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जैनधर्म में दानतीर्थ के प्रवर्तन का पर्व है अक्षयतृतीया

जैनधर्म में दानतीर्थ के प्रवर्तन का पर्व है अक्षयतृतीया
डॉ. पंकज जैन शास्त्री,इन्दौर

वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाए जाने वाले अक्षय तृतीया पर्व का जैनधर्म में विशेष महत्त्व है। इस पवित्र दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव ने दीक्षा ग्रहण करने के उपरान्त एक वर्ष के बाद हस्तिनापुर नगरी में इक्षुरस का प्रथम आहार ग्रहण किया था और इस युग के प्रारंभ में सर्वप्रथम यथार्थ दान की परम्परा का दिग्दर्शन कराया था ।

 भगवान् ऋषभदेव दीक्षा के उपरान्त उपवास की प्रतिज्ञा के साथ कायोत्सर्ग मुद्रा में छह माह तक ध्यानस्थ हो गए थे।

​छह माह तक ध्यान करने के उपरान्त उन्होंने विचार किया कि बड़े-बड़े राजवंशों में उत्पन्न अनेक राजाओं ने मेरे साथ दीक्षा ग्रहण की थी, लेकिन उन्हें आहार ग्रहण करने की उचित विधि का ज्ञान न होने से वे अपने मार्ग से भ्रष्ट हो गए थे। मोक्ष की सिद्धि के लिए साधना करना आवश्यक है और शरीर से ही मोक्ष मार्ग की साधना की जाती है। शरीर की स्थिति बनाए रखने के लिए आहार अनिवार्य है।

​भगवान् ऋषभदेव चिंतन करने लगे कि - मोक्षमार्ग पर चलने वाले मुनियों के लिए शरीर को न तो केवल कृश ही करना चाहिए और न ही मनचाहे रसीले भोजन से इसे पुष्ट करना चाहिए। उन्हें प्राण धारण करने के लिए निर्दोष आहार ग्रहण करना चाहिए। ऐसा आहार ग्रहण करना चाहिए जिससे इन्द्रियाँ वश में रहें और विषय भोगों की ओर न जाएँ। इस प्रकार साधुओं को मध्यम वृत्ति का आश्रय लेना चाहिए। साधुओं को कायक्लेश उतना ही करना चाहिए जितने से संक्लेश न हो, क्योंकि संक्लेश हो जाने पर साधु का चित्त चंचल हो जाता है और वह संयम के मार्ग से भ्रष्ट हो सकता है।

​योगेश्वर भगवान् ऋषभदेव ने मोक्षमार्ग की परंपरा को निर्बाध रूप से गतिमान करने के लिए और साधुओं को आहार ग्रहण करने की निर्दोष विधि प्रकाशित करने के लिए स्वयं आहार ग्रहण करने का निश्चय किया था ।

​भगवान् ऋषभदेव मौन थे। न वे किसी से याचना करते थे और न ही उन्होंने किसी के समक्ष आहार की अतिशय गुप्त विधि को प्रकट किया था। आदि दिगम्बर महाश्रमण श्री ऋषभदेव मौन होकर ईर्या समिति से चल रहे थे अर्थात् चार हाथ भूमि को देखकर उस पर चलने वाले जीवों की रक्षा करते हुए आगे बढ़ रहे थे। प्रजा को उनके विहार करने का प्रयोजन ज्ञात नहीं था। इस कारण प्रजाजन भक्तिपूर्वक उनके समक्ष सोना, चांदी, हीरे-मोती, रत्न, वस्त्र एवं भोजन आदि प्रस्तुत करने लगे। कुछ लोग तो अपनी सुन्दर कन्याएं भी विवाह करने के लिए उनके समक्ष लेकर आ गए। भगवान् इन सबकी उपेक्षा करते हुए आगे बढ़ते गए। इस प्रकार
आहारचर्या के लिए विहार करते-करते जब छह माह व्यतीत हो गए तब एक दिन भगवान् ऋषभदेव कुरुजांगल देश के हस्तिनापुर नगर पहुँचे। उस समय हस्तिनापुर के राजा सोमप्रभ थे और उनके छोटे भाई श्रेयान्सकुमार थे। 

