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जैन ज्ञान मीमांसा

जैनदर्शन में ज्ञानमीमांसा        

         प्रो० फूलचन्द जैन प्रेमी, वाराणसी.

ज्ञान का स्वरूप और महत्त्व--
   सामान्यतः "जो जाणदि सो णाणं "(प्रवचनसार गाथा 35) अर्थात् जो जानता है. वही ज्ञान है। आचार्य वीरसेन स्वामी के अनुसार "भूतार्थ प्रकाशनं ज्ञानम्" (धवला1/143) अर्थात् सत्यार्थ का प्रकाश करने वाली शक्ति विशेष ज्ञान है। सर्वार्थसिद्धि (1/6) में आचार्य पूज्यपाद कहते हैं."जानाति ज्ञायतेऽनेन ज्ञातिमात्र वा ज्ञानम्"- अर्थात जो जानता है, वह ज्ञान है (कर्तृ साधन), जिसके द्वारा जाना जाये, वह ज्ञान हैं (करण साधन), अथवा जानना मात्र ज्ञान है (भावसाधन)। इस प्रकार "येन-येन प्रकारेण जीवादयः पदार्था व्यवस्थितास्तेन तेनावगमः सम्यग्ज्ञानम्"  (सर्वार्थसिद्धि 1/5) अर्थात् जिस-जिस तरह से जीव-अजीव आदि पदार्थ अवस्थित हैं, उस उस प्रकार से उनका जानना सम्यग्ज्ञान है। ज्ञान के पहले “सम्यक्" विशेषण संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय (विमोह) जैसे मिथ्या ज्ञानों का निराकरण करने हेतु रखा गया है। आ. अकलंकदेव ने तत्त्वार्थवार्तिक (1/1/2) में "नयप्रमाणविकल्पपूर्वको जीवाद्यर्थ याथात्यावगमः सम्यग्ज्ञानम्"- अर्थात् नय और प्रमाणों के द्वारा जीवादि तत्वों का संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय रहित यथार्थ बोध सम्यग्ज्ञान कहा है। आचार्य कुन्दकुन्ददेव ने "णाणं णरस्स सारो" कहकर ऐसे ही सम्यग्ज्ञान को मनुष्यों के लिए सारभूत बतलाया है। क्योंकि ज्ञान ही हेय और उपादेय को जानता है।आचार्य वट्टकेर ने जिनशासन में ज्ञान के स्वरूप के विषय में कहा है—
जेण, तच्चं विबुज्झेज्ज जेण चित्तं णिरुज्झदि। 
जेण अत्ता विसुज्झेज्ज तं गाणं जिणसासणे।।
जेण रागा विरज्जेज्ज जेण सेएसु रज्जदि।जेण मित्ती पभावेज्ज तं णाणं जिणसासणे।।मूलाचार ५/७०-७१ ।।
अर्थात् जिसके द्वारा तत्त्व का स्वरूप ज्ञात किया जाता है. चित्तवृत्ति का निरोध किया जाता है, जिसके आश्रय से आत्मा विशुद्ध (वीतराग) बन जाता है। जिसके द्वारा जीव राग, द्वेष, काम, क्रोध आदि विभावों से विरक्त होकर श्रेयस् (स्व कल्याण) में अनुरक्त होता है तथा मैत्रीभाव की ओर बढ़ता है ऐसा ही ज्ञान जिनशासन में प्रमाण है। मूलाचार की आचार्य वसुनन्दि कृत आचारवृत्ति में इनका विशेषार्थ करते हुए कहा है- जिसके द्वारा वस्तु का यथार्थ स्वरूप जाना जाता है, जिसके द्वारा मन का व्यापार रोका जाता है अर्थात् मन अपने वश में किया  जाता है और जिसके द्वारा आत्मा शुद्ध हो जाती है, जीव वीतराग दशा को प्राप्त कर लेता है, वह ज्ञान जिनशासन में प्रमाण है अर्थात् वही ज्ञान मोक्ष को प्राप्त कराने के लिए उपायभूत है। ऐसा ज्ञान संशय, विपर्यय, अनध्यसाय और अकिंचित्कर से रहित है।
दूसरी गाथा के विशेषार्थ में कहा है– जिसके द्वारा जीव राग अर्थात् स्नेह से और काम, क्रोध आदि से विरक्त होता है अर्थात् पराङ्मुख होता है और जिसके द्वारा मोक्ष में
अनुरक्त होता है, जिसके द्वारा जीव द्वेष का अभाव और मैत्री भाव का संचार करता है, उसे जिनशासन में ज्ञान कहा गया है। इसके विपरीत जो जीव अतत्त्व में तत्वबुद्धि, अदेव में देवपना, जो आगम नहीं हैं, उनमें आगम-बुद्धि, अचारित्र में चारित्र-बुद्धि और अनेकान्त में एकान्त-बुद्धि करता है, वह सब अज्ञान है।

