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डॉ. फूलचन्द जैन प्रेमी के प्रकाशित ग्रन्थ

*डॉ. फूलचन्द जैन प्रेमी के प्रकाशित ग्रन्थ*

प्रकाशित मौलिक ग्रन्थ

1. मूलाचार का समीक्षात्मक अध्ययन (तीन पुरस्कारों से पुरस्कृत शोध प्रबंध)
2. लाडनूं के जैनमन्दिर का कला वैभव
3. जैनधर्म में श्रमण संघ
4. जैन साधना पद्धति में तप
5. प्राकृत भाषा विमर्श
6. श्रमण संस्कृति एवं वैदिक ब्रात्य (दो संस्करण) – पुरस्कृत ग्रन्थ
7. जैनदर्शन : धर्म एवं संस्कृति (बृहद् ग्रन्थ)
8. प्राकृत-अपभ्रंश भाषा एवं साहित्य : एक समवलोकन
9. जैन साहित्य और संस्कृति : एक विमर्श (बृहद् ग्रन्थ)
10. काशी की जैन विद्वत् परम्परा

सम्पादित ग्रन्थ

1. मूलाचार भाषा वचनिका : प्राचीन पाण्डुलिपि संपादन (पुरस्कृत बृहद् ग्रन्थ)
2. प्रवचन परीक्षा : प्राचीन संस्कृत पाण्डुलिपि संपादन
3. तीर्थंकर पार्श्वनाथ
4. भारतीय साहित्य और संस्कृति में पार्श्वनाथ
5. आदिपुराण परिशीलन
6. आत्मप्रबोध
7. आत्मानुशासन
8. संस्कृत वाङ्मय का बृहद् इतिहास (द्वादशवाँ खण्ड)
9. बीसवीं सदी के जैन मनीषियों का अवदान
10. आवश्यक निर्युक्ति (आचार्य वट्टकेर कृत)
11. मथुरा का जैन सांस्कृतिक पुरा वैभव
12. जैन विद्या के विविध आयाम
13. स्याद्वाद महाविद्यालय शताब्दी स्मारिका
14. ऋषभ सौरभ
15. रयणसार-सागार-अनगार देशना (आचार्यश्री विशुद्धसागर जी प्रणीत)
16. सत्यार्थ प्रबोध (आचार्यश्री विशुद्धसागर जी प्रणीत)
17. देवागम-देशना (आचार्यश्री विशुद्धसागर जी प्रणीत)
18. श्रावक धर्म-देशना (आचार्यश्री विशुद्धसागर जी प्रणीत)
19. वारसाणुपेक्खा (आचार्य विनिश्चयसागर जी प्रणीत)
20. वस्तुत्व प्रबोधिनी (श्रुतसंवेगी मुनि सुब्रत सागर जी)

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9 अप्रैल 2025 विश्व नवकार सामूहिक मंत्रोच्चार पर विशेष – *णमोकार महामंत्र के 9 रोचक तथ्य* डॉ.रूचि अनेकांत जैन प्राकृत विद्या भवन ,नई दिल्ली १.   यह अनादि और अनिधन शाश्वत महामन्त्र है  ।यह सनातन है तथा श्रुति परंपरा में यह हमेशा से रहा है । २.    यह महामंत्र प्राकृत भाषा में रचित है। इसमें कुल पांच पद,पैतीस अक्षर,अन्ठावन मात्राएँ,तीस व्यंजन और चौतीस स्वर हैं । ३.   लिखित रूप में इसका सर्वप्रथम उल्लेख सम्राट खारवेल के भुवनेश्वर (उड़ीसा)स्थित सबसे बड़े शिलालेख में मिलता है ।   ४.   लिखित आगम रूप से सर्वप्रथम इसका उल्लेख  षटखंडागम,भगवती,कल्पसूत्र एवं प्रतिक्रमण पाठ में मिलता है ५.   यह निष्काम मन्त्र है  ।  इसमें किसी चीज की कामना या याचना नहीं है  । अन्य सभी मन्त्रों का यह जनक मन्त्र है  । इसका जाप  9 बार ,108 बार या बिना गिने अनगिनत बार किया जा सकता है । ६.   इस मन्त्र में व्यक्ति पूजा नहीं है  । इसमें गुणों और उसके आधार पर उस पद पर आसीन शुद्धात्माओं को नमन किया गया है...

जैन ग्रंथों का अनुयोग विभाग

जैन धर्म में शास्त्रो की कथन पद्धति को अनुयोग कहते हैं।  जैनागम चार भागों में विभक्त है, जिन्हें चार अनुयोग कहते हैं - प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग।  इन चारों में क्रम से कथाएँ व पुराण, कर्म सिद्धान्त व लोक विभाग, जीव का आचार-विचार और चेतनाचेतन द्रव्यों का स्वरूप व तत्त्वों का निर्देश है।  इसके अतिरिक्त वस्तु का कथन करने में जिन अधिकारों की आवश्यकता होती है उन्हें अनुयोगद्वार कहते हैं। प्रथमानुयोग : इसमें संयोगाधीन कथन की मुख्यता होती है। इसमें ६३ शलाका पुरूषों का चरित्र, उनकी जीवनी तथा महापुरुषों की कथाएं होती हैं इसको पढ़ने से समता आती है |  इस अनुयोग के अंतर्गत पद्म पुराण,आदिपुराण आदि कथा ग्रंथ आते हैं ।पद्मपुराण में वीतरागी भगवान राम की कथा के माध्यम से धर्म की प्रेरणा दी गयी है । आदि पुराण में तीर्थंकर आदिनाथ के चरित्र के माध्यम से धर्म सिखलाया गया है । करणानुयोग: इसमें गणितीय तथा सूक्ष्म कथन की मुख्यता होती है। इसकी विषय वस्तु ३ लोक तथा कर्म व्यवस्था है। इसको पढ़ने से संवेग और वैराग्य  प्रकट होता है। आचार्य यति वृषभ द्वारा रचित तिलोयपन...

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