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क्या है जैन धर्म- दर्शन का अनेकांतवाद- स्याद्वाद ?

क्या है जैन धर्म- दर्शन का अनेकांतवाद- स्याद्वाद ? 
        
– प्रो. फूलचंद जैन प्रेमी, वाराणसी

अनेकांत और स्याद्वाद सिद्धांत जैन दर्शन का ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतीय ज्ञान परंपरा का प्राण है । भारत की सभी चिंतन परम्पराओं पर इसका व्यापक प्रभाव स्पष्ट दिखलाई देता है । 

किन्तु भारतीय दार्शनिक जगत् में प्राचीन काल से लेकर अब तक कुछ विद्वानों के मन में इन दो सिद्धान्तों को आग्रह रहित होकर गंभीरता से न  समझ पाने के कारण इनके विषय में आशंकायें बनती रहीं हैं। जबकि यथार्थ यह है कि यदि इन्हें और इनकी मूल  भावनाओं को विशाल हृदय की उदारता, गंभीरता और आग्रह रहित बुद्धि से समझने का प्रयास करें, तो इनकी सार्वभौमिक उपयोगिता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगे। 

अनेकांत दर्शन की व्यापकता  - 

    जैन धर्म- दर्शन ने जिस तरह  विश्वकल्याण के लिए अहिंसा सिद्धान्त को महत्वपूर्ण बतलाया है, उसी तरह दार्शनिक क्षेत्र में उदारता से काम लेते हुए वस्तु को विभिन्न दृष्टिकोणों से देखने और विचार करने के लिए प्रेरित किया और निष्पक्ष होकर विषय गत वस्तु -तत्त्व का पूर्णज्ञान प्राप्त करने का अवसर प्रदानकर विभिन्न धार्मिक, दार्शनिक, राजनैतिक,सामाजिक,
पारिवारिक तथा सम्प्रदायवाद आदि विविध क्षेत्रों के विवादों से उत्पन्न संघर्षों को दूरकर सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य किया है। साथ  ही राष्ट्रीय,अंतर्राष्ट्रीय पारस्परिक वाद-विवादों को दूर करने के लिए भी उसने इन दो अनुपम सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। 

समाधान है अनेकांत -

   जीवन व्यवहार की समता तथा अहिंसा की साधना में अनेकान्त का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह तीर्थंकर महावीर  ने अनेकांत के रूप में एक नूतन  और मौलिक दृष्टि प्रदान कर संपूर्ण जगत को अतिशय कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया  है।

     तीर्थंकर महावीर के युग में भी तीन सौ तिरेसठ मत प्रचलित थे। आज की तरह वे  सभी अपने-अपने वचनों, कथनों और मतों को ही सही तथा दूसरों को मिथ्या कहकर परस्पर विवाद और कलहपूर्ण वातावरण बनाने में  संलग्न  थे।तीर्थंकर महावीर ने अनेकान्त दृष्टि की दिव्य देशना देकर चिन्तन की एक सुव्यवस्थित एवं स्वस्थ परम्परा का सूत्रपात्र किया और  वस्तुतत्त्व की पूर्णता को जानने की  नई दृष्टि प्रदान की। क्योंकि प्रत्येक वस्तु अर्थात् द्रव्य में अनन्त धर्म और पर्यायें होती हैं, उन्हें देखने के लिए उतने ही दृष्टिकोण चाहिए।

अनेकांत की परिभाषा - 

एक ही वस्तु में वस्तुपने को निपजाने वाली परस्पर दो विरुद्ध प्रतीत होने वाली शक्तियों का एक साथ प्रकाशित होना अनेकांत कहलाता है । 

         अनेकान्त को 'अनेक' और'अंत'–इन दो शब्दों के मेल से समझाया गया है। एक वस्तु में अनेक  अन्त अर्थात् धर्म या गुण विद्यमान हैं। परन्तु इन सभी का सम्पूर्ण रूप से एक साथ कथन संभव नहीं है। इन्हें क्रमशः ही कहा जा सकता है।क्योंकि शब्दों  या वचनों द्वारा कथन की  एक सीमा होती है। इसीलिए एक बार में सम्पूर्ण सत्य सामने न आकर सत्यांश ही कहने में आता है। 

