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आचार्य भद्रबाहु को ही आचार्य कुन्दकुन्द का गुरु मानना अधिक उपयुक्त

*आचार्य भद्रबाहु को ही आचार्य कुन्दकुन्द का गुरु मानना अधिक उपयुक्त* :

 प्रो .डॉ. फूलचन्द्र जैन प्रेमी, वाराणसी

*आचार्य कुन्दकुन्द और उनका दिव्य अवदान*

तीर्थंकर महावीर और गौतम गणधर के बाद की उत्तरवर्ती जैन आचार्य परम्परा में अनेक महान् आचार्यों का नाम श्रद्धापूर्वक लिया जाता है; जिनके अनुपम व्यक्तित्व और कर्तृत्व से भारतीय चिन्तन, अनुप्राणित हो कर चतुर्दिक प्रकाश की किरणें फैलाता रहा है, किन्तु इन सब में अब से दो हजार (अथवा लगभग 2400) वर्ष पूर्व युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द ऐसे प्रखर प्रभात के समान महान् आचार्य हुए, जिनके महान आध्यात्मिक चिन्तन से सम्पूर्ण भारतीय मनीषा प्रभावित हुई और उसने एक अद्भुत मोड़ लिया। 
यही कारण है कि इनके परवर्ती भी आचार्यों ने अपने को उनकी परम्परा का आचार्य मानकर उनकी सम्पूर्ण विरासत से जुड़ने में अपना गौरव माना तथा उनकी मूल-परम्परा तथा ज्ञान-गरिमा को एक स्वर से श्रेष्ठ मान्य करते हुए कहा -
*मंगलं भगवदो वीर, मंगलं गोदमो गणी।* 
*मंगलं कोण्डकुंदाइं, जेण्ह धम्मोत्थु मंगलं॥* 
[ मंगलं भगवान् वीरो, मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो, जैनधर्मो$स्तु मंगलम्॥ ]
अर्थात् तीर्थंकर भगवान महावीरस्वामी मंगलस्वरूप हैं और इनके प्रथम गणधर गौतमस्वामी ( तीर्थंकर महावीर की दिव्यध्वनि के विवेचनकर्ता तथा द्वादशांग आगमों के रचयिता ) मंगलात्मक हैं। पश्चात् आचार्य कुन्दकुन्द जैसे समर्थ आचार्यों की आचार्य-परम्परा मंगलमय है तथा प्राणिमात्र का कल्याण करनेवाला जैनधर्म सभी के लिए मंगलकारक है।
शिलालेखों के अनुसार इनका जन्मस्थान कोणुकुन्दे प्रचलित नाम कौंडकुन्दी ( कुन्दकुन्दपुरम) तहसील गुण्टर हैं, जो कि आन्ध्रप्रदेश के अनन्तपुर जिले में कौंडकुन्दपुर अपरनाम कुरुमरई माना जाता है। 
[ सामान्यत: माना जाता है कि ] इनका जन्म शार्वरी नाम संवत्सर माख शुक्ला ५, ईसा पूर्व १०८ (बी० सी०) में हुआ था; इन्होंने ११ वर्ष की अल्पायु में ही श्रमण दीक्षा ली तथा ३३ वर्ष तक मुनिपद पर रहकर ज्ञान और चारित्र की सतत साधना की और ४४ वर्ष की आयु (ईसा पूर्व ६४) में चतुर्विध संघ ने इन्हें आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया। ५१ वर्ष १० माह और १५ दिन तक उन्होंने आचार्यपद को सुशोभित किया। इस तरह इन्होंने कुल ९५ वर्ष १० माह १५ दिन की दीर्घायु पायी और ईसा पूर्व १२ में समाधिमरणपूर्वक मृत्यु पाकर स्वर्गारोहण किया। (१. समयसार पुरोवाक्, पृष्ठ ३०४, प्रकाशन - कुन्दकुन्द भारती, दिल्ली १९७८)
डॉ० ए० एन० उपाध्ये ने भी इनका समय, ईसवी सन् के प्रारम्भ में मानते हुए लिखा है -
"I am inclined to believe, after this long survey of the available material, that kundakunda's age lies at the beginning of the Christian era." (Pravachansár : Introduction, p. 21)
कुछ विद्वान् कुन्दकुन्द को पाँचवी शती का भी सिद्ध करने में प्रयत्नशील हैं। (श्रमण भगवान महावीर, पृ० ३०६; लेखक - पं० कल्याण विजयगणी, विशेष- इसमें दस प्रमाणों / बिन्दुओं  से आचार्य कुन्दकुन्द को छठी शती का माना है.)
