Skip to main content

मुल्तान, पाकिस्तान में एक शानदार 150 साल पुराना जैन मंदिर...


मुल्तान, पाकिस्तान में एक शानदार 150 साल पुराना जैन मंदिर...

   *जैन मंदिर की दीवारों पर जैन धर्म के सभी तीर्थंकरों के चित्र आज भी मौजूद हैं।  मंदिर की दीवार पर नवकार मंत्र अंकित है।  यह जैन मंदिर 150 साल पुराना था।*
  *लेकिन आज इस जैन मंदिर में और इस मंदिर से सटे धर्मशाला में एक जामिया हमीदिया तमिल कुरान मदरसा चल रहा है।*
  *एक समय इस भव्य जैन मंदिर के प्रांगण में सभी को दो वक्त का भोजन मिलता था।*
*जब 1947 में भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ।  चारों ओर दंगे हुए थे।  भारत से पाकिस्तान या पाकिस्तान से भारत जाने वाली ट्रेनें और बसें टर्मिनस पर पहुंचते ही कब्रिस्तान में तब्दील हो गईं।*

 *पंजाब के मुल्तान में एक जैन मंदिर था जो बंटवारे के बाद अब पाकिस्तान में है।  जैन समुदाय मुल्तान से भारत में मूर्तियों के हस्तांतरण के बारे में चिंतित था।  दंगों के कारण वे बस या ट्रेन से भारत नहीं जा सकते थे और न ही पाकिस्तान में रह सकते थे।*

 *समुदाय के कुछ लोग चार्टर्ड विमान लेने के लिए दिल्ली गए थे।  लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली तो वे बंबई चले गए।  अंत में उन्हें एक निजी कंपनी से प्रति व्यक्ति 400 रुपये के किराए पर एक विमान मिला।  (आप उस समय 400rs की कीमत की कल्पना कर सकते हैं)*

 *विमान में लोगों के साथ मंदिर की 85 मूर्तियां, तमाम जिनवाणी, घरेलू सामान लाया गया।  यह ओवरलोड हो गया।  पायलट ने यह कहते हुए इसे उड़ाने से मना कर दिया कि यह डबल लोडेड है।  उन्होंने केवल 2-3 मूर्तियाँ लेने का सुझाव दिया ताकि सभी मूर्तियाँ एक जैसी दिखें।*
*सभी स्त्रियाँ रोते हुए विमान से उतर गईं और कहने लगीं हमें यहाँ छोड़ दो लेकिन सभी मूर्तियाँ और जिनवाणी ले जाओ।  घर का सारा सामान निकालने के बाद भी प्लेन ओवरलोड था।*

 *पायलट ने कहा कि या तो लोग जा सकते हैं या मूर्तियां।  लोगों ने उनसे मूर्तियां ले जाने को कहा।  लोगों का ऐसा विश्वास देखकर पायलट हैरान रह गया।  उसने सोचा कि अगर वह उन्हें पाकिस्तान में छोड़ देगा तो वे वैसे भी मर जाएंगे।  उसने मूर्तियों और लोगों दोनों को लेने का जोखिम उठाया।*

 *अंत में विमान ने उड़ान भरी।  सभी ने णमोकार मंत्र का जाप किया।  उस समय विमान में सवार महिलाओं ने संकल्प लिया कि जब तक विमान जोधपुर नहीं पहुंचेगा तब तक न तो कुछ खाएंगे और न ही पानी पीएंगे।  विमान सफलतापूर्वक जोधपुर हवाई अड्डे पर उतरा।*

 *पायलट हैरान था कि डबल-लोडेड विमान इतनी आसानी से, सुरक्षित रूप से, बिना किसी परेशानी के उड़ गया।  पायलट ने कहा कि उसने कभी ऐसा विमान नहीं उड़ाया जो इतना भार होने के बावजूद इतना हल्का महसूस करता हो।  यह एक चमत्कार था।  पायलट ने लोगों से उसे मूर्ति दिखाने को कहा नहीं तो वह उन्हें विमान से मूर्तियां नहीं ले जाने देगा।*

 *पायलट सिख था।  जैनियों ने उन्हें भगवान की मूर्ति के दर्शन (दर्शन) करने से पहले मांसाहार, पेय छोड़ने के लिए कहा, जो अहिंसा के प्रचारक हैं।*

 *पायलट ने तुरंत अपने जीवन में मांसाहार न खाने की कसम खाई और अंत में मूर्तियों को प्रणाम किया।*

 *ये मूर्तियां और जिनवाणी मुल्तान जैन मंदिर, आदर्श नगर, जयपुर में स्थित हैं।  आप इसे देख सकते हैं।  पंडित श्री टोडरमल जी की प्रसिद्ध "रहस्य पूर्णा चिट्ठी" मुल्तान के सन्यासियों के लिए लिखी गई है।*
 *"अपने धर्म की रक्षा करो, धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा।"*

तीर्थोदय वंदन फ़ेसबुक से साभार 

Comments

Popular posts from this blog

क्या जैन का मतलब बनिया होता है ?

