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भारतीय संस्कृति और आचार्य विद्यासागर मुनिराज

भारतीय संस्कृति और आचार्य विद्यासागर मुनिराज 


(भारतीय संस्कृति के संवर्धन में
सन्त शिरोमणि:आचार्यश्री विद्यासागर जी मुनिराज का अवदान)
                     प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी,वाराणसी     
                      ( राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित)                
     
     संत शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागरजी   मुनिराज सर्वोच्च संयम साधना और अध्यात्म जगत के मसीहा माने जाते थे। उनका बाह्य व्यक्तित्व और मौलिक चिंतन  उतना ही अनुपम था,जितना अन्तरंग । अहिंसा, सत्य आदि अट्ठाईस मूलगुणों का निरतिचार पालन करने वाले मुनिराज पूज्य आचार्यश्री इन्द्रियजयी, नदी की तरह प्रवहमान, पक्षियों की तरह स्वच्छन्द, अनियत विहारी, चट्टान की तरह अविचल रहते थे । कविता की तरह रम्य, उदात्त और सुकोमल व्यक्तित्व के धनी,  भौतिक कोलाहलों से दूर, सदा संयम साधना में लीन रहने वाले तपस्वी थे ।  
     आचार्यश्री के तपस्वी संयमी जीवन, सिद्धांतों और वाणियों से हम सभी को निरंतर सुख शांति की सुगन्ध सुवासित होती रही । निरतिचार श्रमणचर्या में आप अपने प्रति वज्र से भी कठोर,परन्तु दूसरों के प्रति नवनीत से भी मृदु बनकर , शीत-ताप एवं वर्षा जैसी सभी ऋतुओं के गहन झंजावातों में भी आप संयम-साधना में अथक प्रवर्तमान रहते थे ; इसीलिए श्रम और अनुशासन, विनय और संयम, तप और त्याग की अग्नि में तप्त आपकी साधना अनुपम थी । 
      नमस्कार महामंत्र में आचार्य परमेष्ठी को ‘णमो आयरियाणं’ कहकर उनकी महनीयता और महत्ता प्रकाशित की गई, जो कि अप्रतिम गौरव का सूचक है । श्रमण संघ के संगठन, संवर्द्धन, अभिरक्षण, अनुशासन एवं उसके सर्वांगीण विकास का सामूहिक एवं प्रमुख दायित्व आचार्य का होता है । क्योंकि आचार्य दीपक के समान होते हैं ।
   आपका जीवन ध्रुव तारे की तरह प्रकाशमान, अप्रतिम और आदर्शमय रहा । 
संयम साधना और तपस्वी जीवन में वे वज्र से भी कठोर थे, किन्तु उनके मुक्त हास्य और सौम्य मुख मुद्रा से उनके सहज जीवन में पुष्पों की कोमलता झलकती थी । जहाँ एक ओर उनकी संयम साधना, तत्त्वदर्शन एवं साहित्य सपर्या में आचार्य कुन्दकुन्द सम प्रतिविम्बित होते थे ; वहीँ दूसरी ओर उनकी वाणी में आचार्य समन्तभद्र स्वामी जैसी निर्भीकता, निःशंकता, निश्चलता, परिलक्षित होती थी ।
   सार्वभौमिक चिंतन के इस निर्ग्रंथ महान् व्यक्तित्व ने जहाँ एक ओर आत्म साधना की  ऊंचाइयों के स्वर्ण शिखरों को छुआ, वही सारस्वत साहित्य-साधना के महासागर में अवगाहन कर ‘मूक-माटी’जैसे उत्कृष्ट महाकाव्य की हिन्दी भाषा में रचना कर महाकाव्य की परिमित परिभाषा को पुनर्समीक्ष्य पटल पर ला खड़ा किया है।