  सम्यग्ज्ञान--'णाणं पयासअं' (मूला. 10/8) सम्यग्ज्ञान द्रव्यस्वरूप का प्रकाशक है अर्थात् वह संसार और मुक्ति तथा इनके कारणों को प्रकाशित करता है। इसलिए मूलाचार (५/७०-७१) में सम्यग्ज्ञान को द्रव्यस्वभाव का प्रकाशक कहा गया है। सम्यग्ज्ञान से तत्त्वज्ञान, चित्त का निरोध तथा आत्मविशुद्धि प्राप्त होती है। ऐसे ही ज्ञान में जीव राग से विमुख तथा श्रेय में अनुरक्त होकर मैत्रीभाव से प्रभावित होता है। ज्ञान रूपी प्रकाश के बिना मोक्ष का उपायभूत चारित्र और तप आदि प्राप्ति की इच्छा करना व्यर्थ है। (भ. आ.७६८) अतः सम्यग्ज्ञान संसारी जीवों को अमृतरूप जल से तृप्त करने वाला होता है।


आचार्य वट्टकेर (मूला. 5/70-71) के ही शब्दों में जिसके सामर्थ्य से तत्त्व का विशिष्ट ज्ञान होता है. मनोव्यापारों का निरोध तथा आत्मा को विशुद्ध किया जा सकता है। आत्मा काम, क्रोध आदि रागभावों से विरक्त हो जाता है। जिसके प्रभाव से आत्मा कल्याणकारक, मोक्षमार्ग में अनुरक्त होता है और प्राणियों में मैत्रीभाव बढ़ाता है जिनशासन में उसे सम्यग्ज्ञान कहा गया है।     

   सर्वार्थसिद्धि (1.1.7) में बतलाया है कि जैसे मेघपटल हटते ही सूर्य के प्रताप और प्रकाश एक साथ प्रकट हो जाते हैं, उसी प्रकार मिथ्यात्व का आवरण दूर होने पर सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान एक साथ प्रकट हो जाते हैं।भगवती आराधना(७६७) में कहा है– वस्तुतः ज्ञानरूपी प्रकाश ही ऐसा उत्कृष्ट प्रकाश है, जिसका हवा आदि कोई भी पदार्थ प्रतिघात (विनाश) नहीं करता है किन्तु यह ज्ञान-प्रदीप समस्त जगत् को प्रकाशित करता है अर्थात् समस्त वस्तुओं में व्याप्त ज्ञान के समान अन्य कोई प्रकाश नहीं है । 
  तत्त्वार्थसूत्रकार आचार्य उमास्वामी ने “सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग:"- कहकर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र- इस रत्नत्रय के एकत्ररूप को मोक्षमार्ग का साधक बतलाया है।इसीलिए पंचास्तिकाय (गाथा १६४) में कहा भी है–
दंसणणाण चरित्ताणि, मोक्खमग्गो त्ति सेविदव्वाणि।साधूहि इदं भणिदं तेहिं दु बंधो व मोक्खो वा।। 
अर्थात् जिनेन्द्रदेव ने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र को मोक्ष का मार्ग बतलाया है। साधुओं को इनका आचरण करना चाहिए। यदि वे स्वाश्रित होते है तो इनसे मोक्ष प्राप्त होता है और यदि वे पराश्रित होते हैं तो बन्ध होता है। 
  वस्तुतः ये रत्नत्रय परस्पर एक-दूसरे के पूरक हैं। इसीलिए उत्तराध्ययनसूत्र (२८/३०) में कहा है –नादंसणिस्स नाणं, नाणेण विणा न हुन्ति चरणगुणा।अगुणिस्स नत्थि मोक्खो, नत्थि अमोक्खस्स निव्वाणं।। अर्थात् सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान नहीं होता। ज्ञान के बिना चारित्र गुण नहीं होता। चारित्रगुण के बिना कर्मक्षय रूप मोक्ष नहीं होता और मोक्ष के बिना अनंत चतुष्टय रूप निर्वाण नहीं होता।आचार्य माणिक्यनंदि ने परीक्षामुख में कहा है- हिताहितप्राप्ति परिहार समर्थन हि प्रमाणं, ततो ज्ञानमेव तत्– अर्थात् जिससे हित की प्राप्ति और अहित का परिहार हो वह प्रमाण है और वही ज्ञान ही है। 
ज्ञान के भेद– आत्मा में अनन्तगुण हैं। वह अनन्त दर्शन, अनन्तज्ञान,अनन्तबल एवं अनन्त सुख से युक्त है। , किन्तु इन अनन्त गुणों में एक "ज्ञान" गुण ही ऐसा है, जो "स्व पर प्रकाशक है। जैसे दीपक अपने को भी प्रकाशित करता है और अन्य पदार्थों को भी प्रकाशित करता है। उसी प्रकार ज्ञान अपने को भी जानता है और अन्य पदार्थों को भी जानता है। यदि ज्ञानगुण न हो तो वस्तु को जानने का दूसरा कोई उपाय नहीं है। इसीलिए "णाणं पयासयं"
ज्ञान की उपमा प्रकाश से दी जाती है । आत्मा में ज्ञान गुण तो है ही, किन्तु वह सम्यक् भी होता है और मिथ्या भी होता है। द्रव्यसंग्रह (४२)में कहा है–संसयविमोह-विब्भय विवज्जियं अप्पपरसरुवस्स।
गहणं सम्मण्णाणं सायारमणेयभेयं तु ।। अर्थात् संशय, विमोह (विपर्यय) और विभ्रम (अनध्यवसाय)- से युक्त ज्ञान को मिथ्याज्ञान कहते हैं। इन तीन मिथ्याज्ञानों से रहित अपने और पर के स्वरूप का ग्रहण करना सम्यग्ज्ञान है। यह सम्यग्ज्ञान वस्तुस्वरूप का यथार्थ निश्चय कराता है, अतएव इसे साकार अर्थात् सविकल्पक (निश्चयात्मक) कहा गया है।
मूलतः ज्ञान के पाँच भेद हैं - 1. मतिज्ञान (आभिनिबोधिक), 2. श्रुतज्ञान 3. अवधिज्ञान, 4. मनःपर्ययज्ञान और 5. केवलज्ञान।
 इन पाँच ज्ञानों में आरंभ के चार ज्ञान क्षायोपशमिक होने के कारण अपूर्ण हैं। पंचम केवलज्ञान सम्पूर्ण कर्मों के क्षय से उत्पन्न होने के कारण परिपूर्ण है। इन्हीं पाँच ज्ञानों का प्रत्यक्ष और परोक्ष इन दो और अन्य प्रमाणों के रूप में विभाजन किया गया है। ज्ञान के आधार पर जैनदर्शन में प्रमाण शास्त्र का विकास हुआ।
मतिज्ञान और श्रुतज्ञान- ये परोक्ष ज्ञान हैं, क्योंकि ये इन्द्रिय और मन की सहायता से होते हैं।पराधीन ज्ञान को परोक्ष कहा गया है। इन्द्रिय मन, प्रकाश उपदेशादि पर है। उनकी सहायता से उत्पन्न होने वाला ज्ञान परोक्ष ज्ञान है।तत्वार्थसूत्र में मतिज्ञान के पाँच प्रकार बताये गये हैं- -मति, स्मृति, संज्ञा (प्रत्यभिज्ञान), चिंता(तर्क) और अभिनिबोध (अनुमान) ।षट्खण्डागम तथा इसका अनुसरण करने वाले ग्रन्थों में मतिज्ञान के मति, स्मृति, संज्ञा और चिन्ता-ये चार भेद ही बताये गये । अनुमान को श्रुतज्ञान के अन्तर्गत रखा गया है। शेष तीन ज्ञान
अवधिज्ञान, मन:पर्यय और केवलज्ञान -ये आत्म मात्र सापेक्ष ज्ञान होने के कारण इन्हें प्रत्यक्ष के अन्तर्गत रखा गया है।  किन्तु इनमें भी अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान- ये दो देश (अपूर्ण) प्रत्यक्ष हैं तथा एकमात्र केवलज्ञान सकलप्रत्यक्ष है।

