श्रमणाचारगत चिंतन का वैशिष्टय :
समयदेशना के परिपेक्ष्य में
प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी,वाराणसी
( राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित)
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, जैनदर्शन विभाग,
सम्पूर्णानन्द संस्कृतविश्वविद्यालय,वाराणसी।
सम्पूर्ण विश्व साहित्य में अध्यात्म का यदि कोई शिरोमणि ग्रन्थ है तो वह आगम ग्रन्थ है, प्रथम शताब्दी के आचार्य भगवन कुंदकुन्द प्रणीत समयपाहुड, जैसे हम समयसार के नाम से जानते हैं.इस शास्त्र पर आध्यात्मिक चिंतन-मनन पुरोधा आचार्यश्री विशुद्धसागर जी मुनिराज के बहुत ही सरल-सुबोध भाषा में श्रृंखलाबद्ध रूप में दिये गए प्रवचनों का वृहदाकार संग्रह पंद्रह खण्डों में समयदेशना नाम से प्रकाशित है. अनेक खण्डों में प्रकाशित इस समयदेशना जैसे विशाल शास्त्र के चिन्तन-वैशिष्ट्य पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, किन्तु संगोष्ठी में अपनी समयसीमा के कारण मात्र निर्धारित खण्डों के अन्तर्गत श्रमणाचारगत चिंतन का वैशिष्टय के कुछ प्रमुख प्रसंगों पर ही चर्चा करना सम्भव होगा. इसलिए सर्वप्रथम प्रस्तुत है–
श्रमण और श्रावक धर्म की भूमिका–
श्रमण धर्म क्या है, इसे सुनिये । षट् आवश्यक श्रावकों के भिन्न हैं, मुनियों के भिन्न हैं। यदि मुनि श्रावक के षट् आवश्यक का पालन करे, तो क्या आप उसे मुनि मानेगे? नहीं न। मेरे मित्रो,इन निर्ग्रंथों को अपने आवश्यक पालन करने दो. श्रावको ! आप उनसे अपने आवश्यक पालन मत कराना। जब योगी सराग अवस्था में होते हैं, तो श्रावकों को दान, पूजा, शील, उपवास आदि के पालन का उपदेश देते हैं. लेकिन आदेश कभी नहीं देते।
मैं बहुत सारे पंचकल्याणकों में गया हूँ, लेकिन मैंने आज तक एक भी पंचकल्याणक नहीं कराया। (जो कथन है ये तो प्रतिष्ठाचार्य काम है. उसको भी हमारे यहाँ आचार्य कहा गया है। ग्रन्थ का विषय तो वास्तु शास्त्र ग्रन्थ लिया है। सूत्रधारों के अनुसार गोम्मटेश बाहुबली स्वामी की मूर्ति की प्रतिष्ठा में आचार्य नेमिचन्द्र स्वामी ने भी आशीष दिया है, परन्तु सूत्रधार नहीं बने, सूत्रधार कोई दूसरा था। गोम्मटेश बाहुबली स्वामी की प्रतिमा में आचार्य नेमीचन्द्र स्वामी ने प्रतिष्ठा के काल में सूरी मंत्र तो दिया है, लेकिन प्रतिमा जो प्रतिष्ठित हुई है,वो मूर्ति तो चामुण्डराय ने शिल्पकार से बनवायी है, वहाँ सूत्रधार अनेक बड़े-बड़े लोग थे। सार की बात इतनी-सी है कि निर्ग्रन्थों को श्रमणसंस्कृति की रक्षा के लिए निर्ग्रन्थ चर्या का निर्दोष पालन करना ही श्रमणसंस्कृति की रक्षा है, परन्तु श्रावकों को द्रव्य तीर्थ की रक्षा करना चाहिए.निर्ग्रन्थों को अपने भावतीर्थ की रक्षा करना चाहिए। व्यवहार तीर्थ की रक्षा नहीं करोगे तो निश्चय तीर्थ समाप्त हो जायेगा।
अमृतचन्द्र स्वामी ने 'समयसार' की 'आत्मख्याति' टीका में एक प्राचीन गाथा लिखी, वहाँ स्पष्ट कहा है कि जो जीव व्यवहार को नहीं मानता, वह व्यवहार तीर्थ का शत्रु है। जो निश्चय को नहीं मानता, वह आत्मतत्त्व का शत्रु है। परमार्थ और व्यवहार इन दोनों का समन्वय लेकर चलना चाहिए। श्रावक अपनी क्रिया करे, उसका निषेध साधु नहीं करे और पुण्यभूत सम्यक्वर्धिनी क्रिया कोई श्रावक कर रहा है, तो उसे आशीर्वाद दे दो ठीक है, तेरे योग्य काम है। (समयदेशना : 14/133)
श्रमण प्रतिक्रमण क्यों आवश्यक?
