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श्रुत की रचना (श्रुतावतार)

*श्रुत की रचना (श्रुतावतार)*
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प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी को जैन समाज में, श्रुतपंचमी पर्व मनाया जाता है। इस दिन षटखण्डागम की रचना पूर्णं होकर उन सूत्रों को पुस्तक बद्ध किया और ज्येष्ठ सुदी पंचमी के दिन चतुर्विध संघ सहित कृतिकर्म पूर्वक महापूजा की।इसी पंचमी का नाम "श्रुतपंचमी’ नाम प्रसिद्ध हो गया"।
इस पर्व को मनाने के पीछे एक इतिहास है, कि श्रुत की रचना कैसे हुई जो निम्नलिखित है-
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श्री वर्द्धमान जिनेन्द्र के मुख से श्री इन्द्रभूति (गौतम) गणधर ने श्रुत को धारण किया। उनसे सुधर्माचार्य ने और उनसे जम्बूस्वामी नामक अंतिम केवली ने ग्रहण किया। 
*०१)* इन्द्रभूति गौतम,  १२ वर्ष    ००-१२
*०२)* सुधर्माचार्य जी,   १२ वर्ष,   १२-२४
*०३)* जम्बुस्वामी जी,   ३८ वर्ष,   २४-६२
*भगवान महावीर स्वामी के पश्चात ६२ वर्ष तक तीन अनुबद्ध केवली हुए*
सबसे अंतिम केवली श्रीधर स्वामी हुए जो कुण्डलपुर से निर्वाण को प्राप्त हुए
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*पश्चात १०० वर्ष में*
*फिर अगले सौ वर्षो मे ये पाँच श्रुतकेवली हुए*
*०४)* विष्णु (विश्वनन्दी) जी, १४ वर्ष, ६२-७६
*०५)* नन्दिमित्र जी,   १६ वर्ष,    ७६-९२
*०६)* अपराजित जी, २२ वर्ष,  ९२-११४
*०७)* गोवर्धन जी,     १९ वर्ष,  ११४-१३३
*०८)* भद्रबाहु जी,      २९ वर्ष, १३३-१६२
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*तदनंतर १८३ वर्ष मे*
*११ अंग १०पूर्वो के वेत्ता ग्यारह मुनिराज हुए*
*०९)* विशाखाचार्य जी,१० वर्ष,  १६२-१७२
*१०)* प्रोष्ठिलाचार्य जी, १९ वर्ष,  १७२-१९१
*११)* क्षत्रिय जी,          १७ वर्ष, १९१-२०८
*१२)* जयसेन जी,        २१ वर्ष, २०८-२२९
*१३)* नागसेन जी,        १८ वर्ष, २२९-२४७
*१४)* सिद्धार्थ जी,        १७ वर्ष, २४७-२६४
*१५)* घृतिषेण जी,        १८ वर्ष, २६४-२८२
*१६)* विजय जी,           १३ वर्ष, २८२-२९५
*१७)* बुद्धिलिंग जी,       २० वर्ष, २९५-३१५
*१८)* गंगदेव जी,           १४ वर्ष, ३१५-३२९
*१९)* धर्मसेन जी,          १६ वर्ष, ३२९-३४५
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*तत्पश्चात २२० वर्ष में*
*११ अंग के पाँच पारगामी मुनि हुये*
*(कही कही १२३ वर्ष भी बताया जाता हैं)*
*२०)* नक्षत्र जी,          १८ वर्ष, ३४५-३६३
*२१)* जयपाल जी,      २० वर्ष, ३६३-३८३
*२२)* पांडुनाम जी,      ३९ वर्ष, ३८३-४२२
*२३)* ध्रुवसेन (धृतषेण) १४ वर्ष, ४२२-४३६
*२४)* कंसाचार्य जी,      ३२ वर्ष, ४३६-४६८
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*तदनन्तर ११८ वर्ष में*
*एक अंग(आचारंग)के धारी चार मुनिराज हुये*
*२५)* सुभद्राचार्य जी,  ०६ वर्ष, ४६८-४७४
*२६)* यशोभद्र जी,      १८ वर्ष, ४७४-४९२
*२७)* यशोबाहु(भद्रबाहु-०२), २३ वर्ष
                                               ४९२-५१५
*२८)* लोहाचार्य जी,    ५२(५०), ५१५-५६५