 -मतिज्ञान और श्रुतज्ञान को इन्द्रिय और मन की सहायता से उत्पन्न होने वाला ज्ञान होने के कारण परोक्षज्ञान के अन्तर्गत रखा गया है ।  यद्यपि जैन दर्शन के अनुसार उसी ज्ञान को प्रत्यक्ष कहा जाता है जो आत्मा को इंद्रिय, मन आदि पर पदाथों की सहायता लिये बिना साक्षात् रूप से प्राप्त हो लेकिन लोक व्यवहार तथा अन्य कुछ जैनेतर दर्शनों में इन्द्रियार्थ सन्निकर्षजन्य साक्षात्कारात्मक ज्ञान को प्रत्यक्ष कहा जाता है। इसमें सामंजस्य स्थापित करने के लिये आचार्य अकलंकदेव ने प्रत्यक्षज्ञान  के लक्षण को व्यापक बनाते हुए उसे 'विशद ज्ञान' के रूप में परिभाषित किया तथा इसके दो भेद किये मुख्य प्रत्यक्ष और सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष।
परीक्षामुखसूत्र के अनुसार प्रतीत्यन्तराव्यवधानेन विशेषवत्तया वा प्रतिभासनं वैशद्यम्।(२/४)अर्थात् 'जो ज्ञान अन्य के व्यवधान से रहित हो तथा वस्तु के विशिष्ट स्वरूप को जानने वाला हो, उसे विशदज्ञान कहा जाता है। 
प्रत्यक्ष ज्ञान के इस वर्गीकरण के अनुसार मतिज्ञान, जिसे अन्य दार्शनिक और लौकिक-जन इन्द्रिय और मानस प्रत्यक्ष कहते हैं. वह (लोक व्यवहार के अनुसार)सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहलाता है । तथा अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान को मुख्य प्रत्यक्ष माना जाता है।       
 
