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समणसुत्तं ग्रंथ - एक परिचय

 समणसुत्तं ग्रंथ”

`समणसुत्तं' नामक इस ग्रन्थ की संरचना या संकलना आचार्य विनोबाजी की प्रेरणा से हुई है। उसी प्रेरणा के फलस्वरूप संगीति या वाचना हुई और उसमें इसके प्रारूप को स्वीकृति प्रदान की गयी। यह एक विशिष्ट ऐतिहासिक घटना है।
विश्व के समस्त धर्मों का मूल आधार है--आत्मा और परमात्मा। इन्हीं दो तत्त्वरूप स्तम्भों पर धर्म का भव्य भवन खड़ा हुआ है। विश्व की कुछ धर्म-परम्पराएँ आत्मवादी होने के साथ-साथ ईश्वरवादी हैं और कुछ अनीश्वरवादी। ईश्वरवादी परम्परा वह है जिसमें सृष्टि का कर्ता-धर्ता या नियामक एक सर्वशक्तिमान् ईश्वर या परमात्मा माना जाता है। सृष्टि का सब-कुछ उसी पर निर्भर है। उसे ब्रह्मा, विधाता, परमपिता आदि कहा जाता है। इस परम्परा की मान्यता के अनुसार भूमण्डल पर जब-जब अधर्म बढ़ता है, धर्म का ह्रास होता है, तब-तब भगवान् अवतार लेते हैं और दुष्टों का दमन करके सृष्टि की रक्षा करते हैं, उसमें सदाचार का बीज-वपन करते हैं।
ग्रन्थ-परिचय
`समणसुत्तं' ग्रन्थ में जैन धर्म-दर्शन की सारभूत बातों का, संक्षेप में, क्रमपूर्वक संकलन किया गया है। ग्रन्थ में चार खण्ड हैं और ४४ प्रकरण हैं। कुल मिलाकर ७५६ गाथाएँ हैं।
ग्रंथ की संरचना या संकलना प्राकृत गाथाओं में की गयी है, जो गेय हैं तथा पारायण करने योग्य हैं। जैनाचार्यों ने प्राकृत गाथाओं को सूत्र कहा है। प्राकृत के सुत्त शब्द का अर्थ सूत्र, सूक्त तथा श्रुत भी होता है। जैन-परम्परा में सूत्र शब्द रूढ़ है। इसीलिए ग्रंथ का नाम `समणसुत्तं' (श्रमणसूत्रम्) रखा गया है। गाथाओं का चयन प्रायः प्राचीन मूल ग्रन्थों से किया गया है। अतः यह समणसुत्तं आगमवत् स्वतः प्रमाण है।
प्रथम खण्ड `ज्योतिर्मुख' है, जिसमें व्यक्ति `खाओ पीओ मौज उड़ाओ' की निम्न भौतिक भूमिका या बाह्य जीवन से ऊपर उठकर आभ्यन्तर जीवन के दर्शन करता है। वह विषय-भोगों को असार, दुःखमय तथा जन्म जरा मरणरूप संसार का कारण जानकर, इनसे विरक्त हो जाता है। रागद्वेष को ही अपना सबसे बड़ा शत्रु समझकर वह हर प्रकार से इनके परिहार का उपाय करने लगता है और क्रोध मान माया व लोभ के स्थान पर क्षमा, मार्दव, सरलता व सन्तोष आदि गुणों का आश्रय लेता है। कषायों का निग्रह करके विषय-गृद्ध इन्द्रियों को संयमित करता है। सभी प्राणियों को आत्मवत् देखता हुआ उनके सुख-दुःख का वेदन करने लगता है और दूसरों की आवश्यकताओं का सम्मान करते हुए परिग्रह का यथाशक्ति त्याग करता है। स्व व पर के प्रति सदा जागरूक रहता है तथा यतनाचारपूर्वक मोक्षमार्ग में निर्भय विचरण करने लगता है।
द्वितीय खण्ड `मोक्षमार्ग' है। इसमें पदार्पण करने पर व्यक्ति की समस्त शंकाएँ, भययुक्त संवेदनाएँ, आकांक्षाएँ तथा मूढ़ताएँ, श्रद्धा ज्ञान व चारित्र अथवा भक्ति ज्ञान कर्म की समन्वित त्रिवेणी में धुल जाती है। इष्टानिष्ट के समस्त द्वन्द्व समाप्त हो जाते हैं तथा समता व वात्सल्य का झरना फट पड़ता है। सांसारिक भोगों के प्रति विरत होकर उसका चित्त प्रशान्त हो जाता है। घर में रहते हुए भी वह जल में कमल की भाँति अलिप्त रहता है। व्यापार-धन्धा आदि सब कुछ करते हुए भी वह कुछ नहीं करता। श्रावक तथा क्रमशः श्रमण धर्म का अवलम्बन लेकर उसका चित्त सहज ही ज्ञान-वैराग्य तथा ध्यान की विविध श्रेणियों को उत्तीर्ण करते हुए धीरे-धीरे ऊपर उठने लगता है, यहाँ तक कि उसकी समस्त वासनाएँ निर्मूल हो जाती है, ज्ञान-सूर्य पूरी प्रखरता के साथ चमकने लगता है और आनन्द-सागर हिलोरें लेने लगता है। जब तक देह है, तब तक वह अर्हन्त या जीवन्मुक्त दशा में दिव्य उपदेशों के द्वारा जगत् में कल्याणमार्ग का उपदेश करते हुए विचरण करता है, और जब देह स्थिति या आयु पूर्ण हो जाती है तब सिद्ध या विदेह दशा को प्राप्त कर सदा के लिए आनन्द-सागर में लीन हो जाती है।
तृतीय खण्ड `तत्त्व-दर्शन' है, जिसमें जीव-अजीव आदि सप्त तत्त्वों का अथवा पुण्य-पाप आदि नौ पदार्थों का विवेचन है। जीवात्मा पुद्गल-परमाणु आदि षट् द्रव्यों का परिचय देकर उनके संयोग व विभाग द्वारा विश्व सृष्टि की अकृत्रिमता तथा अनादि-अनन्तता प्रतिपादित की गयी है।
चतुर्थ खण्ड `स्याद्वाद' है। ऊपर अनेकान्त का संक्षिप्त परिचय दिया जा चुका है। यही जैनदर्शन का प्रधान न्याय है। इस खण्ड में प्रमाण, नय, निक्षेप, व सप्तभंगी जैसे गूढ़ व गम्भीर विषयों का हृदयग्राही, सरल व संक्षिप्त परिचय दिया गया है। अन्त में वीरस्तवन के साथ ग्रन्थ समाप्त होता है।
कहा जा सकता है कि इन चार खण्डों में अथवा ७५६ गाथाओं में जैनधर्म, तत्त्व-दर्शन तथा आचार-मार्ग का सर्वाङ्गीण संक्षिप्त परिचय आ गया है। यों तो जैन-वाङ्मय विपुल है और एक-एक शाखा पर अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं। सूक्ष्मतापूर्वक अध्ययन करने के लिए तो निश्य निश्चय ही उन ग्रन्थों का सहारा लेना आवश्यक है। किन्तु साम्प्रदायिक अभिनिवेश से परे, मूलरूप में जैनधर्म-सिद्धान्त का, आचार-प्रणाली का, जीवन के क्रमिक-विकास की प्रक्रिया का, सर्वसाधारण को परिचय कराने के लिए यह एक सर्वसम्मत प्रातिनिधिक ग्रन्थ है।

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