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ऋषभदेव और बाबा आदम

इस पृथ्वी पर अनंत कालचक्र हुए हैं, प्रत्येक काल में 6+6 युग (era) होते हैं। पहले 6 युगो का कालचक्र उत्सर्पिणी( ascending) और दुसरे 6 युगो का कालचक्र अवसर्पिणी (descending) कालचक्र कहलाता है। अभी वर्तमान में अवसर्पिणी काल का 5वा युग(era) चल रहा है। अवसर्पिणी काल के पहले 3 युग (era) और उत्सर्पिणी के अंतिम 3 युग (era) "युगलिककाल" कहलाते हैं और उस समय की धरती को "भोगभुमि" कहा जाता है जिसे पश्चिमी धर्मों में garden of Eden(आदम बाग) माना गया है।   उस युगलिककाल में पति-पत्नी जोड़े के रूप में(युगल) पैदा होते हैं,   और 10 प्रकार के पेड़ होते हैं जिन्हें इच्छा वृक्ष (कल्पवृक्ष) कहा जाता है,शास्त्रों में यह भी लिखा है कि एक कल्प समय तक आयु होने से इन्हें कल्पवृक्ष कहा जाता है।  ये युगल लोग उन पेड़ों के फलों को खाकर जीते हैं,और इन कल्पवृक्षों से इनकी सभी जरूरते भी पुरी हो जाती है।   उन्हें किसी भी प्रकार के काम करने की ज़रूरत नहीं होती है, जैसे व्यवसाय आदि करके जीविकोपार्जन करना,खाना बनाना आदि, उनकेे शरीर की शक्ति,ऊंचाई,आयु लाखों वर्षों की होती है,सम्पुर्ण जीवन उनका सुखमय ही हो...

आचार्य कुन्दकुन्द

*कुन्दकुन्दाचार्य का व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व*       *आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले की गुटि तहसील में स्थित कौन्डकुन्दपुर (कौन्डकुन्दी) नामक ग्राम में नगरसेठ गुणकीर्ति की धर्मपरायणा पत्नी शांतला के गर्भ से ईसापूर्व 108 के शार्वरी संवत्सर के माघ मास के शुक्लपक्ष की पंचमी के दिन एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ।* चूँकि गर्भधारण के पूर्व माता शांतला ने स्वप्न में चंद्रमा की चाँदनी देखी थी , सो बालक का नाम *पद्मप्रभ* रखा गया।        बचपन से ही माता पालने में झुलाते समय अध्यात्म की लोरियाँ सुनाती थी --   *शुद्धोSसि बुद्धोSसि निरंजनोSसि।* *संसार   माया परिवर्जितोSसि।।* *आजन्मलीनं  त्यज  मोहनिद्रम।* *शान्तालसावाक्यमुपयासि पुत्र!*        माता के मुख से ऐसी लोरियाँ सुनकर बचपन से ही आत्मरुचि और वैराग्य के संस्कार प्रबल हो गये। जब बालक *पद्मप्रभ* ने ग्यारहवें वर्ष में प्रवेश किया , तभी अष्टांग महानिमित्त के ज्ञाता "आचार्य अनंतवीर्य" कौन्डकुन्दी गाँव में पधारे। और बालक "पद्मप्रभ" को देखकर बोले -- *"यह बालक महान् तपस्वी और ...

