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प्रवचनसारस्य दार्शनिकवैशिष्ट्यम्

                                                       प्रवचनसारस्य दार्शनिकवैशिष्ट्य म् (First proof )  (नवदेहलीस्थश्रीलालबहादुरशास्त्रिराष्ट्रीयसंस्कृतविश्वविद्यालयस्य जैनदर्शनविभागेन प्रदत्तं पाठ्यसामग्री - प्रो अनेकांत ) दर्शनजगति आचार्यकुंदकुंदविरचितप्रवचनसारस्य महत्त्वपूर्णम् स्थानं वर्तते ।आद्य टीकाकारामृतचन्द्राचार्यानुसारं ग्रन्थेऽस्मिन् पञ्चसप्तत्युत्तर-द्विशतगाथाः सन्ति, तथा चायं ज्ञानाधिकारः ज्ञेयाधिकारः, चारित्रधिकारश्च इति त्रिषु स्कन्धेषु विभक्तोऽस्ति। प्रथमस्कन्धे द्विनवतिगाथाः, द्वितीये अष्टोत्तरैकशतगाथाः, तृतीये पञ्चसप्ततिगाथाः सन्ति। द्वितीयः टिकाकारः श्रीजयसेनाचार्यानुसारं ग्रन्थेऽस्मिन् एकादशोत्तर-त्रिशतगाथाः सन्ति, तत्र प्रथमे स्कन्धे एकाधिकैकशत-गाथाः, द्वितीये द्वादशाधिकैकशतगाथाः, तृतीये च सप्तनवतिगाथाः सन्ति। अत्र प्रतिपादिताः विषयाः संक्षेपेण प्रस्तूयन्ते –  ज्ञानाधिकारः –  चारित्रं द्विविधं सरागचारि...

आचार्यकुंदकुंदस्य दार्शनिकमवदानम्

आचार्यकुंदकुंदस्य दार्शनिकमवदानम् (First proof )  (नवदेहलीस्थश्रीलालबहादुरशास्त्रिराष्ट्रीयसंस्कृतविश्वविद्यालयस्य जैनदर्शनविभागेन प्रदत्तं पाठ्यसामग्री - प्रो अनेकांत ) सर्वमान्यं निर्विवादञ्च तथ्यमिदं यत् जैनाचार्यपरंपरायां कुंदकुंदाचार्यः स्वकीयं महत्वपूर्णं स्थानं भजते। तस्य महत्त्वस्य गौरवस्याचार्यपरम्परायाञ्च तस्य स्थानस्यानुमानम्  एकेनातिप्रसिद्धश्लोकेन कर्त्तुं शक्यते, सश्च-   मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्।। अर्थात् भगवान् महावीरः मङ्गलस्वरूपः, गौतमगणधरः मङ्गलस्वरूपः, कुन्दकुन्दाचार्यः मङ्गलस्वरूपः, जैनधर्मश्च मङ्गलस्वरूपः वर्तते। उपर्युक्तश्लोके भगवतः महावीरत् गौतमगणधराच्चानन्तरं कुन्दकुन्दाचार्यस्य स्थानमस्ति येन सूच्यते यत् जैनाचार्येषु कुन्दकुन्दाचार्यस्य स्थानं सर्वोपरि विद्यते। दक्षिण-देशेभ्य: प्राप्तेषु शिलालेखेषु 'कुन्दकुन्दान्वयः' इत्युल्लेख: प्राप्यते, यश्च सूचयति यत् जैनपरम्पराया: आचार्या: आत्मानं कुन्दकुन्दाचार्यस्य परम्परायां गणयंतः गौरवमनुभवन्ति स्म। कुन्दकुन्दाचार्य-विरचितस्य नियम...

औरंगजेब से कैसे बचा दिल्ली का जैन लाल मंदिर ?

दिल्ली जैन लाल मंदिर का इतिहास ये समय मुगल शासन का, सन 1656 की बात है जब भारत में शाहजहाँ का शासन हुआ करता था, उस समय किसी भी मंदिर को बनवाने की कल्पना तो दूर, किसी जैन प्रतिमा या मुनि के दर्शन भी दुर्लभ थे। उस समय शाहजहाँ लाल किले में रहकर देश पर शासन करते थे और उनके सैनिकों की छावनी खूनी दरवाजे तक खुले मैदान में थी। एक दिन सेना के एक जैन सैनिक रामचन्द्र को कहीं से भगवान पार्श्वनाथ की एक दुर्लभ प्रतिमा प्राप्त हो गयी, उसने श्रद्धा पूर्वक उस प्रतिमा को अपने घर मे ही विराजमान कर लिया और नियमित पूजा अर्चना शुरू कर दी। सेना के अन्य जैन सैनिक भी वहाँ आते और दर्शन करते थे। धीरे धीरे यह खबर आसपास के जैन श्रावकों को भी लग गयी तो वे भी वहाँ आने लगे और भगवान की आराधना करने लगे। कुछ ही समय में वह जगह लश्करी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गयी। शाहजहाँ एक क्रूर राजा था, उसने अनेक मंदिर ध्वस्त करवाये थे, ऐसा नही है कि उसे इस बात का पता न था, लेकिन उसने अपने सैनिक के इस कार्य को नजरअंदाज कर दिया। सन 1658, शाहजहां को कैद करके उसी का बेटा औरंजेब राजा बन गया, वह अत्यंत निर्दयी था, उसने...

विश्व के विभिन्न सम्प्रदायों पर जैन संस्कृति का प्रभाव

विश्व के विभिन्न सम्प्रदायों पर जैन संस्कृति का प्रभाव   मयूर मल्लिनाथ वग्यानी                                    सांगली, महाराष्ट्र, + 91 9422707721 ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि यूनानी जैन संस्कृति से प्रभावित थे। इतिहासकारोंका कहना है की जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया तो मेगस्थनीज  अपने अभिलेख में दर्ज किया है  कि दिगंबर जैन मुनि तक्षशिला में निवास करते  थे. इजराइल (Israel) में एसेंस (Essence) नामक एक संप्रदाय था जो अहिंसा के सिद्धांत का पालन करता था। वे पार्श्वनाथ और महावीर की शिक्षाओं से प्रभावित रहे होंगे। इजराइल का एक फकीर समुदाय एस्सेन्स, जैन धर्म के सत्य और अहिंसा के मुख्य सिद्धांतों से काफी प्रभावित रहा होगा। अहिंसा ने इजरायली मूल के इस समुदाय को प्रभावित किया। इस समुदाय के फ़िलिस्तीन में बहुत से अनुयायी थे और वहां के लोगों के मन पर इसका अच्छा प्रभाव था। जॉन द बैपटिस्ट इस समुदाय के एक तपस्वी शिक्षक थे। ईसाई धर्म के संस्थापक ईसा मसीह, जॉन के अहिंसा के ...