Skip to main content

भगवान महावीर स्वामी का अनेकान्तवाद

भगवान महावीर स्वामी का अनेकान्त सिद्धाँत
----------------------------- 
       *अनेकान्त* शब्द 'अनेक' और 'अन्त' इन दो शब्दों से बना है। अनेक का अर्थ है-एक से अधिक, अन्त का अर्थ है-धर्म (स्वभाव)। वस्तु में अनेक विरोधी धर्मों के समूह को स्वीकार करना अनेकान्त है। जैन दर्शन के अनुसार एक ही वस्तु में एक ही समय में अनन्त विरोधी धर्म एक साथ रहते हैं, यह अनेकान्त दर्शन की महत्त्वपूर्ण स्वीकृति है। जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक वस्तु अनन्त धर्मों, अनन्त गुणों और अनन्त पर्यायों का अखण्ड समूह है। कोई भी पदार्थ न एकान्ततः नित्य है और न अनित्य। न एक है, न अनेक। न सत् है, न असत्। न वाच्य है, न अवाच्य। सभी पदार्थ नित्य भी हैं, अनित्य भी हैं। एक भी हैं, अनेक भी हैं। सत् भी हैं, असत् भी हैं। वाच्य भी हैं, अवाच्य भी हैं। इस प्रकार अनेकान्त एक ही वस्तु में अनेक विरोधी धर्मों को प्रकट करता है। कोई भी वस्तु सर्वथा नित्य या सर्वथा अनित्य स्वरूप वाली नहीं है। वस्तु में नित्यता और अनित्यता का कथन सापेक्ष है। जिस समय पदार्थ के जिस धर्म की विवेचना  होती है, वह प्रधान बन जाता है, शेष सारे धर्म गौण हो जाते हैं। 
       प्रधानता और गौणता वस्तु का धर्म नहीं, किन्तु यह वक्ता की एक दृष्टि है। उदाहरणतः, व्यक्ति चल रहा है. जब व्यक्ति चलता है तो एक पैर आगे रहता है, दूसरा पैर पीछे रहता है तब गतिक्रिया संभव होती है। लेकिन कोई व्यक्ति यह कहे कि दोनों पैर आगे ही होना आगे बढ़ना है तब, गतिक्रिया संभव नहीं हो सकती। उसी प्रकार वस्तु के जिस गुण का कथन किया जाता है, वह प्रधान बन जाता है। शेष धर्म गौण हो जाते हैं। यदि सभी धर्म प्रधान बनने का आग्रह करें तो भाषा की सीमा के कारण एक साथ सभी को प्रधानता नहीं दी जा सकती।
        अनेकान्त जीवन का एक विशेष दृष्टिकोण एवं व्यवहार आधारित पद्धति है। इसके मुख्य तीन सिद्धाँत हैं, जिसके माध्यम से इसे और अधिक स्पष्टता से समझा जा सकता वे हैं-                
1-सापेक्षता, 
2-सह-अस्तित्व और
3- समन्वय।
 