श्रमण के सात प्रतिक्रमण होते हैं–
दैवसिक, रात्रिक,पाक्षिक, चातुर्मासिक वार्षिक, ईर्यापथ एवं उत्तमार्थ. मुनिराज उत्तमार्थ प्रतिक्रमण करके प्राणों का त्याग करते हैं।श्रमणों को प्रतिक्रमण समझाने के लिए शास्त्रों में एक कथानक आता है.---
एक गरीब पुरुष था, उसके खाने का भी कोई विशेष साधन नहीं था। वह घोड़ा पर पोटली रखकर गाँव-गाँव में वस्तु बेचा करता था। ऐसे व्यक्ति बनजारी कहलाते हैं.
भैया! जब अशुभ का समय आता है, तो पता नहीं क्या से क्या हो जाता है। पाप के उदय में लगे में ही लगती है। वैसा ही उस गरीब के साथ हुआ। उसके घोड़े की आंखों की रोशनी चली गई। अचानक ज्योति जाने से. उसके पास जो साधन या वह विकृत हो गया। वह गरीब अपना घोड़ा लेकर वैद्य के पास जाता है, परन्तु हुआ यह कि वहाँ वैद्य था नहीं, तब वैद्य के बेटे से गरीब बोला कि बेटा। घोडे के नेत्रों की ज्योति जा चुकी है, तुम्हारे पास जो भी अंजन हो एक-एक सलाई लगा दो। वैद्य के पुत्र ने एक-एक अंजन शलाका घोड़े के नेत्र में लगाना प्रारंभ किया, उनमें से एक शलाका ऐसी थी जिसके कारण घोड़े की नेत्र की ज्योति पुनः वापिस आ गई।
मुमुक्षु। यहाँ कथा कहने का अभिप्राय क्या है? हे जीव। जैसे घोड़े की गई ज्योति शलाका के लगने से वापिस आ गई, ऐसे ही जैन मुनियों को सात प्रकार के प्रतिक्रमण करने का जिनागम में कहा है. पता नहीं किस प्रतिक्रमण से भावों की शुद्धता हो जाये। अंतिम प्रतिक्रमण में भी तेरी दृष्टि फिर गई तो तेरी चारित्र की ज्योति प्रकट हो जायेगी और संसार के अंधकार से तू बच जायेगा। सातों प्रतिक्रमण साधक को अभीष्ट है। आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य हैं। पहला प्रतिक्रमण दैवसिक है। दिन में हुए दोषों का संध्याकाल में प्रतिक्रमण करना, दोषों का प्रक्षालन करना, यह दैवसिक प्रतिक्रमण है। आहारचर्या के उपरांत गुरु अथवा प्रभु पादमूल में बैठकर, आहार में, गमन इत्यादि में जो दोष लगे हैं, यह ईर्यापथ प्रतिक्रमण है।
मुमुक्षुओ!अध्ययन मात्र से कल्याण संभव नहीं है, चर्चा के साथ चर्या भी होना चाहिये। धन्य हो दिगम्बर योगियों को जो निज को पल-पल संभाल रहे हैं, दैवसिक प्रतिक्रमण किया, फिर ईर्यापथ प्रतिक्रमण किया, फिर रात्रिक प्रतिक्रमण किया, फिर पाक्षिक प्रतिक्रमण पन्द्रह दिन में करते हैं। पन्द्रह दिन में मेरे से जो भी दोष हुआ तो वह दोष मिथ्या होवे। चार माह में पुनः दोषों के प्रक्षालन के लिए चातुर्मासिक प्रतिक्रमण करते हैं, जबकि प्रतिदिन प्रतिक्रमण कर चुके हैं। संवत्सर/वार्षिक, वर्ष में एक बार जो प्रतिक्रमण होता है वह वार्षिक प्रतिक्रमण है। सालभर में तीन अष्टान्हिका होती हैं, उन पर्वों की चतुर्दशी को श्रमण प्रतिक्रमण करते है। साल में तीन चातुर्मास होते है। वर्षाकाल का चातुर्मास है, यह जीवों की बहु-उत्पत्ति का काल है. इसमें साधु एक ही नगर गाँव में स्थिर होकर साधना करते हैं.