जैन विद्यालय

*दिगम्बर जैन मुमुक्षु समाज द्वारा संचालित* -         *आवासीय विद्यालय एवं महाविद्यालय*               !  ! *एक सामान्य परिचय* !  !                   *1. श्री टोडरमल दिगंबर जैन सिद्धान्त महाविद्यालय जयपुर* प्रवेश -- 11th शास्त्री प्रवेश शिविर (शिक्षण-प्रशिक्षण) -  संपर्क -  डॉ. शांतिकुमारजी पाटिल (प्राचार्य) 94139 75133 पं. जिनकुमारजी शास्त्री 89032 01647 पं. जिनेंद्रजी शास्त्री 95719 55276 पं. गौरवजी शास्त्री 77373 23764 *2. आचार्य अकलंकदेव जैन न्याय महाविद्यालय ध्रुवधाम, बाँसवाड़ा* प्रवेश -- 11th शास्त्री प्रवेश शिविर -  संपर्क-  डॉ. प्रवीणजी शास्त्री (प्राचार्य) 77268 88399 पं. दीपकजी शास्त्री 73898 21495 पं. शिखरजी शास्त्री 76651 92676 *3. आचार्य धरसेन दिगंबर जैन सिद्धांत महाविद्यालय (शास्त्री) एवं आचार्य समंतभद्र विद्या निकेतन (cbse) कोटा* प्रवेश-- 8th (cbse) और 11th (शास्त्री) प्रवेश शिविर (cbse) -  प्रवेश शिविर (शास्त्री) -  संपर्क -  ...

जैन धर्म समाज और संस्कृति की विशेषताएं

जैन समुदाय एक अल्पसंख्यक समुदाय है तथापि इस की उपलब्धियां किसी से कम नहीं है। आप अपने अतीत के शानदार इतिहास पर गर्व महसूस  सकें एवं भविष्य के लिए सुखद कार्य योजना का निर्माण कर सकें, इस हेतु प्रस्तुत है कुछ तथ्य- 1. जैन संस्कृति विश्व की महान एवं प्राचीन संस्कृतियों में से एक है। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो की खुदाई में प्राप्त मुद्रा एवं उस पर अंकित ऋषभदेव का सूचक बैल तथा सील नं.49 पर स्पष्ठ रूप से जिनेश्वर शब्द का अंकन होना तथा वेदों की 141 ऋचाओं में भगवान ऋषभदेव का आदर पूर्वक उल्लेख इस संस्कृति को वेद प्राचीन संस्कृति सिद्ध करती हैं। 2.   हमारे देश भारत वर्ष का नाम ऋषभदेव के पुत्र चक्रवर्ती भरत के नाम से विख्यात है जो कि जग जाहिर प्रमाण है। विष्णु पुराण में भी इसका ऊल्लेख मिलता है। हमारे देश के प्रधान मंत्री स्व. जवाहर लाल नेहरु ने उड़ीसा के खंडगिरी स्थित खारवेल के शिला लेख पर "भरतस्य भारत" रूप प्रशस्ति को देख कर ही इस देश का संवैधानिक नामकरण भारत किया था। 3.    राजा श्रेणिक, सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य , कलिंग नरेश खारवेल एव सेनापति चामुंडराय जैन इतिहास के महान शासक ...

मकरसंक्रांति और जैन संस्कृति

 *मकर संक्रांति पर्व के विषय में फैलाए जा रहे भ्रम का खण्डन*  *मकर संक्रांति के दिन चक्रवर्ती द्वारा सूर्य विमान में स्थित अकृत्रिम जिनमन्दिर के दर्शन कथन आगम सम्मत नहीं* 🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴 भरत चक्रवर्ती जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के आर्य खंड के अयोध्या नगरी मे अपने महल की छत से खडे होकर उगते हुए सूर्य मे स्थित जिनबिम्ब के दर्शन करता है तथा नमस्कार करता हैै, यह क्षेत्र ४७२६३-७/२० योजन है जो कि चक्षु इन्द्रि का अधिकतम क्षेत्र है। भरत जी के दर्शन भी साल भर में एक ही बार होते है। *ये जिनबिम्ब के दर्शन गर्मीयो मे होते है ना कि मकर सक्रान्ति के दिन* जम्बूद्वीप एक लाख योजन व्यास वाला है, इसमे दो सूर्य है, एक सूर्य को परिक्रमा मे साठ मुहूर्त अर्थात दो दिन लगते है,  सूर्य जम्बूद्वीप की परिधि से एक सौ अस्सी (१८०) योजन अन्दर से परिक्रमा करता है तो परिक्रमा का क्षेत्र बचा (१८०+१८०) ३६० योजन कम अर्थात ९९६४० योजन तथा इसकी *परिधि हुई ३१५०८९ योजन*  जब दिन अठारह (१८) मुहूर्त का तथा रात बारह (१२) मुहूर्त की होती है तो उस दिन भरत जी दर्शन करते है,  अठारह (१८) मुहूर्त के दिन मे न...