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इस प्रकार से–
  ६२ वर्ष मे तीन केवली
१०० वर्ष में पाँच श्रुतकेवली
१८३ वर्ष में ११ मुनि, ११अंग १० पूर्व के धारी
२२० वर्ष में पाँच मुनि, ११ अंग के धारी हुये
११८ वर्ष मे चार मुनि, एक अंग के धारी हुये
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*६२ +१०० +१८३ +२२० +११८ =६८३ वर्ष* इस प्रकार भगवान महावीर के पश्चात ६८३ वर्ष तक अंगो का ज्ञान रहा। 
*नोट– यहाँ जो वर्ष लिखे है वे इस्वी सन नहीं है, यह भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष जाने के बाद से वर्षो की गणना है अर्थात वीर निर्वाण सम्वत है*
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फिर चार मुनि अंग और पूर्व ज्ञान के कुछ भाग के ज्ञाता थे। श्रुतावतार की मूल पट्टावली में इन चारों का नाम नहीं है। एक साथ उल्लेख होने से समकालीन हैं। इनका समुदित काल २० वर्ष माना जा सकता है। 
*००)* विनयदत्त जी,  २० वर्ष, ५६५-५८५
*००)* श्रीदत्तजी,       २० वर्ष, ५६५-५८५, 
*००)* शिवदत्त जी,    २० वर्ष, ५६५-५८५
*००)* अर्हदत्त जी,     २० वर्ष, ५६५-५८५
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*२९)* अर्हद्बलि(गुप्तिगुप्त),२८वर्ष, ५६५-५९३
*३०)* माघनंदी जी,      २१ वर्ष, ५९३-६१४
*३१)* धरसेन जी,        १९ वर्ष, ६१४-६३३
*३२)* पुष्पदंत जी,       ३० वर्ष, ६३३-६९३
*३२)* भूतबली जी,      २० वर्ष, ६३३-६८३
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नन्दिसंघ की पट्टावली के अनुसार भगवान महावीर की २९ वी पीढी में अर्हदबलि मुनिराज हुए। ३० वी में माघनंदी मुनिराज हुए। माघनंदी जी के दो शिष्य *जिनसेन जी,धरसेन जी* थे
जिनसेन स्वामी के शिष्य श्री कुन्कुन्दाचार्य और धरसेन स्वामी के शिष्य पुष्पदन्त जी और भूतबलि जी थे। इस हिसाब से *धरसेन स्वामी तीर्थकर वर्द्धमान की ३१ वी पीढी में हुए और कुन्दकुन्द स्वामी तथा पुष्पदंत, भूतबलि आचार्य ३२ वीं पीढी में हुए,*  इसलिए धरसेन स्वामी आचार्य कुन्दकुन्द के काकागुरू होते हैं। *आचार्य कुन्दकुन्द तथा पुष्पदंत एवं भूतबलि आचार्य गुरूभाई होते हैं।* 
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*नन्दिसंघ की जो प्राकृत। पट्टावली उपलब्ध है उसके अनुसार भी श्रुतावतार का यही क्रम है* केवल आचार्य के कुछ नामों में अंतर है,

नन्दिसंघ की पट्टावली के अनुसार धरसेनाचायार्य का काल वीर निर्वाण से ६१४ वर्ष पश्चात जान पड़ता है।
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*✍️अर्हदबलि मुनिराज*
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पूर्व देश में पुण्ड्रवर्द्धनपुर मे श्री अर्हदबलि मुनिराज हुए, ये भी अंग पूर्व के एकदेश को जानने वाले और अष्टांगनिमित्त ज्ञान के ज्ञाता थे। वे प्रत्येक पाँच वर्ष के अंत मे १०० योजन क्षेत्र में निवास करने वाले मुनियो के समुह को एकत्र कर युग प्रतिक्रमण कराते थे। एक बार आचार्य अर्हदबली जी ने प्रतिक्रमण के समय मुनिजनो से पुछा कि सब यति आ गये? उत्तर मे उन मुनियो ने कहा कि–भगवन! हम सब अपने अपने संघ सहित आ गये। इस वाक्य को सुनकर अर्हदबलि मुनिराज को अपने-अपने संघ के प्रति मुनियो का रागभाव का एहसास हुआ, इसलिए मुनिराजो को गणो मे बाट दिया संघ व्यवस्था बना दी