और शेष दो चातुर्मास होते के लिए निर्यापकाचार्य की खोज करके क्षपक अर्थात् सल्लेखना/समाधि धारण करने वाला साधक है. उस काल में विहार होता है। इन सभी प्रतिक्रमणों के उपरांत दिगम्बर मुनि/आचार्य सल्लेखना निर्यापकाचार्य के पादमूल में अपने दोषों के प्रक्षालन के लिए जीवन का अन्तिम प्रतिक्रमण करते हैं. उसे उत्तमार्थ प्रतिक्रमण कहते हैं।
कदाचित् साधना के काल में कोई दोष का प्रतिक्रमण न किया हो,मान के आवेश में अपने जीवन में कोई दोष छिपाकर रखे हो उसे भी साधक प्रकट करता है। भैया! मनुष्य मान के आवेश में सोचता है कि मैं अपने दोषों को प्रकट कर दूँगा तो ऐसा न हो कि गुरु हमारे पर अविश्वास करने लगेंगे, संघ के सदस्य हमारी विनय करना छोड़ देंगे अथवा लोग हमें हीन समझने लगेंगे और कहेंगे कि ये तो दोषी-पापी हैं। ऐसे विचार करके जीव अपने दोषों को छुपा लेता है। असंख्यात-लोक-प्रमाण परिणाम हैं। आलोचना पूरी नहीं की, आपसे चींटी मर गई तो आपने आलोचना करके, प्रतिक्रमण कर लिया, प्रायश्चित्त कर लिया, परन्तु हे मित्र ! आपके मन में जीवों की हिंसा के जो परिणाम हुए थे, उसका क्या होगा?
'आत्मस्वभावं परभाव भिन्नं' –इस सूत्र की सीख :
ओहो श्रावको! जीवन सँभल कर जियो, सोच-समझकर बोला करो। किसी से झगड़ा हो गया, आपको क्रोध आ गया और आपने आवेश में आकर बोल दिया कि इसको गोली मार दूंगा। भैया! आप किसी को मार पाओ या न मार पाओ, उसका पुण्य है.वह जी रहा है, परन्तु आपने पञ्चेन्द्रिय जीव की संकल्पी हिंसा का पापार्जन कर लिया है।
भैया! व्यक्ति सर्वाधिक पाप दूसरों के प्रति राग करके, दूसरे के प्रति द्वेष करके करता है। हे मुमुक्षुः!जिससे तू राग कर रहा है वह भी तेरा नहीं है और जिससे तू द्वेष कर रहा है वह भी तेरा नहीं है। तेरे लिए तो दोनों ही पर है। साधु के मन में जब-तक साम्य का सूत्र नहीं आ रहा है, तब तब साधुत्व-साधुता सम्भव ही नहीं है। मुमुक्षु ! जीवन में ज्यादा न सीख पाओ, तो इतना अवश्य सीख लेना कि सूत्र शब्दब्रह्मभूत ही न रहे, आत्मब्रह्मभूत हो जाये। इस तन से अंतिम श्वास निकले, उससे पहले 'आत्मस्वभावं परभाव भिन्नं' सूत्र समझ लेना।(पृष्ठ15/ 61-62)
अन्तरंग बहिरंग से नग्नत्व मोक्षमार्ग–
मित्रो! कोई गेंहुआ, कोई भगवा, अनेक प्रकार के वस्त्रों से मोक्ष जाना चाहता है। कोई कपड़ा उतारकर मोक्ष जाना चाहता है। इनसे मोक्ष होता तो पता नहीं जगत में कितने मोक्षमार्ग हो जाते। ज्ञानी न कपडे उतारना मोक्ष है, न कपडे धारण करना मोक्षमार्ग है। वीतराग भेदाभेद रत्नत्रय में होने को मोक्षमार्ग मानते हैं। निसंग होने को कपडे फैंकते हैं। कपडे फेंके कहाँ हैं? निसंगता के होगा। जब बहिरंग परिग्रह छोडेगा. फिर किसे ओढेगा? ज्ञानी! नंगे होने को मोक्ष-मार्ग नहीं कहा। आराधना मोक्षमार्ग है। रत्नत्रय आराधक तभी हो पायेगा जब अंतरंग-बहिरंग परिग्रह से पति कपडे छोडे हैं, कि नंगे होकर मोक्ष जाने के लिये कपडे छोडे हैं? निसंग होकर मोक्ष जाया जाता है। चिस से मुक्त होने के लिये दिगम्बर भेष धारण किया जाता है। वह निसंगता तभी आयेगी, जब अन्तरंग बहिरंग से नग्नत्व को प्राप्त हो जायेगा।
