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Antiquity of Jainism....जैन धर्म की प्राचीनता

जैन धर्म की प्राचीनता.... Antiquity of Jainism.... None can ignore the remarkably rich Jain heritage in India for over 5,000 years. The Jain and the Vedic traditions comprise the two ancient streams of religious and philosophical thought in India, the former being the older. Jain principles are radically different from mono/polytheistic faiths; Jainism, for instance, is irreligious in its denial of the concept of creation/creator and ins¬tead follows the ‘Anadi Anantam Cho’ evolutionary concept, that is, the universe has always existed and will always  exist. Nude figures, considered Rishabha, have been discovered at Mohenjodaro and Harappa. Seal motifs found there are identical to those found in the ancient Jain art at Mathura. Scholars like Radha Mookerji, Roth, Chakravarti, Ram Prasad Chanda, T.N. Ramchandran, Maha¬devan, Kamta Jain, Radhakrishnan, Hiralal Jain, Zimmer, Jacobi and Vincent Smith have all established that Jainism is anancient religion which is not a sect or sub-se...

जैन ग्रंथों का अनुयोग विभाग

जैन धर्म में शास्त्रो की कथन पद्धति को अनुयोग कहते हैं।  जैनागम चार भागों में विभक्त है, जिन्हें चार अनुयोग कहते हैं - प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग।  इन चारों में क्रम से कथाएँ व पुराण, कर्म सिद्धान्त व लोक विभाग, जीव का आचार-विचार और चेतनाचेतन द्रव्यों का स्वरूप व तत्त्वों का निर्देश है।  इसके अतिरिक्त वस्तु का कथन करने में जिन अधिकारों की आवश्यकता होती है उन्हें अनुयोगद्वार कहते हैं। प्रथमानुयोग : इसमें संयोगाधीन कथन की मुख्यता होती है। इसमें ६३ शलाका पुरूषों का चरित्र, उनकी जीवनी तथा महापुरुषों की कथाएं होती हैं इसको पढ़ने से समता आती है |  इस अनुयोग के अंतर्गत पद्म पुराण,आदिपुराण आदि कथा ग्रंथ आते हैं ।पद्मपुराण में वीतरागी भगवान राम की कथा के माध्यम से धर्म की प्रेरणा दी गयी है । आदि पुराण में तीर्थंकर आदिनाथ के चरित्र के माध्यम से धर्म सिखलाया गया है । करणानुयोग: इसमें गणितीय तथा सूक्ष्म कथन की मुख्यता होती है। इसकी विषय वस्तु ३ लोक तथा कर्म व्यवस्था है। इसको पढ़ने से संवेग और वैराग्य  प्रकट होता है। आचार्य यति वृषभ द्वारा रचित तिलोयपन...

द्रष्टाष्टक स्तोत्र

*द्रष्टाष्टक स्तोत्र* द्दष्टं जिनेन्द्रभवनं भवतापहारि भव्यात्मनां विभव-संभव-भूरिहेतु| दुग्धाब्धि-फेन-धवलोज्जल-कूटकोटी- नद्ध-ध्वज-प्रकर-राजि-विराजमानम्|1|   द्दष्टं जिनेन्द्रभवनं भुवनैकलक्ष्मी- धामर्द्धिवर्द्धित-महामुनि-सेव्यमानम्| विद्याधरामर-वधूजन-मुक्तदिव्य- पुष्पाज्जलि-प्रकर-शोभित-भूमिभागम्|2|   द्दष्टं जिनेन्द्रभवनं भवनादिवास- विख्यात-नाक-गणिका-गण-गीयमानम्| नानामणि-प्रचय-भासुर-रश्मिजाल- व्यालीढ-निर्मल-विशाल-गवाक्षजालम्|3|   द्दष्टं जिनेन्द्रभवनं सुर-सिद्ध-यज्ञ- गन्धर्व-किन्नर-करार्पित-वेणु-वीणा| संगीत-मिश्रित-नमस्कृत-धारनादै- रापूरिताम्बर-तलोरु-दिगन्तरालम्|4|   द्दष्टं जिनेन्द्रभवनं विलसद्विलोल- मालाकुलालि-ललितालक-विभ्रमाणम्| माधुर्यवाद्य-लय-नृत्य-विलासिनीनां लीला-चलद्वलय-नूपुर-नाद-रम्यम्|5|   द्दष्टं जिनेन्द्रभवनं मणि-रत्न-हेम- सारोज्ज्वलैः कलश-चामर-दर्पणाद्यैः| सन्मंगलैः सततमष्टशत-प्रभेदै- र्विभ्राजितं विमल-मौक्तिक-दामशोभम्|6|   द्दष्टं जिनेन्द्रभवनं वरदेवदारु- कर्पूर-चन्दन-तरुष्क-सुगन्धिधूपैः| मेघायमानगगने पवनाभिवात- चञ्चच्चलद्विमल-केतन-तुंग-शालम्|7|...

