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आचार्य वादीभसिंह कृत क्षत्रचूड़ामणि ग्रन्थ से संकलित सूक्ति संग्रह

आचार्य वादीभसिंह कृत क्षत्रचूड़ामणि ग्रन्थ से संकलित सूक्ति संग्रह

सूक्ति
अर्थ
१. अकुतोभीतिता भूमेर्भूपानामाज्ञयान्यथा।३/४२ ॥ राजाओं की आज्ञा से भूमण्डल पर कहीं से भी भय नहीं रहता।
२. अङ्गजायां हि सूत्यायामयोग्यं कालयापनम् ।।३/३८ ।। कन्या के जवान हो जाने पर विवाह के बिना काल बिताना अनुचित है।
३. अङ्गार सदृशी नारी नवनीत समा नराः ।।७/४१ ।। स्त्री अंगारे के समान तथा पुरुष मक्खन के समान हैं।
४. अजलाशयसम्भूतममृतं हि सतां वचः ।।२/५१ ।। सज्जनों के वचन जलाशय के बिना ही उत्पन्न हुए अमृत के समान हैं।
५. अञ्जसा कृत पुण्यानां न हि वाञ्छामि वञ्चिता ।।८/६७।। सच्चे पुण्यवान पुरुषों की इच्छा भी विफल नहीं होती।
६.अतर्क्यं खलु जीवानामर्थसञ्चय कारणम् ।।३/१२।। मनुष्यों के धन संचय का कारण कल्पनातीत है।
७. अतर्क्यसम्पदापद्भ्यां विस्मयो हि विशेषतः ।।१०/४६।। अकस्मात् सम्पत्ति और विपत्ति के आने से विशेषरूप से आश्चर्य होता है।
८.अत्यक्तं मरणं प्राणैः प्राणिनां हि दरिद्रता ।।३/६ । दरिद्रता मनुष्य के लिए प्राणों के निकले बिना ही जीवित मरण है।
९. अत्युत्कटो हि रत्नांशुस्तज्ज्ञवेकटकर्मणा ।।११/८४ ।। चमकदार रत्न को शाण पर चढ़ाकर उसे और घिसने से वह और अधिक चमकदार हो जाता है।
१०. अदोषोपहतोऽप्यर्थ: परोक्त्वा नैव दूष्यते ।।४/४६ ।। निर्दोष पदार्थ किसी के कहने से ही दूषित नहीं हो जाता।
११. अदृष्टपूर्वदृष्टौ हि प्रायेणोत्कण्ठते मनः।।७/६२।। मनुष्य का मन पहले नहीं देखी हुई वस्तु को देखने में प्रायः उत्कण्ठित रहता है।
१२. अन्यैरशङ्कनीया हि वृत्तिर्नीतिज्ञगोचरा: ।९/१०। नीतिज्ञ लोगों के व्यवहार में दूसरों को शंका नहीं होती ।
१३. अनवद्या सती विद्या फलमूकापि किं भवेत् ।।९/९ ।। निर्दोष और समीचीन विद्या कभी भी निष्फल होती है क्या ?
१४. अनवद्या सती विद्या लोके किं न प्रकाशते ।।४/१९।। १. लोक में उत्तम एवं निर्दोष विद्या प्रसिद्ध नहीं होती है क्या ? २. लोक में उत्तम एवं निर्दोष विद्या किसको प्रकाशित नहीं करती ?
१५. अनवद्या हि विद्या स्याल्लोकद्वयफलावहा ।।३/४५ ।। निर्दोष विद्या इस लोक और परलोक में उत्तम फल देनेवाली होती है।
१६. अनपायादुपायाद्धि वाञ्छिताप्तिर्मनीषिणाम् ।।९/७।। बुद्धिमानों को इच्छित वस्तु की प्राप्ति अमोघ उपायों से होती है।
१७. अनुनयो हि माहात्म्यं महतामुपबृंहयेत् ।।८/५२।। विनय भाव महापुरुषों की महानता को बढ़ाता है।
१८. अनुरागकृदज्ञानां वशिनां हि विरक्तये ।।७/३६।। मूर्खो को प्रिय लगनेवाली वस्तु जितेन्द्रिय पुरुषों को विराग के लिए होती है।
१९. अनुसारप्रियो न स्यात्को वा लोके सचेतनः ।।७/७२ ।। दुनिया में कौन प्राणी अपने अनुकूल व्यक्ति से प्रेम नहीं करता ?
२०. अन्तस्तत्त्वस्य याथात्म्ये न हि वेषो नियामकः ।।९/२१।। बाह्य वेश अन्तर्मन की यथार्थता का नियामक नहीं है।
२१. अन्यरोधि न हि क्वापि वर्तते वशिनां मनः ।।९/२।। जितेन्द्रिय पुरुषों का मन/विचार दूसरों से रुकने वाला नहीं होता।
२२. अन्याभ्युदयखिन्नत्वं तद्धि दौर्जन्यलक्षणम् ।।३/४८ ।। दूसरे की उन्नति में जलना ही दुर्जनता का लक्षण है।
२३. अन्तिकं कृतपुण्यानां श्रीरन्विष्य हि गच्छति ।।३/४६ ।। लक्ष्मी पुण्यवान पुरुषों को खोजती हुई स्वयं उनके पास चली जाती है।