नग्नत्व (दिगम्बरत्त्व)मोक्षमार्ग है, पर नंगापन मोक्षमार्ग नहीं है। निःसंगता मोक्षमार्ग है। नंगेपन में एकान्तिक दोष है। नंगे तो जगत में और सम्प्रदायों में लोग होते हैं. पर नग्नत्व जो है वह वीतराग शासन है। इस नग्नत्व में कोई चरस नहीं होती, कोई भांग नहीं होती, गांजा-अफीम नहीं होता, हुक्का-मुक्का नहीं होता है इस नग्नत्व में मात्र वीतराग भाव ही होता है। (14/182)
दिगम्बर मुनि, मुनि हैं, मुनीम नहीं–
विद्वानों की गोष्ठी हुई, एक उच्च कोटि के विद्वान बोल पडे कि महाराज जी ! आपके साथ युवाओं की टीम है, सब साधु व ब्रह्मचारी युवा हैं, इन लोगों से कुछ काम लो। मैं सुनता रहा। क्या काम लूँ?
विद्वान् बोले —इनके चेहरे ऐसे लग रहे हैं कि ये पढे-लिखे लोग हैं,कोई गरीबों के लड़के तो नहीं हैं । आप सबको कम्प्यूटर दिला दो, इससे समाज का कुछ हित होगा, नहीं तो इतने सारे लोग हैं बिना काम के.इससे व्यवहार की कया में समझ में आ गया सब विषय। ये कह रहे हैं कि इन्हें कम्प्यूटर दे दो, ताकि ये जिनवाणी पर काम करें। पण्डित जैसे लोगों ने ये तो महाराज हैं, उन को कोई काम तो रहता नहीं है, एक काम करो, तीर्थों का उद्धार, तीर्थों का निर्माण, तीर्थों का कल्याण, दुनियाँ भर के मंदिर धर्मशाला, सब इन्हीं को सौंप दो। आप सब फ्री हो सो इन्हें काम सौंप दो, सो हम फ्री रहें। ज्ञानियो ! यहाँ क्या कह रहे हैं। खड़िया खड़िया ही है, खड़िया दीवार नहीं है। यह मुनि का धर्म, मुनि का धर्म ही है, श्रावक धर्म नहीं है। मुनि के धर्म में श्रावक के धर्म को मत सौंपो. नहीं तो मुनिधर्म का लोप हो जायेगा,उच्छेद हो जायेगा.ऐसे ही कुछ मुनि महाराज श्रावकों में लग गये, श्रावकभूत हो गये, तब तो मुनि धर्म का उच्छेद हो जायेगा। इसलिए मुनि तो मुनि ही है, मुनीम नहीं है। श्रावको ! तीर्थ उद्धार करो, आशीर्वाद है, लेकिन मैं तो मुनि हूँ और दिगम्बर मुनि को विहार करते देखना चाहता हूँ, कहीं स्थापित होकर मुनीम बनते नहीं देखना चाहता.(समयदेशना : 14/151)
कभी कभी जो साधारण द्रव्य विशुद्धि और समय के प्रताप से असाता का उदय साता में संक्रमित हो जाता है । धर्म की रक्षा, संस्कृति की रक्षा के लिए हमारे आगम में संस्कृति की रक्षा में लगाओ। उससे आप चेतन तीर्थ की, चतुर्विध संघ की रक्षा करो। अचेतन में जिनमन्दिरों की स्थापना करो।
रयणसार आगम बोल रहा है श्रावकों के लिए -'दाणं पूया मुक्खं सावयेधम्मे ण सावया तेण विणा ।' दान देना, पूजा करना श्रावक का मुख्य धर्म है। और झाणाज्झयण मुक्खं जइधम्मं तं विणा तहा सो वि –.
