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युग-चिंतक सन्त शिरोमणि:आचार्यश्री विद्यासागर जी मुनिराज

युग-चिंतक सन्त शिरोमणि:आचार्यश्री विद्यासागर जी मुनिराज प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी, वाराणसी      परमपूज्य संत शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागरजी मुनिराज सम्पूर्ण देश में सर्वोच्च संयम साधना और अध्यात्म जगत के मसीहा माने जाते थे। उनका बाह्य व्यक्तित्व भी उतना ही मनोरम था,जितना अन्तरंग । संयम साधना और तपस्वी जीवन में वे व्रज्र से भी कठोर हैं । किन्तु उनके मुक्त हास्य और सौम्य मुख मुद्रा से उनके सहज जीवन में पुष्पों की कोमलता झलकती है । जहाँ एक ओर उनकी संयम साधना, मुनि जीवन की चर्या, तत्त्वदर्शन एवं साहित्य सपर्या में आचार्य कुन्दकुन्द प्रतिविम्बित होते हैं; वहीँ दूसरी ओर उनकी वाणी में आचार्य समन्तभद्र स्वामी जैसी निर्भीकता, निःशंकता, निश्चलता, निःशल्यता परिलक्षित होती है । आप माता-पिता की द्वितीय संतान हो कर भी अद्वितीय संतान हैं । मूलाचार में वर्णित श्रमणाचार का पूर्णतः पालन करते हुए आप  राग, द्वेष, मोह आदि से दूर इन्द्रियजयी, नदी की तरह प्रवहमान, पक्षियों की तरह स्वच्छन्द, अनियत विहारी, निर्मल, स्वाधीन, चट्टान की तरह अविचल रहते हैं। कविता की तरह रम्य, ...

तीर्थंकर वर्द्धमान : एक झलक

तीर्थंकर वर्द्धमान : एक झलक 1.अन्य नाम - वर्द्धमान (वीर, अतिवीर, सन्मति, महावीर) 2.तीर्थंकर क्रम -चतुर्विंशतम 3.जन्मस्थान- क्षत्रिय कुण्डग्राम (वैशाली) 4.पूर्व भव - अच्युतेन्द्र 5.पितृनाम -सिद्धार्थ 6. मातृनाम -  त्रिशलादेवी (प्रियकारिणी) 7. वंशनाम् - नाथववंश                 (ज्ञातृवंश, 'नाठ'-इति पालिः) 8. गर्भावतरण - आषाढ़ शुक्ला-षष्ठी, शुक्रवार,                    17 जून 599 ई.पू. 9.गर्भवास -नौ-मास, सात-दिन, बारह घंटे 10.जन्मतिथि -चैत्रशुक्ल त्रयोदशी, सोमवार, 27 मार्च, 598 ई.पू. 11. वर्ण (कान्ति)- स्वर्णाभ (हेमवर्ण) 12.चिह्न - सिंह 13.गृहस्थितरूप -अविवाहित          (प्रसंग चला, परन्तु विवाह नहीं किया) 14. कुमारकाल -28 वर्ष, 5 माह, 15 दिन 15.दीक्षातिथि -मंगसिरकृष्ण दसमी, सोमवार,              29 दिसम्बर 569 ई.पू. 16.तपःकाल - 12 वर्ष, 5 मास, 15 दिन 17. कैवल्य-प्राप्ति - वैशाखशुक्ल दसमी,            ...