२४. अन्यैरशङ्कनीया हि वृत्तिर्नीतिज्ञगोचरा: ।।९/१० ।। नीतिज्ञ लोगों के व्यवहार में किन्हीं को भी शंका नहीं होती।
२५. अपथघ्नी हि वाग्गुरोः ॥२/४०।। गुरु के वचन कुमार्ग के नाशक होते हैं।
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सूक्ति
अर्थ
२६. अपदानमशक्तानामद्भुताय हि जायते ।।७/६५।। स्वयं के लिए अशक्य कार्य दूसरों द्वारा कर दिया जाना असमर्थ लोगों को आश्चर्य के लिए होता है।
२७. अपदोषानुषङ्गा ही करुणा कृति सम्भवा ।।७/३४। विद्वानों की करुणा निर्दोष होती है।
२८. अपश्चिमफलं वक्तुं निश्चितं हि हितार्थीनः ।।७/५४। दूसरों का हित चाहनेवाले सज्जन पुरुष निश्चित रूप से सर्वोत्तम फलदायक बात (तत्वज्ञान) ही कहना चाहते है।
२९. अपुष्कला हि विद्या स्यादवज्ञैकफला क्वचित् ।।३/४४। अपूर्ण ज्ञान अपमान का फल देनेवाला होता है।
३०. अप्राप्ते हि रुचि: स्त्रीणां न तु प्राप्ते कदाचन ।।७/२५।। स्त्रियों की रुचि अप्राप्त पुरुष में होती है, सहज प्राप्त पति में नहीं।
३१. अमित्रो हि कलत्रं च क्षत्रियाणां किमन्यत् ।।८/५९ ।। क्षत्रियों (राजाओं) के लिए अपनी स्त्री ही शत्रु हो जाती है तो अन्य लोगों की तो बात ही क्या ?
३२. अमूलस्य कुत: सुखम् ।।१/१७।। मूल हेतु के बिना सुख कैसे हो सकता है?
३३. अमूलस्य कुत: स्थितिः ।।२/३३।। जड़रहित वृक्ष की स्थिति कैसे सम्भव है?
३४. अम्बामदृष्टपूर्वां च द्रष्टुं को नाम नेच्छति ।।८/४९ ।। ऐसा कौन व्यक्ति है जो पूर्व में न देखी गई माँ को देखने की इच्छा नहीं करता?
३५. अयुक्तं खलु दुष्टं श्रुतं वा विस्मयावहम् ।।८/७।। जब मनुष्य अनहोनी/असम्भव जैसी वस्तु को देखता है या सुनता है, तब उसे आश्चर्य होता है।
३६. अलङ्घयं हि पितुर्वाक्यमपत्यैः पथ्यकांक्षिभिः ।।५/१०।। अपना हित चाहनेवाले पुत्र पिता की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करते।
३७. अलं काकसहस्रेभ्य एकैव हि दृषद् भवेत् ।।३/५१ ।।। हजारों कौओं को उड़ाने के लिए एक ही पत्थर पर्याप्त होता है।
३८.अवश्यं हानुभोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ।।१/१०४ ।। पूर्व में बाँधा हुआ शुभाशुभ कर्म अवश्य ही भोगना पड़ता है।
३९. अविचारितरम्यं हि रागान्धानां विचेष्टितम् ।।१/१३ । राग से अन्धे पुरुषों की चेष्टायें बिना विचार के ही अच्छी लगती हैं।
४०. अविवेकिजनानां हि सतां वाक्यमसङ्गतम् ।।९/१७।। अविवेकी लोगों के लिए सज्जनों के वचन असंगत लगते हैं।
४१. अविशेषपरिज्ञाने न हि लोकोऽनुरज्यते ।।१०/५८ ।। छोटे-बड़े सभी को समान मानने पर जनसमुदाय सन्तुष्ट नहीं हो सकता।
४२. अशक्तैः कर्तुमारब्धं सुकरं किं न दुष्करम् ।।७/६३।। असमर्थ मनुष्य को सरल काम भी कठिन लगता है।
४३. असतां हि विनम्रत्वं धनुषामिव भीषणम् ।।१०/१४ ।। दुर्जनों की नम्रता धनुष की तरह भयंकर होती है।
४४. असमानकृतावज्ञा पूज्यानां हि सुदुःसहा ।।२/६३ ।। छोटे लोगों द्वारा किया गया अपमान बड़े लोगों को असह्य होता है।
४५. असुमतामसुभ्योऽपि गरीयो हि भृशं धनम्।।२/७२। मनुष्यों को धन अपने प्राणों से भी प्यारा होता है।
४६. अस्वप्नपूर्वं हि जीवानां न हि जातु शुभाशुभम् ।।१/२१।। मनुष्यों को स्वप्न देखे बिना शुभ और अशुभ कार्य नहीं होता।
४७. अहो पुण्यस्य वैभवम् ।।२/२२ ।। पुण्य का वैभव आश्चर्यजनक होता है।
‘आ’