ध्यान करना, अध्ययन करना यति का धर्म है। अब प्रश्न यहाँ यह है कि यदि मुनीम का काम तो मुनि की पहचान का क्या करूँगा? बिना पैसे का मुनीम तो मिल गया,परन्तु मुनि कहाँ खोजने जाऊँगा? इसलिए अब यहाँ सुनिये ध्यान से, आ.कुन्दकुन्द की वाणी का विपर्यास की नहीं होना चाहिए। हे जानी!' श्रमण धर्म जो है वह निर्बद्ध होता है। श्रावक धर्म है वह साबद्ध होता मैं। प्रवचनसार' जी में वैयावृत्ति की व्याख्या है। श्रावक की वैयावृत्ति बद्ध और निर्बद्ध दोनों होती है। श्रमण की वैयावृत्ति निर्बद्ध ही होती है। जिसमें षट्काय के जीव की हिंसा नहीं होती है वह निर्बद्ध है। जो साबद्ध क्रिया है वह श्रावक करेगा। निर्ग्रन्थ मुनि क्रिया का उपदेश भी नहीं करेगा. क्योंकि यह षट्काय के जीवों की हिंसा के त्यागी हैं। आप कहो कि मध्यकाल में ऐसे उदाहरण मिलते हैं तो मध्यकाल में अनेक दिगम्बर आचार्य मुनि को जब आवश्यकता पड़ गई तो राजाओं को प्रभावित करके इन्होंने कई मठ, मंदिरों का निर्माण कराया और जो भट्टारक संघ की परम्परा, यापनीय संघ की परम्परा है यह सब उस मध्यकाल की देन है। यदि हम पूर्व की किसी बात को प्रमाणित मानते हैं तो आचार्य शांतिसागर छाणी, शांतिसागर दक्षिण इनके काल में जब एक मध्य भी मुनिराज नहीं थे, वहाँ पर लोग जो थे वे निर्वस्त्र रहते थे, लेकिन चर्या आदि को जाते समय कपड़ा ओढ़ लेते थे। आचार्य शांतिसागर छाणी उत्तर भारत में थे, और चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांतिसागर जी दक्षिण भारत में थे। इन दोनों ने कपड़ा ढककर आहार चर्या में जाने से मना कर दिया प्रयोग नहीं किया.उन्होंने कहा कि यह सत्य नहीं है. उन्होंने उपवास करना पसंद किया, किन्तु इस आगम मार्ग को छोड़ने को तैयार नहीं थे.उन्होंने कहा -भले ही शारीरिक असमर्थता के कारण वैसा करो, किन्तु उसे आगम मार्ग नहीं कहा जा सकता.
(समयदेशना : 14/131-132.)