सूत्रोपदेश, समयोपदेश, परमोपदेश  नाम से प्राचीन आचार्य प्रणीत शास्त्रों पर विशाल टीकाएँ जैसे अनेक ग्रन्थरत्न भी प्रदान किये हैं ।
       समाधि के एक- दो वर्ष पूर्व आपने धीवरोदय नामक उत्कृष्ट संस्कृत चम्पूकाव्य का सृजन कर 21 वीं सदी के संस्कृत साहित्य के विकास में महनीय योगदान किया है।
    यह मेरा सौभाग्य रहा कि समाधि के कुछ दिन पूर्व एक फरवरी २०२४ को पूज्य आचार्यश्री से कुछ महत्त्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 
         जीवन-मूल्यों को प्रतिष्ठित करने वाले स्वभाव से सरल और सब जीवों के प्रति मित्रवत व्यवहार के संपोषक पूज्य आचार्यश्री के व्यक्तित्व में विश्व-बन्धुत्व की सौंधी-सुगन्ध विद्यमान है । इसीलिए किसी कवि ने उचित ही कहा है –
“ संयम सौरभ साधना, जिनको करै प्रणाम ; 
 त्याग तपस्या लीन यति विद्यासागर नाम ।”
      आस्था और विश्वास तथा अहिंसा, अनेकान्तवाद, सर्वोदय, राष्ट्रीयता की भावना को बल देने वाले निर्ग्रंथ आचार्यश्री ऐसे शिखर पुरुष थे , जिनकी ओज और माधुर्यपूर्ण वाणी में ऋजुता, व्यक्तित्व में समता, जीवन  में संयम साधना की त्रिवेणी थी ।
         आपके साधनामय, तेजस्वी जीवन को शब्दों की परिधि में बांधना संभव नहीं है। हां, उसमें अवगाहन करने की कोमल अनुभूतियाँ अवश्य शब्दातीत हैं । उनका चिंतन फलक देश, काल, जाति, संप्रदाय,  सबसे दूर, प्राणिमात्र को समाहितकर,नैतिक जीवन की प्रेरणा देता है। उनका प्रखर तेजोमय व्यक्तित्व करुणा, समता और अनेकान्त का एक जीवंत दस्तावेज था।
      वस्तुतः जगत के उपकारी संत के रूप में वे अब भी संत शिरोमणि हैं, अनेक उपाधियाँ उनके आगे बौनी हो जातीं हैं । वे अपने आचार्य पद को इतना प्रतिष्ठित किये हुए थे कि किसी के मुख से संबोधन में यदि ‘आचार्यश्री’ शब्द निकले तो मन-मस्तिष्क में स्वभावतःआचार्यश्री विद्यासागरजी की छवि ही ध्यान में आ जाती थी ।
श्रेष्ठतम परंपराओं और सिद्धांतों को अपने जीवन में साक्षात् करने वाले जैन धर्म के महान् आचार्य पूज्य श्री विद्यासागर जी महा मुनिराज ने युवा अवस्था में ही दिगंबरी दीक्षा ली थी और तब से जीवन पर्यंत निरंतर दीर्घ तपस्वी के रूप में संयम साधनापूर्वक आध्यात्मिक विकास करते हुए   लोक कल्याण की भावना से अनुप्राणित होकर आपने अपने जीवन में  विविध लोकोपकारी, राष्ट्र विकास और भारतीय संस्कृति संवर्धन के कार्यों हेतु  राजनेताओं, कार्यकर्ताओं, राष्ट्रभक्तों, आम नागरिकों आदि सभी को सदैव  प्रेरणा, प्रोत्साहन और आशीर्वाद प्रदान करते रहे । 
     