सूक्ति
अर्थ
४८. आत्मदुर्लभमन्येन सुलभं हि विलोचनम् ।१०/३।। अपने लिए दुष्प्राप्य वस्तु दूसरे को सहजता से मिल जाए तो मनुष्य को आश्चर्य होता है।
४९. आत्मनीने विनात्मनमञ्जसा न हि कश्चन ।।१०/३१ ।। वास्तव में अपने को छोड़कर अन्य कोई अपना हित करनेवाला नहीं है।
५०. आमोहो देहिनामास्थामस्थानेऽपि हि पातयेत् ।।१०/२४।। जबतक मोह है, तबतक वह जीवों को अस्थान में भी प्रवृत्ति कराता है।
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सूक्ति
अर्थ
५१. आराधनैकसम्पाद्या विद्या न ह्यन्यसाधना ।।७/७४ ।। विद्या, गुरु की आराधना करने से ही प्राप्त होती है; अन्य साधनों से नहीं ।
५२. आलोच्यात्मरिकृत्यानां प्राबल्यं हि मतो विधि:।।१०/१८।। शत्रु को अपने से अधिक बलवान जानकर ही युद्ध की तैयारी करना चाहिए।
५३. आवश्यकेऽपि बन्धूनां प्रातिकूल्यं हि शल्यकृत् ।।८/५१।। आवश्यक कार्य होने पर इष्टजनों की प्रतिकूलता काटें के समान चुभती है।
५४. आशाब्धि: केन पूर्यते।।२/२० ॥ आशारूपी समुद्र को कौन भर सकता है?
५५. आश्रयन्तीं श्रियं को वा पादेन भुवि ताडयेत् ।।६/५० ।। अपने आप प्राप्त होती हुई लक्ष्मी को कौन लात मारता है ?
५६. आ समाहितनिष्पत्तेराराध्या: खलु वैरिण: ।।७/२२ ।। अपने अभीष्ट की सिद्धि तक शत्रु भी आराध्य होते हैं।
५७. आस्थायां हि विना यत्नमस्ति वाक्कायचेष्टितम् ।।८/९।। प्रेम होने पर प्रयत्न किये बिना ही वचन और शरीर की प्रवृत्ति होती है।
५८. आस्था सतां यश:काये न हास्थायिशरीरके।।१/३७ ।। सज्जन पुरुषों की श्रद्धा यशरूपी शरीर में होती है, नश्वर शरीर में नहीं।
‘इ’