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*✍️संघ व्यास्था*
जो मुनिराज गुफाओ से आये थे उन्हे वीर या नन्दी नाम दिया *जैसे* वीरनंदी, पदमनंदी
जो जहाँ अशोक वृक्ष होते थे वहा से आये थे उन्हे देव नाम दिया *जैसे* अकलंक देव
जहाँ पंचस्तूप होते है वहा से आये थे उन्हें सेन या भद्र नाम दिया *जैसे* वीरसेन, जयसेन किसी को भद्र भी कहाँ है *जैसे* गुणभद्र
जो शाल्मली वृक्षो से आये थे उन्हे गुणधर या गुप्त नाम दिया *जैसे* इन्द्रग्प्त, वीरगुप्त
जो केसर वृक्षो से आये थे उन्हे सिंह या चन्द्र नाम दिया *जैसे* वादिभसिंह सुरी, अमृतचन्द्र
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*✍️धरसेनाचार्य जी*
अर्हदबलि मुनिराज के शिष्य माघनन्दी नामक मुनिपुंगव हुए ये भी क्षीण अंग के धारी थे। कालांतर मे ये भी समाधीमरण को प्राप्त हुए।
माघनन्दी जी के शिष्य हुए धरसेनाचार्य जी, ये भी अंगों और पूर्वों के एकदेश का ज्ञाता थे। इन्हे दूसरे अग्रायणी पूर्व की पंचम वस्तु के अंतर्गत चौथे महाकर्म प्रकृति प्राभृत के विशिष्ट ज्ञाता थे। जिस प्रकार दीपक से दीपक जलाने की परम्परा चालू रहती है उसी प्रकार धरसेनाचार्य तक भगवान महावीर की देशना आंशिक रूप में पूर्ववत धाराप्रवाह रूप में चली आ रही थी। 
ये विहार करते हुए सुराष्ट्र देश के गिरिनार के समीप उर्जयन्तगिरि की चन्द्रगुफा मे पहुचे। जब इन्हे अपने निर्मल ज्ञान से यह भासमान हुआ कि मेरी आयु थोड़ी ही शेष रह गई है और चिंता हुई कि अवसर्पिणी काल के प्रभाव से श्रुतज्ञान का दिन प्रतिदिन हृास होता जा रहा है। इस समय मुझे जो कुछ श्रुत प्राप्त है,उतना भी आज किसी को नहीं है,यदि मैं अपना श्रुत दूसरे को नहीं दे सका तो यह भी मेरे ही साथ समाप्त हो जायेगा। ऐसा विचार कर धरसेनाचार्य जी ने देशेन्द्र नामक देश में वेणातटाकपुर में निवास करने वाले महामहिमाशाली मुनियो के निकट ब्रह्मचारी के द्वारा पत्र भेजा उसमें लिखा था-

*‘‘स्वस्ति श्रीमान् ऊर्जयंत तट के निकट स्थित चन्द्रगुहावास से धरसेनाचार्य वेणाक तट पर स्थित मुनिसमूहों को वंदना करके इस प्रकार से कार्य को कहते हैं कि हमारी आयु अब अल्प ही शेष रही है। इसलिए हमारे श्रुतज्ञानरूप शास्त्र का व्युच्छेद जिस प्रकार से न हो जावे उसी तरह से आप लोग तीक्ष्ण बुद्धि वाले श्रुत को ग्रहण और धारण करणे में समर्थ दो यतीश्वरों को मेरे पास भेजो।’’*

*✍️गुरु पुष्पदंत,भूतबलि का विद्या अध्ययन*
मुनि संघ ने आचार्य धरसेन के श्रुतरक्षा सम्बंधी अभिप्राय को जानकर दो मुनियों को गिरिनगर भेजा। दोनो मुनि सुबुद्धि (पुष्पदंत), नरवाहन (भूतबलि) विद्याग्रहण करने में तथा उसका स्मरण रखने में समर्थ थे, अत्यंत विनयी तथा शीलवान थे। उनके देश, कुल और जाति शुद्ध थे और वे समस्त कलाओं में पारंगत थे। जब वे दो मुनि गिरिनगर की ओर जा रहे थे तब यहां श्री धरसेनाचार्य ने ऐसा शुभ स्वप्न देखा कि दो श्वेत वृष आकर उन्हें विनयपूर्वक वंदना कर रहे हैं। उस स्पप्न से उन्होंने जान लिया कि आने वाले दोनों मुनि विनयवान एवं धर्मधुरा को वहन करने में समर्थ है *उनके मुंह से आशीर्वादात्मक वचन ‘जयउसुयदेवदा’ (जयतु श्री देवता) ऐसा निकले* और जाग खडे हुए त्यो ही उन्होने देखा कि दो मुनिवर आ पहुंचे अैर विनयपूर्वक उन्होंने आचार्य के चरणों में वंदना की। आचार्य श्री ने उन्हे मार्गपरिश्रम शमन के लिए तीन दिन तक विश्राम करने को कहा।
