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सात तत्त्व सम्बन्धी भूलें - मोक्षमार्गप्रकाशक

                                                  सात तत्त्व सम्बन्धी भूलें - मोक्षमार्गप्रकाशक 

ग्रन्थकर्ता का संक्षिप्त परिचय -

 पण्डित टोडरमलजी

आचार्यकल्प पण्डित टोडरमलजी के पिता श्री जोगीदासजी खण्डेलवाल दिगंबर जैन गोदीका गोत्रज थे और माँ थी रंभाबाई। वे विवाहित थे। उनके दो पुत्र थे - हरिश्चन्द्र और गुमानीराम। गुमानीराम महान् प्रतिभाशाली और उनके समान ही क्रान्तिकारी थे। यद्यपि पण्डितजी का अधिकांश जीवन जयपुर में ही बीता; किन्तु उन्हें अपनी आजीविका के लिए कुछ समय सिंघाणा अवश्य रहना पड़ा था। वे वहाँ दिल्ली के एक साहूकार के यहाँ कार्य करते थे।

परम्परागत मान्यतानुसार उनकी आयु यद्यपि २७ वर्ष मानी जाती है; किन्तु उनकी साहित्यसाधना, ज्ञान व नवीनतम प्राप्त उल्लेखों व प्रमाणों के आधार पर यह निश्चित हो चुका है कि वे ४७ वर्ष तक जीवित रहे। उनकी मृत्यु वि. सं. १८२३-२४ लगभग निश्चित है, अतः उनका जन्म वि. सं. १७७६-७७ में होना चाहिए।

उनकी सामान्य शिक्षा जयपुर की एक आध्यात्मिक (तेरापंथ) शैली में हुई; परन्तु अगाध विद्वत्ता केवल अपने कठिन श्रम एवं प्रतिभा के बल पर ही उन्होंने प्राप्त की, उसे बाँटा भी दिल खोलकर। वे प्रतिभासम्पन्न, मेधावी और अध्ययनशील थे। प्राकृत, संस्कृत और हिन्दी के अतिरिक्त उन्हें कन्नड़ भाषा का भी ज्ञान था। आपके बारे में वि. संवत् १८२१ में ब्र. रायमलजी इन्द्रध्वज विधान महोत्सव पत्रिका में लिखते हैं - “ऐसे महन्त बुद्धि के धारक पुरुष इस काल विषैं होना दुर्लभ है, तातैं वासु मिले सर्व संदेह दूर होय हैं।”

आप स्वयं मोक्षमार्ग प्रकाशक में अपने अध्ययन के बारे में लिखते हैं - “टीका सहित समयसार, पंचास्तिकाय, प्रवचनसार, नियमसार, गोम्मटसार, लब्धिसार, त्रिलोकसार, तत्त्वार्थसूत्र इत्यादि शास्त्र; अरु क्षपणासार, पुरुषार्थ-सिद्ध्युपाय, अष्टपाहुड़, आत्मानुशासन आदि शास्त्र; अरु श्रावक मुनि के आचार निरूपक अनेक शास्त्र; अरु सुष्ठु कथा सहित पुराणादि शास्त्र इत्यादि अनेक शास्त्र हैं; तिनि विषैं हमारे बुद्धि अनुसार अभ्यास वर्तै है।”

उन्होंने अपने जीवन में छोटी-बड़ी बारह रचनाएँ लिखी, जिनका परिमाण करीब एक लाख श्लोक प्रमाण और पाँच हजार पृष्ठ के करीब है। इनमें कुछ तो लोकप्रिय ग्रंथों की विशाल प्रामाणिक टीकाएँ हैं और कुछ हैं स्वतन्त्र रचनाएँ। वे गद्य और पद्य दोनों रूपों में पाई जाती हैं। वे कालक्रमानुसार निम्नलिखित हैं -

१) रहस्यपूर्ण चिट्ठी (वि. सं. १८११)