वसुधैव कुटुंबकम् की भावना है अनेकांत - 

               अपनी किसी भी बात के लिए आग्रह पूर्वक ऐसा "ही" है ,जो हम देख- समझ रहे हैं या कह रहे है, वही सही है, अन्य सब गलत हैं। इन्हें हम नहीं मानेंगे– इस तरह के दुराग्रहों से बचने के लिए 'ही' के स्थान पर"भी" के प्रयोग की अपनी विशेष सार्थकता है।क्योंकि संभावना की दृष्टि से दूसरों की बात को भी हम आदर दें, यही अनेकांत दर्शन की शैली है।

 इसमें सर्वधर्म समभाव, सौहार्द और समन्वय जैसे वसुधैव कुटुंबकम् के  मूलमंत्र की भावना सार्थक होती है। 

अत: किसी के एक पक्ष को सत्य बतलाकर और दूसरे पक्ष को झूठा या मिथ्या कहकर दूसरों के विचारों का अनादर नहीं करना चाहिए । ताकि हमारा आपसी संबंधों में सौहार्द भाव बना रहे। 
   
दुराग्रह का नाशक है अनेकांत -

आग्रह वश किसी एक ही दृष्टि से वस्तु के सत्य को देखने का अर्थ है-मात्र अपने स्वीकृत सिद्धान्त का समर्थन और दूसरों की स्वीकृतियों का खण्डन- इसी तरह के दुराग्रह ही वैचारिक हिंसा तथा अन्य अनेक दुष्प्रवृत्तियों को जन्म देते हैं। 
     इनका समाधान भी हम अनेकान्तवाद की उस भावनाओं में ढूँढ़ सकते हैं, जिसमें एक-दूसरे की भावनाओं, दृष्टिकोणों और मतों को सापेक्ष दृष्टि से समझने और उनकी कद्र (आदर) करने की बात कही गयी है।

राष्ट्रीय एकता का आधार है अनेकांत - 

    अनेकान्तवाद ने वैचारिक क्षेत्रों में फैली हिंसा को रोकने का काम किया है। ऐसा राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की दृष्टि से सदा आवश्यक भी रहा है।एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की ही नहीं, अपितु पड़ोसी राष्ट्रों में और सामाजिक जीवन में परस्पर वैर, ईर्ष्या और एक-दूसरे के विनाश की कामनाएं, परस्पर अविश्वास, आग्रह और असम्मान की भावनाएं व्याप्त रहतीं  हैं।   
     इस तरह यह अनेकान्तवाद हमें आग्रह- मुक्त वह चिन्तन दृष्टि प्रदान करता है कि सत्य न तो मेरा होता है, न पराया ही । वह सबका है और सर्वत्र हो सकता है। अनेकान्त दृष्टि के अनुसार 'जो मेरा कथन है, वही सत्य है- 'यह धारणा मिथ्या होने से विवादों को जन्म देती है, जबकि जो सत्य है, वह हमारा भी है- ऐसा कथन यथार्थ होने से यह परस्पर सद्भावना स्थापित करता है। जो व्यक्ति किसी भी वस्तु के एक ही अंश, धर्म अथवा गुण, स्वभाव को देखकर उसे एक ही स्वरूप मानता है, दूसरे स्वरूप को स्वीकार नहीं करता, उस व्यक्ति की एकान्त धारणा मानी जाती है। पर जब वही व्यक्ति अपनी दृष्टि को उदार बना लेता है और दूसरे पक्ष का भी अवलोकन करने लगता है तो उसकी दृष्टि अनेकान्तात्मक हो जाती है। इसी प्रकार अनेक धर्मात्मक वस्तु के स्वरूप का निर्णय भी सापेक्षिक दृष्टियों द्वारा ही सम्भव है।क्योंकि वस्तु में द्रव्यदृष्टि से नित्यत्व  और पर्यायदृष्टि से अनित्यत्व आदि अनेक विरोधी धर्मयुगल रहते हैं। 