 *1- सापेक्षता*: यह एक वैज्ञानिक एवं सार्वभौम सिद्धान्त है। यह दर्शन-युग से वैज्ञानिक युग में भी प्रवेश पा चुका है। विश्व-विख्यात वैज्ञानिक आल्बर्ट आइंस्टीन द्वारा आविष्कृत सापेक्षवाद (Theory of Relativity) विज्ञान का एक प्रमुख सिद्धान्त बन चुका है। स्याद्वाद में प्रयुक्त 'स्यात्' शब्द सापेक्षता का सूचक है। जैन दर्शन के अनुसार वस्तु में अनन्त धर्म होते हैं। अनन्त धर्मों का एक साथ प्रतिपादन कर पाना किसी के वश की बात नहीं, क्योंकि भाषा की अपनी सीमा है। शब्द के द्वारा एक समय में एक धर्म का ही प्रतिपादन किया जा सकता है। उसके शेष धर्म प्रतिपादित नहीं किये जा सकते। किसी एक अपेक्षा से हम वस्तु के एक धर्म का कथन करते हैं, पर किसी अन्य अपेक्षा से दूसरे धर्मों का भी अस्तित्व है, उसे नकारा नहीं जा सकता। इस अपेक्षाभेद को समझना ही सापेक्षता है। यदि सापेक्षता का आधार न लिया जाये तो व्यावहारिक और दार्शनिक दोनों दृष्टियों से काफी उलझनें खड़ी हो सकती हैं। इस प्रकार सापेक्षवाद जैन दर्शन की समूचे विश्व के लिए एक वैज्ञानिक देन है।
 *2- सह-अस्तित्व*
अनेकान्त का दूसरा सिद्धान्त है-सह-अस्तित्व है। अनेकान्त सिद्धान्त के अनुसार वस्तु में अनन्त विरोधी धर्म होते हैं और उनका सह-अस्तित्व होता है।समूची प्रकृति की व्यवस्था में विरोधी युगलों का अस्तित्व है। सुख है तो दुख भी है, ज्ञान है तो अज्ञान भी है, जीवन है तो मृत्यु भी है। इस पक्ष प्रतिपक्ष की स्वीकृति से ही अनेकान्त का विकास होता है। 
        अनेकान्त ने सबसे पहले इस नियम की व्याख्या की जिस प्रकार विरोधी युगल धर्मों का होना स्वाभाविक है, वैसे ही इन विरोधी धर्मों का सह-अस्तित्व भी स्वाभाविक है। भारतीय दर्शनों और विश्व के सभी दर्शनों में सह-अस्तित्व की व्याख्या का ऐतिहासिक श्रेय यदि किसी को दिया जा सकता है तो वह अनेकान्तवाद को ही दिया जा सकता है। अनेकान्त का आधार भी यही बना कि जब पदार्थ की प्रकृति ही ऐसी है कि उसमें विरोधी धर्मों का सह-अस्तित्व होता है, तब हम एक ही दृष्टि से पदार्थ की व्याख्या कैसे कर सकते हैं? स्वभाव में तर्क नहीं चलता, वहाँ अनुभव प्रमाण होता है। अनुभव कहता है कि जो वस्तु गर्म है, वह ठंडी भी हो सकती है। तर्क कहता है वस्तु या ठंडी ही है या गर्म ही है, ठंडी और गर्म एक साथ नहीं हो सकती। अनुभव यह कहता है कि एक ही वस्तु में अपेक्षाभेद से ठंडा और गर्म एक साथ रह सकता है। उनका सह-अस्तित्व हो सकता है. दुनिया की कोई भी वस्तु इस मर्यादा का अतिक्रमण नहीं कर सकती।
और गर्म एक साथ रह सकता है। उनका सह-अस्तित्व हो सकता है. अपेक्षा है, इस सह-अस्तित्व के सिद्धान्त को मानवीय व्यवहार के साथ जोड़ा जाये ताकि आज रंग-भेद, जातिवाद आदि के नाम पर जो दूरियां बढ़ रही हैं, वे समाप्त हो सके। 
*3- समन्वयवाद*
अनेकान्त का एक और  महत्तवपूर्ण पहलू है- समन्वयवाद। जैन चिन्तकों ने विरोधी धर्मों का एक साथ होना असंभव नहीं माना, उन्होंने विरोधी विचारों को स्वीकार ही नहीं किया अपितु उन विरोधी विचारों के बीच भी समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। समन्वयवाद का अर्थ है-विचारों की मीमांसा। एक ही वस्तु के विषय में भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से विचार करना ही समन्वयवाद है। मान लीजिए दो विचारधाराएँ हैं, एक आत्मा को नित्य मानती है और दूसरी अनित्य मानती है। इन दोनों के बीच समन्वय कैसे हो सकता है? समन्वयवादी कहेगा-दोनों दृष्टियाँ ठीक हैं। द्रव्य की दृष्टि से आत्मा नित्य है और पर्याय की दृष्टि से आत्मा अनित्य है। विश्व में न कोई पदार्थ एकान्ततः नित्य है और न एकान्ततः अनित्य, यही समन्वयवाद है। समन्वय के चिन्तन की इस पद्धति का नाम ही अनेकान्त है। एक वस्तु है, उसे जानने या देखने वाले अनेक हैं। सबके पास अपनी-अपनी दृष्टियां हैं। अपनी-अपनी दृष्टि से समझी गई वस्तु का स्वरूप एक समान नहीं हो सकता। पर उनके बीच समन्वय को ढूंढ़ा जा सकता है। एक वस्तु है, उदाहरण के लिए पांच अंधों ने हाथी को जानना चाहा। पहले अंधे ने हाथी के पैरों को पकड़ा और कहा-हाथी खम्भे जैसा होता है। दूसरे अन्धे ने हाथी की पूँछ को पकड़ा और कहा-हाथी खम्भे जैसा नहीं अपितु रस्सी जैसा होता है। तीसरे ने हाथी के मध्य भाग को छुआ और कहा-हाथी तो दीवार जैसा होता है। चौथे ने उसकी सूंड को पकड़ा और कहा-हाथी तो पेड़ की शाखा जैसा होता है। पाँचवे ने हाथी के कान को पकड़ा और कहा-हाथी न खम्भे जैसा होता है, न दीवार जैसा, अपितु वह तो सूपे जैसा होता है। पाँचों अपनी-अपनी बात को सत्य साबित करने का आग्रह करने लगे। विवाद बढ़ गया। एक बुद्धिमान् व्यक्ति ने उनके बीच समन्वय स्थापित करवाकर उस विवाद को समाप्त किया। उसने कहा आप सभी हाथी के एक अंश को जानकर उसे पूर्ण हाथी समझ रहे हैं, जो कि ठीक नहीं। पांचों ने जो जाना है, उसका समन्वय करके ही आप हाथी के सही रूप को समझ सकते हैं।
इस समन्वयवाद में वैयक्तिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सभी समस्याओं का सुन्दर समाधान समाहित है।
         अनेकान्त व्यापक सिद्धान्त है। इसका उपयोग हर क्षेत्र में किया जा सकता है। सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर व्यक्ति या वस्तु वर्तमान में जो क्रिया कर रहे होते हैं, उसी स्वरूप वाले प्रतीत होते हैं। पर वृहद दृष्टि से विचार करने पर ऐसा प्रतीत नहीं होता। अतः, अपनी प्रतिक्रिया देते समय  तथा दूसरे की सुनते समय अपनी तथा दूसरों की दृष्टि पर ध्यान देने से अंतर्वैयक्तिक एवं सामाजिक संघर्ष को नियंत्रित किया जा सकता है. 
*🖋️आभार (20अप्रैल, 2024)*