सूक्ति
अर्थ
५९. इष्टस्थाने सती वृष्टिस्तुष्टये हि विशेषतः ।।४/४१ ।। इष्ट स्थान में होनेवाली वर्षा विशेष आनन्द देनेवाली होती है।
‘ई’

सूक्ति
अर्थ
६०. ईर्ष्या ही स्त्रीसमुद्भवा ।।४/२६।। ईर्ष्या स्त्रियों से उत्पन्न हुई है।
‘उ’

सूक्ति
अर्थ
६१. उक्तिचातुर्यतो दाढच्र्यमुक्तार्थे हि विशेषतः ।।९/२७ ।। कथन की चतुराई से कहे हुए विषय में विशेष दृढ़ता आती है।
६२. उत्पथस्थे प्रबुद्धानामनुकम्पा हि युज्यते ।।७/६१ ।। मिथ्यामार्ग पर चलनेवाले मनुष्यों पर बुद्धिमानों की कृपा उचित ही है।
६३. उदात्तानां हि लोकोऽयमखिलो हि कुटुम्बकम् ।।२/७० ।। उदार चरित्रवालों को सम्पूर्ण विश्व कुटुम्ब के समान है।
६४. उदाराः खलु मन्यन्ते तृणायेदं जगत्रयम् ।।७/८२ ।। उदारचित्त महापुरुष तीन लोक की संपत्ति को त्रण के समान तुच्छ मानते हैं।
६५. उपायपृष्ठरूढा हि कार्यनिष्ठानिरड्कुंशाः ।।१०/२३ । उत्तम उपाय में तत्पर पुरुष कार्य को नियम से सिद्ध करते हैं।
‘ए’

सूक्ति
अर्थ
६६. एककण्ठेषु जाता हि बन्धुता ह्यवतिष्ठते ।।८/३५ ।। एकसमान व्यवहार करनेवालों में ही मित्रता स्थिर रहती है।
६७. एककोटिगतस्नेहो जडानां खलु चेष्टितम् ।।८/३१ ।। इकतरफा प्रीति करना मूर्खो की चेष्टा है।
६८. एकार्थस्पृहया स्पर्धा न वर्धेतात्र कस्य वा ।।४/१६ ।। एक ही पदार्थ की इच्छा होने से किसके स्पर्धा नहीं बढ़ती ?
६९. एतादृशेन लिङ्गेन परलोको हि साध्यते ।।४/३९ ।। प्रशंसात्मक बातों से अन्य मनुष्य वश में किये जाते हैं।
७०. एधोगवेषिभिर्भाग्ये रत्नं चापि हि लभ्यते ।।८/३० ।। भाग्योदय होने पर लकड़हारे को भी रत्न की प्राप्ति हो जाती है।
७१. एधोन्वेषिजनैर्दृष्ट: किं वान प्रीतये मणिः ।।१/९६ ।। ईधन तलाशनेवाले मनुष्यों द्वारा देखी गई माणिक्य प्रसन्नता के लिए नहीं होती ?
‘ऐ’

सूक्ति
अर्थ
७२. ऐहिकातिशयप्रीतिरतिमात्रा हि देहिनाम् ।।९/३ ।। मनुष्य को सांसारिक उत्कर्ष में ही अधिक प्रेम होता है।
‘क’

