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तीर्थंकर ऋषभदेव : ‘कृषि करो और ऋषि बनो’ सूत्र के मन्त्रदाता

जन्मकल्याणक महोत्सव के उपलक्ष्य में- 

 तीर्थंकर ऋषभदेव : ‘कृषि करो और ऋषि बनो’ सूत्र के मन्त्रदाता
       – प्रो. फूलचंद जैन प्रेमी, वाराणसी

        जैन परम्परा के अनुसार जैनधर्म को शाश्वत अर्थात् अनादि, अनन्त और अनिधन माना गया है। यह धर्म शाश्वत रूप में सनातन परम्परा से सदा से चला आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा।वैदिक तथा कुछ अन्य परम्पराओं के साहित्य में अनेक तीर्थंकरों के साथ ही विविध रूपों में श्रमण संस्कृति, जिसे निर्ग्रन्थ या आर्हत् संस्कृति भी कहा जाता था, के अनेक प्राचीन साहित्यिक उल्लेख, सिन्धुघाटी और मोहनजोदड़ो आदि की सभ्यता तथा देश के विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्यों आदि ने यह सिद्ध कर दिया है कि जैनधर्म एक अतिप्राचीन, मौलिक और एक स्वतंत्र धर्म है।
     प्राचीन जैन साहित्य में जैनधर्म के प्रवर्तक त्रैकालिक अर्थात् भूत, भविष्यत् और वर्तमान-इन प्रत्येक काल के चौबीस-चौबीस तीर्थंकरों के नामोल्लेख और उनका विवरण प्राप्त होता है। वर्तमान काल की अपेक्षा प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव से लेकर अन्तिम और चौबीसवें तीर्थंकर वर्धमान महावीर तक चौबीस तीर्थकरों की एक सुदीर्घ परम्परा विद्यमान है.वर्तमान चौबीस तीर्थंकरों में से प्रथम तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव, जिन्हें वृषभदेव,
ऋषभनाथ,आदिनाथ, आदिदेव और पुरुदेव
भी कहते हैं।
वे जैनधर्म के मूल प्रवर्तक माने जाते हैं। इतिहासकार चौबीस तीर्थंकरों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव, बाईसवें नेमिनाथ, तेईसवें पार्श्वनाथ और चौबीसवें तीर्थंकर महावीर को ऐतिहासिक महापुरुष सिद्ध कर चुके हैं। 
     तीर्थंकर ऋषभदेव— प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव एक ऐसे महापुरुष थे, जिन्हें हमारे देश के प्रायः सभी प्राचीन धर्मों ने उन्हें पूज्य आदर्श पुरुष स्वीकार किया और उनके विषय में विभिन्न धर्मशास्त्रों में उनके जीवनवृत्त तथा उनसे सम्बन्धित अन्य तथ्यों का सम्मानपूर्ण उल्लेख मिलता है।यद्यपि समय के प्रवाह में अनेक प्रमाण नष्ट हो गए, फिर भी उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार
