Skip to main content

Posts

जैन अध्यात्म

जैन दर्शन में अध्यात्म    'अध्यात्म' शब्द अधि+आत्म –इन दो शब्दों से बना है, जिसका अर्थ है कि आत्मा को आधार बनाकर चिन्तन या कथन हो, वह अध्यात्म है। यह इसका व्युत्पत्ति अर्थ हे। यह जगत् जैन दर्शन के अनुसार छह द्रव्यों के समुदायात्मक है। वे छह द्रव्य हैं- जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। इनमें जीव द्रव्य चेतन है, जिसे 'आत्मा' शब्द से भी कहा जाता है। शेष पाँचों द्रव्य  अजीव  हैं, जिन्हें अचेतन, जड़ और अनात्म शब्दों से भी व्यवहृत किया जाता है। पुद्गल द्रव्य स्पर्श, रस, गन्ध और रूप गुणोंवाला होने से इन्द्रियों का विषय है। पर आकाश, काल, धर्म और अधर्म ये चार अजीव द्रव्य इन्द्रियगोचर नहीं हैं, क्योंकि उनमें स्पर्श, गन्ध, रस और रूप नहीं हैं। पर आगम और अनुमान से उनका अस्तित्व सिद्ध है। हमारे भीतर दो द्रव्यों का मेल है- शरीर और आत्मा शरीर अचेतन या जड़ है और आत्मा सचेतन है, ज्ञाता-दृष्टा है। किन्तु वह स्पर्श-रस-गन्ध-वर्ण-शब्द रूप नहीं है। अत: पाँचों इन्द्रियों का विषय नहीं है। ऐसा होने पर भी वह शरीर से भिन्न अपने पृथक् अस्तित्व को मानता है। यद्यपि जन्म में तो शरीर के साथ ही...

भक्तामर स्तोत्र और वेद

*भक्तामर स्तोत्र और वेद*  डॉ अनेकांत कुमार जैन , नई दिल्ली  drakjain2016@gmail.com  एक वैदिक मित्र से बातों ही बातों में पता चला कि उन्हें जैनों का भक्तामर स्तोत्र बहुत पसंद है । उन्होंने कुछ छंद सुना भी दिए तो आनंद आया । फिर उन्होंने कहा कि कई छंद ऐसे हैं जिनका वैदिक मंत्रों से बहुत साम्य है । मुझे आश्चर्य हुआ । यह तथ्य मैं उन अनुसंधान करने वाले शोधार्थियों के लिए प्रेषित कर रहा हूं जो भक्तामर पर गहराई से अध्ययन कर रहे हैं -  मानतुंग आचार्य विरचित स्तोत्र का २३ वां छंद है - त्वामामनन्ति मुनयः परमं पुमांस। मादित्यवर्णममलं तमसः परस्तात् ॥ त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयंति मृत्युं। नान्यः शिवः शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्थाः॥२३॥ अर्थ - हे ऋषभदेव भगवान ! तपस्वीजन आपको सूर्य की तरह तेजस्वी, निर्मल और मोहान्धकार से परे रहने वाले परम पुरुष मानते हैं | आपको ही अच्छी तरह से जान कर मृत्यु पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है |इसके सिवाय मोक्षपद का दूसरा सरल रास्ता नहीं है| यजुर्वेद अ.३१ मंत्र ८ की एक स्तुति है - वेदाहमतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्ण तमस: पुरस्तात् । तमेव निदित्वादि मृत्युमेति नान...

शिव और ऋषभदेव

शिव और ऋषभदेव ============ (इतिहास का वह क्षण कितना क्रूर था जब एक महान व्यक्तित्व के दो टुकडे किये !!) हर जगह कूछ  अच्छे और कुछ बुरे लोग होते है ! कटरपण सदैव हिंसा को प्रश्रय देत ही अथवा यु कह सकते है कि उसमे से हिंश स्वता  झरती है ! सैकडो वर्ष पूर्व के समय भी कटरपन्थि थे ! किंतु उदारपन्थियो कि भी कमी नाही थी ! वे संप्रदाय नीरपेक्ष थे ! तामिळनाडू के इतिहास में यद्दपी जैन और शैवो के घात - प्रतिघात का सशक्त चित्रण किया गाय है, किंतु उसके भीतर से झांकती संप्रदाय नीरपेक्षता भी स्पष्ट देखी जा सकती है ! शिव और ऋषभदेव क्या दो थे ? एक ज्वलंत प्रश्न है ! जैन ग्रन्थो में दोनो को एक मन गया है ! भट्टाकलंक एक प्रसिद्ध आचार्य थे ! उनका एक लोकप्रिय काव्य है  -  अकलंक स्तोत्र  उसमे लिखा है  - "सो$स्मान्पातू निरंजनो जीन्पती: सर्वत्र सूक्ष्म शिव: !" (अकलंक स्तोत्र - १०)  मनतुन्गाचार्य के भक्तामर स्तोत्र का आज भी घर-घर में पाठ होता है ! उन्होने एक स्थान पार कहा है - नान्य: शिव: शिवपदस्य मुनीन्द्रपंथ:!! (भक्तामर स्तोत्र -२३)  आचार्य जिनसेन ने "हर" शब्द का प्रयोग तीर...