सूक्ति
अर्थ
७३. कः कदा कीदृशो न स्याद्भाग्ये सति पचेलिमे ।।७/२९।। भाग्य को उदय होने पर कौन, कब और कैसा मकान बनेगा - यह कह नहीं सकते।
७४. कणिशोद्गमवैधुर्ये केदारादिगुणेन किम् ।।११/७५ ।। पौधों में अन्नोत्पत्ति की सामर्थ्य न होने पर खेत आदि सामग्री अच्छी होने से भी क्या प्रयोजन ?
७५. करुणामात्रपात्रं हि बाला वृद्धाश्च देहिनाम् ।९/८। बालक तथा वृद्ध मात्र दया के पात्र होते हैं।



सूक्ति
अर्थ
७६. काकार्थफलनिम्बोऽपि श्लाघ्यते न हि चूतवत् ।।३/९ ।। कौए के लिए नीम का वृक्ष आम के वृक्ष के समान प्रशंसनीय नहीं होता।
७७. काचो हि याति वैगुण्यं गुण्यतां हारगो मणि:।।११/२। हार में स्थित मणि ही शोभा को प्राप्त होती है, काँच नहीं।
७८. कारणे जृम्भमाणेऽपि न हि कार्यपरिक्षयः ।।११/७२ ।। कारण के विद्यमान रहने पर कार्य का विनाश नहीं होता।
७९. कालातिपातमात्रेण कर्तव्यं हि विनश्यति।११/७। कार्य करने का उचित समय निकल जाने पर कार्य बिगड़ जाता है।
८०. कालायसं हि कल्याणं कल्पते रसयोगतः ।।४/९ ।। रसायन के प्रभाव से लोहा भी सोना बन जाता है।
८१. किं पुष्पावचयः शक्यः फलकाले समागते ।।१/३६।। फलोत्पत्ति का काल आने पर क्या फूलों की प्राप्ति सम्भव है?
८२. किं न मुञ्चन्ति रागिणि ।।१/७२ ।। विषयासक्त मनुष्य क्या-क्या नहीं छोड़ देते हैं ?
८३. किं गोष्पदजलक्षोभी क्षोभयेज्जलधेर्जलम् ।।२/५३ ।। गाय खुर-प्रमाण जल को तरंगित करनेवाला छोटा-सा मेंढक क्या समुद्र के जल को तरंगित कर सकता है ?
८४. किं स्यात्किं कृतं इत्येवं चिन्तयति हि पीडिता:।।२/६६ ।। कौन-सा कार्य किस फल के लिए होगा - पीड़ित लोग यही विचार करते हैं।
८५. कुत्सितं कर्म किं किं वा मत्सरिभ्यो न रोचते ।।४/१८ ।। ईर्ष्या करने वालों को कौन-कौन से खोटे कार्य अच्छे नहीं लगते ?
८६. कूपे पिपतिषुर्बालो न हि केनाऽप्युपेक्षते ।।६/९।। कुएँ में गिरते हुए बालक की कोई भी उपेक्षा नहीं करता।
८७. क्रूराः किं किं न कुर्वन्ति कर्म धर्मपराङ्गखा: ।।४/४।। धर्म से परांगमुख क्रूर पुरुष क्या-क्या खोटे कार्य नहीं करते ?
८८. कृतार्थानां हि पारार्थ्यमैहिकार्थपराङ्गुखम्।।७/७६।। परोपकारी पुरुषों का परोपकार इस लोक सम्बन्धी प्रयोजनों से रहित होता है।
८९. कृतिनोऽपि न गण्या हि वीतस्फीतपरिच्छदाः ।।८/३२ ।। पुण्यवान पुरुषों को समृद्धि-परिवार आदि से रहित नहीं समझना चाहिए।
९०. कृत्याकृत्यविमूढा हि गाढस्नेहान्धजन्तवः ।।२/७३ ।। अति स्नेह से अन्धे पुरुष कर्तव्य-अकर्तव्य के विचार से रहित होते हैं।
९१. कोऽनन्धो लङ्घयेद्गुरुम् ।।२/३९ । कौन ज्ञानवान शिष्य गुरु के आदेश का उल्लंघन करेगा?
९२. क्वचित्किमपि सौजन्यं नो चेल्लोकः कुतो भवेत् ।।४/३४।। यदि संसार में कहीं पर भी सज्जनता न रहे तो संसार कैसे चलेगा ?
९३. क्व विद्या पारगामिनी ।।१०/२५।। विरले व्यक्ति ही परिपूर्ण विद्या के धारी होते हैं।
‘ख’