चौबीस तीर्थंकरों में ऋषभदेव ऐसे महापुरुष हुए, जिनका भारत की प्रायः सभी प्राचीन धर्म परम्पराओं और संस्कृतियों में गौरव के साथ उल्लेख मिलता है।उनकी लोकप्रियता का यह प्रत्यक्ष उदाहरण है कि वैदिक परम्परा ने उन्हें भगवान का अपना अवतार माना है। अनेक पुराणों के साथ ही श्रीमद्भागवत में भगवान् ऋषभदेव की मुक्तकंठ से प्रशंसा की गई है। वहाँ कहा है कि ऋषभदेव वेदों के भी परमगुरु थे। इसमें भगवान के अवतार की महत्ता और अर्थात् उनका यह अवतार रजोगुण से व्याप्त लोगों को मोक्षमार्ग की शिक्षा देने के लिए उनकी उपयोगिता बतलाते हुए लिखा है - 'अयमवतारो रजसोपप्लुत कैवल्योपशिक्षणार्थं`
इस तरह भगवान ऋषभदेव की महिमा के स्वर जैन परम्परा एवं वैदिक परम्परा में एक समान श्रद्धा के साथ मुखरित तो  हुए
ही हैं, बौद्ध परम्परा में भी उनका आदर के साथ अनेक प्रसंगों में उल्लेख मिलता है।जैन अनुश्रुतियों के अनुसार तीर्थंकर ऋषभदेव का जन्म जब भोग-भूमि का अन्त तथा कल्पवृक्ष संस्कृति का समापन हो रहा था, तब कालचक्र के अनुसार कर्मभूमि का प्रादुर्भाव हो गया था। ऐसे समय अयोध्या नगरी में चौदहवें और अन्तिम कुलकर (मनु) नाभिराज (अजनाभ)की पत्नी मरूदेवी से चैत्रकृष्ण नवमी को सूर्योदय के समय जिस युगपुरुष ने जन्म लिया, उनका नाम था ऋषभदेव। आचार्य जिनसेन (10वीं शती)ने अपने आदिपुराण में इनके एक हजार आठ नामों का उल्लेख करते हुए ‘श्रीमद् जिनसहस्रनामस्तोत्र’ के माध्यम से उनका स्तवन भी किया है।
           ऋषभदेव जब युवा हुए तब इनका विवाह यशस्वती (नन्दा) और सुनन्दा- इन दो कन्याओं से हुआ। इनमें प्रथम महारानी यशस्वती से 'भरत' नामक प्रतापी पुत्र का जन्म हुवा,जो आगे चलकर चक्रवर्ती भरत के रूप में प्रसिद्ध हुए और जिनके नाम से अपने देश का ‘भारतवर्ष’ नाम सुविख्यात हुआ. इन्ही की माता यशस्वती से ब्राह्मी नामक कन्या के बाद क्रमशः ९८ पुत्रों का भी जन्म हुआ।महाराजा ऋषभदेव की दूसरी महारानी सुनन्दा से ‘बाहुबली’ नामक तेजस्वी और कामदेव सदृश सुन्दर पुत्र तथा 'सुन्दरी' नामक कन्या का जन्म हुआ। इस तरह ऋषभदेव के सौ पुत्र और दो कन्यायें थीं।
   समय को परखने वाले ऋषभदेव के पिता
 महाराजा नाभिराज जन-नेतृत्व(प्रजापालक) का भार अपने सुयोग्य पुत्र ऋषभ को सौंप चुके थे।  बड़ा कठिन समय था वह। मानवजाति का भाग्य आशा और निराशा के बीच झूल रहा था। ऐसे समय उसे एक सुयोग्य कर्मठ नेता महाराजा ऋषभदेव के रूप में मिल गये।
        वस्तुतः कर्मभूमि के प्रारंभ में यहाँ जो आर्य बसते थे, उस समय उन्हें अपने सांसारिक जीवनोपयोगी कर्तव्यों का भान नहीं था, क्योंकि उससे पहले भोगभूमि मौजूद थी, जिसमें दैनिक जीवन की पुण्यप्रभावक सर्व भोगोपभोग की सामग्री और आवश्यकतायें स्वतः ही कल्पवृक्षों अर्थात् एक प्रकार के उदार वृक्षों से पूर्ण हो जाती थीं. सम्भवतः युग के आदिकाल में मानव की आवश्यकतायें और इच्छायें, उतनी ही सीमित रहती होंगी, जो इस प्रकार के