Skip to main content

प्रमुख जैन ग्रंथ और उनके आचार्य

📖 *प्रमुख जैन ग्रंथ और उनके रचयिता* 📖

1. षट्खंडागम - आचार्य पुष्पदंत, आचार्य भूतबलि
2. समयसार - आचार्य कुंदकुंद
3. नियमसार - आचार्य कुंदकुंद
4. प्रवचनसार - आचार्य कुंदकुंद
5. अष्टपाहुड़ - आचार्य कुंदकुंद
6. पंचास्तिकाय - आचार्य कुंदकुंद
7. रयणसार - आचार्य कुंदकुंद
8. दश भक्ति - आचार्य कुंदकुंद
9. वारसाणुवेक्खा - आचार्य कुंदकुंद
10. तत्त्वार्थसूत्र - आचार्य उमास्वामी
11. आप्तमीमांसा - आचार्य समन्तभद्र
12. स्वयंभू स्तोत्र - आचार्य समन्तभद्र
13. रत्नकरण्ड श्रावकाचार - आचार्य समन्तभद्र
14. स्तुति विद्या - आचार्य समन्तभद्र
15. युक्त्यनुशासन - आचार्य समन्तभद्र
16. तत्त्वसार - आचार्य देवसेन
17. आराधना सार - आचार्य देवसेन
18. आलाप पद्धति - आचार्य  देवसेन
19. दर्शनसार - आचार्य  देवसेन
20. भावसंग्रह - आचार्य  देवसेन
21. लघु नयचक्र - आचार्य  देवसेन
22. इष्टोपदेश - आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी)
23. समाधितंत्र - आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी)
24. सर्वार्थसिद्धि - आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी)
25. वैद्यक शास्त्र - आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी)
26. सिद्धिप्रिय स्तोत्र - आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी)
27. जैनेन्द्र व्याकरण - आचार्य पूज्यपाद (देवनन्दी)
28. परमात्म प्रकाश - आचार्य योगीन्दु देव
29. योगसार - आचार्य योगीन्दु देव
30. नौकार श्रावकाचार - आचार्य योगीन्दु देव
31. तत्त्वार्थ टीका - आचार्य योगीन्दु देव
32. अमृताशीति - आचार्य योगीन्दु देव
33. सुभाषित तंत्र - आचार्य योगीन्दु देव
34. अध्यात्म संदोह - आचार्य योगीन्दु देव
35. सन्मति सूत्र - आचार्य सिद्धसेन दिवाकर
36. कल्याण मंदिर - आचार्य सिद्धसेन दिवाकर
37. अष्टशती - आचार्य अकलंकदेव
38. लघीयस्त्रय - आचार्य अकलंकदेव
39. न्यायविनिश्चय सवृत्ति - आचार्य अकलंकदेव
40. सिद्धिविनिश्चय सवृत्ति - आचार्य अकलंकदेव
41. प्रमाण संग्रह सवृत्ति - आचार्य अकलंकदेव
42. तत्त्वार्थ राजवार्तिक - आचार्य अकलंकदेव
43. हरिवंश पुराण - आचार्य जिनसेन (प्रथम)
44. आदिपुराण - आचार्य जिनसेन
45. उत्तरपुराण - आचार्य गुणभद्र
46. आत्मानुशासन - आचार्य गुणभद्र
47. अष्टसहस्री - आचार्य विद्यानंद
48. श्लोक वार्तिक - आचार्य विद्यानंद
49. आप्तपरीक्षा - आचार्य विद्यानंद
50. प्रमाणपरीक्षा - आचार्य विद्यानंद
51. पत्र परीक्षा - आचार्य विद्यानंद
52. क्षत्रचूड़ामणि -- आचार्य वादीभसिंह सूरि
53. गद्यचिंतामणि -- आचार्य वादीभसिंह सूरि
54. कार्तिकेयानुप्रेक्षा -- आचार्य कार्तिकेय स्वामी
55. तत्वार्थसार -- आचार्य अमृतचंद
56. पुरुषार्थसिद्धिउपाय -- आचार्यअमृतचंद्र
57. आत्मख्याति टीका -- आचार्य अमृतचंद्र