हमारी क्रियाएं और अध्यात्म

हमारी क्रियाएं और अध्यात्म  डॉ अनेकांत कुमार जैन २/०७/२०२० मुंडन वाले प्रसंग में मैंने जानबूझ कर मिथ्यात्व वाली टिप्पणी की थी ,उसका यह सुखद परिणाम रहा कि इतनी अच्छी चर्चा सामने आयी ,जैसा मैं चाहता था । जैन परम्परा में कई क्रियाएं मौलिक हैं किन्तु बाद में अन्य परम्परा ने उसे अपने नाम से अपना लिया ,बहुमत के फल स्वरूप वे उनके नाम से प्रसिद्ध हो गईं ।उन्होंने उस क्रिया में अपने मिथ्या परिणाम और अभिप्राय संयोजित कर दिए इसलिए जैनों ने उस रूप क्रिया को ही इस भय से छोड़ दिया कि कहीं ये हमारे सम्यक्तव में ही दोष उत्पन्न न कर दे । कालांतर में ये उन्हीं की क्रियाएं बन गईं ।  जैसे मूर्ति पूजा वैदिकों की मूल नहीं हैं , श्रमण परम्परा की है ,हमसे उनमें गई है ,लेकिन आज हमसे ज्यादा उनकी ही हो गई है ।  स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में यह स्पष्ट लिखा है कि ' मूर्ति पूजा जैसी विकृति जैनों से सनातन धर्म में अाई है । अब जब वहां मूर्ति पूजा थी ही नहीं ,तब सिंधु सभ्यता में योगी मुद्रा में बैठी मूर्ति जो कि कुछ विद्वानों ने ऋषभदेव की बतलाई है , वे शिव की बतला कर योग विद्या ...

जैनदर्शन नास्तिक नहीं, आस्तिक दर्शन है

*जैनदर्शन नास्तिक नहीं, आस्तिक दर्शन है* डॉ. शुद्धात्मप्रकाश जैन  निदेशक, क. जे. सोमैया जैन अध्ययन केन्द्र, सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय, मुम्बई                   समस्त भारतीय दर्शनों को दो विभागों में विभाजित किया गया है- आस्तिक और नास्तिक। इस विभाजन का आधार पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, लोक-परलोक, आत्मा-परमात्मा आदि के आधार पर न होकर मात्र यह परिभाषा है- ‘‘वेदनिन्दको नास्तिकः’’ अर्थात् जो वेदों को अस्वीकार करे, वह नास्तिक है, इस आधार पर जैन, बौद्ध और चार्वाक- ये तीन दर्शन नास्तिक कहे जाते हैं।                 इस सन्दर्भ में दो बातें विचारणीय हैं, जिनमें से प्रथम यह है कि- जिन वेदों और पुराणों में ऋषभदेव, अरिष्टनेमि और पाश्र्वनाथ आदि जैन तीर्थंकरों का नामस्मरण किया गया है, उन वेदों की जैनदर्शन निन्दा कैसे कर सकता है? वहां कई स्थानों पर ऋषभदेव,  उनके पुत्र भरत, अरिष्टनेमि आदि का बहुत आदर से उल्लेख किया गया है। दूसरी बात यह है कि- वेदों पर जैन अहिंसा का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। जहां जैन तीर्थं...

भारतवर्ष नामकरण - परम्परा एवं प्रमाण

भारतवर्ष नामकरण - परम्परा एवं प्रमाण (एक प्रामाणिक आलेख) डॉ शुद्धात्मप्रकाश जैन निदेशक, के जे सोमैया जैन अध्ययन केंद्र, सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय, मुम्बई भारत हमारा देश है और हम सब भारतवासी हैं. इस भारत के निवासियों को भारतीय कहा जाता है. यद्यपि हमारी भारतभूमि को प्राचीन काल से ही विविध नामों से अभिहित किया जाता रहा है, यथा-इंडिया, हिंदुस्तान हिन्दुस्तां आदि. लेकिन यह नाम हमारे देश को या तो दूसरों के द्वारा दिए गए हैं या एकांगी है, जैसे कि इस देश में प्रवाहित सिंधु नदी को इण्डस कहने के कारण इंडिया नाम दिया गया. इसी प्रकार पुराकाल में - 'स' वर्ण को 'ह'  के रूप में उच्चारित करने के कारण इसे हिन्दु कहा गया और मुस्लिम शासकों ने इसे हिन्दुस्तां कहकर पुकारा.  यह सभी नाम सर्वांगीण ना होने के कारण हमारे देश के गौरव को कम करते रहे. यही कारण है कि हमारे देश का नाम भारत ही अधिक श्रेष्ठ और गौरवपूर्ण होगा, क्योंकि इसका हमारे प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास से सीधा संबंध है. इसका सविस्तार उत्तर इस आलेख में स्पष्ट किया ही जा रहा है. आज हमारे देश को पूरे विश्व में इंडिया के नाम से जान...