भगवान् ऋषभदेव के हस्तिनापुर में पहुँचने के पूर्व रात्रि में राजा श्रेयान्स ने रात्रि के अंतिम पहर में सुवर्णमय सुमेरु पर्वत, कल्पवृक्ष, सिंह, बैल, सूर्य-चन्द्र, समुद्र एवं अष्ट मंगल द्रव्य - ये सात स्वप्न देखे थे। इन सातों स्वप्नों का फल अत्यंत शुभ था।भगवान् ऋषभदेव ने हस्तिनापुर में आहार ग्रहण करने के लिए चान्द्री चर्या से विहार किया था। जिस प्रकार चन्द्रमा बिना किसी भेदभाव के निर्धन और धनी सभी लोगों के घर चाँदनी फैलाता है उसी प्रकार श्री ऋषभदेव भी राग-द्वेष से रहित होकर निर्धन और धनी सभी लोगों के घर यथायोग्य प्रवेश करते थे, परन्तु उचित विधि के अभाव में आगे बढ़ जाते थे।

​अन्त में आहार ग्रहण करने के लिए ऋषभदेव ने राजमहल में प्रवेश किया । राजा सोमप्रभ और श्रेयान्सकुमार ने सपरिवार भक्तिपूर्वक भगवान् का सादर अभिनन्दन किया। भगवान् ऋषभदेव के चरणों में राजा सोमप्रभ और श्रेयान्स कुमार ने भक्तिपूर्वक नमस्कार किया, प्रासुक जल से भगवान् का पाद प्रक्षालन किया और उनके चरणों में अर्घ्य चढ़ाया।

​जगद्गुरु भगवान् ऋषभदेव की तीन प्रदक्षिणा (परिक्रमा) की। उसी समय भगवान् का अतिशय रूप देखकर श्रेयान्स कुमार को अपने पिछले जन्मों का जातिस्मरण होने लगा । श्रेयान्स कुमार को स्मरण हुआ कि वे पूर्वजन्म में विदेह क्षेत्र की पुण्डरीकिणी नगरी में राजा वज्रजंघ की रानी श्रीमती थे। भगवान् ऋषभदेव  ही उस भव में राजा वज्रजंघ थे।

​उस जन्म में राजा वज्रजंघ और रानी श्रीमती ने दो चारण ऋद्धिधारी मुनिराजों को विधिपूर्वक आहारदान दिया था।
​श्रेयान्स कुमार को जातिस्मरण से यह ज्ञान हुआ था कि जैन साधुओं को नवधाभक्ति पूर्वक आहार दिया जाता है और दाता में श्रद्धा, शक्ति, भक्ति, विज्ञान, अलुब्धता, क्षमा एवं त्याग नामक सात गुण होने चाहिए।

​'नवधाभक्ति' का स्मरण होने पर श्रेयान्सकुमार ने अतिशय विशेष पात्र श्री ऋषभदेव का पड़गाहन किया, उन्हें ऊँचे स्थान पर विराजमान किया, उनका पादप्रक्षालन किया, उनकी पूजा की, उनको नमस्कार किया, अपने मन, वचन, काय की शुद्धि पूर्वक आहार की विशुद्धि रखते हुए उनके पाणिपात्र (अंजलि) में इक्षु (ईख) के प्रासुक रस का आहार दिया। राजा सोमप्रभ और रानी लक्ष्मीमती ने भी ऋषभदेव को आहारदान दिया। ​श्रेयान्सकुमार के द्वारा
​अक्षय तृतीया के पवित्र दिन भगवान् ऋषभदेव को दिये गये महादान से सभी मनुष्यों के साथ-साथ देवगण भी अत्यंत हर्षित हुए थे। 

देवों ने रत्नवृष्टि, पुष्पवृष्टि, दुन्दुभिवादन, शीतल मन्द सुगन्धित पवन एवं जयघोष के द्वारा इस महादान की प्रशंसा की थी। चारों ओर एक ही स्वर सुनाई दे रहा था —धन्य महादान, धन्य महापात्र एवं धन्य महादाता।

​अक्षय तृतीया के दिन

​इस युग के प्रारम्भ में दान तीर्थ की परम्परा का प्रवर्तन होने के कारण ही सभी को यह ज्ञान प्राप्त हुआ था कि सुपात्रों को किस विधि से और किस द्रव्य का दान देना चाहिए। आज भी अक्षय तृतीया पर्व के दिन सभी जैनधर्मावलम्बी विशेष रूप से प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और सुपात्रों को विधिवत् आहारदान आदि देकर अतिशय पुण्य का संचय करते हैं।

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