वृक्षों से ही पूर्ण हो जाया करती होंगी। परन्तु जब इस सामग्री का मिलना उन कल्पवृक्षों से बंद हो गया, तब जन-जन की समस्या को ध्यान में रखकर महाराजा के रूप में ऋषभदेव ने प्रजा के जीवन-निर्वाह हेतु असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प--इन छह कलाओं की शिक्षायें प्रदान कीं, ताकि जीवन-यापन और दैनिक व्यवहार हेतु आवश्यक उपयोगी वस्तुएं प्राप्त हो सकें. वे छह कलायें इस प्रकार हैं –
 १. असि अर्थात् अस्त्र-शस्त्र चलाने रूप क्षात्र कर्म, २. मसि अर्थात लिखना-पढ़ना, ३. कृषि-अर्थात् भोजन हेतु अन्न उत्पादन रूप खेती आदि के कार्य, ४. विद्या-अर्थात् लिपि एवं अंक आदि विद्यायें पढ़ना, पढ़ाना, ५.वाणिज्य–अर्थात् जीवकोपार्जन के लिए उद्योग-धन्धे आदि करने की कलायें और ६.शिल्प अर्थात् शिल्पकारी रूप हस्तकला के कार्य, जैसे वस्त्र, बर्तन तथा अन्यान्य वस्तुयें बनाने के कार्य– ये छः कलायें (कार्य) सिखलाये। इन छह कलाओं में जीवन निर्वाह हेतु सभी व्यवस्थायें सन्निहित हैं। इनके साथ ही उन्होंने राजनीति, धर्मनीति, गीत, संगीत, नाट्य, युद्ध एवं मल्ल आदि कलायें भी सिखलाई। 
 
      ब्रम्हाण्ड के सम्पूर्ण जीवों में मनुष्य के पास बुद्धि और विवेक होने से यही श्रेष्ठ माना जाता है। मानव समाज में परस्पर सौहार्द, सहयोग और करुणा बना रहता है तो मनुष्येतर प्राणी भी सुख से जीवन यापन करते हैं। इसी उद्देश्य से महाराजा ऋषभदेव ने अपनी विशेष प्रतिभा और दूरदृष्टि से सामाजिक नियम-उपनियम बनाये, किन्तु इनका पालन कौन कराये ? इस समस्या को लेकर सभी आमजन जब ऋषभदेव के पिता नाभिराज के पास गये थे, तब उन्होंने कुमार ऋषभ के पास परामर्श हेतु भेज दिया। सभी ने कुमार ऋषभ को इस योग्य समझ प्रथम शासक नियामक बनने का अनुरोध किया। इस तरह सभी की सहमति से मानव समाज के वे प्रथम अभिषिक्त राजा बने। जहाँ ऋषभदेव का जन्म हुआ था, उस अयोध्या नगरी को ही केन्द्रबिन्दु बनाकर मानव समाज की प्रथम बस्ती क्रमशः विकसित होते-होते नगर और राजधानी के रूप अयोध्या को यह श्रेय प्राप्त हुआ।
         इस तरह महाराजा ऋषभदेव
ने मानव सभ्यता के प्रारम्भिक चरण में अव्यवस्थित जन-जीवन को तत्कालीन आवश्यकताओं के अनुसार एक व्यवस्थित और मर्यादित जीवन जीने की कला सिखलाना प्रारम्भ किया।उन्होंने प्रजा की कठिनाइयों को ध्यान में रखकर कर्मयुगीन आरम्भिक समस्याओं के समाधान हेतु अनेक व्यवस्थायें सिखलाई, क्योंकि सामाजिक व्यवस्था का प्रवर्तन करते समय वे एक प्रजानायक थे। इसीलिए मानवीय सभ्यता और संस्कृति का पाठ पढ़ाकर समाज धर्म, राष्ट्रधर्म,ग्रामधर्म और नगरधर्म आदि की व्यवस्था का उन्होंने सूत्रपात किया,इसलिए वे 'प्रजापति' कहलाये। 