58. लघुतत्त्वस्फोट -- आचार्य अमृतचंद्र
59. तत्त्वप्रदीपिका टीका -- आचार्य अमृतचंद्र
60. वरांग चरित्र - श्री जटासिंह नन्दि
61. चन्द्रप्रभ चरित्र -- आचार्य वीरनन्दी
62. कषाय पाहुड -- आचार्य गुणधर
63. गोम्मटसार -- आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती
64. पाषणाहचरिउ -- मुनि पद्मकीर्ति
65. त्रिलोकसार -- आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती
66. लब्धिसार -- आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती
67. क्षपणासार -- आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती
68. तिलोयपण्णत्ति --  आचार्य यतिवृषभ
69. जम्बूद्वीप पण्णत्ति - आचार्य यतिवृषभ
70. धवला टीका - आचार्य वीरसेन
71. यशस्तिलक चंपू -- आचार्य सोमदेव
72. नीतिवाक्यामृत -- आचार्य सोमदेव
73. अध्यात्मतरंगिणी -- आचार्य सोमदेव
74. सिद्धिविनिश्चय टीका -- बृहद् अनंतवीर्य
75. प्रमाणसंग्रहभाष्य -- बृहद् अनंतवीर्य
76. शाकटायन शब्दानुशासन -- आचार्य शाकटायन
77. केवली भुक्ति -- आचार्य शाकटायन
78. लघु द्रव्य संग्रह -- आचार्य नेमिचन्द्र
79. वृहद् द्रव्य संग्रह -- आचार्य नेमिचन्द्र
80. प्रमेय-कमल-मार्तण्ड -- आचार्य प्रभाचंद्र
81. न्याय कुमुदचन्द्र -- आचार्य प्रभाचंद्र
82. तत्वार्थ-वृत्तिपद-विवरण -- आचार्य प्रभाचंद्र
83. शाकटायन-न्यास -- आचार्य प्रभाचंद्र
84. शब्दाम्भोज भास्कर -- आचार्य प्रभाचंद्र
85. गद्यकथाकोष -- आचार्य प्रभाचंद्र
86. प्रद्युम्नचरित्र -- आचार्य महासेन
87. भक्तामर स्तोत्र -- आचार्य मानतुंग
88. पद्मनंदी पंचविंशतिका - आचार्य पद्मनंदी (द्वितीय)
89. मूलाचार - आचार्य वट्टकेर स्वामी
90. ज्ञानार्णव  - शुभचन्द्राचार्य जी
91. भगवती आराधना - आचार्य शिवार्य (शिवकोटि)
92. अमितगति श्रावकाचार - आचार्य अमितगति
93. धर्म परीक्षा - आचार्य अमितगति
94. सुभाषित रत्न संदोह - आचार्य अमितगति
95. तत्त्व भावना - आचार्य अमितगति
96. पंच संग्रह - आचार्य अमितगति
97. भावना द्वात्रिंशतिका - आचार्य अमितगति
98. नियमसार टीका -- आचार्य पद्मप्रभमलधारिदेव
99. पार्श्वनाथ स्तोत्र -- आचार्य पद्मप्रभमलधारिदेव
100. धर्मामृत - आचार्य नयसेन
101. समयसारतात्पर्यवृत्तिटीका -- आचार्य जयसेन (द्वितीय)
102. नियमसारतात्पर्यवृत्तिटीका -- आचार्य जयसेन (द्वितीय)
103. पंचास्तिकायतात्पर्यवृत्तिटीका -- आचार्य जयसेन (द्वितीय)
104. तत्त्वानुशासन -- आचार्य रामसेन
105. प्रमेयरत्नमाला -- आचार्य लघु अनंतवीर्य
106. सिद्धांतसार संग्रह -- आचार्य नरेंद्रसेन
107. परीक्षामुख - आचार्य माणिक्यनंदी
108. न्यायदीपिका - आचार्य धर्मभूषण यति
109. द्रव्य प्रकाशक नयचक्र - आचार्य माइल्ल धवल
110. पद्मपुराण - आचार्य रविषेण
111. मूलाचार - आचार्य वट्टकेर स्वामी
112. गणितसार संग्रह -- आचार्य महावीर