अहिंसा अणुव्रत - वर्णी जी

*अहिंसकता का विकास*      आर्ष ग्रंथों में चार प्रकार की हिंसायें बताकर यह दिखाया हैकि गृहस्थ संकल्पी हिंसा का तो पूर्ण त्यागी होती ही है । यदि वह विवेकी है, ज्ञानी है तो वह अपने इरादे से किसी भी जीव का अकल्याण नहीं चाहता । लेकिन आरंभ के प्रसंगों में, उद्यमों के प्रसंगों में अथवा किसी शत्रु द्वारा आक्रमण हुआ हो ती वहाँ पर जो हिंसायें हो जाती हैं उन हिंसाओं का त्यागी यह अविरत गृहस्थ नहीं है । फिर संयमासंयम के बीच में जैसे-जैसे उसकी प्रतिमा बढ़ती रहती है, प्रतिज्ञा बढ़ती रहती है, आशय विरक्ति की ओर जाता है तैसे-तैसे उन तीन प्रकार की हिंसावों में भी उसका त्याग बढ़ता जाता है और संयत हो जाने पर तो सर्वप्रकार की हिंसावों का सर्वथा त्याग हो जाता है । अब रह गया यह कि वे साधु श्वास तो लेते हैं ओर श्वास लेने पर भी जीव मरते हैं तो जो इस तन, मन, वचन के अनुकूल किया ही न जा सकता हो ऐसी स्थिति अशक्यानुष्ठान में कहलाती है और आशय रंच भी किसी के घात को न होने से वहाँ वह अहिंसक ही कहलाता है। *हिंसा का दोष*        तो जैसे पदवियों के अनुसार कर्तव्य का विभिन्न-विभिन्न वर्णन है, ...

महावीराष्टक स्तोत्र

*श्री महावीराष्टक स्त्रोत* यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिदचित:, समं भान्ति ध्रौव्य-व्यय-जनि-लसन्तोऽन्तरहिता:। जगत्साक्षी मार्ग-प्रकटन-परो भानुरिव यो, महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ 1॥   अताम्रं यच्चक्षु: कमलयुगलं स्पन्द-रहितं, जनान् कोपापायं प्रकटयति वाभ्यन्तरमपि। स्फुटं मूर्तिर्यस्य प्रशमितमयी वातिविमला, महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥ 2॥   नमन्नाकेन्द्राली-मुकुटमणि-भा-जाल-जटिलं, लसत्पादाम्भोज-द्वयमिह यदीयं तनुभृताम्। भवज्ज्वाला-शान्त्यै प्रभवति जलं वा स्मृतमपि, महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥ 3॥   यदर्चा - भावेन प्रमुदित - मना दर्दुर इह, क्षणादासीत्स्वर्गी गुणगण-समृद्ध: सुख-निधि:। लभन्ते सद्भक्ता: शिवसुखसमाजं किमु तदा, महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥ 4॥   कनत्स्वर्णाभासोऽप्यपगत-तनुज्र्ञान-निवहो , विचित्रात्माप्येको नृपतिवरसिद्धार्थतनय:। अजन्मापि श्रीमान् विगतभवरागोऽद्भुतगतिर्- महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥ 5॥   यदीया वाग्गङ्गा विविधनयकल्लोलविमला, बृहज्ज्ञानाम्भोभिर्जगति जनतां या स्नपयति। इदानीमप्येषा बुधजनमरालै: परिचिता, महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥ 6॥...