🙏 चित्तौड़गढ़ : जैन धर्म, राजपरंपरा, आचार्य-साधना और जिनालयों का गौरवशाली इतिहास 🙏
चित्तौड़गढ़ के निकट स्थित प्राचीन मध्यमिका नगरी, जिसे वर्तमान में नगरी क्षेत्र से जोड़ा जाता है, पुरातात्त्विक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। मथुरा के प्राचीन जैन अभिलेखों में उल्लिखित ‘ *मज्झिमिल्ल* ’ गण-शाखा को कुछ विद्वान मध्यमिका से संबंधित मानते हैं।
आठवीं शताब्दी में आचार्य *हरिभद्रसूरि* के चित्तौड़ आने के समय यहाँ अनेक जैन मंदिर विद्यमान थे। आचार्य हरिभद्रसूरि भारतीय दर्शन के महान विद्वानों में गिने जाते हैं। उन्होंने योग, दर्शन-समीक्षा और विभिन्न दार्शनिक मतों का अध्ययन करते हुए अनेक ग्रंथों की रचना की। षड्दर्शनसमुच्चय, योगबिन्दु और धूर्ताख्यान उनके प्रसिद्ध ग्रंथों में हैं।
जैन सिद्धान्त-साहित्य की परंपरा में आचार्य *ऐलाचार्य* का नाम उस गुरु के रूप में आता है, जिनसे आचार्य *वीरसेन* ने चित्तौड़गढ़ में सिद्धान्तशास्त्रों का अध्ययन किया। आचार्य वीरसेन ने आगे चलकर षट्खण्डागम पर *धवला* टीका तथा कषायपाहुड़ पर *जयधवला* टीका की रचना-परंपरा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। जयधवला को उनके शिष्य आचार्य जिनसेन ने आगे पूर्ण किया।
जैन परंपरा में आचार्य *जिनवल्लभसूरि* का नाम विधिमार्ग के प्रचार से जुड़ा है। चित्तौड़ के जैन कीर्ति स्तम्भ के ऐतिहासिक विवरणों में भी उनका उल्लेख मिलता है।
तेरहवीं शताब्दी के जैन अभिलेखों और साहित्यिक संदर्भों में आचार्य *रत्नप्रभसूरि* का उल्लेख मिलता है। तेरहवीं शताब्दी में चित्तौड़ आगमन के समय उनके संपर्क में आए श्रावकों ने प्रतिमा-प्रतिष्ठा तथा पांडुलिपियों की प्रतिलिपियाँ तैयार कराने जैसे धार्मिक कार्यों में योगदान दिया।
इसके अतिरिक्त चित्तौड़ और आसपास के क्षेत्रों से प्राप्त दिगम्बर जैन आचार्यों की निषेधिका-अभिलेख परंपरा साधुओं के समाधि-स्मारकों, गुरु-परंपराओं और स्थानीय जैन समाज के इतिहास पर प्रकाश डालती है।
चित्तौड़ का इतिहास गुहिल, गुहिलोत तथा सिसोदिया शासकों से जुड़ा है। जैन मंदिरों को दान, भूमि तथा धार्मिक संरक्षण मिलने के प्रमाण उपलब्ध हैं।
चित्तौड़ के जैन इतिहास में रानी *जयतल्लदेवी* का नाम विशेष महत्त्व रखता है। ऐतिहासिक अभिलेखों के आधार पर उन्होंने भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित श्याम पार्श्वनाथ जैन मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर के रखरखाव के लिए चित्तौड़, खोहर और सज्जनपुर से संबंधित राजस्व की व्यवस्था किए जाने का भी उल्लेख मिलता है।
*समरसिंह* के समय जैन धार्मिक संस्थाओं को भूमि-अनुदान दिए जाने के उल्लेख मिलते हैं। जैन ऐतिहासिक साहित्य में उनके द्वारा पशु-वध पर रोक लगाने संबंधी आदेश का भी वर्णन है।
जैन कीर्ति स्तम्भ के निर्माण-काल के संदर्भ में *रावल कुमारसिंह* का नाम मिलता है। इस स्मारक के निर्माण में जैन श्रावक परिवार की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
*महाराणा कुम्भा* मेवाड़ के प्रसिद्ध शासक थे। उनके शासनकाल के अभिलेखों और ऐतिहासिक विवरणों में जैन धार्मिक स्थलों तथा जैन समाज से संबंधित सूचनाएँ मिलती हैं।
जैन कीर्ति स्तम्भ : चित्तौड़ की विश्वप्रसिद्ध जैन धरोहर चित्तौड़ दुर्ग का *जैन कीर्ति स्तम्भ* प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ को समर्पित एक विशिष्ट स्मारक है। लगभग बारहवीं शताब्दी से संबंधित इस सात मंजिला स्तम्भ की ऊँचाई लगभग 22 मीटर बताई जाती है।