    ऋषभदेव ऐसे तीर्थंकर महापुरुष थे, जिन्होंने अपने राज्यकाल में संसार की प्रवृत्तियों के सुसंचालन हेतु पूर्वोक्त छह कार्य-विधियों का सर्वप्रथम उस प्रवृत्तिमूलक व्यावहारिक लोकमंगलकारी धर्म का प्रवर्तन किया, जिसे पाकर सम्पूर्ण विश्व युगों-युगों तक उनके आदर्शों पर चलकर उनका यशोगान करता रहेगा। निवृत्ति-प्रधान कहलाने वाली जैन-संस्कृति की यह दृढ मान्यता है कि कोई भी समाज एक मात्र निवृत्ति के बल पर ही नहीं, अपितु कल्याणकारी प्रवृत्ति के  बल पर ही विकास कर सकती है। जैन संस्कृति में तत्त्वज्ञान और आचार के जो मूलभूत नियम हैं और वह जिन आदर्शों को आज तक पूँजी मानती आई है, उनके आधार पर उन्होंने निवृत्ति और प्रवृत्ति का ऐसा मंगलमय योग साधा, जो सभी जीवों के लिए क्षेमंकर बन सका। क्योंकि कोई भी समाज एकमात्र निवृत्ति पर जीवित नहीं रह सकती और न इससे वह वास्तविक निवृत्ति ही साध सकती है। सत्य तो यह है कि प्रवृत्ति और निवृत्ति एक ही मानव- कल्याण रूप सिक्के के दो पहलू हैं।

सामाजिक व्यवस्था-
   ऋषभदेव ने अपने गृहस्थ जीवन में एक 'राजा' के नाते प्रजा के लोक-मंगल हेतु जो कर्तव्य थे, उनका क्रियान्वयन बड़ी निष्ठा से किया।उन्होंने मनुष्यों को निःसहाय, मात्र प्रकृति मुखापेक्षी रहने के बदले प्रकृति के प्रतिकूल रहने पर उसके समाधान हेतु स्व-पुरुषार्थ करके प्रवृत्ति मूलक जीवन जीने का पाठ पढ़ाया।  साथ ही समाज के नैतिक उत्थान हेतु उन्होंने धर्म के प्रति भी सम्पूर्ण प्रजा को सजग किया। 
     वस्तुतः प्रजा को संस्कृति और सभ्यता का प्रथम पाठ पढ़ाकर सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन मूल्यों का सूत्रपात ऋषभेदव ने जिस दिन किया, वह दिन भाद्रपद शुक्ल पंचमी का था। इसीलिए तभी से इन सभी प्राचीन भारतीय परम्पराओं में इसकी स्मृति स्वरूप भाद्रपद शुक्ल पंचमी को ऋषि पंचमी या ऋषभपंचमी के नाम से विशेष पर्व के रूप में मनाने की परम्परा अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है।
कृषि करो और ऋषि बनो-इस सूत्र के मंत्रदाता
    वस्तुतः ऋषभदेव 'आदि-कृषि-शिक्षक' भी थे, क्योंकि सभी प्राणियों के प्राणरक्षार्थ जिस कृषिकर्म की शिक्षा उन्होंने दी, उन षट्‌कर्मों में से शेष पाँच-कर्म ‘कृषि’ पर प्रमुख रूप से आधारित हैं। अन्न उत्पादन की उन्होंने जो विधि बतलाई, उससे लोगों में सदा के लिए भक्ष्य-अभक्ष्य का विवेक तो जाग्रत हुआ ही, साथ ही अन्न के अभाव की समस्या का समाधान उपस्थित रहने से मनुष्य विविध चारित्रिक दोषों से भी बचा रहा, क्योंकि 'बुभुक्षितः किं न करोति पापम्' अर्थात् भूखा व्यक्ति कौन-सा पाप नहीं कर सकता ?
