Skip to main content

आदिनाथ का परिचय - एक नजर में

आदिनाथ का परिचय - एक नजर में

  डॉ. महावीर प्रसाद जैन शिक्षा शास्त्री
           प्रधानाचार्य -राउमावि आसना

1.मूल नाम - ऋषभदेव
2.माता नाम -मरुदेवी
3.पिता नाम - नाभिराय
4.पूर्व भव - सर्वार्थ सिद्धि के देव
5.चिह्न -   बैल
6.रंग - पीत
7.ऊँचाई -500 धनुष
8.कुमारकाल -20 लाख पूर्व .
9.राज्यकाल - 63 लाख पूर्व
10.संयम काल -1लाख पूर्व
11.कुल आयु - 84लाख पूर्व
12.छद्मस्थ काल -1000 वर्ष
13.वंश - इक्वाकु
14.प्रमुख गणधर - वृषभसेन
15.गणधरों की संख्या -84
16.गर्भ कल्याणक तिथि - आषाढ़ कृष्णा द्वितीया
17.जन्मकल्याणक तिथि - चैत्र कृष्णा नवमी
18.दीक्षा कल्याणक तिथि -चैत्र कृष्णा नवमी
19.केवल ज्ञान कल्याणक तिथि - फाल्गुन कृष्णा ग्यारस
20.मोक्ष कल्याणक तिथि - माघ कृष्णा ग्यारस
21.जन्म कल्याण स्थान -सकेता अयोध्या
22.जन्म नक्षत्र - उत्तराषाढ़ा
23.दीक्षा पालकी का नाम - सुर्दशना
24.दीक्षा वन - सिद्धार्थ वन
25.वैराग्य निमित्त - नृत्य करती नीलांजना की मृत्यु
26.प्रथम पारणा काल -13 माह
27.प्रथम पारणा की आहार वस्तु - इक्षुरस
28.प्रथम पारणा स्थान - हस्तिनापुर
29.आहरदाता - राजा श्रेयांस
30.समवसरण विस्तार - 12 योजन
31.निर्वाण स्थल - कैलास पर्वत
32.इनके काल में चक्रवर्ती - भरत
33.इनके काल में रुद्र - भीमावली
34.इनके काल में कामदेव - बाहुबली
35 .मोक्ष का आसान - पद्मासन
36.साथ में दीक्षा लेने वालों की संख्या -4000 राजा

Comments

Popular posts from this blog

क्या जैन का मतलब बनिया होता है ?

Dr Amit Rai Jain के फेसबुक वाल से साभार क्या जैन मतलब बणिया होता है ? #Jain_Bania  सोशल मीडिया पर चल रहे माहौल को देखते हुए मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं,कि क्या जैन का अर्थ बणिया होता है,आमतौर पर सबकी यह धारणा होती है कि जैन से आशय बणिया/वैश्य वर्ण की एक जाति है।अगर आप भी ऐसा मानते हैं तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी के शिकार है।   जैन कोई जाति या वर्ण नहीं है,बल्कि यह स्वतंत्र धर्म है,इसे समझने के लिए हमें इसके इतिहास की ओर जाना पड़ेगा, जैन धर्म का अपना स्वतंत्र इतिहास है,यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना धर्म है,यहां तक कि वैदिक के भी पहले भी यहां के मूलनिवासियों का धर्म यही था,और इसके अनुयायी ही जैन थे, जिन्हें तत्कालीन समय में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता था।    अधिकतर लोग जानकारी के अभाव में जैन-धर्म को वैष्णव या हिंदू से जोड़कर देखते हैं,किंतु मूलनिवासी देवता शिव और प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव एक ही पुरुष थे, यहां का धर्म ऋषभदेव का अनुयायी ही था !    अंतिम तीर्थंकर महावीर के बाद जैन-धर्म दो परंपराओं में बंट गया,दिगंबर व श्वेतांबर। दिगंबर दक्षिण भारत में अधिक प्रचार...

जैनदर्शन नास्तिक नहीं, आस्तिक दर्शन है

*जैनदर्शन नास्तिक नहीं, आस्तिक दर्शन है* डॉ. शुद्धात्मप्रकाश जैन  निदेशक, क. जे. सोमैया जैन अध्ययन केन्द्र, सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय, मुम्बई                   समस्त भारतीय दर्शनों को दो विभागों में विभाजित किया गया है- आस्तिक और नास्तिक। इस विभाजन का आधार पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, लोक-परलोक, आत्मा-परमात्मा आदि के आधार पर न होकर मात्र यह परिभाषा है- ‘‘वेदनिन्दको नास्तिकः’’ अर्थात् जो वेदों को अस्वीकार करे, वह नास्तिक है, इस आधार पर जैन, बौद्ध और चार्वाक- ये तीन दर्शन नास्तिक कहे जाते हैं।                 इस सन्दर्भ में दो बातें विचारणीय हैं, जिनमें से प्रथम यह है कि- जिन वेदों और पुराणों में ऋषभदेव, अरिष्टनेमि और पाश्र्वनाथ आदि जैन तीर्थंकरों का नामस्मरण किया गया है, उन वेदों की जैनदर्शन निन्दा कैसे कर सकता है? वहां कई स्थानों पर ऋषभदेव,  उनके पुत्र भरत, अरिष्टनेमि आदि का बहुत आदर से उल्लेख किया गया है। दूसरी बात यह है कि- वेदों पर जैन अहिंसा का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। जहां जैन तीर्थं...

ब्रह्मी लिपि उद्भव और विकास Brahmi Lipi origin and Devolopment

ब्राह्मी लिपि : उद्भव और विकास - श्रीमती डा. मुन्नी पुष्पा जैन, वाराणसी          भाषा के बाद अभिव्यक्ति का सबसे अधिक सशक्त माध्यम ‘लिपि' है। ‘लिपि' किसी भाषा को चिन्हों तथा विभिन्न आकारों में बांधकर दृश्य और पाल्य बना देती है। इसके माध्यम से भाषा का वह रूप हजारों वर्षों तक सुरक्षित रहता है। विश्व में सैकड़ों गाषाए तथा सैकड़ों लिपियों हैं। भाषा का जन्म लिपि से पहले होता है, लिपि का जन्म बाद मे। प्राचीन शिलालेखों से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में ब्राह्मीलिपि ही प्रमुखतया प्रचलित रही है और यही बाह्मी लिपि अपने देश के समृद्ध प्राचीन ज्ञान-विज्ञान ,संस्कृति,इतिहास आदि को सही रूप में सामने लाने में एक सशक्त माध्यम बनी। सपाट गो मापवं ने/ इस ब्राह्मी लिपि में शताधिक शिलालेख लिखवाकर ज्ञान लिाप और भाषा को सदियों तक जीवित रखने का एक क्रांतिकारी कदम उठाया था।   सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में ब्राह्मी लिपि के रहस्य को समझने के लिए पश्चिमी तथा पूर्वी विद्वानों ने जो श्रम किया उसी का प्रतिफल है कि आज हम उन प्राचीन लिपियो को पढ़-समझ पा रहे है...