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आचार्य श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तदेव कृत द्रव्य संग्रह

*आचार्य श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तदेव कृत द्रव्य संग्रह* 
                 
 *मुख्य बिन्दु* 
 _(1) द्रव्य संग्रह ग्रंथ विक्रम संवत 1125 के लगभग प्राकृत भाषा में लिखा गया है।_ 
 _(2) द्रव्य संग्रह ग्रंथ के रचयिता आचार्य श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तदेव हैं।_ 
 _(3) द्रव्य संग्रह ग्रंथ में तीन अधिकार व 58 गाथायें हैं।_ 
 _(4) द्रव्य संग्रह ग्रंथ में षड् द्रव्य , सप्त तत्व , नव पदार्थ , पंचास्तिकाय , पंच परमेष्ठि, ध्यान और मोक्षमार्ग का विवेचन संक्षिप्त व सुबोध शैली में किया गया है।_ 
 _(5) द्रव्य संग्रह ग्रंथ का प्ररूपण लाक्षणिक शैली में किया गया है।_ 
 _(6) द्रव्य संग्रह ग्रंथ में प्रत्येक लक्षण द्रव्य और भाव , निश्चय और व्यवहार दोनों दृष्टियों से किया गया है।_ 
 _(7) द्रव्य संग्रह ग्रंथ लक्षण ग्रंथ होते हुए भी अध्यात्म ग्रंथ के रूप में मान्यता प्राप्त है।_ 
 _(8) तत्वबोध करने के लिए द्रव्य संग्रह ग्रंथ भी जैन समाज में तत्त्वार्थसूत्र और छहढाला के समान महत्वपूर्ण स्थान रखता है।_ 
 _(9) द्रव्य संग्रह ग्रंथ को आचार्य श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तदेव ने सोमश्रेष्ठी को बोध कराने के लिए 26 गाथा प्रमाण लघु द्रव्य संग्रह की रचना की फिर विशेष तत्वबोध कराने के लिए 58 गाथा प्रमाण वृहद् द्रव्य संग्रह की रचना की।_ 
 _(10) सोम नामक राजश्रेष्ठी(राजा का सेठ) मालव देश के धारा नगरी के नरेश भोजदेव के काल में श्रीपाल मण्डलेश्वर के आश्रम नगर में श्री मुनिसुब्रतनाथ जिनालय में राजकीय भाण्डागार (खजाना ) आदि अनेक कार्यों के अधिकारी ( स्वामी) थे।_ 
 *नोट -* _धारा नगरी यह स्थान वर्तमान में कोटा राजस्थान के निकट केशवराव पाटन के रूप में इतिहासकारों ने सुनिश्चित किया है।_ 

     *- गाथा विवेचन -* 

 _(1) द्रव्य संग्रह ग्रंथ में तीन अधिकारों व आठ अन्तराधिकारों में 58 गाथायें हैं।_ 
 _👉 प्रथम अधिकार में (1 से 27 गाथा तक) 27 गाथायें हैं और तीन अन्तराधिकार हैं।_ 
 _➡️ प्रथम अन्तराधिकार में (1 से 14 गाथा तक) 14 गाथाओं में जीवतत्व का वर्णन है।_ 
 _➡️ दूसरे अन्तराधिकार में (15 से 22 वीं गाथा तक) 8 गाथाओं में पुद्गल, धर्म , अधर्म, आकाश और काल इन पांच_ _अजीव द्रव्यों का वर्णन है।_ 
 _➡️ तीसरे अन्तराधिकार में (23 से 27 वीं गाथा तक ) 5 गाथाओं में पाँच अस्तिकायों का वर्णन है।_ 
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 _👉 दूसरे अधिकार में (28 से 38 वीं गाथा तक) 11 गाथायें हैं। इसमें 2 अन्तराधिकार हैं।_ 
 _➡️ प्रथम अन्तराधिकार में (28 से 37 वीं गाथा तक) 10 गाथाओं में जीवादि सात तत्वों का वर्णन है।_ 
 _➡️ दूसरे अन्तराधिकार में (38 वीं गाथा में) सात तत्वों में पुण्य और पाप को मिलाकर नौ पदार्थों का वर्णन है।_ 
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 _👉 तीसरे अधिकार में (39 से 58 वीं गाथा तक) 20 गाथाओं में मोक्षमार्ग का वर्णन है । इसमें दो अन्तराधिकार हैं।_ 
 _➡️ प्रथम अन्तराधिकार में (39 से 46 वीं गाथा तक) 8 गाथाओं में व्यवहार और निश्चय मोक्षमार्ग का वर्णन है।_ 
 _➡️ दूसरे अन्तराधिकार में (47 से 58 वीं गाथा तक) 12 गाथाओं में ध्यान और ध्येय (पंच परमेष्ठि) का वर्णन है।_ 
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