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पागद भासा जुले २०१५

JIN FOUNDATION द्वारा प्रकाशित







प्राकृत भाषा में प्रकाशित प्रथम अखबार "पागद भासा" का नया अंक आप सभी की सेवा में प्रस्तुत है।इस बार यह अंक ८ पृष्ठों का है |अब इसे ISSN संख्या भी प्राप्त हो चुकी है | यह सर्वत्र नि:शुल्क वितरित किया जा रहा है।इसमें आप अपनी शुभकामनाएं /विज्ञापन आदि देकर प्राकृत भाषा के प्रचार प्रसार तथा संरक्षण-संवर्धन में सहयोग कर सकते हैं।
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pagadbhasa011@gmail.com,
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यह एक अव्यवसायिक प्रयास है।आप इसे यथावत जितने चाहे प्रिंट लेकर साधु -साध्वियों ,श्रावक -श्राविकाओं में वितरित कर सकते हैं।सोशल मीडिया आदि में fwd करके,या अपनी बेबसाइट,ब्लॉग आदि पर यथावत् निः शुल्क प्रकाशित करके अपना योगदान दे सकते हैं।आपके सुझाव सदैव आमंत्रित हैं।
Dr Anekant Kumar Jain,Editor

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क्या जैन का मतलब बनिया होता है ?

Dr Amit Rai Jain के फेसबुक वाल से साभार क्या जैन मतलब बणिया होता है ? #Jain_Bania  सोशल मीडिया पर चल रहे माहौल को देखते हुए मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं,कि क्या जैन का अर्थ बणिया होता है,आमतौर पर सबकी यह धारणा होती है कि जैन से आशय बणिया/वैश्य वर्ण की एक जाति है।अगर आप भी ऐसा मानते हैं तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी के शिकार है।   जैन कोई जाति या वर्ण नहीं है,बल्कि यह स्वतंत्र धर्म है,इसे समझने के लिए हमें इसके इतिहास की ओर जाना पड़ेगा, जैन धर्म का अपना स्वतंत्र इतिहास है,यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना धर्म है,यहां तक कि वैदिक के भी पहले भी यहां के मूलनिवासियों का धर्म यही था,और इसके अनुयायी ही जैन थे, जिन्हें तत्कालीन समय में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता था।    अधिकतर लोग जानकारी के अभाव में जैन-धर्म को वैष्णव या हिंदू से जोड़कर देखते हैं,किंतु मूलनिवासी देवता शिव और प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव एक ही पुरुष थे, यहां का धर्म ऋषभदेव का अनुयायी ही था !    अंतिम तीर्थंकर महावीर के बाद जैन-धर्म दो परंपराओं में बंट गया,दिगंबर व श्वेतांबर। दिगंबर दक्षिण भारत में अधिक प्रचार...

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