भगवान् महावीर के पूर्व भव

*⭐पुरुरवा भील की पर्याय से श्री वर्धमान भगवान की पर्याय में जन्म तक भगवान के असंख्यात भवों का वर्णन* 1️⃣ पुरुरवा भील 2️⃣ पहले सौधर्म स्वर्ग में देव 3️⃣ भरत का पुत्र मरीचि 4️⃣ पांचवें ब्रह्म स्वर्ग में देव 5️⃣ जटिल ब्राह्मण 6️⃣ पहले सौधर्म स्वर्ग में देव 7️⃣ पुष्यमित्र ब्राह्मण 8️⃣ पहले सौधर्म स्वर्ग में देव 9️⃣ अग्निसह ब्राह्मण 🔟 तीसरे सनत्कुमार स्वर्ग में देव 1️⃣1️⃣ अग्निमित्र ब्राह्मण 1️⃣2️⃣ चौथे महेन्द्र स्वर्ग में देव 1️⃣3️⃣ भारद्वाज ब्राह्मण 1️⃣4️⃣ चौथे महेन्द्र स्वर्ग में देव 1️⃣5️⃣  कुमार्ग प्रकट करने के फलस्वरूप त्रस स्थावर योनियों में असंख्यात वर्षों तक परिभ्रमण 1️⃣6️⃣ स्थावर ब्राह्मण 1️⃣7️⃣ चौथे महेन्द्र स्वर्ग में देव 1️⃣8️⃣ विश्वनंदी 1️⃣9️⃣ दसवें महाशुक्र स्वर्ग में देव 2️⃣0️⃣ त्रिपृष्‍ठ नारायण 2️⃣1️⃣ सातवां नरक  2️⃣2️⃣ सिंह 2️⃣3️⃣ पहला नरक  2️⃣4️⃣ सिंह 2️⃣5️⃣ पहले सौधर्म स्वर्ग में सिंहकेतु नाम का देव 2️⃣6️⃣ कनकोज्ज्वल विद्याधर 2️⃣7️⃣ सातवें लांतव स्वर्ग में देव 2️⃣8️⃣ हरिषेण राजा 2️⃣9️⃣ दसवें महाशुक्र स्वर्ग में देव 3️⃣0️⃣ चक्रवर्ती प्रियमित्र 3️⃣1️⃣ बारहवे...

जापान में जैन धर्म

।।जापान में जैन धर्म।। उपरोक्त विषय को देखकर आप आश्चर्यचकित हो सकते हैं, लेकिन यह सच है। जापान में लगभग 5000 स्थानीय जापानी जैन  परिवारों के घर है ।जो सभी अनुष्ठानों के साथ ,जैन जीवन शैली एवं आहार शैली का सख्ती से पालन कर रहे हैं। वे सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त से पहले भोजन करते हैं। व गर्म पानी का उपयोग करते हैं ।घंटों तक ध्यान करते हैं, जैन धर्म के त्योहार जैसे महावीर जयंती , चतुर्मास ,पर्युषण पर्व ,दीपावली आदि को जैन दर्शन के अनुसार मनाते हैं ।फलतः  जापान में जैन दर्शन एक आगे बढ़ता हुआ दर्शन है। मुज़े यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि 1950 में, भारत सरकार ने 40 जापानी छात्रों को भारतीय धर्मों का अध्ययन करने के लिए प्रायोजित किया था। जापानी छात्र अध्ययन के लिए गुजरात और वाराणसी आये ।इनमें से कुछ छात्रों ने जैन दर्शन, विशेष रूप से कर्म की अवधारणाओं के प्रति गहरी आश्ता विकसित की, और जैन दर्शन को अपनाने का फैसला किया। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वे घर वापस चले गये।जैन जीवन पद्धति को अपनाया एवं अपने इष्ट मित्रों में भी इसका प्रचार प्रसार किया । जैन धर्म पर पहली ज्ञात जापानी भाषा की ...

जैनधर्म में भगवान हनुमान Hanuman

*जैनधर्म में भगवान हनुमान का महत्वपूर्ण स्थान*  🍁 *जैन धर्म में 20 वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रतनाथ के शासन काल में वीर, बलशाली, पराक्रमी  तेजस्वी, ओजस्वी, तपस्वी,मनस्वी  हनुमान का जन्म  पराक्रमी पवन की धर्म -पत्नी अंजना सती के गर्भ से हुआ।*  *पति -पत्नी का आपस में 22 वर्ष का वियोग भी रहा। हनुमान की पवनपुत्र के रूप में  पहचान रही।* *जनमानस उन्हें वीर, महाबलशाली महावीर के रूप में याद करते हैं।* 🍁 *वह भारतभूमि में कामदेव के रूप में उत्पन्न हुए।सर्वांग सुंदर, दिव्यता और भव्यता से भरपूर मनमोहक उनका अलौकिक शक्तिशाली रूप था। वे वानरवंशी थे। वानर/बंदर नहीं थे। उसके मुकुट में वानर का चिन्ह अंकित था वानरवंशी होने से। उनकी मनोज्ञ मानवाकृति थी।* 🍁 *जैन धर्म में भगवान जन्मते नहीं ,बनते हैं। जन्म से कोई भगवान नहीं होते। सभी महापुरुषों ने मानव देह धारण कर मानवीय मूल्यों को आत्मसात करते हुए अपने आत्मपुरूषार्थ जागृत कर, मोक्षमार्गी बनकर , निजस्वभाव की साधना साधकर ,कर्मकालिमा से मुक्त होकर निर्वाण को प्राप्त करते हैं।* 🍁 *कामदेव हनुमान ने रामचंद्र जी के सहयोगी और सच्चे ...

