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विश्वास की कीमत

*👉 विश्वास 👈*            एक विद्वान साधु थे जो दुनियादारी से दूर रहते थे। वह अपनी ईमानदारी, सेवा तथा ज्ञान के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार वह पानी के जहाज से लंबी यात्रा पर निकले।         उन्होंने यात्रा में खर्च के लिए पर्याप्त धन तथा एक हीरा संभाल के रख लिया । ये हीरा किसी राजा ने उन्हें उनकी ईमानदारी से प्रसन्न होकर भेंट किया था सो वे उसे अपने पास न रखकर किसी अन्य  राजा को देने जाने के लिए ही ये यात्रा कर रहे थे। यात्रा के दौरान साधु की पहचान दूसरे यात्रियों से हुई। वे उन्हें ज्ञान की बातें बताते गए। एक फ़क़ीर यात्री ने उन्हें नीचा दिखाने की मंशा से नजदीकियां बढ़ ली।      एक दिन बातों-बातों में साधु ने उसे विश्वासपात्र अल्लाह का बन्दा समझकर हीरे की झलक भी दिखा दी। उस फ़क़ीर को और लालच आ गया।             उसने उस हीरे को हथियाने की योजना बनाई। रात को जब साधु सो गया तो उसने उसके झोले तथा उसके वस्त्रों में हीरा ढूंढा पर उसे नही मिला। अगले दिन उसने दोपहर की भोजन के समय साधु से कहा कि इतना कीमती हीर...

प्रेरक कहाणी

एक बार समुद्र के बीच में एक बड़े जहाज पर बड़ी दुर्घटना हो गयी। कप्तान ने जहाज खाली करने का आदेश दिया।जहाज पर एक युवा दम्पति थे। जब लाइफबोट पर चढ़ने का उनका नम्बर आया तो देखा गया नाव पर केवल एक व्यक्ति के लिए ही जगह है।इस मौके पर आदमी ने अपनी पत्नी को अपने आगे से हटाया और नाव पर कूद गया।जहाज डूबने लगा। डूबते हुए जहाज पर खड़ी औरत ने जाते हुए अपने पति से चिल्लाकर एक वाक्य कहा। अब प्रोफेसर ने रुककर स्टूडेंट्स से पूछा – तुम लोगों को क्या लगता है, उस स्त्री ने अपने पति से क्या कहा होगा ? ज्यादातर विद्यार्थी फ़ौरन चिल्लाये – स्त्री ने कहा – मैं तुमसे नफरत करती हूँ ! I hate you ! प्रोफेसर ने देखा एक स्टूडेंट एकदम शांत बैठा हुआ था, प्रोफेसर ने उससे पूछा कि तुम बताओ तुम्हे क्या लगता है ? वो लड़का बोला – मुझे लगता है, औरत ने कहा होगा – हमारे बच्चे का ख्याल रखना ! प्रोफेसर को आश्चर्य हुआ, उन्होंने लडके से पूछा – क्या तुमने यह कहानी पहले सुन रखी थी ? लड़का बोला- जी नहीं,लेकिन यही बात बीमारी से मरती हुई मेरी माँ ने मेरे पिता से कही थी। प्रोफेसर ने दुखपूर्वक कहा – तुम्हारा उत्तर सही है ! प्रोफेसर ने कहानी आ...

तत्त्वार्थसूत्र के अनुसार जीवों की इंद्रियां

*कृमि पिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेवैकवृद्धानि।।२३।।* अर्थ — कृमि, पिपीलिका, भ्रमर, मनुष्यादि के क्रमश: एक—एक इन्द्रियाँ बढ़ती गई हैं। कृमि, लट, केचुआ आदि जीवों के स्पर्शन और रसना ये दो इन्द्रियाँ होती हैं। पिपीलिका—चींटी, बिच्छू आदि जीवों के स्पर्श, रसना और घ्राण ये तीन इन्द्रियाँ होती हैं। भ्रमर—भौंरा, मच्छर आदि जीवों के स्पर्शन, रसना, घ्राण और चक्षु ये चार इन्द्रियाँ होती हैं तथा मनुष्यादि—मनुष्य, पशु, देव, नारकी इनकी पाँचों ही इन्द्रियाँ होती हैं। समनस्क की परिभाषा बताई है— *संज्ञिन: समनस्का:।।२४।।* अर्थ — मन सहित जीव संज्ञी होते हैं। सम्यक् प्रकारेण ज्ञायते इति संज्ञा’’ और उस संज्ञा से समन्वित, जिन्हें ज्ञान—हेय और उपादेय का विवेक होता है वे प्राणी संज्ञी कहलाते हैं। यह विवेक एकेन्द्रिय से चार इन्द्रिय तक के जीवों को स्वभावत: नहीं होता अत: वे सभी असंज्ञी—मनरहित जीव कहलाते हैं। पंचेन्द्रिय जीवों में ही संज्ञी होने की क्षमता रहती है। उनमें भी मनुष्य, देव, नारकी ये तीन गति वाले जीव तो नियम से संज्ञी ही होते हैं तथा तिर्यंचों में कुछ प्राणी असंज्ञी भी होते हैं। इतना बताने के बाद आचार्यश्...