          कृषि कर्म के इस उपदेश से लोगों में सदा के लिए शाकाहारी प्रवृत्ति को भी बढ़ावा मिला। इसी से उनका 'कृषि करो और ऋषि बनो' का यह सूत्रमंत्र प्रवृत्तिधर्म से निवृत्तिधर्म की ओर उन्मुख होने का मूलमंत्र बना। वे जानते थे कि जब तक मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती, तब तक धर्म-नीति पर चलना कठिन है। इसीलिए उन्होंने श्रावकों (गृहस्थों) को श्रावकाचार के रूप में प्रवृत्तिपरक आचार मार्ग बतलाया, फिर इसी पर आगे विकास करते हुए निवृत्ति-परक आध्यात्मिक विकास के रूप में श्रमणाचार परक ' मुनि या श्रमण' धर्म का प्रवर्तन किया। इस तरह उन्होंने प्रवृत्ति रूप स्वपुरुषार्थ के द्वारा 'श्रम' करके श्रावकों (गृहस्थों) के लिए और ध्यान, तप और संयम साधना रूप आचारमार्ग का  प्रतिपादन साधुओं के लिए किया.
 लिपि और अंक विद्या के आद्य सृष्टा
        ऋषभदेव ने सम्पूर्ण प्रजा एवं अपनी सन्तान को सुशिक्षित करने के उद्देश्य से उसे णविविध विद्यायें और कलायें प्रदान करने और सिखाने का संकल्प किया। उन्होंने इनका शुभारंभ अपनी संतान से ही किया। उन्होंने सर्वप्रथम 'ॐ नमः सिद्धम्' इस मंत्र का उच्चारण कराके वर्णमाला अपने दायी ओर बैठी ब्राह्मी नामक कन्या को लिपि-विद्या (अक्षरकला) अर्थात्  दायें हाथ से लिखकर सिखायी और बायीं ओर बैठी 'सुन्दरी' नामक कन्या को बायें हाथ से अंकविद्या सिखायी। यही कारण है कि आज भी इकाई, दहाई आदि रूप में संख्या की गणना बायीं ओर से की जाती है।जबकि दाहिनी ओर से वायीं ओर वर्णमाला लिखी जाती है.
     इस प्रकार जैन परम्परा के अनुसार इस युग में लिपिविद्या और अंक विद्या के आद्य स्रष्टा ऋषभदेव माने जाते हैं। इन विद्याओं का सर्वप्रथम शिक्षण का गौरव ब्राह्मी और सुन्दरी के रूप में नारी जाति को प्राप्त हुआ। इस दृष्टि से नारी शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति का  सूत्रपात करके सम्पूर्ण नारी समाज को शिक्षा के साथ ही अन्य सभी क्षेत्रों में उनकी अग्रणी भूमिका का शुभारम्भ भी यहीं से हुआ।     
       अपनी ब्राह्मी नामक कन्या को जिस लिपि का सर्वप्रथम ज्ञान कराया, बाद में वह लिपि 'ब्राह्मी लिपि' नाम से प्रसिद्ध हुई और आज भी यह विश्व की प्राचीनतम लिपियों के रूप में भी प्रसिद्ध है। विद्वानों का ऐसा मानना है कि बृहद् भारत की प्रायःअन्य सभी लिपियाँ भी इसी ब्राह्मी लिपि से उद्भूत हुईं हैं। दूसरी पुत्री सुन्दरी को आपने "अंक विद्या" सिखलाई, जिस गिनती (गणना) के आधार पर संसार अंक विद्या में प्रवीण होकर गणना का कार्य कर पा रहा है।
           ऋषभदेव ने अपनी पुत्रियों की तरह पुत्रों को भी विविध कलाओं में शिक्षित किया और उन्होंने उन कलाओं से संबंधित शास्त्रों की रचना की। इन्हीं सब विद्याओं और आविष्कारों के कारण ऋषभदेव 'आदि ब्रह्मा' कहलाये।