एकांत पक्ष का निषेध -

    इस प्रकार सर्वथा एकान्त रूप आग्रह का त्याग कर अनेकान्त को स्वीकार करके ही वस्तु का कथन किया जा सकता है।क्योंकि वस्तु अनेक विरोधी धर्मों का समूह रूप है। इन अनेक धर्मों का निरूपण एक साथ- सम्भव नहीं है, अतः अनेक धर्मों को एक साथ जाना तो जा सकता है, किन्तु एक शब्द एक समय में अनेक धर्मों अर्थात् गुणों का कथन नहीं कर सकता है। शब्द की शक्ति वस्तु के एक ही धर्म-गुण के व्याख्यान तक सीमित है।
   वस्तुतः शब्द की प्रवृत्ति भी वक्ता के अधीन है। वस्तु केअनेक धर्मों में से वक्ता किसी एक धर्म का मुख्यता से व्यवहार करता है। क्योंकि वस्तु में अनेकधर्मता विद्यमान है। वक्ता जिस धर्म का कथन  करता है, उस धर्म का वह किसी दृष्टिविशेष से प्रतिपादन कर देता है। एक ही दृष्टि से प्रत्येक वस्तु विवेच्य नहीं हो सकती है।
    जैसे किसी व्यक्ति विशेष को कोई एक ही समय में उसका पिता भी बुलाता है और पुत्र भी। पिता उसे पुत्र कहकर और पुत्र उसे पिता कहकर बुलाता है।  यहाँ वह व्यक्ति न केवल पिता ही है, न केवल पुत्र ही, किन्तु वह पिता भी है और पुत्र भी है । 
  अतएव पिता की दृष्टि से उस व्यक्ति का पुत्रत्व धर्म मुख्य है और शेष धर्म गौण हैं और पुत्र की दृष्टि से उस व्यक्ति  में पितृत्व धर्म मुख्य है और शेष धर्म गौण हैं। क्योंकि अनेक धर्मात्मक वस्तु में से जिस धर्म या गुण के कथन की विवक्षा या अपेक्षा अर्थात् जरूरत होती है, उस धर्म या गुण का कथन मुख्य कहलाता है और उसके इतर अर्थात् अन्य धर्म या गुण गौण रहते हैं। इसीलिए वस्तु अनेकान्तात्मक है या अनन्तसहभावी गुणों और अनन्तक्रमभावी पर्यायों का समूह है। 

विचार शुद्धि का आंदोलन है अनेकांत -

   वस्तुत: विचारशुद्धि और सत्यता के लिए यह आवश्यक है कि वस्तु की अनन्तधर्मता और अपनी संकुचित शक्ति का भान  अर्थात् ज्ञान हमें रहे। क्योंकि हम मात्र अपने ही विचार, दृष्टिकोण या अभिप्राय को पूर्णतया सत्य मानने का दावा या दम्भ नहीं कर सकते। इसीलिए अनेकान्त दर्शन ही विचार शुद्धि का वास्तविक आधार है, इसी की मंगलमय ज्योति में हम ज्ञान के अहंकार और उस अहंकार से उत्पन्न होने वाली बुराईयों और विनाशकारी प्रवृत्तियों के त्याग से सामाजिक, पारिवारिक, राजनैतिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता सुरक्षित रखने में सक्षम हो सकते हैं।
    अनेकान्त दृष्टि संपन्न व्यक्ति यह विचारता है कि किसी वस्तु या पदार्थ में एक मात्र वही गुणधर्म नहीं है, जिसे मैं जानता और मानता हूँ ,अपितु दूसरा व्यक्ति उसमें जिस अन्य  दूसरे गुण की विद्यमानता (मौजूदगी) बता रहा है, वह भी उस वस्तु में है।    
     भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण (पॉइन्ट आफ व्यू) से पदार्थों को जानकर कुछ मत-मतान्तर अपने एकांगी ज्ञान को ही आग्रह पूर्वक पूर्ण सत्य मानकर दूसरे मत के सिद्धान्त को असत्य बतलाते हुए परस्पर वाद-विवाद करते हैं। और वे एकान्त हठ पकड़कर दूसरे को मिथ्या  और मात्र अपने को सत्य समझने की भूल कर बैठते हैं।   
   इसीलिए अनेकान्तवाद में आग्रह, दुराग्रह, स्वार्थ या विवाद का कोई स्थान है ही नहीं। लड़ाई चाहे व्यक्ति-व्यक्ति के बीच हो या परस्पर दो या अधिक राष्ट्रों के बीच की हो, इसके मूल में उसका अहंकार ही कार्य करता है। इसी ‘अहं' से आग्रह बुद्धि उत्पन्न होती है। इन्हीं आग्रहों या एकान्तों से राग-द्वेष, कलह और साम्प्रदायिक उन्माद उत्पन्न होते हैं, जो किसी भी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के लिए कलंक ही नहीं, अपितु घोर दुःखदायी ही है। अत: इस 'अहं' का विसर्जन अनेकान्तवाद की प्रथम एवं श्रेष्ठ जीत हो सकती है। इससे मनुष्य में सद्विचार का आविर्भाव होता है और पूर्वाग्रह अथवा एकान्त हठवाद का अन्त हो जाता है।