२) गोम्मटसार जीवकाण्ड भाषा टीका ┐

३) गोम्मटसार कर्मकाण्ड भाषा टीका

४) अर्थसंदृष्टि अधिकार

┤ * सम्यग्ज्ञान चन्द्रिका (वि. सं. १८१८) ५) लब्धिसार भाषा टीका │ ६) क्षपणासार भाषा टीका ┘

७) गोम्मटसार पूजा

८) त्रिलोकसार भाषा टीका

९) समवशरण रचना वर्णन

१०) मोक्षमार्ग प्रकाशक (अपूर्ण)

११) आत्मानुशासन भाषा टीका

१२) पुरुषार्थसिद्ध्युपाय भाषा टीका (अपूर्ण)

इसे पण्डित दौलतरामजी कासलीवाल ने वि. सं. १८२७ में पूर्ण किया।

उनकी गद्य शैली परिमार्जित, प्रौढ़ एवं सहज बोधगम्य हैं। उनकी शैली का सुन्दरतम रूप उनके मौलिक ग्रंथ ‘मोक्षमार्गप्रकाशक’ में देखने को मिलता है। उनकी भाषा मूलरूप में ब्रज होते हुए भी उसमें खड़ी बोली का खड़ापन भी है और साथ ही स्थानीय रंगत भी। उनकी भाषा उनके भावों को वहन करने में पूर्ण समर्थ व परिमार्जित है। आपके संबंध में विशेष जानकारी के लिये ‘पण्डित टोडरमल : व्यक्तित्व और कर्तृत्व’ नामक ग्रंथ देखना चाहिये।

प्रस्तुत अंश ‘मोक्षमार्ग प्रकाशक’ के सप्तम अधिकार के आधार पर लिखा गया है। निश्चय-व्यवहार की विशेष जानकारी के लिये ‘मोक्षमार्ग प्रकाशक’ के सप्तम अधिकार का अध्ययन करना चाहिये।

* गोम्मटसार जीवकाण्ड व कर्मकाण्ड भाषा टीका, लब्धिसार व क्षपणासार भाषा टीका एवं अर्थसंदृष्टि अधिकार को ‘सम्यग्ज्ञान चन्द्रिका’ भी कहते हैं।

उन्होंने मोक्षमार्ग प्रकाशक ग्रन्थ में जीव की सात तत्त्व सम्बन्धी भूलों को बताया है - 

सात तत्त्व सम्बन्धी भूलें

जब तक जीवादि सात तत्त्वों का विपरीताभिनिवेश१ रहित सही भावभासन२ न हो, तब तक सम्यग्दर्शन की प्राप्ति नहीं हो सकती है। जैन शास्त्रों का अध्ययन कर लेने पर भी मिथ्यादृष्टि जीव को तत्त्व का सही भावभासन नहीं होता।

जीव और अजीव तत्त्व सम्बन्धी भूल

१. जैन शास्त्रों में वर्णित जीव के त्रस-स्थावरादि तथा गुणस्थान, मार्गणास्थान आदि भेदों तथा अजीव के पुद्गलादि भेदों व वर्णादि पर्यायों को तो जानता है, पर अध्यात्म शास्त्रों में वर्णित भेदविज्ञान और वीतराग दशा होने के कारणभूत कथन को नहीं पहिचानता।

२. यदि प्रसंगवश उन्हें जान भी ले तो शास्त्रानुसार जान लेता है, परन्तु अपने को आप रूप जानकर पर का अंश अपने में न मिलाना और अपना अंश पर में न मिलाना - ऐसा सच्चा श्रद्धान नहीं करता।

३. अन्य मिथ्यादृष्टियों के समान यह भी आत्माश्रित ज्ञानादि तथा शरीराश्रित उपदेश, उपवासादि क्रियाओं में अपनत्व३ मानता है।

४. शास्त्रानुसार आत्मा की चर्चा करता हुआ भी यह अनुभव नहीं करता कि मैं आत्मा हूँ और शरीरादि मुझसे भिन्न हैं, जैसे और ही की बातें कर रहा हो ऐसे ही शरीरादि और आत्मा को भिन्न बताता है।

