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स्थानांगसूत्र में पाँच निर्ग्रन्थों का स्वरूप..एक तुलनात्मक विवेचन.

स्थानांगसूत्र में पाँच निर्ग्रन्थों का स्वरूप..एक तुलनात्मक विवेचन.                      प्रो० फूलचन्द जैन, प्रेमी- वाराणसी                 आचारांगादि द्वादशांगों में स्थानांगसूत्र ऐसा तृतीय अंग आगम है, जिसमें प्रथमानुयोग आदि चारों अनुयोगों का अक्षय ज्ञान भण्डार समाहित है। दस स्थानों (अध्ययनों) में विभक्त इस आगम में क्रमश: एक से लेकर बढ़ते हुए क्रम से दस संख्या तक का विविध विषयों का सूत्रात्मक शैली में तात्त्विक विवेचन अद्‌भुत विधि से किया गया है। इसके अध्ययन से जहाँ हमें चरम तीर्थंकर महावीर के वचनामृत का पान करने का गौरव प्राप्त होता है, वहीं हमें इसकी वाचना में सम्मिलित उन महान आचार्यों की अद्‌भुत उच्च मेधा के भी दर्शन हो जाते हैं। इसे यदि हम भारतीय ज्ञान परम्परा का विश्वकोश कहें तो अत्युक्ति नहीं होगी।     यहाँ प्रस्तुत है स्थानांग सूत्र के पंचम स्थान में वर्णित निर्ग्र्ंथों का तुलनात्मक स्वरूप विवेचन-              इसमें ( सूत्र संख्या 184 से...

जैन का शानदार इतिहास

🔥 *जैन  का शानदार इतिहास* 🔥 ♦️ जैन संस्कृति विश्व की महान एवं प्राचीन संस्कृतियों में से एक है।  👉  हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो की खुदाई में प्राप्त मुद्रा एवं उस पर अंकित ऋषभदेव का सूचक बैल तथा सील नं.449 पर स्पष्ठ रूप से जिनेश्वर शब्द का अंकन होना तथा 👉 वेदों की 141 ऋचाओं में भगवान ऋषभदेव का आदर पूर्वक उल्लेख इस संस्कृति को वेद प्राचीन संस्कृति सिद्ध करती हैं। ♦️ हमारे देश भारत वर्ष का नाम ऋषभदेव के पुत्र चक्रवर्ती भरत के नाम से विख्यात है जो कि जग जाहिर प्रमाण है। 👉 विष्णु पुराण में भी इसका ऊल्लेख मिलता है। हमारे देश के प्रधान मंत्री स्व. जवाहर लाल नेहरु ने उड़ीसा के खंडगिरी स्थित खारवेल के शिला लेख पर "भरतस्य भारत" रूप प्रशस्ति को देख कर ही इस देश का संवैधानिक नामकरण भारत किया था। ♦️ राजा श्रेणिक, सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य , कलिंग नरेश खारवेल एव सेनापति चामुंडराय जैन इतिहास के महान शासक हुए है। ♦️ जैन पुराणों के अनुसार सती चंदन बाला, मैना सुंदरी एवं रानी रेवती आदि अनेक महान सम्यकदृष्टि जैन नारीयां हुई है। 👉 नारी स्वतंत्रता के प्रतीक भगवान महावीर के चतुर्विधि संघ में कु...

संस्कृत की प्रसिद्ध सूक्तियां

संस्कृत की प्रसिद्ध सूक्तियां  ------------------- 1. संघे शक्ति: कलौ युगे। – एकता में बल है। 2. अविवेक: परमापदां पद्म। – अज्ञानता विपत्ति का घर है। 3. कालस्य कुटिला गति:। – विपत्ति अकेले नहीं आती। 4. अल्पविद्या भयंकरी। – नीम हकीम खतरे जान। 5. बह्वारम्भे लघुक्रिया। – खोदा पहाड़ निकली चुहिया। 6. वरमद्य कपोत: श्वो मयूरात। – नौ नगद न तेरह उधार। 7. वीरभोग्य वसुन्धरा। – जिकसी लाठी उसकी भैंस। 8. शठे शाठ्यं समाचरेत् – जैसे को तैसा। 9. दूरस्था: पर्वता: रम्या:। – दूर के ढोल सुहावने लगते हैं। 10. बली बलं वेत्ति न तु निर्बल : जौहर की गति जौहर जाने। 11. अतिपर्दे हता लङ्का। – घमंडी का सिर नीचा। 12. अर्धो घटो घोषमुपैति नूनम्। – थोथा चना बाजे घना। 13. कष्ट खलु पराश्रय:। – पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं। 14. क्षते क्षारप्रक्षेप:। – जले पर नमक छिड़कना। 15. विषकुम्भं पयोमुखम। – तन के उजले मन के काले। 16. जलबिन्दुनिपातेन क्रमश: पूर्यते घट:। – बूँद-बूँद घड़ा भरता है। 17. गत: कालो न आयाति। – गया वक्त हाथ नहीं आता। 18. पय: पानं भुजङ्गानां केवलं विषवर्धनम्। – साँपों को दूध पिलाना उनके विष को बढ़ाना है। 19. सर्...