निःसंगता नग्नत्व मोक्षमार्ग है–
अब तो विद्वानों से डरना नहीं, स्पष्ट कहना कि इसका स्पष्ट कथन कीजिये. ये सिद्धांत लेकर कहाँ से आये हो, व्यवस्था में? व्यवहारता में धर्म कैसा? वस्तु की अवस्था में धर्म कैसा ?ओहो!कोई कार्य करके ही मोक्ष जाना चाहता है, कोई धोती-दुपट्टा पहन कर मोक्ष जाना चाहता है।
कोई गेंहुआ,कोई भगवा, अनेक प्रकार के वस्त्रों से मोक्ष जाना चाहता है। कोई कपडे उतारकर मोक्ष जाना चाहता है।
इनसे मोक्ष होता तो पता नहीं जगत् में कितने मोक्षमार्ग हो जाते। ज्ञानी! न कपडे उतारना मोक्ष है, न कपड़े धारण करना मोक्षमार्ग है। वीतराग भेदाभेद रत्नत्रय की आराधना मोक्षमार्ग है. रत्नत्रय आराधक तभी हो पायेगा, जब अंतरंग-बहिरंग परिग्रह से रहित होगा.परिग्रह छोड़ेगा, फिर किसे ओढ़ेगा? ज्ञानी। नंगे होने को मोक्ष-मार्ग नहीं कहा। निःसंग होने को मोक्षमार्ग मानते हैं। निःसंग होने को कपड़े फैकते हैं। कपड़े फेंके कहाँ हैं? निसंगता के लिए कपड़े छोड़े हैं, कि नंगे होकर मोक्ष जाने के लिये कपड़े छोड़े हैं? निसंग होकर मोक्ष जाया जाता है। चिन्ता से मुक्त होने के लिये दिगम्बर भेष धारण किया जाता है। वह निःसंगता तभी आयेगी, जब अन्तरंग बहिरंग से नग्नत्व को प्राप्त हो जायेगा।
इसलिए इस प्रकार का नग्नत्व मोक्षमार्ग है, नंगापन मोक्षमार्ग नहीं है। निःसंगता मोक्षमार्ग है। नंगेपन में एकान्तिक दोष है। नंगे तो जगत् में और सम्प्रदायों में लोग होते हैं, पर नग्नत्व जो है वह वीतराग शासन है। इस नग्नत्व में मात्र वीतराग भाव ही होता है। मात्र नंगे होने में बहुत सारी विपत्तियाँ खड़ी हैं।(समयदेशना : 14/182):
जो मात्र सम्यग्दर्शन से मोक्ष मानता है, वह कपड़े पहने-पहने मोक्ष मानता है, वह श्वेताम्बर जीव है। सच्चे साधु दिगम्बर ही हैं, लेकिन दिगम्बर बनना नहीं होना। सम्यग्दर्शन न भी कहता तो यह कहता महाराज रत्नत्रय की पूर्णता होगी तब मुझे निर्वाण होगा और रत्नत्रय की पूर्णता में सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र तीनों आ गये। सम्यक्चारित्र की पूर्णता के बिना मोक्ष होता ही नहीं। ज्ञान की पूर्णता से मोक्ष नहीं होता, चारित्र की पूर्णता से ही मोक्ष होगा। ज्ञान तो तेरहवें गुणस्थान में प्रकट हो जाता है, पूर्ण केवल ज्ञान। लेकिन चारित्र की पूर्णता चौदहवें गुणस्थान में होती है। और जैसे-ही चारित्र की पूर्णता होती है-अ, इ, उ, ऋ, लृ बस मोक्ष हो गया। चौदहवें गुणस्थान में मोक्ष होता है। परन्तु मोक्षमार्ग प्रारम्भ स्यात् चौथे, स्यात् पाँचवें गुणस्थान से प्रारम्भ होता है। लेकिन यथार्थ रूप में छठवें गुणस्थान से होता है।(समयदेशना :14/110.)