आ. अकलंकदेव के ग्रन्थों में किये गये ज्ञान के स्वरूप के विवेचन को सूत्रबद्ध करते हुए माणिक्यनन्दी ने परीक्षामुख सूत्र की रचना की है तथा प्रायः सभी जैन दार्शनिक ग्रन्थों में ज्ञान के इसी वर्गीकरण का विवेचन किया गया है। यहाँ तत्त्वार्थसूत्र तथा अन्य प्राचीन ग्रन्थों द्वारा प्रतिपादित ज्ञान के पाँच प्रकार-मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान का स्वरूप प्रस्तुत है–

१.मतिज्ञान–   तदिन्द्रियाऽनिंद्रिय निमित्तम् (तत्त्वार्थसूत्र 1/14.)अर्थात्
विषय का इन्द्रिय तथा मन की सहायता से उत्पन्न होने वाला ज्ञान मतिज्ञान कहलाता है। यह ज्ञान मतिज्ञानावरणीय तथा वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम रूप अन्तरंग कारण और इन्द्रिय तथा मन रूप बहिरंग कारणों से उत्पन्न होता है।। इसे आभिनिबोधिक ज्ञान भी कहा जाता है। अभिमुख तथा नियमित पदार्थ के बोध को अभिनिबोध कहा जाता है। इस प्रकार अभिमुख तथा नियत पदार्थ में होने वाला बोध ही आभिनिबोधिक ज्ञान है।(धवला६/१५, १६)  मति, स्मृति, संज्ञा (प्रत्यभिज्ञान), चिन्ता (तर्क), अभिनिबोध (अनुमान) आदि मतिज्ञान के विभिन्न प्रकार हैं। इनमें अवग्रह, ईहा, अवाय तथा धारणा रूप मतिज्ञान साक्षात् इन्द्रिय निमित्तक हैं तथा स्मृति आदि परम्परा से इन्द्रिय निमित्तक हैं। धारणा पर्यन्त मतिज्ञान की उत्पत्ति इन्द्रिय तथा मन द्वारा होती है, जबकि स्मृति आदि की उत्पत्ति मात्र मन द्वारा होती है। (धवला, पुस्तक 13. पृष्ठ 244) । स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क, अनुमान और आगम को परोक्षज्ञान कहा जाता है।   


2.श्रुतज्ञान–पंचसंग्रह(१/१२२) में कहा है–
अत्थाओ अत्थंतर-मुवलंभे तं भणंति सुयणाणं ।आभिणिबोहियपुव्वं णियमेण य सदयं मूलं ।।  अर्थात् अनुमान या लिंगज्ञान की तरह अर्थ (शब्द) को जानकर उस पर से अर्थान्तर (वाच्यार्थ) को ग्रहण करना श्रुतज्ञान कहलाता है।यह ज्ञान नियमत:
आभिनिबोधिक ज्ञान पूर्वक होता है। 
इसके लिंगजन्य और शब्दजन्य-- ये दो भेद हैं। धुआँ देखकर अग्नि का ज्ञान होना लिंगज है और वाचक के शब्द सुनकर या पढ़कर होने वाला ज्ञान शब्दज है।आगम में शब्दज श्रुतज्ञान का प्राधान्य है। मतिज्ञान पूर्वक ही श्रुतज्ञान होता है। इन दोनों का कार्य-कारण भाव सम्बन्ध है। मतिज्ञान कारण और श्रुतज्ञान कार्य है।
     अतः मति और श्रुत- ये दोनों सहभावी ज्ञान हैं. एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ते। ये दोनों प्रत्येक संसारी जीव में होते हैं। 
 
मतिज्ञान और श्रुतज्ञान की तुलना–
समस्त संसारी जीवों में मतिज्ञान और श्रुतज्ञान का अस्तित्व अनिवार्यतया पाया जाता है। मतिज्ञान का विषय इन्द्रियों से सम्बद्ध, वर्तमानकालीन और स्थूल पदार्थ होता है। इसके द्वारा पृथक् पृथक् घटनाओं को ही जाना जा सकता है। जबकि श्रुतज्ञान इन्हें जानने के साथ ही साथ विभिन्न घटनाओं के मध्य विद्यमान सम्बन्ध, उनकी उत्पत्ति की व्याख्या, पदार्थों के सार्वभौमिक स्वरूप आदि को भी जानता है।मन रहित जीवों में श्रुतज्ञान ही मतिज्ञान पर आश्रित होता है, जबकि समनस्क जीवों, विशेष रूप से मनुष्यों में मतिज्ञान भी श्रुतज्ञान पर आश्रित होता है। मतिज्ञान का कार्य है इन्द्रियों एवं मन के द्वारा स्पर्श, रस, गंध, रूप, शब्द आदि को जानना और विविध अवस्थाओं पर विचार करना। श्रुतज्ञान का कार्य शब्द के द्वारा उसके वाच्य अर्थ को जानना और शब्द के द्वारा ज्ञात अर्थ को पुनः शब्द के द्वारा प्रतिपादित करना।