Comments

Popular posts from this blog

क्या जैन का मतलब बनिया होता है ?

Dr Amit Rai Jain के फेसबुक वाल से साभार क्या जैन मतलब बणिया होता है ? #Jain_Bania  सोशल मीडिया पर चल रहे माहौल को देखते हुए मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं,कि क्या जैन का अर्थ बणिया होता है,आमतौर पर सबकी यह धारणा होती है कि जैन से आशय बणिया/वैश्य वर्ण की एक जाति है।अगर आप भी ऐसा मानते हैं तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी के शिकार है।   जैन कोई जाति या वर्ण नहीं है,बल्कि यह स्वतंत्र धर्म है,इसे समझने के लिए हमें इसके इतिहास की ओर जाना पड़ेगा, जैन धर्म का अपना स्वतंत्र इतिहास है,यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना धर्म है,यहां तक कि वैदिक के भी पहले भी यहां के मूलनिवासियों का धर्म यही था,और इसके अनुयायी ही जैन थे, जिन्हें तत्कालीन समय में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता था।    अधिकतर लोग जानकारी के अभाव में जैन-धर्म को वैष्णव या हिंदू से जोड़कर देखते हैं,किंतु मूलनिवासी देवता शिव और प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव एक ही पुरुष थे, यहां का धर्म ऋषभदेव का अनुयायी ही था !    अंतिम तीर्थंकर महावीर के बाद जैन-धर्म दो परंपराओं में बंट गया,दिगंबर व श्वेतांबर। दिगंबर दक्षिण भारत में अधिक प्रचार...