'ज्ञायको ज्ञायक एव''
ज्ञायको ज्ञायक एव' अर्थात् ज्ञाता ज्ञाता ही है.यथार्थ मानो ही मैं तो इस बात को पूर्ण मानता हूँ कि आपने पूर्व में
कोई विशिष्ट पुण्य किये होंगे, क्योंकि भले ही खोटे काल में आये,तब भी तत्व का सम्यक् शोध,सम्यक् प्ररुपण, सम्यक् तत्त्व को जानने के लिये मन कर रहा है। और सम्यक्त्व समझने के लिये बुद्धि चल रही है। सम्यक् तत्त्व अपन को प्राप्त हुआ है। नहीं तो इस खोटे काल में इतने सारे जीव हैं उनको पता ही नहीं है कि समयसार क्या है ? और क्या ज्ञान- ज्ञेय भाव है? ये निश्चय मानिये, आज केवली भगवान् को पता चल रहा होगा कि इसने क्या पुण्य किये होंगे? जरूर ही श्रुत की आराधना की होगी. वीत रागी दिगम्बर साधुओं को शास्त्र भेंट किये होंगे,जिनवाणी दान की होगी,उसका फल है कि आज तुम्हारे हाथ में जिनवाणी है। नहीं तो ये हाथ कोई गोबर उठाते मिलता, कोई तराजू तौलते मिलता, तो कोई हाथ में छुरी लिये मिलता।
पण्डित शब्द प्रबल पुण्य के उदय से मिलता है- ज्ञानी! अहोभाग्य मानो जो ऐसे दिन तुम जिनवाणी की हाथ में लिये सम्हाले बैठे हो। भैया एक बार मैंने दस वर्ष की उम्र में एक शास्त्र में पढ़ा था ।ये पण्डित शब्द है, नियम से प्रबल पुण्य के उदय से मिलता है। आपको पण्डित बोला जा रहा है तो ये आपके पुण्य, ज्ञान, तपस्या फल है,
ज्ञानाराधना का फल है। जगत् में पण्डित शब्द कोई छोटा-मोटा है क्या? आपको पण्डितजी बोला जा रहा है, नहीं तो किसी से भी आप कहो कि मुझे तो पण्डित जी ही बोलते हैं। मेरे मित्र। घर में ही है,आपने सब सदस्यों को देखा है, जिनकी प्रज्ञा नहीं चलती, बुद्धि नहीं चलती तो आप भी अपने मुख बोल देते हो कि ये तो ईटें ढोने वाला है। मूढ़ बुद्धि बोल देते हो। जडवृद्धि, मूर्ख बोल देते हो। विश्वास रखना भैया। इतनी-सी बात मानना,कितना ही बडा अज्ञानी हो, उसे
मूर्ख मत कहना। इतनी गहन पीड़ा होती है, जितना बाण नहीं चुभता, उससे कई गुना पीडा उस 'मूर्ख' शब्द को सुनने में होती है। आप लोगों को बोध मिला है, बोधि के लिये मिला है, न कि किसी को बुद्धू कहने के लिये मिला है। ये हृदय की डायरी पर लिख लो। जो बोध मिला है, उसका उपयोग बोधि में कीजिये । बोध यानि ज्ञान, बोधि यानि रत्नत्रय। बोध मिला है, इसलिए प्रवचन भी करो तो कभी भी सामने वाले को तिरस्कृत भाषा में मत बोलना ऐसा उपदेश करो कि वक्ता और श्रोता के बीच में अभेद वृत्ति हो जाये, आत्मीय भाव जगे। श्रोता आपको ज्ञानी मानता है और आप श्रोता को अज्ञानी मानते रहे, ये तिरस्कार की भाषा और पूज्यता की भाषा इन दोनों के बीच में भेद है। इसलिये आपकी बात आनन्द नहीं देती।(समयदेशना :14/186)
इस प्रकार जब इस देशना के खण्ड संख्या 13,14,15 में श्रमणाचारगत चिंतन के अनेकानेक प्रसंगों में कुछ को ही प्रस्तुत किया जा सका है, तब सभी खण्डों पर इसी विषय मात्र को प्रस्तुत करने के लिए तो एक नया बृहद् ग्रन्थ तैयार हो सकता है. अतः अलं अति विस्तरेण.
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लेखक–प्रो० डॉ० फूलचन्द जैन प्रेमी, निवास- अनेकान्त विद्या भवनम्, बी० २३ / ४५ पी-६, शारदानगर, खोजवाँ, संतोषी माता मन्दिर के पास,वाराणसी-२२१०१० फोन.नं०9670863335 09450179254 Email anekantif@gmail.com
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