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भक्तामर स्त्रोत

*श्री भक्तामर स्त्रोत*

भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-

मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम्।

सम्यक्-प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादा-

वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम्।। 1॥

 

य: संस्तुत: सकल-वाङ् मय-तत्त्व-बोधा-

दुद्भूत-बुद्धि-पटुभि: सुर-लोक-नाथै:।

स्तोत्रैर्जगत्- त्रितय-चित्त-हरैरुदारै:,

स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥ 2॥

 

बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ!

स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोऽहम्।

बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब-

मन्य: क इच्छति जन: सहसा ग्रहीतुम् ॥ 3॥

 

वक्तुं गुणान्गुण -समुद्र ! शशाङ्क-कान्तान्,

कस्ते क्षम: सुर-गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या ।

कल्पान्त -काल-पवनोद्धत- नक्र- चक्रं ,

को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम्॥ 4॥

 

सोऽहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश!

कर्तुं स्तवं विगत-शक्ति-रपि प्रवृत्त:।

प्रीत्यात्म-वीर्य-मविचार्य मृगी मृगेन्द्रम्

नाभ्येति किं निज-शिशो: परिपालनार्थम्॥ 5॥

 

अल्प- श्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम,

त्वद्-भक्तिरेव मुखरी-कुरुते बलान्माम् ।

यत्कोकिल: किल मधौ मधुरं विरौति,

तच्चाम्र -चारु -कलिका-निकरैक -हेतु:॥ 6॥

 

त्वत्संस्तवेन भव-सन्तति-सन्निबद्धं,

पापं क्षणात्क्षयमुपैति शरीरभाजाम् ।

आक्रान्त-लोक-मलि -नील-मशेष-माशु,

सूर्यांशु- भिन्न-मिव शार्वर-मन्धकारम्॥ 7॥

 

मत्वेति नाथ! तव संस्तवनं मयेद, -

मारभ्यते तनु- धियापि तव प्रभावात् ।

चेतो हरिष्यति सतां नलिनी-दलेषु,

मुक्ता-फल-द्युति-मुपैति ननूद-बिन्दु:॥ 8॥

 

आस्तां तव स्तवन- मस्त-समस्त-दोषं,

त्वत्सङ्कथाऽपि जगतां दुरितानि हन्ति ।

दूरे सहस्रकिरण: कुरुते प्रभैव,

पद्माकरेषु जलजानि विकासभाञ्जि ॥ 9॥

 

नात्यद्-भुतं भुवन-भूषण ! भूूत-नाथ!

भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्त-मभिष्टुवन्त:।

तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा

भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥ 10॥

 

दृष्ट्वा भवन्त मनिमेष-विलोकनीयं,

नान्यत्र-तोष- मुपयाति जनस्य चक्षु:।

पीत्वा पय: शशिकर-द्युति-दुग्ध-सिन्धो:,

क्षारं जलं जलनिधेरसितुं क इच्छेत्?॥ 11॥

 

यै: शान्त-राग-रुचिभि: परमाणुभिस्-त्वं,

निर्मापितस्- त्रि-भुवनैक-ललाम-भूत !

तावन्त एव खलु तेऽप्यणव: पृथिव्यां,

यत्ते समान- मपरं न हि रूप-मस्ति॥ 12॥

 

वक्त्रं क्व ते सुर-नरोरग-नेत्र-हारि,

नि:शेष- निर्जित-जगत्त्रितयोपमानम् ।

बिम्बं कलङ्क-मलिनं क्व निशाकरस्य,

यद्वासरे भवति पाण्डुपलाश-कल्पम्॥13॥

 

सम्पूर्ण- मण्डल-शशाङ्क-कला-कलाप-

शुभ्रा गुणास्-त्रि-भुवनं तव लङ्घयन्ति।

ये संश्रितास्-त्रि-जगदीश्वरनाथ-मेकं,

कस्तान् निवारयति सञ्चरतो यथेष्टम्॥ 14॥

 

चित्रं-किमत्र यदि ते त्रिदशाङ्ग-नाभिर्-

नीतं मनागपि मनो न विकार-मार्गम्््् ।

कल्पान्त-काल-मरुता चलिताचलेन,

किं मन्दराद्रिशिखरं चलितं कदाचित्॥ 15॥

 

निर्धूम-वर्ति-रपवर्जित-तैल-पूर:,

कृत्स्नं जगत्त्रय-मिदं प्रकटीकरोषि।

गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां,

दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ ! जगत्प्रकाश:॥ 16॥

 

नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्य:,

स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्- जगन्ति।

नाम्भोधरोदर-निरुद्ध-महा- प्रभाव:,

सूर्यातिशायि-महिमासि मुनीन्द्र! लोके॥ 17॥

 

नित्योदयं दलित-मोह-महान्धकारं,

गम्यं न राहु-वदनस्य न वारिदानाम्।

विभ्राजते तव मुखाब्ज-मनल्पकान्ति,

विद्योतयज्-जगदपूर्व-शशाङ्क-बिम्बम्॥ 18॥

 

किं शर्वरीषु शशिनाह्नि विवस्वता वा,

युष्मन्मुखेन्दु- दलितेषु तम:सु नाथ!