113. श्रीपाल चरित्र  - आचार्य सकलकीर्ति 
114. शांतिनाथ चरित्र  - आचार्य सकलकीर्ति 
115. वर्धमान चरित्र  - आचार्य सकलकीर्ति 
116. मल्लिनाथ चरित्र  - आचार्य सकलकीर्ति 
117. यशोधर चरित्र  - आचार्य सकलकीर्ति 
118. धन्यकुमार चरित्र  - आचार्य सकलकीर्ति 
119. सुकमाल चरित्र  - आचार्य सकलकीर्ति 
120. सुदर्शन चरित्र  - आचार्य सकलकीर्ति 
121. जम्बूस्वामी चरित्र  - आचार्य सकलकीर्ति 
122. मूलाचार प्रदीप - आचार्य सकलकीर्ति 
123. पार्श्वनाथ पुराण - आचार्य सकलकीर्ति 
124. सिद्धांतसार दीपक - आचार्य सकलकीर्ति 
125. तत्त्वार्थसार दीपक - आचार्य सकलकीर्ति 
126. आगमसार - आचार्य सकलकीर्ति 
127. मेरु मन्दर पुराण - श्री वामन मुनि जी
128. प्रमाण ग्रंथ - आचार्य वज्रनन्दि
129. चौबीसी पुराण  - आचार्य शुभचन्द्र
130. श्रेणिक चरित्र  - आचार्य शुभचन्द्र
131. श्री पांडव पुराण - आचार्य शुभचन्द्र
132. श्री श्रेणिक चरित्र - आचार्य शुभचन्द्र
133. चन्द्रप्रभ चरित्र - आचार्य शुभचन्द्र
134. करकण्डु चरित्र - आचार्य शुभचन्द्र
135. चन्दना चरित्र - आचार्य शुभचन्द्र
136. जीवंधर चरित्र - आचार्य शुभचन्द्र
137. अध्यात्मतरंगिणी - आचार्य शुभचन्द्र
138. प्राकृत लक्षण - आचार्य शुभचन्द्र
139. गणितसार संग्रह - आचार्य श्रीधर
140. त्रिलोकसारटीका - आचार्य माधवचन्द
141. योगसार प्राभृत - आचार्य अमितगति
142. बृहत्कथाकोश - आचार्य हरिषेण
143. आराधनासार - आचार्य रविभद्र
144. आचारसार - आचार्य वीरनन्दी
145. वर्धमान चरित्र - आचार्य असग
146. सुदंसण चरिउ - आचार्य नयनन्दि
147. एकीभाव स्तोत्र - आचार्य वादिराज
148. पुराणसार संग्रह - आचार्य श्रीचन्द
149. वसुनन्दी श्रावकाचार - आचार्य वसुनन्दी
150. भावना पद्धति - आचार्य पद्मनन्दि 
151. अनगार धर्मामृत - पंडित आशाधर
152. सागार धर्मामृत - पंडित  आशाधर
153. भरतेश वैभव - महाकवि रत्नाकर जी
154. समयसार नाटक - पण्डित बनारसीदास
155. ब्रह्म विलास - भैया भगवतीदास
156. छहढाला - पंडित द्यानतराय
157. क्रिया कोश - पंडित दौलतराम (प्रथम)
158. भाव दीपिका - पंडित दीपचन्द
159. चिद विलास - पंडित दीपचन्द
160. पार्श्व पुराण  - पंडित भूधरदास 
161. जिन शतक - पंडित भूधरदास 
162. मोक्षमार्ग प्रकाशक - पंडित टोडरमल 
163. गोम्मटसार टीका - पंडित टोडरमल 
164. लब्धिसार टीका - पंडित टोडरमल 
165. क्षपणासार टीका - पंडित टोडरमल 
166. त्रिलोकसार टीका - पंडित टोडरमल 
168. पुरुषार्थसिद्धिउपायटीका - पंडित टोडरमल 
169-जैन सिद्धांत प्रवेशिका - पं गोपालदासजी बरैया
170. छहढाला - पं. दौलतरामजी (द्वितीय)
171. रत्नकरंड वचनिका - पं. सदासुखदास 
172. समयसार वचनिका - पं. जयचन्द छावड़ा
173. छहढाला - पंडित बुधजन
174. महावीराष्टक स्तोत्र - पंडित भागचन्द
175. जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश - क्षुल्लक जिनेन्द्र वर्णी