               इस प्रकार महाराजा ऋषभदेव ने अपनी गृहस्थावस्था में आने वाले समय और युग का बड़ी ही दूरदर्शिता के साथ मूल्यांकन किया और भोग-भूमियाँ युग की सम्पूर्ण व्यवस्था और बिना श्रम किये ही कल्पवृक्षों से जीवन-यापन की परम्परा बदलकर प्रजा को कार्य-भूमिया युग (कर्मभूमि) की व्यवस्था के अनुरूप पुरुषार्थपूर्ण कार्य सिखाने हेतु उन्होंने जो श्रम और पुरुषार्थ किया, वहीं उन्हें इस लोकमंगलकारी व्यावहारिक धर्म के प्रथम प्रशिक्षक होने का गौरव प्राप्त हुआ। इसीलिए वे इन सब विद्याओं और कलाओं के आद्य स्रष्टा और शिक्षक कहलाये।
अहिंसक संस्कृति का सूत्रपात
कोई भी संस्कृति, विचार और भावना जगत् की वस्तु है। इसके परिष्कार का प्रयत्न जैनधर्म के पुरस्कर्ताओं द्वारा निरन्तर होता रहा है। किसी भी स्तर पर जहाँ कहीं भी बुराईयाँ, विकृतियाँ पनपीं, इन्होंने अपनी नवीन चिन्तनधाराओं और अहिंसक क्रान्तियों के द्वारा उनके सुधार हेतु सदा जनचेतना जागृत की। यह सत्य है कि प्रायः सभी स्वस्थ चिन्तनधारायें 'अहिंसा' को केन्द्र में रखकर ही प्रसारित होती हैं। वस्तुतः जैनधर्म भी मूलतः अहिंसा- प्रधान धर्म है और इसके सभी तीर्थकरों ने अहिंसा के परिपेक्ष्य में ही अपने समस्त उपदेश दिये।
      उन्होंने धर्म के प्राणस्वरूप मुख्यतः उस अहिंसा के स्वरूप को भी बतलाया जो लोकमंगलकारी के साथ-साथ व्यावहारिक भी हो। क्योंकि इसी अहिंसक क्रान्ति का भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक विकास में और उसकी अखण्डता में महत्वपूर्ण योग रहा है।वस्तुतः जैनधर्म में अहिंसा सिद्धान्त का जितना विस्तृत, सूक्ष्म और गहन विवेचन किया गया है, उतना ही उसे व्यावहारिक धरातल भी प्रदान किया गया। व्यवहार में कायिक, वाचिक और मानसिक रूप से यह  अहिंसा तत्त्व आत्मिक रूप में परिणत हो जाता है। इसीलिए जैनाचार्यों ने विचार किया कि यह 'अहिंसा' सिद्धान्त इतना जटिल या गहन न बनकर रह जाये, कि इसका व्यावहारिक प्रयोग कठिन हो जाए। इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन अहिंसा से ओतप्रोत बन सके, ऐसी व्यावहारिक अहिंसा का भी उन्होंने प्रतिपादन किया, क्योंकि धर्म का आत्मभूत लक्षण अहिंसा ही है। इसके बिना धर्म की कल्पना ही व्यर्थ है।
     इस प्रकार तीर्थंकर ऋषभदेव ने
कर्मभूमि के प्रारम्भ में जो व्यवस्थायें दीं, उन्हीं का पालन और प्रवर्तन जैनधर्म के सभी तीर्थंकरों और उनकी परम्परा के सभी आचार्यों ने किया। लोकमंगल के साथ ही साधना के पथपर स्वयं अग्रसर होते हुए वे अनेक प्रजाजनों और राजाओं के साथ स्वयं दीक्षा लेकर संन्यस्त हुए और दीर्घ काल तक कठिन तपश्चरण करते हुए केवलज्ञान प्राप्त कर अष्टापद-कैलाश पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया।
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लेखक का आवासीय पता– 
प्रो. फूलचंद जैन प्रेमी,बी. २३/४५, पी .६, शारदानगर कॉलोनी,खोजवां, वाराणसी – २२१०१०. मो. ९४५०१७९२५४ (WhatsApp) ९६७०८६३३३५. email : anekantjf@gmail.com jainphoolchand48@gmail.co
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