निष्पन्न-शालि-वन-शालिनी जीव-लोके,

कार्यं कियज्जल-धरै-र्जल-भार-नमै्र:॥ 19॥

 

ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं,

नैवं तथा हरि -हरादिषु नायकेषु।

तेजो महा मणिषु याति यथा महत्त्वं,

नैवं तु काच -शकले किरणाकुलेऽपि॥ 20॥

 

मन्ये वरं हरि- हरादय एव दृष्टा,

दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति।

किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्य:,

कश्चिन्मनो हरति नाथ ! भवान्तरेऽपि॥ 21॥

 

स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्,

नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता।

सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मिं,

प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशु-जालम् ॥ 22॥

 

त्वामामनन्ति मुनय: परमं पुमांस-

मादित्य-वर्ण-ममलं तमस: पुरस्तात्।

त्वामेव सम्य-गुपलभ्य जयन्ति मृत्युं,

नान्य: शिव: शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्था:॥ 23॥

 

त्वा-मव्ययं विभु-मचिन्त्य-मसंख्य-माद्यं,

ब्रह्माणमीश्वर-मनन्त-मनङ्ग-केतुम्।

योगीश्वरं विदित-योग-मनेक-मेकं,

ज्ञान-स्वरूप-ममलं प्रवदन्ति सन्त: ॥ 24॥

 

बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित-बुद्धि-बोधात्,

त्वं शङ्करोऽसि भुवन-त्रय- शङ्करत्वात् ।

धातासि धीर! शिव-मार्ग विधेर्विधानाद्,

व्यक्तं त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमोऽसि॥ 25॥

 

तुभ्यं नमस्-त्रिभुवनार्ति-हराय नाथ!

तुभ्यं नम: क्षिति-तलामल -भूषणाय।

तुभ्यं नमस्-त्रिजगत: परमेश्वराय,

तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि-शोषणाय॥ 26॥

 

को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणै-रशेषैस्-

त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश !

दोषै-रुपात्त-विविधाश्रय-जात-गर्वै:,

स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि॥ 27॥

 

उच्चै-रशोक- तरु-संश्रितमुन्मयूख -

माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम्।

स्पष्टोल्लसत्-किरण-मस्त-तमो-वितानं,

बिम्बं रवेरिव पयोधर-पाश्र्ववर्ति॥ 28॥

 

सिंहासने मणि-मयूख-शिखा-विचित्रे,

विभ्राजते तव वपु: कनकावदातम्।

बिम्बं वियद्-विलस-दंशुलता-वितानं

तुङ्गोदयाद्रि-शिरसीव सहस्र-रश्मे: ॥ 29॥

 

कुन्दावदात-चल-चामर-चारु-शोभं,

विभ्राजते तव वपु: कलधौत -कान्तम्।

उद्यच्छशाङ्क- शुचिनिर्झर-वारि -धार-

मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम् ॥ 30॥

 

छत्र-त्रयं तव विभाति शशाङ्क- कान्त-

मुच्चै: स्थितं स्थगित-भानु-कर-प्रतापम्।

मुक्ता-फल-प्रकर-जाल-विवृद्ध-शोभं,

प्रख्यापयत्-त्रिजगत: परमेश्वरत्वम्॥ 31॥

 

गम्भीर-तार-रव-पूरित-दिग्विभागस्-

त्रैलोक्य-लोक -शुभ-सङ्गम -भूति-दक्ष:।

सद्धर्म -राज-जय-घोषण-घोषक: सन्,

खे दुन्दुभि-ध्र्वनति ते यशस: प्रवादी॥ 32॥

 

मन्दार-सुन्दर-नमेरु-सुपारिजात-

सन्तानकादि-कुसुमोत्कर-वृष्टि-रुद्घा।

गन्धोद-बिन्दु- शुभ-मन्द-मरुत्प्रपाता,

दिव्या दिव: पतति ते वचसां ततिर्वा॥ 33॥

 