 आपने १९९७ को नेमावर में चातुर्मास के समय कहा था कि–
"हमारा भारत देश और संस्कृति युगों-युगों से सम्पूर्ण विश्व में जगद्‌गुरु के रूप में चिकित्सा, तकनीकी, विज्ञान, उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में दुनियाँ के शीर्ष पर था। जब विश्व का बड़ा हिस्सा अज्ञान के अंधकार में डूबा था तब भारत में ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी और अध्यात्म का सूर्य दैदीप्यमान हो रहा था। इसका कारण यहाँ की गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था थी। यह केवल कल्पना नहीं है, अपितु यह फ्रांसिसी, अंग्रेजी, जर्मनी इतिहासकारों की रचनाओं और ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत दस्तावेजों के द्वारा स्पष्ट होता है। आप उसे पढ़ें तो अपनी संस्कृति इतिहास पर गौरव होगा, प्रेरणा मिलेगी। भारत सदा से आयुर्वेद, वास्तुशास्त्र, इंजीनियरिंग, प्रबंधन, भूगोल, खगोल आदि सभी विद्याओं में समृद्ध रहा है। 
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने शिक्षा के उद्देश्यों के सम्बन्ध में चार सूत्र प्रदान किये–
■ हित का सृजन और अहित का विसर्जन यही शिक्षा का लक्षण है। □ शिक्षा का उद्देश्य जीवन निर्वाह नहीं, जीवन निर्माण है।
■ विद्या अर्थकरी नहीं परमार्थकरी होना चाहिए।
□ शिक्षा का कार्य संस्कारों के संरक्षण के साथ भविष्य का विकास करना है।
□ ज्ञान भाषात्मक नहीं, भावनात्मक होना चाहिए।

      आज भी भारत की शिक्षा व्यवस्था, मैकॉले की बनायी हुई शिक्षा नीतियों का तीव्रगति से अनुकरण कर रही है। नवीन नीतियों का निर्धारण भी विदेशी तर्ज पर हो रहा है। जबकि भारतीय सभ्यता और संस्कृति पाश्चात्य देशों से पूर्णतया भिन्न है। हमारे देश में लगभग दो करोड़ से अधिक बच्चे अपनी मातृभाषा एवं संस्कृति छोड़कर विदेशी भाषा में अध्ययनरत हैं और उन अंग्रेजी स्कूलों में प्रवेश के लिए भीड़ लगी हुई है।    
       यह जानकर बड़ा दुःख होता है कि भारत ही एक ऐसा देश है जिसमें शिक्षा का माध्यम अपनी मातृभाषा को छोड़कर विदेशी भाषा को बनाया गया है। जबकि आज विकसित देशों में अग्रणी चीन, जापान, रूस, फ्रांस और जर्मनी ने प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्चशिक्षा-तकनीकी, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कम्प्यूटर, व्यावसायिक शिक्षा आदि में अपनी मातृभाषा को ही शिक्षा का माध्यम बनाया है।

हम अंग्रेजी को अंतरराष्ट्रीय भाषा मानकर सीख रहे हैं लेकिन यह हमारा भ्रम है। सत्य तो यह है कि विश्व के मानचित्र पर स्थित २०० देशों में से केवल १२ देशों में ही अंग्रेजी भाषा बोली जाती है।  अंग्रेजी भाषा इतनी दरिद्र है कि उसके निजी शब्दकोष में मात्र १२००० ही शब्द हैं। शेष फ्रेंच और लैटिन भाषा से लिए गए हैं। जबकि हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी ७७,००० निजी शब्दों से समृद्ध है। 
 सन् १९६८, १९७९, १९८६ में राष्ट्रीय शिक्षा में कहा गया-शिक्षास्तर को ऊँचा उठाने और लोगों कि सृजनात्मक शक्तियों को क्रियाशील करने के लिए प्रादेशिक भाषाओं को उच्चशिक्षा का माध्यम बनाना चाहिए। गांधीजी, विनोबा भावे, डॉ. राधाकृष्णन जैसे अनेक शिक्षाविद्, चिंतक और विद्वानों ने भी मातृभाषा में अध्ययन का समर्थन किया, परन्तु कुछ राजनेताओं की अंग्रेजी भक्ति के कारण आज तक भारत में मातृभाषा में अध्ययन अनिवार्य नहीं हो पाया।
किसी भी भाषा को शिक्षा के माध्यम के रूप में चयन के तीन आधार हैं-
१. जिस भाषा में विद्यार्थी सरलता से ज्ञान ग्रहण कर सके।
२. जिस भाषा में विद्यार्थी बारीकी के साथ वस्तु के यथार्थ स्वरूप का चिंतन कर सके।