   इसीलिए इसके अक्षरात्मक और अनक्षरात्मक--  ये दो भेद हैं। मन वाले जीव अक्षर सुनकर वाचक के द्वारा वाच्य का ज्ञान होना अक्षरात्मक श्रुतज्ञान हैं। यह एक एकेन्द्रिय आदि सभी जीवों को होता है।धूम के निमित्त से अग्नि का ज्ञान, बाढ़(नदीपूर) के निमित्त से वृष्टी का ज्ञान अनक्षरात्मक अथवा अर्थलिंगज श्रुतज्ञान है। 
  अक्षरात्मक और अनक्षरात्मक रूप इन दो भेदों के अतिरिक्त श्रुतज्ञान के अंगबाह्य और अंग प्रविष्ट रूप भेद  भी हैं। बारह अंगआगम, चौदह पूर्व तथा प्रकीर्णक आदि आगम भी इसी के ही भेद माने गये हैं। श्रुत का मनन या चिन्तनात्मक जितना भी ज्ञान होता है वह सब श्रुतज्ञान के अन्तर्गत है। यह रूपी-अरूपी दोनों प्रकार के पदार्थों को जान सकता है। आगम में शब्दजन्य श्रुतज्ञान का ही प्राधान्य है। 
 
 3. अवधिज्ञान –भूत, भविष्यत काल की सीमित बातों को तथा दूर क्षेत्र की परिमित रूपी वस्तुओं को जानने वाला अवधिज्ञान होता है। अतः देशान्तरित, कालान्तरित और सूक्ष्म पदार्थों के द्रव्य, क्षेत्र, काल एवं भाव की मर्यादा से जानने वाले ज्ञान को अवधिज्ञान कहते हैं। यह अवधिज्ञानावरण और वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम से होता है। इस तरह "अवधीयते इति अवधिः" अर्थात् द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की मर्यादापूर्वक रूपी पदार्थों को एकदेश जानने वाले ज्ञान को अवधिज्ञान कहते हैं। आगमों में इसे "सीमाज्ञान" भी कहा है।
 इसके दो भेद हैं- भवप्रत्यय और गुणप्रत्यय ।भव अर्थात् एक विशेष गति में जन्म ही जिसका कारण हो वह भवप्रत्यय अवधिज्ञान कहलाता है। देव, नारकी और चरमशरीरी (अन्तिम शरीर वाले) तीर्थंकरों में भवप्रत्यय अर्थात् जन्म से अवधिज्ञान होता है। गोम्मटसार (जीवकाण्ड गाथा ३७१) के अनुसार यह अवधिज्ञान भी क्षयोपशम निमित्तक होता है । पर इसमें एक विशेष गति में जन्म लेना ही अवधिज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम का कारण है। इसमें अवधिज्ञानावरण और वीर्यान्तराय कर्म का क्षयोपशम समस्त आत्म प्रदेशों में उत्पन्न होता है। इसलिये इसे सर्वांग से उत्पन्न कहा जाता है।  
    गुणप्रत्यय अवधिज्ञान की उत्पत्ति सम्यग्दर्शनादि गुणों की अपेक्षा पूर्वक होने वाले अवधिज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से होती है। यह पर्याप्तक (सभी इन्द्रियों के निर्माण से युक्त) मनुष्यों और समनस्क तिर्यन्चों में उत्पन्न हो सकता है। यह शंख, पद्म, स्वस्तिक आदि शुभ चिन्हों से युक्त आकार में नाभि से ऊपर के आत्म प्रदेशों में उत्पन्न होता । (गो.जी.गाथा ३७०) 
तत्त्वार्थवार्त्तिक (पृष्ठ 326) के अनुसार गुणप्रत्यय अवधिज्ञान अनुगामी, अननुगामी, वर्धमान, हीयमान, अवस्थित, अनवस्थित-- इन छः प्रकार का होता है। जो अवधिज्ञान सूर्य के प्रकाश की तरह पीछे पीछे भवान्तर तक साथ जाता है, वह अनुगामी है। जो अपने स्वामी का अनुगमन नहीं करता, वहीं रूक जाता है, वह अननुगामी है। जो अवधिज्ञान सम्यग्दर्शन आदि गुणों की विशुद्धि के कारण पत्तों में लगी हुई आग के समान निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होता है वह वर्धमान तथा जो ईंधन रहित अग्नि के समान निरन्तर कम होता रहता है वह हीयमान अवधिज्ञान है। जो अवधिज्ञान तिल आदि चिन्हों के समान सदैव एक सा रहता है, न कम होता है, न बढ़ता है उसे अवस्थित तथा जो कभी  कमता,  कभी बढ़ता रहता है वह अनवस्थित अवधिज्ञान है।
4. मनःपर्ययज्ञान - द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की मर्यादा लिए हुए इन्द्रिय और मन की सहायता के बिना ही दूसरे के मन की अवस्थाओं (पर्यायों) का ज्ञान मनःपर्ययज्ञान है। सामान्य रूप में यह ज्ञान दूसरे के मन की बात को जानने वाला ज्ञान होता है। वस्तुतः चिन्तक जैसा सोचता है उसके अनुरूप पुद्गल द्रव्यों की आकृतियाँ (पर्यायें) बन जाती हैं और इनके जानने का कार्य मनःपर्ययज्ञान  करता है। इसके लिए वह सर्वप्रथम मतिज्ञान द्वारा दूसरे के मानस को ग्रहण करता है, उसके बाद मनःपर्ययज्ञान की अपने विषय में प्रवृत्ति होती है। 