इसके निर्माण में बाघेरवाल जैन श्रावक शाह जीजा और उनके परिवार की भूमिका का उल्लेख मिलता है। स्तम्भ पर उत्कीर्ण जैन प्रतिमाएँ, सूक्ष्म शिल्पांकन और अभिलेख जैन समाज की धार्मिक आस्था, दानशीलता तथा स्थापत्य-कौशल के प्रमाण हैं।
इस स्मारक का महत्त्व केवल इसकी ऊँचाई या सुंदरता में नहीं है। यह उस परंपरा का प्रतीक है जिसमें *श्रावकों ने अपनी संपत्ति का उपयोग जिनालयों, प्रतिमा-स्थापना और धर्म-संरक्षण के लिए किया।*
*सातबीस देवरी जैन मंदिर* चित्तौड़ दुर्ग के भीतर स्थित यह मंदिर-समूह अपनी स्थापत्य कला और देवकुलिकाओं के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर के नाम को सामान्यतः 27 देवकुलिकाओं से जोड़कर समझाया जाता है। यहाँ की प्राचीन शिल्पकला मध्यकालीन जैन मंदिर-निर्माण की परंपरा का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
*भगवान आदिनाथ का जिनालय और बावन जिनालय* परंपरा चित्तौड़ दुर्ग में भगवान आदिनाथ को समर्पित प्रमुख जैन मंदिर है। बावन जिनालय तथा अनेक देवकुलिकाओं से संबंधित स्थानीय धार्मिक परंपराएँ भी चित्तौड़ की जैन विरासत का हिस्सा हैं।
*श्याम पार्श्वनाथ जैन मंदिर* रानी जयतल्लदेवी से संबंधित यह मंदिर चित्तौड़ के जैन इतिहास में राजपरिवार के धार्मिक संरक्षण का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। मंदिर के लिए दिए गए दान और राजस्व संबंधी विवरण जैन संस्थाओं की आर्थिक व्यवस्था का भी परिचय देते हैं।
*चन्द्रप्रभु जिनालय चित्तौड़* के जैन अभिलेखों में चन्द्रप्रभु जिनालय तथा जैन श्रावक परिवारों द्वारा मंदिर-निर्माण के उल्लेख मिलते हैं। इससे ज्ञात होता है कि यहाँ मंदिर-निर्माण केवल राजपरिवारों तक सीमित नहीं था, बल्कि व्यापारी और श्रावक समुदाय भी इसमें सक्रिय भूमिका निभाते थे।
*शान्तिनाथ जिनालय और शृंगार चौरी* चित्तौड़ की जैन विरासत में भगवान शान्तिनाथ से संबंधित जिनालय तथा शृंगार चौरी के नाम से प्रसिद्ध स्थल का उल्लेख मिलता है। इन स्थलों का इतिहास प्रतिमा-स्थापना, धार्मिक अनुष्ठानों और मंदिरों की स्थापत्य परंपरा से जुड़ा है।
चित्तौड़ की जैन विरासत का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसके विकास में राजाओं के साथ-साथ जैन व्यापारियों, श्रेष्ठियों, मंत्रियों और सामान्य श्रावकों ने भी योगदान दिया।
*शाह जीजा* और उनके परिवार जैसे दानदाताओं के उल्लेख बताते हैं कि जैन समाज ने जिनालयों, प्रतिमाओं, मानस्तम्भों तथा धार्मिक साहित्य के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाई।
तेरहवीं से पंद्रहवीं शताब्दी के अभिलेखों में गुरु-परंपराएँ, श्रावक परिवारों का परिचय, प्रतिमा-प्रतिष्ठाएँ, दान और तीर्थयात्राओं से संबंधित सूचनाएँ मिलती हैं। विक्रम संवत् 1495 अर्थात् 1438 ईस्वी के चित्तौड़ अभिलेख को भी इस क्षेत्र के जैन और राजवंशीय इतिहास के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
समकित जैन "शास्त्री"
ब्रांड एम्बेसडर केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय
मेंटर ऑफ चेंज ATL नीति आयोग
रिसोर्स पर्सन स्पोकन ट्यूटोरियल आईआईटी मुंबई
कैंपस एम्बेसडर MyGov
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