शुम्भत्-प्रभा- वलय-भूरि-विभा-विभोस्ते,

लोक-त्रये-द्युतिमतां द्युति-माक्षिपन्ती।

प्रोद्यद्- दिवाकर-निरन्तर-भूरि -संख्या,

दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोमसौम्याम्॥34॥

 

स्वर्गापवर्ग-गम-मार्ग-विमार्गणेष्ट:,

सद्धर्म- तत्त्व-कथनैक-पटुस्-त्रिलोक्या:।

दिव्य-ध्वनि-र्भवति ते विशदार्थ-सर्व-

भाषास्वभाव-परिणाम-गुणै: प्रयोज्य:॥ 35॥

 

उन्निद्र-हेम-नव-पङ्कज-पुञ्ज-कान्ती,

पर्युल्-लसन्-नख-मयूख-शिखाभिरामौ।

पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र ! धत्त:,

पद्मानि तत्र विबुधा: परिकल्पयन्ति॥ 36॥

 

इत्थं यथा तव विभूति- रभूज्-जिनेन्द्र्र !

धर्मोपदेशन-विधौ न तथा परस्य।

यादृक्-प्र्रभा दिनकृत: प्रहतान्धकारा,

तादृक्-कुतो ग्रहगणस्य विकासिनोऽपि॥ 37॥

 

श्च्यो-तन्-मदाविल-विलोल-कपोल-मूल,

मत्त- भ्रमद्- भ्रमर-नाद-विवृद्ध-कोपम्।

ऐरावताभमिभ-मुद्धत-मापतन्तं

दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्॥ 38॥

 

भिन्नेभ-कुम्भ- गल-दुज्ज्वल-शोणिताक्त,

मुक्ता-फल- प्रकरभूषित-भूमि-भाग:।

बद्ध-क्रम: क्रम-गतं हरिणाधिपोऽपि,

नाक्रामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते॥ 39॥

 

कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-वह्नि -कल्पं,

दावानलं ज्वलित-मुज्ज्वल-मुत्स्फुलिङ्गम्।

विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुख-मापतन्तं,

त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम्॥ 40॥

 

रक्तेक्षणं समद-कोकिल-कण्ठ-नीलम्,

क्रोधोद्धतं फणिन-मुत्फण-मापतन्तम्।

आक्रामति क्रम-युगेण निरस्त-शङ्कस्-

त्वन्नाम- नागदमनी हृदि यस्य पुंस:॥ 41॥

 

वल्गत्-तुरङ्ग-गज-गर्जित-भीमनाद-

माजौ बलं बलवता-मपि-भूपतीनाम्।

उद्यद्-दिवाकर-मयूख-शिखापविद्धं

त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति॥ 42॥

 

कुन्ताग्र-भिन्न-गज-शोणित-वारिवाह,

वेगावतार-तरणातुर-योध-भीमे।

युद्धे जयं विजित-दुर्जय-जेय-पक्षास्-

त्वत्पाद-पङ्कज-वनाश्रयिणो लभन्ते॥ 43॥

 

अम्भोनिधौ क्षुभित-भीषण-नक्र-चक्र-

पाठीन-पीठ-भय-दोल्वण-वाडवाग्नौ।

रङ्गत्तरङ्ग -शिखर- स्थित- यान-पात्रास्-

त्रासं विहाय भवत: स्मरणाद्-व्रजन्ति ॥ 44॥

 

उद्भूत-भीषण-जलोदर-भार- भुग्ना:,

शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशा:।

त्वत्पाद-पङ्कज-रजो-मृत-दिग्ध-देहा:,

मत्र्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्यरूपा:॥ 45॥

 

आपाद-कण्ठमुरु-शृङ्खल-वेष्टिताङ्गा,

गाढं-बृहन्-निगड-कोटि निघृष्ट-जङ्घा:।

त्वन्-नाम-मन्त्र- मनिशं मनुजा: स्मरन्त:,

सद्य: स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति॥ 46॥

 

मत्त-द्विपेन्द्र- मृग- राज-दवानलाहि-

संग्राम-वारिधि-महोदर-बन्ध -नोत्थम्।

तस्याशु नाश-मुपयाति भयं भियेव,

यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमानधीते॥ 47॥

 

स्तोत्र-स्रजं तव जिनेन्द्र गुणैर्निबद्धाम्,

भक्त्या मया रुचिर-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम्।

धत्ते जनो य इह कण्ठ-गता-मजस्रं,

तं मानतुङ्ग-मवशा-समुपैति लक्ष्मी:॥ 48॥

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