लगता है मूल दिगम्बर परम्परा के महान पोषक होने के कारण आचार्य कुन्दकुन्द जैसे अनुपम व्यक्तित्व और कर्तृत्वं के धनी आचार्य की उत्कृष्ट मौलिकता एवं कीर्ति को कुछ विद्वान् सहन नहीं कर पा रहे हैं, इसीलिए उन्हें परवर्ती सिद्ध करने के लिए तथ्य रहित आधार बतलाकर अपने को सन्तुष्ट मान रहे हैं। वस्तुतः आचार्य कुन्दकुन्द या अन्य जैनाचार्य द्वारा श्रेष्ठ साहित्य के निर्माण का उद्देश्य स्व-पर कल्याण करना था, न कि आत्म-प्रदर्शन या लौकिक यश की प्राप्ति; इसीलिए आज अनेकों ऐसे उत्कृष्ट अज्ञात-कर्तृक के ग्रन्थ उपलब्ध हैं, जिनमें उनके लेखक ने अपना नाम तक लिखना उचित न समझा। 
आचार्य अमृतचन्द्राचार्य (८- ९वीं शती) के पूर्व तक कुन्दकुन्द के साहित्य पर किसी के द्वारा टीका आदि न लिखे जाने का यह अर्थ नहीं कि वे ५-६वीं शती के थे, अपितु काफी साहित्य का नष्ट होना, भाषायी आक्रमण और साथ ही आज जैसे प्राचीन काल में विविध सम्पर्क और साधनों का अभाव कारण है ।
आचार्य कुन्दकुन्द के ग्रन्थ ही उनकी प्राचीनता, प्रामाणिकता और मौलिकता को कह रहे है। उन्होंने अपने ग्रन्थों में "सुयणाणि भद्दबाहु गमयगुरु भयवओ जयउ" कहकर अपने को बारह अंगों और चौदह पूर्वों के विपुल विस्तार के वेत्ता, गमक ( प्रबोधक) भगवान् श्रुतज्ञानी श्रुतकेवली भद्रबाहु का शिष्य कहा है। (बोधपाहुड गाथा ६१-६२) भद्रबाहु को अपना गमक कहने का यही अर्थ है कि श्रुतकेवली भद्रबाहु, कुन्दकुन्द को प्रबोध करनेवाले गुरु थे; इसीलिए समयसार को भी उन्होंने "श्रुतकेवली भणित" कहा है। यथा -
वंदित्तु सव्वसिद्धे धुवमचलमणोवमं गइं पत्ते । वोच्छामि समयपाहुडमिणमो सुदकेवली भणिदं ॥   
                   (- समयसार गाथा १)
श्रवणबेलगोल के चन्द्रगिरि पर्वत पर महनवमी मण्डप में दक्षिण मुख स्तम्भ पर शक सं० १०८५' के लेख संख्या ४० में श्रुतकेवली भद्रबाहु और चन्द्रगुप्त के बाद आचार्य कुन्दकुन्द, इनके बाद आ० उमास्वाति का उल्लेख करके इन्हें भद्रबाहु के अन्वय का ही बतलाया है। इस लेख का मुख्यांश इसप्रकार हैं -
*श्रीभद्रः सर्वतो यो हि भद्रबाहुरिति श्रुतः ।* *श्रुतकेवलि-नाथेषु चरम: परमो मुनिः ॥* *चन्द्रप्रकाशोज्वलचन्द्रकीर्तिः श्रीचन्द्रगुप्तोऽजनि तस्य शिष्यः ।*
*यस्य प्रभावाद् वनदेवताभिराराधितः स्वस्य गणो मुनीनाम् ॥ ....*
*तस्यान्वये भू-विदिते बभूव यः पद्मनन्दिप्रथमाभिधानः ।*
*श्रीकोण्डकुन्दादि मुनीश्वराख्यस्सत्संयमादुद्गत चारणार्द्धि: ॥*
*अभूदुमास्वातिमुनीश्वरा$स्वाचार्यशब्दोत्तरगृद्धपिच्छः ।*
*तदन्वये तत्सदृशोऽस्ति नान्यस्तात्कालिकाशेषपदार्थवेदी ॥*
पद्मनन्दि, कुन्दकुन्दाचार्य का ही अपर नाम है। टीकाकार जयसेनाचार्य तथा ब्रह्मदेव ने कुमारनन्दि सिद्धान्तदेव को भी कुन्दकुन्दाचार्य का गुरु बतलाया है, जबकि नन्दिसंघ की पट्टावली में जिनचन्द्र को उनका गुरु बतलाया है; किन्तु *(श्रुतकेवली) भद्रबाहु को आचार्य कुन्दकुन्द ने गमकगुरु के रूप में जिस तरह स्मरण किया है, उससे आचार्य भद्रबाहु को ही उन (आचार्य कुन्दकुन्द) का गुरु मानना अधिक उपयुक्त है।*

(भूमिका, अष्टपाहुड, भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वद् परिषद्, पृष्ठ 10-12 से साभार)

- डॉ. फूलचन्द्र जैन प्रेमी, 
अध्यक्ष, जैन दर्शन विभाग,
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी

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