समस्त विरोधों का नाशक है अनेकांत - 

  अनेकान्तवाद ने उत्पन्न संघर्षों को दूरकर सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य किया।इसीलिए इसकी महत्ता को समझते हुए पुरुषार्थसिद्धयुपाय ग्रंथ में आचार्य अमृतचंद्र सूरी ने कहा है–
परमागमस्य बीजं,
निषिद्धजात्यन्धसिन्धुरविधानम् । 
सकलनयविलसिताना,
विरोधमथनं नमाम्यनेकान्तम् ।।
नेत्र के समान जो त्रिलोकवर्ती पदार्थों को जानने वाला है, समस्त नयाँ एक ज्ञानों) के पारस्परिक विरोध को दूर करने वाला है, ऐसे अनेकान्तवाद  को मैं नमस्कार करता हूँ।     

अहिंसा और अनेकांतवाद –

   जैन धर्म- दर्शन का विश्वास है कि जब तक दृष्टि में समीचीनता नहीं आएगी ,तब तक मतभेद और संघर्ष बना ही रहेगा। नए दृष्टिकोण से वस्तुस्थिति तक पहुँचना ही विसंवाद से हटाकर जीवन को संवादी बना सकता है। जैन दर्शन की भारतीय संस्कृति को यही देन है। आज हमें जो स्वातन्त्र्य के दर्शन हुए हैं, वह इसी अहिंसा का पुण्यफल है। कोई यदि विश्व में भारत का मस्तक ऊँचा रख़ सकता है तो यह निरुपाधि वर्ण, जाति, रंग, देश आदि की क्षुद्र उपाधियों से रहित अहिंसा भावना ही है। आचार्य समन्तभद्र ने कहा है— 
अहिंसा भूतानां जगति विदितं ब्रह्म परमम् -अर्थात् वास्तव में अहिंसा परमात्मस्वरूप है, अहिंसा वीतरागमय आत्मा का स्वभाव है, इससे उनका आशय यह प्रतीत होता है कि अहिंसा ब्रह्म के 
समान शुद्ध है। चैतन्य स्वरूप मनुष्य को परमात्मा होने की क्षमता अहिंसा द्वारा प्राप्त होती है अथवा अहिंसा की उपासना परमेश्वर की उपासना है। अहिंसा में राग-द्वेष का अभाव है और रागद्वेष रहित परिणति ही वीतरागता है, यह वीतराग भाव ब्रह्म-परब्रह्म-प्राप्ति का मार्ग है। 

   अतः अहिंसा का यशोवर्णन इह-पर उभयलोक के श्रेयः साधन में अनुपम है। सच्चे अहिंसक की उपस्थिति में हिंसा के भाव लुप्त हो जाते हैं। प्राणिदया, समभाव तथा आत्मशांति की प्राप्ति अहिंसा द्वारा सम्भव है। अहिंसा से दया, करुणा विश्वमैत्री तथा प्राणीमात्र के प्रति समत्व का विचार उत्पन्न होता है। यह आचार का निरवद्य मार्ग है। इसमें घृणा, द्वेष, असन्तोष तथा परपीड़ा को अणुमात्र भी स्थान नहीं । अनेकान्त दर्शन इस अहिंसा को पुष्ट करने वाली विचारधारा है।
    