  ३.जिस भाषा में विद्यार्थी अपने विचारों को सरलता से अभिव्यक्त कर सके।

यह तो केवल मातृभाषा में ही संभव है। विदेशी भाषा तो बिल्कुल भी इन मापदंडों पर खरी नहीं उतर सकती। वैश्वीकरण के इस युग में आवश्यकतानुसार अंग्रेजी भाषा को अलग से सीखकर व्यवस्था को पूरा किया जा सकता है लेकिन उसे शिक्षा का माध्यम बनायें ये जरूरी नहीं। सुबह का भूला शाम को घर आए तो उसे भूला नहीं कहते। 




आप आचार्य के धनी होने के साथ-साथ एक प्रतिभाशाली दार्शनिक कवि ह्रदय संत हैं। आपके चार हिंदी कविता संग्रह, बारह हिंदी शतक, छह संस्कृत शतक, हजारों जापानी काव्य शैली में हिन्दी 
भाषा में हाईकू प्रकाशित हो चुकी हैं। 
आपने न केवल हिन्दी भाषा में रचनाएँ की है अपितु संस्कृत, प्राकृत, कन्नड़, बंगला, अंग्रेजी भाषा में भी काव्य सूजन किया है। इसके साथ ही आप मराठी एवं अपभ्रंश भाषाविद् भी हैं। बहु भाषाओं से सम्पृक्त आपकी प्रज्ञा ने भारतीय भाषाओं के संरक्षण की वैचारिक क्रान्ति पैदा की हैं। आज आप भारतीय भाषाओं में शिक्षा के पैरोकार बन गए हैं।

आज आप भारतीय सांस्कृतिक जीवन मूल्यों के पतन को देखते हुए संरक्षणात्मक संवाद का बिगुल बजा रहे हैं, यही कारण है कि आप जनमानस के बीच भारतीय संस्कृति के पुरोधा महापुरुष के रूप में आदरणीय बन गए हैं।

भारतीय जीवन मूल्यों और शिक्षा पद्धति को कुचलने के लिए आज शिक्षा में विदेशी भाषा को आधार बना दिया गया है। इस कुचक्र को समाप्त करने हेतु आपके द्वारा राष्ट्रहित में युगांतरकारी मशाल को पुनः प्रज्ज्वलित करते हुए आपने राष्ट्र को यह चिंतन प्रदान किया -
(१) राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' हो, 
(२) देश का नाम 'इण्डिया' नहीं 'भारत' हो, (३) भारत में भारतीय शिक्षा पद्धति लागू हो,
 (४) अंग्रेजी भाषा में नहीं, भारतीय भाषा में सरकारी एवं न्यायिक कार्य हों, 
(५) छात्र-छात्राओं की शिक्षा व्यवस्था  पृथक् पृथक् हो,
 (६) भारतीय प्रतिभाओं का  पलायन रोका जाए,उनकी प्रतिभा का  यथोचित उपयोग अपने ही देश में हो, 
 (७)  शिक्षा के क्षेत्र में योग्यता की रक्षा हो।
  (८) शत-प्रतिशत मतदान का लक्ष्य हो, 
   आपके अनुसार शिक्षा के उद्देश्य ये हैं– स्वस्थ तन, स्वस्थ मन, स्वस्थ वचन, स्वस्थ चेतन,स्वस्थ वेतन,स्वस्थ वतन,  स्वस्थ चिंतन आदि विचारों के संस्कार प्रदान कर रहे हैं। यही कारण है आप एक महान शिक्षाशास्त्री के रूप में सर्वमान्य बन गए ।
  आपकी यही अभिलाषा थी कि यह देश अपनी उदात्त शिक्षाओं और जीवनादर्शों को लेकर पुनः खड़ा हो और वर्तमान समय में विश्व को नई दिशा प्रदान करे। उनका संपूर्ण जीवन इन आदर्शों के प्रति पूरी तरह समर्पित था। अंतिम श्वांस तक उन्होंने अपने कठोर साधनाव्रतों का निर्वाह किया।

