यदि आप मांस का भोजन करते हैं, तो यह मनुष्यता से बाहर है. क्योंकि आप जिस भी प्राणी का मांस खायेंगे, वह प्राणी भी किसी न किसी की तो संतान होगा ही. क्या हम अपनी संतान को मार कर खा सकते हैं ? यदि नहीं, तो हमें दूसरे की संतान को मार कर खाने का क्या अधिकार है ? क्या मानव अधिकार आयोग सिर्फ मानवों के अधिकार की ही रक्षा के लिए बना है ? क्या पशु पक्षियों के अधिकारों की रक्षा की चिंता उसको नहीं करनी चाहिए. क्या पशु पक्षियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोई आयोग बनाने की हिम्मत करेगा ? सम्पूर्ण मानवता की ओर से स्वागत है उन महापुरुषों का, जो पशु पक्षियों के अधिकारों की रक्षा के लिए आयोग बनायेंगे.
Dr Amit Rai Jain के फेसबुक वाल से साभार क्या जैन मतलब बणिया होता है ? #Jain_Bania सोशल मीडिया पर चल रहे माहौल को देखते हुए मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं,कि क्या जैन का अर्थ बणिया होता है,आमतौर पर सबकी यह धारणा होती है कि जैन से आशय बणिया/वैश्य वर्ण की एक जाति है।अगर आप भी ऐसा मानते हैं तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी के शिकार है। जैन कोई जाति या वर्ण नहीं है,बल्कि यह स्वतंत्र धर्म है,इसे समझने के लिए हमें इसके इतिहास की ओर जाना पड़ेगा, जैन धर्म का अपना स्वतंत्र इतिहास है,यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना धर्म है,यहां तक कि वैदिक के भी पहले भी यहां के मूलनिवासियों का धर्म यही था,और इसके अनुयायी ही जैन थे, जिन्हें तत्कालीन समय में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता था। अधिकतर लोग जानकारी के अभाव में जैन-धर्म को वैष्णव या हिंदू से जोड़कर देखते हैं,किंतु मूलनिवासी देवता शिव और प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव एक ही पुरुष थे, यहां का धर्म ऋषभदेव का अनुयायी ही था ! अंतिम तीर्थंकर महावीर के बाद जैन-धर्म दो परंपराओं में बंट गया,दिगंबर व श्वेतांबर। दिगंबर दक्षिण भारत में अधिक प्रचार...
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