     वस्तुतः मनःपर्ययज्ञान का शाब्दिक अर्थ है मन की पर्यायों को जानने वाला ज्ञान। इसे परिभाषित करते हुए तत्त्वार्थवार्तिक;( पृष्ठ८४) में आचार्य अकलंकदेव कहते हैं – वीर्यान्तराय तथा मनःपर्यय ज्ञानावरणीय कर्म का क्षयोपशम होने पर अपने और दूसरे के मन की अपेक्षा से होने वाला ज्ञान मनःपर्ययज्ञान कहलाता है। यह ज्ञान आत्म मात्र सापेक्ष होने के कारण प्रत्यक्ष है। इसे अपने मन की अपेक्षा से कहने का तात्पर्य मात्र यह है कि वहाँ के आत्म प्रदेशों में मनःपर्ययज्ञानावरणीय कर्म का क्षयोपशम होता है। जैसे चक्षु में अवधिज्ञानावरण का क्षयोपशम होने पर चक्षु की अपेक्षा होने मात्र से अवधिज्ञान को मतिज्ञान नहीं कहते, उसी प्रकार मनःपर्ययज्ञान भी मतिज्ञान नहीं है, क्योंकि वह इन्द्रिय और मन से उत्पन्न नहीं होता। यह ज्ञान अन्य व्यक्ति के मन का विषय बन रहे पदार्थ को जानता है। जैसे आकाश में चन्द्रमा को देखने के लिये आकाश साधारण सा निमित्त है, वह चन्द्र ज्ञान का उत्पादक कारण नहीं है, उसी प्रकार अन्य व्यक्ति का मन मन:पर्ययज्ञान का साधारण सा आधार है, वह उसका उत्पादक नहीं है।(तत्त्वार्थवार्तिक; पृष्ठ 323) 
   आचार्य वीरसेन स्वामी धवला; (पुस्तक 6, पृष्ठ 28) में कहते हैं, दूसरे व्यक्ति के मन में स्थित पदार्थ मन कहलाता है। उसकी पर्यायों अर्थात् विशेषों को मनःपर्यय कहते है। उनको जो ज्ञान जानता है वह मनःपर्ययज्ञान है।  
   ज्ञान मनुष्यलोक में स्थित जीव के चिन्तित, अचिन्तित, अर्धचिन्तित आदि अनेक प्रकार के अर्थ से मन को प्रत्यक्ष जानता है, वह मनःपर्ययज्ञान है। इसीलिए मनःपर्ययज्ञान का विषय चिन्तित, अर्ध  चिन्तित और अचिन्तित पदार्थ होते हैं। यह ज्ञान मनुष्य क्षेत्र (पृथ्वी) के भीतर स्थित समनस्क प्राणियों के द्वारा,
 जिसका भूतकाल में चिन्तन किया था,वह चिन्तित। जिसका आगामी काल में चिन्तन किया जायेगा वह अचिन्तित तथा अर्धचिन्तित - जिसका पूर्ण रूप से चिन्तन नहीं किया गया,ऐसे पदार्थो को जानता है।   
 
मनःपर्ययज्ञान अवधिज्ञान के समान स्वमुख से पदार्थों को नहीं जानता, अपितु अन्य व्यक्ति के मन के माध्यम से जानता है।
          इस प्रकार यह मनःपर्ययज्ञान दूसरे के मन में स्थित संज्ञा (प्रत्यभिज्ञान) स्मृति, चिन्ता (तर्क), मति आदि ज्ञानों को तथा जीवों की जीवन, मरण, सुख, दुःख तथा नगर आदि का विनाश, अतिवृष्टि, सुवृष्टि, दुर्भिक्ष, सुभिक्ष, क्षेम, अक्षेम आदि पदार्थों को जानता है। (धवला; पुस्तक 13, पृष्ठ 332) 
     मनःपर्ययज्ञान विशिष्ट वर्धमान चारित्र के धारक, ऋद्धिधारी, छठे गुणस्थान तथा उससे ऊपर के गुणस्थानों में स्थित महामुनि यों के ही होता है।(गोम्मटसार-जीवकाण्ड; गाथा 438) 
    