हिंदी की आम अशुद्धियां

हिंदी भाषा से सम्बंधित सुंदर जानकारी.! हिन्दी लिखने वाले अक़्सर  'ई' और 'यी' में,  'ए' और 'ये' में और 'एँ' और 'यें' में जाने-अनजाने गड़बड़ करते हैं...। कहाँ क्या इस्तेमाल होगा? इसका ठीक-ठीक ज्ञान होना चाहिए...।  जिन शब्दों के अन्त में 'ई' आता है वे संज्ञाएँ होती हैं क्रियाएँ नहीं... जैसे: मिठाई, मलाई, सिंचाई, ढिठाई, बुनाई, सिलाई, कढ़ाई, निराई, गुणाई, लुगाई, लगाई, बुझाई...। इसलिए 'तुमने मुझे पिक्चर दिखाई' में 'दिखाई' ग़लत है...  इसकी जगह 'दिखायी' का प्रयोग किया जाना चाहिए...।  इसी तरह कई लोग 'नयी' को 'नई' लिखते हैं...।  'नई' ग़लत है , सही शब्द 'नयी' है...  मूल शब्द 'नया' है , उससे 'नयी' बनेगा...। क्या तुमने क्वेश्चन-पेपर से आंसरशीट मिलायी...? ( 'मिलाई' ग़लत है...।) आज उसने मेरी मम्मी से मिलने की इच्छा जतायी...। ( 'जताई' ग़लत है...।)  उसने बर्थडे-गिफ़्ट के रूप में नयी साड़ी पायी...। ('पाई' ग़लत है)  अब आइए 'ए' और 'ये' के प...

प्राकृत भाषा में प्रकाशित होने वाला पहला अखबार

(कीर्तिमान ) * प्राकृत भाषा में प्रकाशित होने वाला पहला अखबार * जिस प्रकार *उदंत मार्तण्ड* हिंदी का प्रथम समाचार पत्र माना जाता है जो कि जुगलकिशोर सुकुल ने 30 मई 1826 को कलकत्ता से पहली बार प्रकाशित किया था । संस्कृत भाषा का प्रथम अखबार *सुधर्मा* श्री के.वी.संपत कुमार ने 14 जुलाई 1970 को मैसूर से प्रारम्भ किया था ।  उसी प्रकार प्राकृत भाषा में प्रकाशित होने वाला  *पागद भासा* नामक अखबार अब तक का प्रथम प्रयास है । यह भारत सरकार के समाचारपत्र पंजीयन कार्यालय में प्राकृत भाषा के प्रथम समाचार पत्र के रूप में पंजीकृत हुआ है । आरम्भ में भारत सरकार के समाचारपत्र पंजीयन कार्यालय ने इसे DELPRA00001जैसा Title code जारी किया ,क्यों कि उनके रिकॉर्ड के अनुसार इस भाषा में आज तक कोई भी समाचार पत्र प्रकाशित नहीं हुआ था । इस प्राचीन भाषा को इस तरीके से बचाने का  यह प्रथम एवं अनूठा प्रयास किया है नई दिल्ली स्थित श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में जैन दर्शन विभाग के आचार्य प्रो अनेकान्त कुमार जैन ने ,जो इसके संस्थापक संपादक हैं । मीडिया के क्षेत्र में भारत की प्राची...

संस्कृत के ध्येय वाक्य

विभिन्न संस्थाओं के संस्कृत ध्येय वाक्य :-- भारत सरकार --        " सत्यमेव जयते " लोक सभा --        " धर्मचक्र प्रवर्तनाय " उच्चतम न्यायालय --        " यतो धर्मस्ततो जयः " आल इंडिया रेडियो --           " सर्वजन हिताय सर्वजनसुखाय " दूरदर्शन --        " सत्यं शिवम् सुन्दरम " गोवा राज्य --        " सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्। " भारतीय जीवन बीमा निगम --        " योगक्षेमं वहाम्यहम् " डाक तार विभाग --        " अहर्निशं सेवामहे " श्रम मंत्रालय --        " श्रम एव जयते " भारतीय सांख्यिकी संस्थान --        " भिन्नेष्वेकस्य दर्शनम् " थल सेना --        " सेवा अस्माकं धर्मः " वायु सेना --        " नभःस्पृशं दीप्तम् " जल सेना --        " शं नो वरुणः " मुंबई पुलिस --        " सद्रक्षणाय खलनिग्र...

क्या जैन का मतलब बनिया होता है ?

Dr Amit Rai Jain के फेसबुक वाल से साभार क्या जैन मतलब बणिया होता है ? #Jain_Bania  सोशल मीडिया पर चल रहे माहौल को देखते हुए मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं,कि क्या जैन का अर्थ बणिया होता है,आमतौर पर सबकी यह धारणा होती है कि जैन से आशय बणिया/वैश्य वर्ण की एक जाति है।अगर आप भी ऐसा मानते हैं तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी के शिकार है।   जैन कोई जाति या वर्ण नहीं है,बल्कि यह स्वतंत्र धर्म है,इसे समझने के लिए हमें इसके इतिहास की ओर जाना पड़ेगा, जैन धर्म का अपना स्वतंत्र इतिहास है,यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना धर्म है,यहां तक कि वैदिक के भी पहले भी यहां के मूलनिवासियों का धर्म यही था,और इसके अनुयायी ही जैन थे, जिन्हें तत्कालीन समय में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता था।    अधिकतर लोग जानकारी के अभाव में जैन-धर्म को वैष्णव या हिंदू से जोड़कर देखते हैं,किंतु मूलनिवासी देवता शिव और प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव एक ही पुरुष थे, यहां का धर्म ऋषभदेव का अनुयायी ही था !    अंतिम तीर्थंकर महावीर के बाद जैन-धर्म दो परंपराओं में बंट गया,दिगंबर व श्वेतांबर। दिगंबर दक्षिण भारत में अधिक प्रचार...