५. जीव और पुद्गल के परस्पर निमित्त से अनेक क्रियायें होती हैं, उन्हें दोनों की सम्मिलित क्रिया मानता है। यह नहीं जानता कि यह जीव की क्रिया है, पुद्गल इसका निमित्त है; यह पुद्गल की क्रिया है, जीव इसका निमित्त है - ऐसा भिन्न-भिन्न भाव भासित नहीं होता।

आस्रव तत्त्व सम्बन्धी भूल

१. हिंसादि रूप पापास्रवों को तो हेय४ मानता है, पर अहिंसादि रूप पुण्यास्रवों को उपादेय५ मानता है; किन्तु दोनों बंध के कारण होने से हेय ही हैं।

२. जहाँ वीतराग होकर ज्ञाता-दृष्टारूप रहे, वहाँ निर्बन्ध६ है, वही उपादेय है। जब तक ऐसी दशा न हो, तब तक प्रशस्तराग१ रूप प्रवर्तन करे; परन्तु श्रद्धा तो ऐसी रखे कि यह भी बंध का कारण है; हेय है। श्रद्धा में इसे मोक्षमार्ग माने तो मिथ्यादृष्टि ही है।

१. उल्टी मान्यता या उल्टा अभिप्राय, २. अन्तरंग ज्ञान, ३. अपनापन, ४. त्यागने योग्य, ५. ग्रहण करने योग्य, ६. बंध का अभाव

३. मिथ्यात्वादि आस्रवों के अन्तरंग स्वरूप को तो पहिचानता नहीं है; उनके बाह्य रूप को ही आस्रव मानता है। जैसे -

(क) गृहीत मिथ्यात्व को ही मिथ्यात्व जानता है; परतु अनादि अगृहीत मिथ्यात्व है, उसे नहीं पहिचानता।

(ख) बाह्य जीवहिंसा और इन्द्रिय-मन के विषयों में प्रवृत्ति को अविरति जानता है, पर हिंसा में प्रमाद परिणति मूल है तथा विषय सेवन में अभिलाषा२ मूल है, उसे नहीं जानता।

(ग) बाह्य क्रोधादि को ही कषाय मानता है। अभिप्राय में जो राग-द्वेष रहते हैं, उन्हें नहीं पहिचानता।

(घ) बाह्य चेष्टा को ही योग मानता है। अन्तरंग शक्तिभूत योग को नहीं जानता।

४. जो अंतरंग अभिप्राय में मिथ्यात्वादिरूप रागादिभाव हैं, वस्तुतः वे ही आस्रवभाव हैं। इनकी पहिचान न होने से आस्रव तत्त्व का भी सही श्रद्धान नहीं है।

बन्ध तत्त्व सम्बन्धी भूल

१. पापबंध के कारण अशुभ भावों को तो बुरा जानता है, पर पुण्यबंध के कारण शुभ भावों को भला मानता है। पुण्य-पाप का भेद तो अघाति कर्मों में है, घातिया तो पापरूप ही है तथा शुभ भावों के काल में भी घाति कर्म तो बंधते ही रहते हैं, अतः शुभ भाव बंध के ही कारण होने से भले कैसे हो सकते हैं ?

संवर तत्त्व सम्बन्धी भूल

१. अहिंसादिरूप शुभास्रवों को संवर जानता है, पर एक ही कारण से पुण्यबंध और संवर दोनों कैसे हो सकते हैं ? उसका उसे पता नहीं।

२. शास्त्र में कहे संवर के कारण गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परिषहजय और चारित्र को भी यथार्थ नहीं जानता। जैसे -

(क) पाप चिंतवन न करे, मौन धारण करे, गमनादि न करे, उसे गुप्ति मानता है; पर भक्ति आदिरूप प्रशस्तराग से नाना विकल्प३ होते हैं, उनकी तरफ लक्ष्य नहीं। वीतरागभाव होने पर मन-वचन-काय की चेष्टा न हो - वही सच्ची गुप्ति है।

