गौतम बुद्धपर जैन धर्म का प्रभाव
मयूर मल्लिनाथ वग्यानी , सांगली, महाराष्ट्र
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बौद्ध ग्रंथों से पता चलता है कि जैन धर्म से बुद्ध प्रभावित थे. बौद्ध ग्रंथ मज्जिमा निकाय में दर्ज है कि बुद्ध के तपस्वी जीवन के दौरान (ज्ञान प्राप्ति से पहले) उन्होंने कई उपवास, और तपस्या की थी. जिनका वर्णन अन्यत्र केवल जैन परम्परा में ही मिलता है.
जैन मुनि जिस प्रकार आहार लेते है , इसी प्रकार बुद्ध अपने अनुभव के बारे में कहते हैं,
Thus far, Sari Putta, did I go in my penance. I went without clothes. I licked my food from my hands. I took no food that was brought or meant especially for me. I accepted no invitation to a meal." (S. C. Diwaker, Glimpses of Jainism, Jain Mitra Mandal, Delhi, 1964, p.1.)
हे सरिपत्ता, "क्या मैं अपनी तपस्या में चला गया, मैं बिना कपड़ों के गया था, लोगों ने मुझे भोजन दिया मैंने इसे अपने दोनों हाथों से लिया, वह खाना मेरे लिए नहीं बना था, मैंने भोजन का कोई निमंत्रण स्वीकार नहीं किया।
यह भी केवल जैन परंपरा में ही पाया जाता है.
आचार्य श्री हस्तीमलजी महाराज कहते है ,
‘’ ’मज्जीम निकाय च्या महासिंहनाद सूत्र मे बुद्ध ने अपनी कठोर तपस्या का वर्णन करते हुए तप के चार प्रकार बतलाये है, जो इस प्रकार है :--‘(१) तपस्विता २) रुक्षता ३) जुगुप्सा आणि ४) प्रविविक्तता! इसका अर्थ है तपस्या करना, स्नान नही करना, जल के बूंद पर भी दया करना और एकन्त स्थान मे राहना! ये चारो तप निर्ग्रंथ संप्रदाय के होते थे! स्वयं भगवान महावीर ने इनका पालन कीया था और अन्य निर्ग्रंन्थों के लिये इनका पालन आवश्यक था! (‘’मज्जीम निकाय महासिहनाद’’, ४८-५०). (''ऐतेहासिक काल के तीर्थंकर’’) पुष्ठ १८८, आचार्य श्री हस्तीमलजी महाराज)
यह भी केवल जैन परंपरा में ही पाया जाता है.
अंगुतार निकाय की अट्टकथा में कपिलवस्तु के वप्पा शाक्य का उल्लेख है जो बुद्ध के चाचा थे और जैन धर्म का पालन करते थे।
बौद्ध साहित्य त्रिपिटक के आधार पर, जर्मन इतिहासकार हरमन जैकोबी इसकी पुष्टि करते हैं और इसका वर्णन प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक धर्मानंद कौशांबी ने पार्श्वनाथ का चतुर्य धर्म में भी किया है, जिसमें कहा गया है,
‘’त्रिपिटकमें निर्ग्रंन्थोंका उल्लेख अनेक स्थानोंपर हुआ है! उससे ऐसा दिखाई देता है निर्ग्रंथ संप्रदाय बुद्धसे बरसों पहिले मौजूद था! अंगुत्तर निकायममें यह उल्लेख पाया जाता है + कि वप्प नामका शाक्य निर्ग्रंन्थोंका श्रावक था! उस सुत्तकी अट्ठकथामें यह कहा गया है कि यह वप्प बुद्धका चाचा था! अर्थात यह कहना पडता है कि गौतम बुद्धके जन्मसे पहले या उनकि छोटी उम्रमे हि निर्ग्रंन्थोंका धर्म शाक्य देशमें पहूंच गया था. महावीर स्वामी बुद्धके समकालीन थे! अतः यह मानना उचित होगा कि यह धर्म - प्रचार उन्होंने नही बल्की उनसे पहेलेके निर्ग्रंथोंने किया था! ('पार्श्वनाथ का चातुर्य धर्म’’ पुष्ठ १४),