अहिंसक दृष्टि का आधार - 

      जैन धर्म - दर्शन ने भारतीय संस्कृति और समाज के  कल्याणार्थ मानस शुद्धि के लिए अनेकांतवाद और वाचनिक शुद्धि के लिए स्याद्वाद सिद्धांत जैसी निधियाँ अहिंसा की परिपूर्णता और स्थायित्व के लिए  प्रदान की हैं।  साथ ही  सर्वांगीण अहिंसा की साधना का वैयक्तिक और सामाजिक दोनों प्रकार का प्रत्यक्षानुभूत मार्ग बताया है। उसने पदार्थों के स्वरूप का यथार्थ निरूपण तो किया ही, साथ ही पदार्थों के देखने का, उनके ज्ञान करने का और उनके स्वरूप को वचन से कहने का नया वस्तुस्पर्शी मार्ग बताया। 
  इस अहिंसक दृष्टि से यदि भारतीय दर्शनकारों ने वस्तु का निरीक्षण किया होता तो विवाद का कहीं कोई  स्थान नहीं होता। इसीलिए प्रत्येक युग में  अहिंसक सन्त समन्वय दृष्टि, समता भाव और सर्वांगीण अहिंसा का सन्देश देते आए हैं। 
     यह जैन दर्शन की ही विशेषता है जो वह अहिंसा की तह तक पहुँचने के लिए केवल धार्मिक उपदेश तक ही सीमित नहीं रहा अपितु वास्तविक स्थिति के आधार से दार्शनिक युक्तियों को सुलझाने की मौलिक दृष्टि भी खोज सका। न केवल दृष्टि ही किन्तु मन वचन और काय – इन तीनों द्वारों से होने वाली हिंसा को रोकने का प्रशस्ततम मार्ग भी उपस्थित कर सका।
   इस प्रकार जहां अहिंसा और अनेकांत-दर्शन चित्त में समता, मध्यस्थभाव, वीतरागता, निष्पक्षता का उदय करता है, वहां स्याद्वाद वाणी में निर्दोषता आने का पूरा अवसर देता है। 
   
