलग अनुशीलन और
विश्लेषण करें और अन्त में सभी विद्वान् मिलकर विश्लेषित सामग्री का समायोजन करें, तब जाकर वास्तविक इतिहास का स्थापत्य निर्मित होगा ।

देश में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली अनेक उच्च या सामान्य प्रतियोग परीक्षाओं में तथा विभिन्न उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश हेतु आयोजित प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी हेतु देश के विभिन्न प्रकाशकों द्वारा संस्कृति, दर्शन - इतिहास आदि विषयक प्रकाशित पुस्तकें, गाइडें या नोट्स आदि कभी पढ़कर देखिये, जो हमारी पीढ़ी को पढ़ाया जा रहा है। इनमें जैनधर्म के विषय में ऐसी-ऐसी भ्रामक बातें एवं सूचनाएं मिलेंगी कि हम सभी आश्चर्य हुए बिना न रहेंगे। ऐसे प्रकाशकों, लेखकों को संबंधित विषयों के मूलग्रन्थ या प्रामाणिक लेखकों के ग्रन्थ एवं तथ्यपूर्ण सामग्री देकर उन्हें भूल सुधार हेतु प्रेरित करना सभी जुम्मेदारी और जैन विद्वानों की प्रमुख कर्तव्य है । 1

वस्तुतः हमें अपना समग्र साहित्य सब तक पहुंचाना बहुत अपेक्षित है। क्योंकि सभी क्षेत्रों और विषयों के विशेषज्ञ लेखकों के पास यदि हमारा साहित्य नहीं पहुंचा, तो सही और पूर्ण जानकारी के अभाव में वह जो भी लिखेंगे, वह तथ्य-रहित, एकांगी, भ्रामक और अपूर्ण होना स्वाभाविक है।


इस तरह अब नित नये शोध-खोज और विविध आयामों में अनेक दृष्टिकोणों से जैन साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसके लिए साहित्येतिहास लेखन के सिद्धान्त, पद्धति और इतिहास, दर्शन आदि का गहराई और आधुनिक तकनीकी के साथ विस्तार के साथ उसका अध्ययन और उसका लेखन किया जाना भी आज के युग की मांग है। तभी जैन साहित्य और संस्कृति के इतिहास के भावी लेखन को नया प्रकाश मिल सकेगा। आईये हम सभी मिलजुलकर ऐसे जैन साहित्येतिहास के पुर्ननिर्माण में अपना-अपना योगदान सुनिश्चित करें, ताकि हम अपनी भावी पीढ़ी को एक जैन साहित्य और संस्कृति का नया युगीन इतिहास देकर गौरव का अनुभव कर सकें ।
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लेखक–
प्रो० डॉ० फूलचन्द जैन प्रेमी 
निवास- अनेकान्त विद्या भवनम्, बी० २३ / ४५ पी-६, शारदानगर, खोजवाँ, वाराणसी-२२१०१० फोन नं० 9670863335 09450179254
Email anekantif@gmail.com

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