 आप करुणाहृदयी, दयालु, देशप्रेमी संत थे, देश में बढ़ती बेरोजगारी एवं विदेशी परावलंबता को सुनकर गाँधी जी के विचारों का समर्थन करते  हुए सबको रोजगार मिले एवं देश स्वावलंबी बने इस दिशा में अहिंसक रोजगार की निरंतर प्रेरणा देते रहे। आप सदा उद्‌घोषणा करते रहे कि–
(१) नौकरी नहीं, व्यवसाय करो,
(२) चिकित्सा व्यवसाय नहीं, सेवा है,
(३) अहिंसक कुटीर उद्योग संवर्धित करो, (४) बैंकों के भ्रमजाल से बचो और बचाओ, (५) खेतीबाड़ी देश का अर्थतंत्र है-ऋषि बनो या कृषि करो,
(६) खादी अहिंसक है और हथकरघा रोजगार को बढ़ाता है, पर्यावरण की रक्षा करता है तथा स्वावलम्बी बनने का सोपान है। 
 (७) मांस निर्यात, कुकुट पालन, मछली पालन कृषि नहीं है, इसे कृषि बताना छल है, 
(८) गौशालाएँ जीवित कारखाना हैं।
     संपूर्ण भारतवर्ष में उन्होंने अनेक स्थानों पर गौशालाएं, कन्याओं को संस्कार युक्त अच्छी शिक्षा हेतु अनेक क्षेत्रों में प्रतिभास्थली शिक्षा संस्थानों की स्थापना,हथकरघा केंद्र, शुद्ध आयुर्वेद के विकास के लिए पूर्णायु तथा भिन्न-भिन्न प्रकार की लोकमंगलकारी योजनाओं का शुभारंभ कराया। अनेक कारागारों में बंदी के रूप में वहाँ रह रहे हजारों लोगों को हथकरघा केंद्रों  के माध्यम से जीवकोपार्जन के  साथ साथ उनके  जीवन में आमूलचूल  हृदय परिवर्तन करके अपराध मुक्त जीवन जीने का अभूतपूर्व कार्य आपके आशीर्वाद से  चल रहा है। 
  
आपके  सर्वोदयी विचारों ने आपको सर्वोदयी संत के रूप में पहचान दी। नवपीढी के लिए आप सशक्त प्रणेता के रूप में विचार प्रकट करते रहे। आपके सर्वोदयी राष्ट्रीय चिंतन से प्रभावित होकर आज के युवक उत्साह, ऊर्जा, दिशाबोध पाकर निजजीवन को परोपकार में लगाने की प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं। 
   
    करुणा,समता, अनेकान्त का जीवंत दस्तावेज: पूज्य आचार्यश्री के उपदेश, हमेशा जीवन-समस्याओं की गहनतम गुत्थियों के मर्म का संस्पर्श और समाधान तो प्रस्तुत करते ही हैं साथ ही जीवन को उसकी समग्रता में जानने और समझने की कला से परिचित कराते हैं ।
    हम गौरव के साथ कह सकते हैं कि -
इस युग का सौभाग्य रहा, कि इस युग में गुरूवर जन्मे ।
अपना यह सौभाग्य रहा, गुरूवर के युग में हम जन्मे ।।
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प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी
बी. २३/४५, पी .६, शारदानगर कॉलोनी,
खोजवां, वाराणसी – २२१०१०
email : anekantjf@gmail.com

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