अनेकान्तवाद की कथन शैली है स्याद्वाद - 

   अनेकान्तमयी उदार और निष्पक्ष दृष्टिकोण द्वारा वस्तु तत्त्व को आग्रहविहीन वाणी द्वारा प्रकट करने की प्रणाली को जैनदर्शन में स्याद्वाद कहा गया है।
  वास्तविकता तो यह है कि जब पदार्थों में अनेक धर्मों का अस्तित्व विद्यमान है तो उसका निषेध कैसे किया जा सकता है? अनेकान्तदर्शन इसी सद्भूत मान्यता पर आधारित है। उस अनेकान्त को व्यक्त करने की विधि का नाम स्याद्वाद है।यह विचारों की प्रांजलता, दर्शन की व्यापकता तथा सहिष्णुता को प्रसारित कर समन्वय मार्ग को प्रशस्त करता है। 
      स्याद्वाद सिद्धांत में  स्यात् विधिपरक अव्यय है। स्यात् जिसका अर्थ कथंचित् (किसी एक अपेक्षा या दृष्टिकोण से) होता है, इन अनेक धर्मों की अभिव्यक्ति में साहाय्यकारी होता है।वस्तुतः एकवाक्यता में जब वस्तु के अनेक धर्मों का कथन नहीं किया जा सकता, तब उनके निर्वचन व्यवहार को अबाधित करने के लिए स्यात् पद की योजना सहायक सिद्ध होती है। जैसे— यह मणि है, प्रकाशमान है, शुक्लवर्ण, बहुमूल्य है आदि । मणिगत इन स्वधर्मों को भी युगपत् (एक साथ ) कहना शक्य नहीं। 
     इस तरह वस्तु मूलतः अनन्तधर्मात्मक है। उसमें विभिन्न दृष्टियों से विभिन्न विवक्षाओं से अनन्त धर्म हैं। जैसे स्यादस्ति घटःमें -घट(घड़ा)है ही,अपने द्रव्य क्षेत्र काल भाव की मर्यादा से। जिस प्रकार घट में स्वचतुष्टय की अपेक्षा अस्तित्व धर्म है, उसी तरह घटव्यतिरिक्त अन्य पदार्थों का नास्तित्व भी घट में है। क्योंकि प्रत्येक धर्म (वस्तु के गुण) का विरोधी धर्म भी दृष्टिभेद से वस्तु में सम्भव है l यदि  घड़े से भिन्न पदार्थों का नास्तित्व घड़े में न पाया जाय तो घड़ा  और अन्य पदार्थ मिलकर एक हो जाएँगे । अतः घट स्यादस्ति और स्यान्नास्ति रूप है।
     जैसे स्यात् यह मनुष्य काला है। इस पद में स्यात् पद होने से मनुष्य शरीर के और विभिन्न गुण (जैसे रक्त लाल है, हड्डी सफेद है) वक्ता के विवक्षित विषय न होने से गौण हो जाते हैं और विवक्षित (अभी कहा जाने वाला) काला रंग मुख्य हो जाता है । इस प्रकार स्यात् पद सुनिश्चित वाचक है और अपेक्षा को लिये हुए है, संशयवाचक नहीं है।   
        वस्तुतः बोलते समय वक्ता को सदा यह ध्यान रहना चाहिए कि वह जो बोल रहा है, उतनी ही वस्तु नहीं है किन्तु बहुत बड़ी है, उसके पूर्णरूप तक शब्द नहीं पहुँच सकते। इसी भाव को जताने के लिए वक्ता स्यात् शब्द का प्रयोग करता है। स्यात् शब्द अपने वक्तव्य को निश्चित रूप में उपस्थित करता है, न कि संशय रूप में ।     
      इस तरह सापेक्षता ही स्याद्वाद का रहस्य है। इसी के द्वारा सत्य का ज्ञान और निरूपण हो सकता है, जो कि किसी भी राष्ट्र के प्रजातंत्र, जनतंत्र या गणतंत्र की रीढ़ है। इसीलिए जैनदर्शन ने अनेकान्त और स्याद्वाद सिद्धान्त के फलितार्थ सिद्धान्त के रूप में सर्वोदय की भावना को प्रसारित करने पर बल दिया। मात्र मनुष्य के ही नहीं, अपितु संसार के सम्पूर्ण प्राणि जगत के अभ्युदय का नाम ही सर्वोदय है।इसी कारण तीर्थंकर महावीर के धर्मतीर्थ को भी आचार्य समंतभद्र स्वामी ने तीर्थंकर महावीर के धर्मशासन को "सर्वोदयं तीर्थमिदम् त्वयीय" कहकर,उसे सर्वोदय तीर्थ नाम से संबोधित भी   किया  है। क्योंकि सर्वोदय का यह सूर्य किसी एक के घर को नहीं, अपितु सभी के घरों को निष्पक्षभाव से प्रकाश देता है। जरूरत है अपने घर रूपी मन के दरवाजे, खिड़कियाँ खुली रखें।

  स्याद्वाद का रहस्य  -

सापेक्षता ही स्याद्वाद का रहस्य है। जहां अनेकांत दर्शन चित्त में समता, मध्यस्थभाव, वीतरागता, निष्पक्षता का उदय करता है, वहां स्याद्वाद वाणी में निर्दोषता आने का पूरा अवसर देता है। इसी के द्वारा सत्य का ज्ञान और निरूपण हो सकता है, जो कि किसी भी राष्ट्र के प्रजातंत्र, जनतंत्र या गणतंत्र की रीढ़ है। 

     वस्तुत: सत्य का सूरज किसी एक के घर को नहीं, अपितु सभी के घरों को निष्पक्षभाव से प्रकाश देता है। जरूरत है अपने घर रूपी मन के दरवाजे, खिड़कियाँ खुली रखें।  इसी प्रकार उनके अनेकांत सिद्धान्त को समन्वय और सह-अस्तित्व के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण माना गया है । 



            *******
संपर्क :
प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी 
(राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित)
पूर्व जैनदर्शन विभागाध्यक्ष, 
श्रमण विद्या सङ्काय,
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी

पता –‘अनेकान्त विद्या भवन’, बी- 23/45, पी-6,
शारदनगर कॉलोनी, खोजवाँ, वाराणसी – 221010
ईमेल –anekantjf@gmail.com, 
मो. 9450179254
9686703335,

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