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भगवान महावीर स्वामी का अनेकान्तवाद

भगवान महावीर स्वामी का अनेकान्त सिद्धाँत
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       *अनेकान्त* शब्द 'अनेक' और 'अन्त' इन दो शब्दों से बना है। अनेक का अर्थ है-एक से अधिक, अन्त का अर्थ है-धर्म (स्वभाव)। वस्तु में अनेक विरोधी धर्मों के समूह को स्वीकार करना अनेकान्त है। जैन दर्शन के अनुसार एक ही वस्तु में एक ही समय में अनन्त विरोधी धर्म एक साथ रहते हैं, यह अनेकान्त दर्शन की महत्त्वपूर्ण स्वीकृति है। जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक वस्तु अनन्त धर्मों, अनन्त गुणों और अनन्त पर्यायों का अखण्ड समूह है। कोई भी पदार्थ न एकान्ततः नित्य है और न अनित्य। न एक है, न अनेक। न सत् है, न असत्। न वाच्य है, न अवाच्य। सभी पदार्थ नित्य भी हैं, अनित्य भी हैं। एक भी हैं, अनेक भी हैं। सत् भी हैं, असत् भी हैं। वाच्य भी हैं, अवाच्य भी हैं। इस प्रकार अनेकान्त एक ही वस्तु में अनेक विरोधी धर्मों को प्रकट करता है। कोई भी वस्तु सर्वथा नित्य या सर्वथा अनित्य स्वरूप वाली नहीं है। वस्तु में नित्यता और अनित्यता का कथन सापेक्ष है। जिस समय पदार्थ के जिस धर्म की विवेचना  होती है, वह प्रधान बन जाता है, शेष सारे धर्म गौण हो जाते हैं। 
       प्रधानता और गौणता वस्तु का धर्म नहीं, किन्तु यह वक्ता की एक दृष्टि है। उदाहरणतः, व्यक्ति चल रहा है. जब व्यक्ति चलता है तो एक पैर आगे रहता है, दूसरा पैर पीछे रहता है तब गतिक्रिया संभव होती है। लेकिन कोई व्यक्ति यह कहे कि दोनों पैर आगे ही होना आगे बढ़ना है तब, गतिक्रिया संभव नहीं हो सकती। उसी प्रकार वस्तु के जिस गुण का कथन किया जाता है, वह प्रधान बन जाता है। शेष धर्म गौण हो जाते हैं। यदि सभी धर्म प्रधान बनने का आग्रह करें तो भाषा की सीमा के कारण एक साथ सभी को प्रधानता नहीं दी जा सकती।
        अनेकान्त जीवन का एक विशेष दृष्टिकोण एवं व्यवहार आधारित पद्धति है। इसके मुख्य तीन सिद्धाँत हैं, जिसके माध्यम से इसे और अधिक स्पष्टता से समझा जा सकता वे हैं-                
1-सापेक्षता, 
2-सह-अस्तित्व और
3- समन्वय।
 

 *1- सापेक्षता*: यह एक वैज्ञानिक एवं सार्वभौम सिद्धान्त है। यह दर्शन-युग से वैज्ञानिक युग में भी प्रवेश पा चुका है। विश्व-विख्यात वैज्ञानिक आल्बर्ट आइंस्टीन द्वारा आविष्कृत सापेक्षवाद (Theory of Relativity) विज्ञान का एक प्रमुख सिद्धान्त बन चुका है। स्याद्वाद में प्रयुक्त 'स्यात्' शब्द सापेक्षता का सूचक है। जैन दर्शन के अनुसार वस्तु में अनन्त धर्म होते हैं। अनन्त धर्मों का एक साथ प्रतिपादन कर पाना किसी के वश की बात नहीं, क्योंकि भाषा की अपनी सीमा है। शब्द के द्वारा एक समय में एक धर्म का ही प्रतिपादन किया जा सकता है। उसके शेष धर्म प्रतिपादित नहीं किये जा सकते। किसी एक अपेक्षा से हम वस्तु के एक धर्म का कथन करते हैं, पर किसी अन्य अपेक्षा से दूसरे धर्मों का भी अस्तित्व है, उसे नकारा नहीं जा सकता। इस अपेक्षाभेद को समझना ही सापेक्षता है। यदि सापेक्षता का आधार न लिया जाये तो व्यावहारिक और दार्शनिक दोनों दृष्टियों से काफी उलझनें खड़ी हो सकती हैं। इस प्रकार सापेक्षवाद जैन दर्शन की समूचे विश्व के लिए एक वैज्ञानिक देन है।