वस्तुतः अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान ये दोनों ज्ञान आत्मा से होते हैं। इनके लिए इन्द्रिय और मन की सहायता आवश्यक नहीं है। ये दोनों रूपी द्रव्यों के ज्ञान तक ही सीमित है अतः इन्हें अपूर्ण प्रत्यक्ष कहा जाता है। अवधिज्ञान के द्वारा रूपी द्रव्य का जितना सूक्ष्म अंश जाना जाता है उससे अनन्त गुणा अधिक सूक्ष्म अंश मनःपर्यय के द्वारा जाना जाता है। अवधिज्ञान चारों गतियों के जीवों को हो सकता है किन्तु मनःपर्यय ज्ञान मनुष्यगति में, वह भी संयत जीवों को ही होता है। इस पंचम काल में अवधिज्ञान का होना तो यहाँ सम्भव भी है किन्तु मनःपर्यय ज्ञान होना दुर्लभ है। अवधि और मनःपर्यय की मोक्षमार्ग में अनिवार्यता नहीं है, जबकि मति और श्रुतज्ञान अनिवार्य है।

   5. केवलज्ञान– समस्त पदार्थों की त्रिकालवर्ती पर्यायों को युगपत् जानने वाला केवलज्ञान है। कहा भी है कि केवलज्ञान लोक और अलोक को सर्वतः परिपूर्ण रूप से जानता है। भूत, भविष्य और वर्तमान में से ऐसा कुछ भी नहीं है. जिसे केवलज्ञान नहीं जानता हो।  वस्तुतः चार घातिया कर्म- ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय के पूर्णरूपेण क्षय होने पर उत्पन्न होने वाला ज्ञान केवलज्ञान कहलाता है।
केवलज्ञान की विशेषताओं के विषय में विशेषआवश्यकभाष्य ( गाथा ८४) में कहा है- केवलमेगं सुद्धं सगलमसाहारणं अणंतं च।पायं च नाणसद्दो, नामसमाणाहिगरणोऽयं ।। 
अर्थात् "केवल" इस शब्द के एक, शुद्ध, सकल, असाधारण और अनन्त आदि अर्थ हैं। इसीलिए केवलज्ञान "एक" है। इन्द्रियादि की सहायता से रहित है और इसके होने पर अन्य सभी ज्ञान निवृत्त हो जाते है- इसीलिए यह “एकाकी“ है। मल-कलंक रहित होने से "शुद्ध है। सम्पूर्ण ज्ञेयों का ग्राहक होने से "सकल"है। इसके समान और कोई ज्ञान नहीं है, अतः "असाधारण" है। इसका कभी अन्त नहीं होता, अतः अनन्त है। ये सब केवलज्ञान की विशेषतायें हैं।आत्मा स्वभावतः अनन्त ज्ञान सामर्थ्य से युक्त है, इसलिये समस्त प्रतिबन्धकों के पूर्णरूपेण नष्ट हो जाने पर केवलज्ञान समस्त द्रव्यों की समस्त पर्यायों को युगपत् जानता है। (तत्त्वार्थसूत्र 10/31,29) 
प्रश्न होता है कि इन पाँच ज्ञानों में एक साथ किसी भी जीव को कितने ज्ञान हो सकते हैं ? आचार्य उमास्वामी ने तत्त्वार्थसूत्र (1/30) में कहा है- एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्म्यः अर्थात् एक जीव में एक साथ एक से लेकर चार ज्ञान तक ही हो सकते हैं, इससे अधिक नहीं। जीव को यदि एक ज्ञान होगा तो मात्र "केवलज्ञान"। क्योंकि यह निरावरण और क्षायिक है। अर्थात् समस्त ज्ञानावरण कर्म के क्षय से यह होता है. इसीलिए असहाय (अकेला) होता है। इसके साथ अन्य क्षायोपशमिक ज्ञान नहीं रह सकते।
    