सूक्ति
अर्थ
९४. खाताऽपि हि नदी दत्ते पानीयं न पयोनिधि: ।।१०/५३ ।। सूख जाने पर भी खोदी हुई नदी ही प्यासों को मीठा जल देती है, समुद्र नहीं।
‘ग’

सूक्ति
अर्थ
९५. गतेर्वार्ता हि पूर्वगा ।।१०/१७ ।। समाचारों की गति अति तेज होती है, वे मनुष्य के पहुँचने के पूर्व ही दूर तक पहुँच जाते हैं।
९६. गत्यधीनं हि मानसम् ।।१/६५ ।। मन के विचार भविष्य में होनेवाली गति के अनुसार ही होते हैं।
९७. गर्भाधानक्रियामात्रन्यूनौ हि पितरौ गुरुः ।।२/५९ ।। मात्र गर्भाधान क्रिया को छोड़कर गुरु ही शिष्य के लिए माता-पिता हैं।
९८. गात्रमात्रेण भिन्नं हि मित्रत्वं मित्रता भवेत् ।।२/७५ ।। शरीर मात्र से भिन्न मित्रपना ही मित्रता कहलाती है।
९९. गुणज्ञो लोक इत्येषा किम्वदन्ती हि सुतम् ।।५/१५।। यह कहावत सत्य है कि मनुष्य गुणग्राही होते हैं।
१००. गुरुरेव हि देवता।१/१११॥ गुरु ही देवता है।
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सूक्ति
अर्थ
१०१. गुरुस्नेहो हि कामसूः ।।२/२ ।। गुरु का प्रेम इच्छाओं को पूरा करनेवाला होता है।
‘च’

सूक्ति
अर्थ
१०२. चतुराणां स्वकार्योक्तिः स्वन्मुखान्न हि वर्तते ।।८/२३ ।। चतुर पुरुष अपने अन्तरंग का अभिप्राय दूसरे के बहाने से ही प्रकट करते हैं।
१०३. चित्रं जैनी तपस्या हि स्वैराचारविरोधिनी ।।२/१५ ।। जैनी तपस्या स्वेच्छाचार की विरोधी है।
१०४. चिरकाड्ंक्षितलाभे हि तृप्ति: स्यादतिशायिनी ।।११/१ ।। चिरकांक्षित वस्तु की प्राप्ति हो जाने पर अत्यधिक प्रसन्नता होती है।
१०५. चिरकाङ्गितसम्प्राप्त्या प्रसीदन्ति हि देहिनः ।।८/६८ ।। चिरकाल से चाही हुई वस्तु के मिल जाने पर मनुष्य आनन्दित होते ही हैं।
१०६. चिरस्थाय्यन्धकारोऽपि प्रकाशे हि विनश्यति ।।११/७३।। चिरकाल से व्याप्त अन्धकार भी प्रकाश के होने पर नष्ट हो जाता है।
‘ज’