तत्पश्चात श्री धरसेनाचार्य ने उनकी परीक्षा की। एक को अधिक अक्षरों वाला और दूसरे को हीन अक्षरों वाला विद्यामंत्र देकर दो उपवास सहित उसे साधने को कहा। ये दोनों गुरू के द्वारा दी गई विद्या को लेकर और उनकी आज्ञा से भी नेमिनाथ तीर्थंकर की सिद्धभूमि पर जाकर नियमपूर्वक अपनी अपनी विद्या की साधना करने लगे। जब उनकी विद्या सिद्ध हो गई तब वहां पर उनके सामने दो देवियां आई। उनमें से एक देवी के एक ही आंख थी और दूसरी देवी के दांत बड़े-बड़े थे। मुनियों ने जब सामने देवो को देखा तो सोचा कि देवो का यह स्वभाव नही है यह असली स्वरुप नही है। अवश्य ही हमारी साधना मे कोई भूल हुई। तब उन्होने व्याकरण की दृष्टि से उन्होंने मंत्र पर विचार किया। *जिसके सामने एक आंख वाली देवी आई थी उन उन्होंने अपने मंत्र में एक वर्ण कम पाया तथा जिसके सामने लम्बे दांतों वाली देवी आई थी उन्होंने अपने मंत्र में एक वर्ण अधिक पाया* दोनों ने अपने-अपने मंत्रों को शुद्ध कर पुनः अनुष्ठान किया, जिसके फलस्वरूप देवियां अपने यथार्थ स्वरूप में प्रकट हुई तथा बोली कि हे नाथ! आज्ञा दीजिए! हम आपका क्या कार्य करें? दोनों मुनियों ने कहा-देवियों हमारा कुछ भी ऐहिक पारलौकिक कार्य नहीं है। हमने तो केवल गुरू की आज्ञा से ही विद्यामंत्र की आराधना की है। ये सुनकर वे देवियां अपने स्थान को चली गई।

दोनो मुनियो ने गुरुदेव के समीप जाकर अपना सारा वृतान्त निवेदन किया, मुनियों की इसी कुशलता से गुरू ने जान लिया कि सिद्धांत का अध्ययन करने के लिए वे योग्य पात्र है।आचार्य श्री ने उन्हें उत्तम शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र और शुभ समय में सिद्धांत का अध्ययन कराना प्रारम्भ किया *वह अध्ययन अषाढ शुक्ल एकादशी के दिन पूर्ण हुआ,धरसेनाचार्य जी ने दोनो को आचार्य पद प्रदान करा* इसी दिन देवो ने भी दोनों मुनियों की पूजा की। *एक मुनिराज के दांतों की विषमता दूर कर देवों ने उनके दांत को कुंदपुष्प के समान सुंदर करके उनका ‘पुष्पदन्त’ यह नामांकरण किया तथा दूसरे मुनिराज को भी भूत जाति के देवों ने तूर्यनाद जयघोष, गंधमाला, धूप आदि से पूजा कर ‘भूतबलि’ नाम से घोषित किया।*

*✍️आचार्य पुष्पदंत भूतबलि का बिहार*
अनन्तर श्री धरसेनाचार्य ने विचार किया कि मेरी मृत्यु का समय निकट है। इन दोनों को संक्लेश न हो, यह सोचकर वचनों द्वारा योग्य उपदेश देकर दूसरे ही दिन वहां से कुरीश्वर नगर की ओर विहार करा दिया यद्यपि वे दोनों ही मुनिराज गुरू के चरण सान्निध्य में कुछ अधिक समय तक रहना चाहते थे तथापि ‘‘गुरू के वचन अनुल्लडघनीय हैं,’’ ऐसा विचार कर वे उसी दिन वहां से चल दिए और नौ दिन चलकर कुरीश्वर नगर मे पहुचे और श्रावण् कृष्ण पंचमी को दोनो मुनिराजो ने वही साथ में चातुर्मास करा।चातुर्मास के बाद यहा से पुष्पदन्त मुनि   वनवास देश को चले गए वहा पर उनका भानजा जिनपालित था उसे जिन दीक्षा दी और भूतबलि मुनि मैदुरई देश मे पहुचकर ठहर गए