        चार घातिया कर्म, जो आत्मा की शक्तियों को लुप्त करते हैं , के समूल नाश जाने पर जीव का केवलज्ञान स्वभाव प्रकट हो जाता है जिसके फलस्वरूप वह क्षण समस्त द्रव्यों की समस्त पर्यायों को युगपत् जानता है तथा किसी भी क्षण ज्ञानरहित नहीं होता । आचार्य कुन्दकुन्ददेव प्रवचनसार(१/२१, २२) में कहते हैं, "केवलज्ञान समस्त द्रव्यों की विद्यमान-अविद्यमान समस्त पर्यायों को तात्कालिक पर्याय की भांति विशिष्टता पूर्वक अपने भिन्न भिन्न स्वरूप में जानता है।" इसकी व्याख्या करते हुए अमृतचन्द्र कहते हैं 'जिस प्रकार एक अल्पज्ञ जीव को एक भूतकालवर्ती पदार्थ का ज्ञान भूतकालवती रूप से, वर्तमान कालवतीं पदार्थ का ज्ञान वर्तमानकालवर्ती रूप से और भविष्यकालवर्ती पदार्थ का ज्ञान भविष्य कालवर्ती रूप से होता है; उसी प्रकार सर्वज्ञ को भी सभी ज्यों की त्यों भूत, भविष्य, वर्तमानकालीन पर्याय भूत, भविष्य, वर्तमान कालीन रूप से ही ज्ञात होती हैं। एक ही वस्तु की भूत, भविष्य, वर्तमान कालीन पर्यायों का भूत,भविष्य, वर्तमान कालीन रूप से युगपत् ज्ञान असिद्ध नहीं है। एक अल्पज्ञ व्यक्ति को भी “यह वही है” रूप प्रत्यभिज्ञान होता है ,जिसमें वस्तु की भूतकालीन और वर्तमान कालीन पर्यायों का उस रूप से ज्ञान होता  है। 
इस प्रकार केवलज्ञान होते ही वह आत्मा सर्वज्ञ सर्वदर्शी हो जाता है। 
  जैनदर्शन की सर्वज्ञता की अवधारणाके प्रति अनेक प्रकार की आपत्तियाँ उठायी जाती है।सर्वज्ञता के सम्बन्ध में एक आपत्ति यह की जाती है कि एक समय में एक ही पदार्थ का ज्ञान हो सकता है. अनेक पदार्थ एक साथ एक ज्ञान का विषय नहीं हो सकते, तब अनन्त पदार्थों को युगपत् जानने वाली सर्वज्ञता किस प्रकार सम्भव हो सकती है? 
    जैन दार्शनिक कहते हैं कि यदि अनेक पदार्थ एक साथ एक ज्ञान का विषय नहीं बन सकते हों तो विभिन्न पदार्थों के मध्य तुलना, संशय आदि सम्भव नहीं हो सकते। एक साथ पाँच अंगुलियों का ज्ञान, अनेक व्यक्तियों का ज्ञान आदि सर्वप्रसिद्ध हैं। जब एक सामान्य व्यक्ति एक ही ज्ञान द्वारा अनेक वस्तुओं को जान सकता है, तो अनन्त शक्ति सम्पन्न आत्मा अनन्त द्रव्यों को उनके पूर्णरूपेण वैशिष्ट्य के साथ युगपत् क्यों नहीं जान सकता ?
वस्तुतः पांच ज्ञानों में मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान -ये चार  क्षायोपशमिक ज्ञान हैं। ज्ञानावरण कर्म का पूर्ण रूपेण क्षय होने पर ये चारों ज्ञान समाप्त हो जाते हैं और वह आत्मा एक मात्र
ज्ञान-केवलज्ञान स्वरूप होकर निरन्तर समस्त द्रव्यों को सम्पूर्णत:जानता रहता है। 
‘‘जे एगं जाणइ, से सव्वं जाणइ। जे सव्वं जाणइ, से एगं जाणइ।।258।।
अर्थात् जो एक (आत्मा) को जानता है, वह सब (जगत्) को जानता है और जो सबको जानता है वह एक को जानता है। इस तरह मानवीय मूल्यों में सम्यग्ज्ञान का महत्त्व स्वतः स्पष्ट है।
   ज्ञान के सम्बन्ध में जैनधर्म की यह मान्यता भी विशेष महत्त्व रखती है कि ज्ञान में अज्ञान का एक अंश भी है, तो वह मिथ्या ज्ञान है।शास्त्रों में दिए तथ्यों को जान-बूझकर भलीभाँति न समझने से स्वयं को भी धोखा होता है और दूसरों को भी धोखे में रखा जाता है। 
   यहाँ ज्ञान के अभाव को तो अज्ञान कहा ही है, मिथ्याज्ञान को भी अज्ञान माना है। यहाँ इन दोनों में यह अन्तर विशेष दृष्टव्य है कि जीव एकबार सम्यग्दर्शन रहित तो हो सकता है, किन्तु ज्ञान रहित नहीं हो सकता। किसी न किसी प्रकार का ज्ञान जीव में अवश्य रहता है। वही ज्ञान सम्यक्त्व का आविर्भाव होते ही सम्यग्ज्ञान कहलाने लगता है।
  इस प्रकार मानवीय मूल्यों में ज्ञान का महत्त्व है। क्योंकि ज्ञान ही एकमात्र ऐसा तत्त्व है जो मानव और पशु में अन्तर तो करता ही है, साथ ही जिसके आधार पर मनुश्य ज्ञान-विज्ञान, तत्त्वज्ञान और अध्यात्म के शिखर पर पहुंच सकता है।
 इस प्रकार जैन दर्शन की ज्ञान मीमांसा बहुत ही गहन और विस्तृत और महत्वपूर्ण है। 
  लेखक का आवासीय पता—
-प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी, वाराणसी
बी. २३/४५, पी .६, शारदानगर कॉलोनी,
खोजवां, वाराणसी – २२१०१०
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