१. शुभ राग, २. इच्छा ३. राग-द्वेषयुक्त विचार

(ख) इसीप्रकार यत्नाचार प्रवृत्ति को समिति मानता है, पर उसे यह पता नहीं कि हिंसा के परिणामों से पाप होता है और रक्षा के परिणामों से संवर कहोगे तो पुण्यबंध किससे होगा ? मुनियों के किंचित् राग होने पर गमनादि क्रिया होती है, वहाँ उन क्रियाओं में अत्यासक्ति के अभाव में प्रमादरूप प्रवृत्ति नहीं होती तथा अन्य जीवों को दुःखी करके अपना गमनादि प्रयोजन नहीं साधते, अतः स्वयमेव दया पलती है - यही सच्ची समिति है।

(ग) बंधादिक के भय से, स्वर्ग-मोक्ष के लोभ से क्रोधादि न करे। क्रोधादि का अभिप्राय मिटा नहीं, पर अपने को क्षमादि धर्म का धारक मानता है। तत्त्वज्ञान के अभ्यास से जब कोई पदार्थ इष्ट और अनिष्टरूप भासित नहीं होते, तब स्वयमेव ही क्रोधादि उत्पन्न नहीं होते - तब सच्चा धर्म होता है।

(घ) अनित्यादि भावना के चिन्तवन से शरीरादिक को बुरा जान उदास होने को अनुप्रेक्षा कहता है पर उसकी उदासीनता द्वेषरूप होती है। वस्तु का सही रूप पहिचान कर भला जान राग नहीं करना, बुरा जान द्वेष नहीं करना - यही सच्ची उदासीनता है।

(च) क्षुधादिक होने पर उसके नाश का उपाय नहीं करने को परिषहजय मानता है; अन्तर में क्लेशरूप परिणाम रहते हैं, उन पर ध्यान नहीं देता। इष्ट-अनिष्ट में सुखी-दुःखी नहीं होना व ज्ञाता-दृष्टा रहना यही सच्चा परिषहजय है।

(छ) हिंसादि के त्याग को चारित्र मानता है तथा महाव्रतादि शुभ योग को उपादेय मानता है, पर तत्त्वार्थसूत्र में आस्रवाधिकार में अणुव्रत-महाव्रत को आस्रवरूप कहा है, वे उपादेय कैसे हो सकते हैं ? तथा बंध का कारण होने से महाव्रतादि को चारित्रपना सम्भव नहीं है। सकल कषाय रहित उदासीन भाव, उसी का नाम चारित्र है। मुनिराज मन्द कषायरूप महाव्रतादि का पालन तो करते हैं, पर उन्हें मोक्षमार्ग नहीं मानते।

निर्जरा तत्त्व सम्बन्धी भूल

१. वीतराग भावरूप तप को तो जानता नहीं है, बाह्य क्रिया में ही लीन रहे, उसे ही तप मानकर उससे निर्जरा मानता है।

२. उसे यह पता नहीं कि जितना शुद्ध भाव है, वह तो निर्जरा का कारण है और जितना शुभ भाव है वह बंध का कारण है। निश्चय धर्म तो वीतराग भाव है, वही निर्जरा का कारण है।

मोक्ष तत्त्व सम्बन्धी भूल

१. मोक्ष और स्वर्ग के सुख को एक जाति का मानता है; जबकि स्वर्गसुख इन्द्रियजन्य है और मोक्षसुख अतीन्द्रिय।

२. स्वर्ग और मोक्ष के कारण को भी एक मानता है, जबकि स्वर्ग का कारण शुभ भाव है और मोक्ष का कारण शुद्ध भाव।

इस प्रकार जैन शास्त्रों के पढ़ लेने के बाद भी सातों तत्त्वों का विपरीत श्रद्धान बना रहता है।



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