जैनदर्शन नास्तिक नहीं, आस्तिक दर्शन है

*जैनदर्शन नास्तिक नहीं, आस्तिक दर्शन है* डॉ. शुद्धात्मप्रकाश जैन  निदेशक, क. जे. सोमैया जैन अध्ययन केन्द्र, सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय, मुम्बई                   समस्त भारतीय दर्शनों को दो विभागों में विभाजित किया गया है- आस्तिक और नास्तिक। इस विभाजन का आधार पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, लोक-परलोक, आत्मा-परमात्मा आदि के आधार पर न होकर मात्र यह परिभाषा है- ‘‘वेदनिन्दको नास्तिकः’’ अर्थात् जो वेदों को अस्वीकार करे, वह नास्तिक है, इस आधार पर जैन, बौद्ध और चार्वाक- ये तीन दर्शन नास्तिक कहे जाते हैं।                 इस सन्दर्भ में दो बातें विचारणीय हैं, जिनमें से प्रथम यह है कि- जिन वेदों और पुराणों में ऋषभदेव, अरिष्टनेमि और पाश्र्वनाथ आदि जैन तीर्थंकरों का नामस्मरण किया गया है, उन वेदों की जैनदर्शन निन्दा कैसे कर सकता है? वहां कई स्थानों पर ऋषभदेव,  उनके पुत्र भरत, अरिष्टनेमि आदि का बहुत आदर से उल्लेख किया गया है। दूसरी बात यह है कि- वेदों पर जैन अहिंसा का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। जहां जैन तीर्थं...

ब्रह्मी लिपि उद्भव और विकास Brahmi Lipi origin and Devolopment

ब्राह्मी लिपि : उद्भव और विकास - श्रीमती डा. मुन्नी पुष्पा जैन, वाराणसी          भाषा के बाद अभिव्यक्ति का सबसे अधिक सशक्त माध्यम ‘लिपि' है। ‘लिपि' किसी भाषा को चिन्हों तथा विभिन्न आकारों में बांधकर दृश्य और पाल्य बना देती है। इसके माध्यम से भाषा का वह रूप हजारों वर्षों तक सुरक्षित रहता है। विश्व में सैकड़ों गाषाए तथा सैकड़ों लिपियों हैं। भाषा का जन्म लिपि से पहले होता है, लिपि का जन्म बाद मे। प्राचीन शिलालेखों से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में ब्राह्मीलिपि ही प्रमुखतया प्रचलित रही है और यही बाह्मी लिपि अपने देश के समृद्ध प्राचीन ज्ञान-विज्ञान ,संस्कृति,इतिहास आदि को सही रूप में सामने लाने में एक सशक्त माध्यम बनी। सपाट गो मापवं ने/ इस ब्राह्मी लिपि में शताधिक शिलालेख लिखवाकर ज्ञान लिाप और भाषा को सदियों तक जीवित रखने का एक क्रांतिकारी कदम उठाया था।   सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में ब्राह्मी लिपि के रहस्य को समझने के लिए पश्चिमी तथा पूर्वी विद्वानों ने जो श्रम किया उसी का प्रतिफल है कि आज हम उन प्राचीन लिपियो को पढ़-समझ पा रहे है...