Dr Amit Rai Jain के फेसबुक वाल से साभार क्या जैन मतलब बणिया होता है ? #Jain_Bania  सोशल मीडिया पर चल रहे माहौल को देखते हुए मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं,कि क्या जैन का अर्थ बणिया होता है,आमतौर पर सबकी यह धारणा होती है कि जैन से आशय बणिया/वैश्य वर्ण की एक जाति है।अगर आप भी ऐसा मानते हैं तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी के शिकार है।   जैन कोई जाति या वर्ण नहीं है,बल्कि यह स्वतंत्र धर्म है,इसे समझने के लिए हमें इसके इतिहास की ओर जाना पड़ेगा, जैन धर्म का अपना स्वतंत्र इतिहास है,यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना धर्म है,यहां तक कि वैदिक के भी पहले भी यहां के मूलनिवासियों का धर्म यही था,और इसके अनुयायी ही जैन थे, जिन्हें तत्कालीन समय में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता था।    अधिकतर लोग जानकारी के अभाव में जैन-धर्म को वैष्णव या हिंदू से जोड़कर देखते हैं,किंतु मूलनिवासी देवता शिव और प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव एक ही पुरुष थे, यहां का धर्म ऋषभदेव का अनुयायी ही था !    अंतिम तीर्थंकर महावीर के बाद जैन-धर्म दो परंपराओं में बंट गया,दिगंबर व श्वेतांबर। दिगंबर दक्षिण भारत में अधिक प्रचार...

जैनदर्शन नास्तिक नहीं, आस्तिक दर्शन है

*जैनदर्शन नास्तिक नहीं, आस्तिक दर्शन है* डॉ. शुद्धात्मप्रकाश जैन  निदेशक, क. जे. सोमैया जैन अध्ययन केन्द्र, सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय, मुम्बई                   समस्त भारतीय दर्शनों को दो विभागों में विभाजित किया गया है- आस्तिक और नास्तिक। इस विभाजन का आधार पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, लोक-परलोक, आत्मा-परमात्मा आदि के आधार पर न होकर मात्र यह परिभाषा है- ‘‘वेदनिन्दको नास्तिकः’’ अर्थात् जो वेदों को अस्वीकार करे, वह नास्तिक है, इस आधार पर जैन, बौद्ध और चार्वाक- ये तीन दर्शन नास्तिक कहे जाते हैं।                 इस सन्दर्भ में दो बातें विचारणीय हैं, जिनमें से प्रथम यह है कि- जिन वेदों और पुराणों में ऋषभदेव, अरिष्टनेमि और पाश्र्वनाथ आदि जैन तीर्थंकरों का नामस्मरण किया गया है, उन वेदों की जैनदर्शन निन्दा कैसे कर सकता है? वहां कई स्थानों पर ऋषभदेव,  उनके पुत्र भरत, अरिष्टनेमि आदि का बहुत आदर से उल्लेख किया गया है। दूसरी बात यह है कि- वेदों पर जैन अहिंसा का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। जहां जैन तीर्थं...

ब्रह्मी लिपि उद्भव और विकास Brahmi Lipi origin and Devolopment

ब्राह्मी लिपि : उद्भव और विकास - श्रीमती डा. मुन्नी पुष्पा जैन, वाराणसी          भाषा के बाद अभिव्यक्ति का सबसे अधिक सशक्त माध्यम ‘लिपि' है। ‘लिपि' किसी भाषा को चिन्हों तथा विभिन्न आकारों में बांधकर दृश्य और पाल्य बना देती है। इसके माध्यम से भाषा का वह रूप हजारों वर्षों तक सुरक्षित रहता है। विश्व में सैकड़ों गाषाए तथा सैकड़ों लिपियों हैं। भाषा का जन्म लिपि से पहले होता है, लिपि का जन्म बाद मे। प्राचीन शिलालेखों से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में ब्राह्मीलिपि ही प्रमुखतया प्रचलित रही है और यही बाह्मी लिपि अपने देश के समृद्ध प्राचीन ज्ञान-विज्ञान ,संस्कृति,इतिहास आदि को सही रूप में सामने लाने में एक सशक्त माध्यम बनी। सपाट गो मापवं ने/ इस ब्राह्मी लिपि में शताधिक शिलालेख लिखवाकर ज्ञान लिाप और भाषा को सदियों तक जीवित रखने का एक क्रांतिकारी कदम उठाया था।   सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में ब्राह्मी लिपि के रहस्य को समझने के लिए पश्चिमी तथा पूर्वी विद्वानों ने जो श्रम किया उसी का प्रतिफल है कि आज हम उन प्राचीन लिपियो को पढ़-समझ पा रहे है...