अनेकांत और स्याद्वाद के संबंध में कुछ आधुनिक मनीषियों के उद्गार

  अनेकांत और स्याद्वाद के संबंध में कुछ आधुनिक मनीषियों के उद्गार जिन आधुनिक मनीषियों ने अनेकांत और स्याद्वाद प्रणाली पर मनन कर उनके संबंध में निष्पक्ष भाव से उनकी यथार्थता, उपयोगिता तथा महत्व पर जो अपने उद्गार समय—समय पर प्रकट किये है उनमें से कुछ का संकलन उन्हीं के शब्दों में निम्नलिखित है— गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज बनारस के भूतपूर्व प्रिंसिपल श्री मंगलदेवजी शास्त्री ने लिखा है कि— ‘भारतीय दर्शन के इतिहास में जैन दर्शन की एक अनोखी देन (अनेकान्त) है। यह स्पष्ट है कि किसी तत्व के विषय में कोई भी तात्विक दृष्टि एकान्तिक नहीं हो सकती, प्रत्येक तत्व में अनेकरूपता स्वाभाविक होनी चाहिये और कोई भी दृष्टि उन सबका एक साथ तात्विक प्रतिपादन नहीं कर सकती। इसी सिद्धांत को जैन दर्शन की परिभाषा में अनेकांत दर्शन कहा गया है। जैनदर्शन का तो यह आधार स्तम्भ है ही, वास्तव में इसे प्रत्येक दार्शनिक विचारधारा के लिये भी आवश्यक मानना चाहिये। बौद्धिक स्तर पर इस सिद्धांत के मान लेने पर मनुष्य के नैतिक और बौद्धिक व्यवहार में भी एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आ जाता है। चरित्र ही मानव जीवन का सार है। चरित्र के लिये ...

नागराजा मंदिर क्या एक जैन मंदिर था ?

नागराजा मंदिर क्या एक जैन मंदिर था ?  नागरकोइल का नागराजा मंदिर, जो आज सर्प देवता की पूजा का प्रमुख केंद्र बन चुका है, कभी एक प्राचीन जैन तीर्थ स्थल था। यह मंदिर दक्षिण भारत के कन्याकुमारी जिले के नागरकोइल शहर में स्थित है और यहाँ की दीवारों पर उकेरी गई जैन मूर्तियाँ इसके प्राचीन जैन इतिहास को दर्शाती हैं। हालांकि, आज इस मंदिर को मुख्य रूप से नागराजा की पूजा का केंद्र माना जाता है, लेकिन यह कई शताब्दियों पहले एक दिगंबर जैन तीर्थ स्थल था। नागराजा की पूजा के साथ इस मंदिर की दीवारों पर जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ, जिनमें से कुछ ध्यानमुद्रा में बैठी हुई हैं, आज भी मौजूद हैं। इन मूर्तियों के अस्तित्व ने इस मंदिर के जैन अतीत को उजागर किया है, जो अब हिंदू मंदिर में बदल गया है। मंदिर की दीवारों पर जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ और अन्य जैन चिह्नों की उपस्थिति यह संकेत देती है कि यह स्थान प्राचीन समय में एक प्रमुख जैन मठ या तीर्थ स्थल था। यह मंदिर शायद 8वीं-9वीं शताब्दी के आसपास स्थापित हुआ था, जब दक्षिण भारत में जैन धर्म का व्यापक प्रभाव था। इस क्षेत्र में जैन संस्कृति के प्रबल हो...

स्वर्णमय अंकित ५२ काव्य का भक्तामर महास्तोत्र

दिल्ली के चाँदनी चौक स्थित धर्मपुरा नया मंदिर , जो की आज से २२३ वर्ष प्राचीन है, जिसे सेठ हरसुख राय ने बनवाया था, वही पर १२००० प्राचीन ग्रंथों के साथ स्थित है ये स्वर्णमय अंकित ५२ काव्य का भक्तामर महा स्तोत्र ! जहाँ ये कहा जाता है कि अभी जो प्रचलित भक्तामर स्तोत्र है जिसमे ४८ काव्य है, जो की मूल भक्तामर स्तोत्र के ५२ काव्य में से ४८, ४९, ५०, ५१ काव्य को अलग करके किया है, क्युकी इन ४ काव्य में अति दिव्य शक्तियां है, देवों का साक्षात आह्रन है, जिसका कई लोग असामान्य उपयोग करने लगे थे, जिस वजह से इन्हें पृथक किया गया है ! . .

श्रुत पंचमी मनाने का कारण

*श्रुतपंचमी मनाने का कारण* 🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴 प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी को जैन समाज में, श्रुतपंचमी पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को मनाने के पीछे एक इतिहास है, जो निम्नलिखित है- श्री वर्द्धमान जिनेन्द्र के मुख से श्री इन्द्रभूति (गौतम) गणधर ने श्रुत को धारण किया। उनसे सुधर्माचार्य ने और उनसे जम्बूस्वामी नामक अंतिम केवली ने ग्रहण किया। भगवान महावीर के निर्वाण के बाद इनका काम ६२ वर्ष है।  *पश्चात १०० वर्ष में* *०१)* विष्णु, *०२)* नन्दिमित्र, *०३)* अपराजित, *०४)* गोवर्धन, *०५)* भद्रबाहु, ये पांच आर्चाय पूर्ण द्वादशांग के ज्ञाता श्रुतकेवली हुए।  *तदनंतर १८३ वर्ष मे* ग्यारह अंग और दश पूर्वों के वेत्ता से ग्यारह आचार्य हुए- *०१)* विशाखाचार्य, *०२)* प्रोष्ठिन, *०३)* क्षत्रिय, *०४)* जयसेन, *०५)* नागसेन, *०६)* सिद्धार्थ, *०७)* धृतिसेन, *०८)* विजय, *०९)* बुद्धिल, *१०)* गंगदेव जी और *११)* धर्म सेन। *तत्पश्चात २२० वर्ष में* ग्यारह अंग के पाँच पारगामी मुनि हुये *(कही कही १२३ वर्ष भी बताया जाता हैं)* *०१)* नक्षत्र, *०२)* जयपाल, *०३)* पाण्डुनाम, *०४)* ध्रुवसेन और *०५)* कंसाचार्...