सूक्ति
अर्थ
१०७. जठरे सारमेयस्य सर्पिषो न हि सञ्जनम् ।।७/६० ।। कुत्ते के पेट में घी नहीं ठहरता।
१०८. जन्मान्तरानुबन्धौ हि रागद्वेषौन नश्यतः ।।९/३२ ।। जन्म-जन्मान्तर से जीव के साथ सम्बन्ध रखनेवाले राग-द्वेष के परिणाम सहज नष्ट नहीं होते।
१०९. जलबुदबुद्नित्यत्वे चित्रीया न हि तत्क्षये ।।१/५९ ।। पानी के बुलबुलों के देर तक ठहरने में आश्चर्य है, उनकेनाश होने में नहीं।
११०. जीवितात्तु पराधीनाज्जीवानांमरणं वरम् ।।१/४० ।। पराधीन रहकर जीवन जीने की अपेक्षा मरण ही श्रेष्ठ है।
१११. जीवानां जननीस्नेहो न हान्यैः प्रतिहन्यते ।।८/४८ ।। जीवों का मातृ-प्रेम किन्हीं भी कारणों से नष्ट नहीं होता।
‘त’

सूक्ति
अर्थ
११२. तत्तन्मात्रकृतोत्साहैः साध्यते हि समीहितम् ।।७/६४ ।। उत्साही तथा चतुर लोग अपना इच्छित कार्य सिद्ध कर लेते हैं।
११३. तत्त्वज्ञानतिरोभावे रागादि हि निरङ्कुशम् ।।८/५३ ।। तत्त्वज्ञान का तिरोभाव होने पर राग-द्वेषादि निरंकुश हो जाते हैं।
११४. तत्वज्ञानजलं नो चेत् क्रोधाम्नि: केन शाम्यति ।।५/९ ।। यदि तत्त्वज्ञानरूपी जल न हो तो क्रोधरूपी अग्नि किससे बुझेगी ?
११५. तत्त्वज्ञानविहीनानां दुःखमेव हि शाश्वतम् ।।६/२ ।। तत्त्वज्ञान से रहित जीवों का दु:ख शाश्वत होता है।
११६. तत्त्वज्ञानं हि जागर्ति विदुषामार्तिसम्भवे ।।१/५७ ।। पीड़ा होने पर भी विद्वानों का तत्त्वज्ञान स्थिर ही रहता है।
११७. तत्त्वज्ञानं हि जीवानां लोकद्वयसुखावहम् ।।३/१८ ।। तत्त्वज्ञान इहलोक और परलोक में जीवों के लिए सुख देनेवाला है।
११८. तन्तवो न हि लूताया: कूपपातनिरोधिनः ।।१०/४८ ।। मकड़ी के जाल के तन्तु कुएँ में गिरते हुए प्राणी को नहीं बचा सकते।
११९. तप्यध्वं तत्तपो यूयं किं मुधा तुषखण्डनैः ।।६/२४ ।। तुम सब सर्वज्ञ प्रणीत तप तपो, व्यर्थ में भूसा कूटने से क्या लाभ ?
१२०. तमो ह्यभेद्यं खद्योतैर्भानुना तु विभिद्यते ।।२/७१ ।। जो अन्धकार जुगनुओं के लिए अभेद्य है, उसे सूर्य द्वारा नष्ट कर दिया जाता है।
१२१. तीरस्था: खलु जीवन्ति न हि रागाब्धिगाहिनः ।।८/१।। रागरूपी समुद्र के किनारे रहनेवाले लोग जीवित रहते हैं, उसमें गोते लगानेवाले नहीं।
‘द’

सूक्ति
अर्थ
१२२. दग्धभूम्युप्तबीजस्य न हाङ्कुरसमर्थता ।।१/६२ ।। जली हुई भूमि में बोये गये बीज में अंकुर पैदा करने की सामर्थ्य नहीं होती।
१२३. दानपूजातप:शीलशालिनां किं न सिध्यति ।।१०/१९ ।। दान, पूजा, तप और शील से सम्पन्न मनुष्य को क्या सिद्ध नहीं होता?
१२४. दीपनाशे तमोराशि: किमाह्वानमपेक्षते ।।१/५८ ।। दीपक बुझ जाने पर अन्धकार का समूह क्या निमन्त्रणकी अपेक्षा रखता है?
१२५. दुःखचिंता हि तत्क्षणे ।।१/३२ ।। दुःख की चिन्ता दु:ख के समय ही रहती है।

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