धर्मानंद कौसंबी कहते है कि,
“इसका उल्लेख उपर आ चुका है कि वप्प शाक्य निर्ग्रंन्थोंका श्रावक था! इससे यह स्पष्ट है कि निर्ग्रंन्थोंका चातुर्याम धर्म शाक्य देशमें प्रचलित था! परंतु ऐसा उल्लेख कही नही मिलता कि उस देशमे निर्ग्रंन्थोंका कोई आश्रम हो! इससे ऐसा लगता है कि निर्ग्रंन्थ श्रमण बिच-बीचमें शाक्य देशमें जाकर अपने धर्मका उपदेश करते थे. शाक्योमें अलारकालाम के श्रावक अधिक थे; क्योंकि उनका आश्रम कपिलवस्तू नगरमें हि था ! आलारके समाधिमार्गका अध्ययन गौतम बोधिसत्वने बचपनमें हि किया ; फिर गृहत्याग करनेपर वे प्रथमतः आलारकेही आश्रममें गये और उन्होंने योगमार्ग का अध्ययन आगे चलाया. आलारने उन्हें समाधिकी सात सीढियां सिखाई. फिर वो उद्रक रामपुत्रके पास गये और उससे समाधिकी आठवी सीढी सिखी,परंतु उतनेसे ऊन्हें सन्तोष नही हुआ! क्योंकि उस समाधीसे मनुष्यके झगडे खत्म होना संभव नाही था! तब बोधिसत्व उदक रामपुत्रका आश्रम छोडकर राजगृह चले गये ! वहाँके श्रमण संप्रदायमें उन्हें शायद निर्ग्रंन्थोंका चातुर्याम- संवर हि विशेष पसंद आया ; क्योंकि आगे चलकर उन्होंने जिस आर्य अष्टांगिक मार्गका आविष्कार किया ऊसमें इस चातुर्यामका समावेश किया गया है’’ ('पार्श्वनाथ का चातुर्य धर्म'' पुष्ठ २७-२८)
शाक्य प्रदेश वर्तमान नेपाल है। बुद्ध के चाचा वप्पा शाक्य निर्ग्रन्थ यानि जैन धर्म के श्रावक थे. यह भी संभव है कि बुद्ध की माता और पिता भी पार्श्वनाथ के भक्त थे और जैन धर्म का पालन करते थे. क्योंकि उस समय सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन धर्म का प्रभाव था.
श्रीमती राइस डेविस (Mrs. Rhys Davis) के अनुसार, बुद्ध ने वैशाली में दो शिक्षकों अलारा और उदका से जैन के रूप में धार्मिक जीवन शुरू किया।
उन्होंने मध्यम मार्ग स्वीकार किया और बौद्ध धम्म की स्थापना की. धम्म की स्थापना अहिंसा के सिद्धांत पर की गई थी। वह पशु हत्या और बलि की प्रथाओं के विरोधी थे. बुद्ध वैदिक अनुष्ठानों, बलि और अंधविश्वासों के विरोधी थे. साथ ही, उन्हें जैन धर्म के सिद्धांत बहुत सख्त लगे, जिनका पालन स्वयं महावीर ने किया था और साथ ही जैन संघ के साधु भी इसका सख्ती से पालन कर रहे थे।जैसे कठोर उपवास, कठोर तपस्या, दिन में केवल एक बार आहार लेना, सख्त अहिंसा का पालन करना जैसे कीटाणुओं और छोटे जीवों को मरने से बचने के लिए पानी को छानके पीना, खड़े होकर आहार लेना , भोजन करते समय यदि बाल या अन्य कीटाणु निकल आएं तो उसी समय भोजन का त्याग कर देना (जैन इसे अंतराय कहते हैं), केश लोच करना, नंगे पैर यात्रा करना, यात्रा के दौरान वाहन का प्रयोग ना करना , यदि किसी कारण से बीमार पड़ जाते है, तो भोजन और पानी त्याग कर धीरे-धीरे आहार और पानी बंद करके सल्लेखना या संतारा लेना, चाहे कितनी भी ठंड हो या बरसात हो 12 महीने जमीन पर सोना, ऐसे कई सख्त नियम हैं जिनका जैन साधु हजारों सालों से पालन करते आ रहे हैं.