social media 

Comments

Popular posts from this blog

क्या जैन का मतलब बनिया होता है ?

Dr Amit Rai Jain के फेसबुक वाल से साभार क्या जैन मतलब बणिया होता है ? #Jain_Bania  सोशल मीडिया पर चल रहे माहौल को देखते हुए मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं,कि क्या जैन का अर्थ बणिया होता है,आमतौर पर सबकी यह धारणा होती है कि जैन से आशय बणिया/वैश्य वर्ण की एक जाति है।अगर आप भी ऐसा मानते हैं तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी के शिकार है।   जैन कोई जाति या वर्ण नहीं है,बल्कि यह स्वतंत्र धर्म है,इसे समझने के लिए हमें इसके इतिहास की ओर जाना पड़ेगा, जैन धर्म का अपना स्वतंत्र इतिहास है,यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना धर्म है,यहां तक कि वैदिक के भी पहले भी यहां के मूलनिवासियों का धर्म यही था,और इसके अनुयायी ही जैन थे, जिन्हें तत्कालीन समय में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता था।    अधिकतर लोग जानकारी के अभाव में जैन-धर्म को वैष्णव या हिंदू से जोड़कर देखते हैं,किंतु मूलनिवासी देवता शिव और प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव एक ही पुरुष थे, यहां का धर्म ऋषभदेव का अनुयायी ही था !    अंतिम तीर्थंकर महावीर के बाद जैन-धर्म दो परंपराओं में बंट गया,दिगंबर व श्वेतांबर। दिगंबर दक्षिण भारत में अधिक प्रचार...

जैनदर्शन नास्तिक नहीं, आस्तिक दर्शन है

*जैनदर्शन नास्तिक नहीं, आस्तिक दर्शन है* डॉ. शुद्धात्मप्रकाश जैन  निदेशक, क. जे. सोमैया जैन अध्ययन केन्द्र, सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय, मुम्बई                   समस्त भारतीय दर्शनों को दो विभागों में विभाजित किया गया है- आस्तिक और नास्तिक। इस विभाजन का आधार पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, लोक-परलोक, आत्मा-परमात्मा आदि के आधार पर न होकर मात्र यह परिभाषा है- ‘‘वेदनिन्दको नास्तिकः’’ अर्थात् जो वेदों को अस्वीकार करे, वह नास्तिक है, इस आधार पर जैन, बौद्ध और चार्वाक- ये तीन दर्शन नास्तिक कहे जाते हैं।                 इस सन्दर्भ में दो बातें विचारणीय हैं, जिनमें से प्रथम यह है कि- जिन वेदों और पुराणों में ऋषभदेव, अरिष्टनेमि और पाश्र्वनाथ आदि जैन तीर्थंकरों का नामस्मरण किया गया है, उन वेदों की जैनदर्शन निन्दा कैसे कर सकता है? वहां कई स्थानों पर ऋषभदेव,  उनके पुत्र भरत, अरिष्टनेमि आदि का बहुत आदर से उल्लेख किया गया है। दूसरी बात यह है कि- वेदों पर जैन अहिंसा का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। जहां जैन तीर्थं...

ब्रह्मी लिपि उद्भव और विकास Brahmi Lipi origin and Devolopment

ब्राह्मी लिपि : उद्भव और विकास - श्रीमती डा. मुन्नी पुष्पा जैन, वाराणसी          भाषा के बाद अभिव्यक्ति का सबसे अधिक सशक्त माध्यम ‘लिपि' है। ‘लिपि' किसी भाषा को चिन्हों तथा विभिन्न आकारों में बांधकर दृश्य और पाल्य बना देती है। इसके माध्यम से भाषा का वह रूप हजारों वर्षों तक सुरक्षित रहता है। विश्व में सैकड़ों गाषाए तथा सैकड़ों लिपियों हैं। भाषा का जन्म लिपि से पहले होता है, लिपि का जन्म बाद मे। प्राचीन शिलालेखों से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में ब्राह्मीलिपि ही प्रमुखतया प्रचलित रही है और यही बाह्मी लिपि अपने देश के समृद्ध प्राचीन ज्ञान-विज्ञान ,संस्कृति,इतिहास आदि को सही रूप में सामने लाने में एक सशक्त माध्यम बनी। सपाट गो मापवं ने/ इस ब्राह्मी लिपि में शताधिक शिलालेख लिखवाकर ज्ञान लिाप और भाषा को सदियों तक जीवित रखने का एक क्रांतिकारी कदम उठाया था।   सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में ब्राह्मी लिपि के रहस्य को समझने के लिए पश्चिमी तथा पूर्वी विद्वानों ने जो श्रम किया उसी का प्रतिफल है कि आज हम उन प्राचीन लिपियो को पढ़-समझ पा रहे है...