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*✍️षटखण्डागम की रचना*
पुष्पदन्त मुनिराज अपने भानजे को पढाने के लिए और महाकर्मप्रकृति प्राभृत का छह खण्डों में उपसंहार करना चाहते थे अतः उन्होंने लिखना प्राराम्भ करा और जीवस्थानाधिकार नामक पहले खंड के आठ अनुयोग (अधिकार) द्वार मे से पहले सतप्ररुपणा अधिकार के १७७ सुत्रो की रचना करी और शिष्य मुनिजिनपालित को आचार्य भूतबलि मुनि के पास अभिप्राय जानने के लिए भेजा वे इस कार्य के करने मे सहमत है अथवा नही। 
इस रचना को देखकर भूतबलि मुनि बहुत खुश हुए और षटखंडरुपआगम रचना का अभिप्राय जान लिया।और स्वयं पाँच खण्डो मे पूर्व सूत्रो सहित ६००० शलोक प्रमाण ‘‘द्रव्यप्ररूपणादि’’ अधिकारो की रचना करी। और इसके पश्चात महाबंध नामक छठे खण्ड को ४०००० श्लोक प्रमाण लिखा
*शास्त्र के शाब्दो को नापने के तरीके को श्लोक कहते है। ३२ अक्षरो का एक श्लोक होता है, श्लोक मे पूर्ण अक्षर को मानते है*
*छह खण्डों के नाम हैं-जीवस्थान, क्षुद्रकबंध, बंधस्वामित्व, वेदना खण्डा, वर्गणाखण्ड, और महाबंध।* 
श्री भूतबलि मुनि ने इस प्रकार षटखण्डागम की रचना करके उन सूत्रों को पुस्तक बद्ध किया और ज्येष्ठ सुदी पंचमी के दिन चतुर्विध संघ सहित कृतिकर्म पूर्वक महापूजा की।इसी पंचमी का नाम "श्रुतपंचमी’ नाम प्रसिद्ध हो गया" तथा आकाश से देवो ने भी अनग़िणित बार पुष्पो को वृष्टि करी एवं तभी से लेकर लोग श्रुतपंचमी के दिन श्रुत की पूजा करते आ रहे हैं। 
*पुनः भूतबलि जी मुनिराज ने जिनपालित को षट्खण्डागम ग्रन्थ देकर पुष्पदन्त मुनि के पास भेजा।* उन्होंने अपने गुरु के चिन्तित कार्य को पूरा हुआ देखकर महान हर्ष किया और श्रुत के अनुराग से चतुर्विध संघ के मध्य महापूजा की।

षटखण्डागम यथानाम छह खण्डों की रचना है। ये छः खण्ड इस प्रकार हैं-
*०१) जीवस्थान,    ०२) खुद्दाबंध(क्षुद्रबंध)*
*०३) बंधस्वामित्वविचय,        ०४) वेदना*
*०५) वर्गणा,                      ०६) महाबंध*
आचार्य पुष्पदंत ने समस्त सत् प्ररूपणा के बीस अधिकार रचे, इसके पश्चात समस्त ग्रन्थ आचार्य भूतबलि द्वारा रचा गया।
प्रथम तीन खण्डो मे जीव का वर्णन है
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*निष्कर्ष*
अपर्युक्त विवरण से ज्ञान होता है कि आचार्य पुष्पदन्त और भूतबलि ने षटखण्डागम ग्रन्थ की रचना कर ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन चतुर्विध संघ के साथ पूजा की थी, जिससे श्रुतपंचमी तिथि दिगम्बर जैनों में प्रख्यात हो गई। ज्ञान की आराधना का यह महान पर्व हमें वीतरागी संतों की वाणी की आराधना और प्रभावना का संदेश देता है। इस दिन धवल, महाधवलादि ग्रंर्थो को विराजमान कर महामहोत्सव के साथ उनकी पूजा करना चाहिए। श्रुतपूजा के साथ सिद्धभक्ति और शांतिभक्ति का भी इस दिन पाठ करना चाहिए। 
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*शलभ*

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