बुद्ध ने वैदिक और जैन ये दोनों धर्मों के बीच का मार्ग अपनाया। उन्होंने आठ सिद्धांतों का उल्लेख किया है। इसे अष्टविध मार्ग, सदाचार मार्ग या मध्यम मार्ग भी कहा जाता है। इतिहासकार डी.डी. कोसंबी का कहना है कि अष्टांगिक आर्य पथ बौद्ध धर्म का मूल है, आठ चरण बताये है,
१) सम्यक दृष्टि (संसार मनुष्य की असीमित इच्छाओं, लालच और स्वार्थ से उत्पन्न होने वाले दुखों से भरा है। इन इच्छाओं को संतुष्ट करना ही सभी के लिए शांति लाने का मार्ग है)
२) सही इरादा (दूसरों को नुकसान पहुंचाकर अपना धन और शक्ति नहीं बढ़ाना , विलासिता और कामुक सुखों में लिप्त नहीं होना, दूसरों से प्यार करना और दूसरों की खुशी बढ़ाना ही सही इरादा है
३) सम्यक् वाणी (''झूठे शब्द, निन्दा, निन्दा, निरर्थक बकवास, आदि) समाज की संरचना को भ्रष्ट करती है, इसलिए सम्यक् वाणी वह होनी चाहिए जो सच्चे पारस्परिक स्नेह और कम को बढ़ावा दे।
४) सही कार्य (''हत्या, व्यभिचार और शरीर के समान कृत्य समाज को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं, इसलिए किसी के लिए भी हत्या, चोरी, व्यभिचार और अन्य लोगों को लाभ पहुंचाने वाले कार्यों से बचना आवश्यक है।
५ ) सही आजीविका (''किसी को भी अपनी आजीविका ऐसे तरीके से नहीं कमानी चाहिए जो समाज के लिए हानिकारक हो। जैसे - शहद बेचना, भोजन के लिए जानवरों का उपयोग करना आदि। केवल ईमानदार तरीकों का पालन किया जाना चाहिए।
६) उचित मानसिक व्यायाम ('दृश्य विचारों को मन में प्रवेश न करने देना, मन में पहले से मौजूद दृश्य विचारों को त्यागना, ध्यानपूर्वक मन में अच्छे विचार पैदा करना और मन में पहले से ही अच्छे विचारों को पूरा करना.
७) सम्यक जागरूकता ("इस तथ्य की निरंतर जागरूकता कि शरीर अशुद्ध पदार्थ से बना है, शरीर में सुख और दर्द की संवेदनाओं का निरंतर अवलोकन, स्वयं के मन की जांच"
८) सम्यक चिंतन ("यह एकाग्रता की सावधानीपूर्वक नियोजित मानसिक शिक्षा है
(प्राचीन भारतीय संस्कृती व सभ्यता, पुष्ठ ११८, (The Culture and Civilization of Ancient India in Historical Outline)
बुद्ध के दीघनिकाय के समन फल सुत्त में भगवान पार्श्वनाथ के चातुर्य धर्म (चार व्रत) का उल्लेख है। पार्श्वनाथ के समय जैन धर्म चातुर्य धर्म के नाम से जाना जाता था. अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह ये 4 व्रत हैं. इतिहासकारों का मानना है बाद में महावीर ने ब्रह्मचर्य ये पांचवां व्रत जोड़ा। बौद्ध अनुयायी पार्श्वनाथ की परंपरा से परिचित थे। इसलिए उन्होंने महावीर की शिक्षाओं को उसी तरह देखा। यह भी हो सकता है कि बुद्ध और उनके अनुयायियों को भगवन महावीर जी ने शिक्षा में परिवर्तन किया वो समझ में न आया हो. चातुर्याम की जो परम्परा बुद्ध के पूर्व से चली आ रही है वह पार्श्वनाथ की देन है.
बुद्ध पार्श्वनाथ से प्रभावित थे। इसलिए उन्होंने अपने अष्टविध मार्ग में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह नामक चार व्रतों को शामिल किया। इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि बुद्ध और महावीर समकालीन थे और वो बुद्ध से उम्र में बढ़े थे. इतिहासकारोंका मानना है की महावीर 600 ईसा पूर्व, पार्श्वनाथ 800 ईसा पूर्व, और नेमिनाथ 900 से 1500 ईसा पूर्व के बीच हुए थे. और इन तीनों की ऐतिहासिकता को विभिन्न इतिहासकारों ने स्वीकार किया है।
इससे सिद्ध होता है कि जैन धर्म के तत्वोंसे बुद्ध प्रभावित थे. उन्हें जैन दर्शन बहुत सख्त लगा, इसलिए उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाया और बौद्ध धर्म की स्थापना की.
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