तीर्थंकर भगवान महावीर का संक्षिप्त परिचय

*तीर्थंकर भगवान महावीर का संक्षिप्त परिचय* 🍁 *जन्म -* *चतुर्थ काल का 75 वर्ष 3 माह शेष बचे थे तब वैशाली गणराज्य के वासो कुण्ड ग्राम में राजा सिद्धार्थ के नंद्यावर्त राजमहल में रानी त्रिशला देवी के उदर से ई.पू.598 में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को सोमवार के दिन हुआ। सभी देवताओं के साथ मनुष्यों ने उनका जन्मकल्याणक महोत्सव भक्ति भाव से मनाया।* *माता-* प्रियकारिणी त्रिशला  *पिता-*  राजा सिद्धार्थ  *दादा -*  राजा सर्वार्थ  *दादी -* रानी श्रीमती  *नाना* -राजा चेटक  *नानी*- रानी सुभद्रा  कुल - क्षत्रिय/ज्ञातृ/ नाथ वंश 🍁 *मौसी -6* 🔸 सुप्रभा, प्रभावती,प्रियावती,सुज्येष्ठा,चेलना और चंदनवाला. 🍁 *मामा -10* 🔸 धनदत्त, उपेन्द्र,सिंहभद्र,अकंपन,धनभद्र,सुदत्त,सुकुम्भोज,पतंगक, प्रभंजन और प्रभास  *नाम -* 🍁  5 प्रसिद्ध  *वर्धमान,वीर, अतिवीर, सन्मति और महावीर।* *मूल नाम वर्धमान शेष चार नाम घटनाओं के आधार पर रखे गए.* 🍁 *विवाह -* 🔸 *यशोधरा सुकन्या से विवाह का प्रस्ताव आया था पर उन्होंने विवाह संस्कार से मना कर दिया। वह अंतिम पांचवें बाल ब्रह्मचारी तीर्थं...

भगवान महावीर स्वामी का अनेकान्तवाद

भगवान महावीर स्वामी का अनेकान्त सिद्धाँत -----------------------------         *अनेकान्त* शब्द 'अनेक' और 'अन्त' इन दो शब्दों से बना है। अनेक का अर्थ है-एक से अधिक, अन्त का अर्थ है-धर्म (स्वभाव)। वस्तु में अनेक विरोधी धर्मों के समूह को स्वीकार करना अनेकान्त है। जैन दर्शन के अनुसार एक ही वस्तु में एक ही समय में अनन्त विरोधी धर्म एक साथ रहते हैं, यह अनेकान्त दर्शन की महत्त्वपूर्ण स्वीकृति है। जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक वस्तु अनन्त धर्मों, अनन्त गुणों और अनन्त पर्यायों का अखण्ड समूह है। कोई भी पदार्थ न एकान्ततः नित्य है और न अनित्य। न एक है, न अनेक। न सत् है, न असत्। न वाच्य है, न अवाच्य। सभी पदार्थ नित्य भी हैं, अनित्य भी हैं। एक भी हैं, अनेक भी हैं। सत् भी हैं, असत् भी हैं। वाच्य भी हैं, अवाच्य भी हैं। इस प्रकार अनेकान्त एक ही वस्तु में अनेक विरोधी धर्मों को प्रकट करता है। कोई भी वस्तु सर्वथा नित्य या सर्वथा अनित्य स्वरूप वाली नहीं है। वस्तु में नित्यता और अनित्यता का कथन सापेक्ष है। जिस समय पदार्थ के जिस धर्म की विवेचना  होती है, वह प्रधान बन जाता है, शेष ...