जैनदर्शन में काल द्रव्य का स्वरूप

*🍁जैनदर्शन  में काल द्रव्य का स्वरूप 🍁* *काल द्रव्य अस्तिकाय न होकर भी अर्थ/पदार्थ के रूप में उसका अस्तित्व है। *इस जगत में जीवों और पुद्गलों में प्रतिक्षण उत्पाद -व्यय-ध्रौव्य की एकवृत्तिरूप परिणाम वर्तता है।वह परिणाम वास्तव में काल द्रव्य रूप सहकारी कारण के सद्भाव में ही दिखाई देता है। *वह काल द्रव्य जीव व पुद्गल के परिणाम की अन्यथा अनुपपत्ति हेतु के द्वारा सिद्ध होता है। * काल द्रव्य परिणमन कराता नहीं और काल के बिना परिणमन होता है।* *वस्तु नई से पुरानी होती है,इससे कालद्रव्य है -यह सिद्ध होता है। *जिस प्रकार पुद्गल परमाणु इकट्ठे होकर स्कंध होता है वैसे कालाणु इकट्ठे नहीं होते,क्योंकि कालाणु में स्निध-रूक्षता का गुण नहीं है।कालाणु रत्नों की राशि के समान सम्पूर्ण लोक में हैं और वे असंख्य है तथा प्रत्येक कालाणु एक स्वतंत्र द्रव्य है।कालद्रव्य के निमित्त बिना किसी द्रव्य का परिणमन नहीं होता ।नई और पुरानी पर्यायों से कालद्रव्य का माप निकलता है। *कालद्रव्य वर्ण,रस,गंध और स्पर्श से रहित है तथा अगुरूलघु,अमूर्त और वर्तना लक्षणवाला है।लोकाकाश के प्रत्येक प्रदेश में एक एक कालाणु स्थित है...

अनेकांत स्याद्वाद का स्वरूप

 अनेकान्त  स्याद्वाद  स्वयम्भूस्त्रोत्र मे स्वामी समन्तभद्र ने कहा है-"हे भगवन ! 'स्यात' शब्द केवल आपके न्याय शास्त्र मे ही पाया जाता है। अन्य दार्शनिको के न्याय मे 'स्यात' शब्द नहीं है।" इसका कारण यह है की जैन दर्शन ही अनेकान्तवादी है, अन्य सब दर्शन ऐकान्तवादी है।  वस्तु सर्वथा नित्य है या सर्वथा  अनित्य है, सर्वथा सत है या असत है।  इस प्रकार के ऐकान्तवाद का निर्णय करने वाला अनेकान्तवाद है। जो तत है वही अतत है, जो एक है वही अनेक है, जो सत है वही असत है, जो नित्य है वही अनित्य है, इस प्रकार वस्तु मे परस्पर मे विरुद्ध दो शक्तियो का प्रकाशन करना "अनेकान्त" है। इसका खुलासा इस प्रकार है-स्वद्रव्य, स्वकाल, स्वक्षेत्र, स्वस्वभाव से जो सत है वही परद्रव्य, परकाल, परक्षेत्र, परस्वभाव से असत है। जैसे मिट्टी के घट का स्वद्रव्य मिट्टी है, अन्य स्वर्णादि परद्रव्य है। पृथ्वी स्वक्षेत्र है, दिवार परक्षेत्र है, वर्तमान काल स्वकाल है, अतीत परकाल है। "स्व" शब्द सदा 'पर' की अपेक्षा रखता है। इसी प्रकार विधि सदा निषेध की अपेक्षा रखता है। जो अस...

एक बैल ने सिखाया जीने का सलीका

ये कहानी आपके जीने की सोच बदल देगी! एक दिन एक किसान का बैल कुएँ में गिर गया।  वह बैल घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं। अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि बैल काफी बूढा हो चूका था अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था और इसलिए उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिऐ।।   किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी। जैसे ही बैल कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़ चीख़ कर रोने लगा और फिर ,अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया।   सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया.. अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह बैल एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था।   जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे -वैसे वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता...

अति प्राचीन प्राकृत भाषा

अतिप्राचीन भाषा प्राकृत -  एक ऐसा माध्यम जिससे हम अपने भावों की अभिव्यक्ति कर सकते हैं वो है भाषा । पूरा विश्व भाषाओं की विविधता से सुशोभित है । एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते ही भाषा एवं उसके लहजे में फर्क परिलक्षित होता है। भारत में भी अनेक भाषाएं और बोलियां हैं किन्तु उन सभी का केन्द्र बिन्दु उद्गम स्थल एक ही है और वो है स्वाभाविक बोलचाल से आई भाषा - प्राकृत । जी हाँ प्राकृत भाषा जो आरम्भ से ही मनुष्य के भावों की अभिव्यक्ति के लिए स्वाभाविक रूप से स्वयं प्रकट हुई ।  अतिप्राचीन काल से जनभाषा के रूप में प्रचलित प्राकृत भाषा के मागधी, अर्धमागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री,अपभ्रंश आदि रूपों से होती हुई वर्तमान भारत में जो भाषा और बोलियों की धारा बह रही है उसके मूल रूप में प्राकृत भाषा का वास है।  भाषा वैज्ञानिकों का अभिमत है कि ●महाराष्ट्री अपभ्रंश से मराठी और कोंकणी,●मागधी अपभ्रंश की पूर्वी शाखा से बंगला,उड़िया तथा असमिया, ●मागधी अपभ्रंश से बिहारी, मैथिली, मगही और भोजपुरी,●अर्द्धमागधी अपभ्रंश से पूर्वी हिन्दी-अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी,●शौरसेनी अपभ्रंश से बुन्देली, कन्नौजी, ब्रजभा...