 *2- सह-अस्तित्व*
अनेकान्त का दूसरा सिद्धान्त है-सह-अस्तित्व है। अनेकान्त सिद्धान्त के अनुसार वस्तु में अनन्त विरोधी धर्म होते हैं और उनका सह-अस्तित्व होता है।समूची प्रकृति की व्यवस्था में विरोधी युगलों का अस्तित्व है। सुख है तो दुख भी है, ज्ञान है तो अज्ञान भी है, जीवन है तो मृत्यु भी है। इस पक्ष प्रतिपक्ष की स्वीकृति से ही अनेकान्त का विकास होता है। 
        अनेकान्त ने सबसे पहले इस नियम की व्याख्या की जिस प्रकार विरोधी युगल धर्मों का होना स्वाभाविक है, वैसे ही इन विरोधी धर्मों का सह-अस्तित्व भी स्वाभाविक है। भारतीय दर्शनों और विश्व के सभी दर्शनों में सह-अस्तित्व की व्याख्या का ऐतिहासिक श्रेय यदि किसी को दिया जा सकता है तो वह अनेकान्तवाद को ही दिया जा सकता है। अनेकान्त का आधार भी यही बना कि जब पदार्थ की प्रकृति ही ऐसी है कि उसमें विरोधी धर्मों का सह-अस्तित्व होता है, तब हम एक ही दृष्टि से पदार्थ की व्याख्या कैसे कर सकते हैं? स्वभाव में तर्क नहीं चलता, वहाँ अनुभव प्रमाण होता है। अनुभव कहता है कि जो वस्तु गर्म है, वह ठंडी भी हो सकती है। तर्क कहता है वस्तु या ठंडी ही है या गर्म ही है, ठंडी और गर्म एक साथ नहीं हो सकती। अनुभव यह कहता है कि एक ही वस्तु में अपेक्षाभेद से ठंडा और गर्म एक साथ रह सकता है। उनका सह-अस्तित्व हो सकता है. दुनिया की कोई भी वस्तु इस मर्यादा का अतिक्रमण नहीं कर सकती।
और गर्म एक साथ रह सकता है। उनका सह-अस्तित्व हो सकता है. अपेक्षा है, इस सह-अस्तित्व के सिद्धान्त को मानवीय व्यवहार के साथ जोड़ा जाये ताकि आज रंग-भेद, जातिवाद आदि के नाम पर जो दूरियां बढ़ रही हैं, वे समाप्त हो सके। 
*3- समन्वयवाद*
अनेकान्त का एक और  महत्तवपूर्ण पहलू है- समन्वयवाद। जैन चिन्तकों ने विरोधी धर्मों का एक साथ होना असंभव नहीं माना, उन्होंने विरोधी विचारों को स्वीकार ही नहीं किया अपितु उन विरोधी विचारों के बीच भी समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। समन्वयवाद का अर्थ है-विचारों की मीमांसा। एक ही वस्तु के विषय में भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से विचार करना ही समन्वयवाद है। मान लीजिए दो विचारधाराएँ हैं, एक आत्मा को नित्य मानती है और दूसरी अनित्य मानती है। इन दोनों के बीच समन्वय कैसे हो सकता है? समन्वयवादी कहेगा-दोनों दृष्टियाँ ठीक हैं। द्रव्य की दृष्टि से आत्मा नित्य है और पर्याय की दृष्टि से आत्मा अनित्य है। विश्व में न कोई पदार्थ एकान्ततः नित्य है और न एकान्ततः अनित्य, यही समन्वयवाद है। समन्वय के चिन्तन की इस पद्धति का नाम ही अनेकान्त है। एक वस्तु है, उसे जानने या देखने वाले अनेक हैं। सबके पास अपनी-अपनी दृष्टियां हैं। अपनी-अपनी दृष्टि से समझी गई वस्तु का स्वरूप एक समान नहीं हो सकता। पर उनके बीच समन्वय को ढूंढ़ा जा सकता है। एक वस्तु है, उदाहरण के लिए पांच अंधों ने हाथी को जानना चाहा। पहले अंधे ने हाथी के पैरों को पकड़ा और कहा-हाथी खम्भे जैसा होता है। दूसरे अन्धे ने हाथी की पूँछ को पकड़ा और कहा-हाथी खम्भे जैसा नहीं अपितु रस्सी जैसा होता है। तीसरे ने हाथी के मध्य भाग को छुआ और कहा-हाथी तो दीवार जैसा होता है। चौथे ने उसकी सूंड को पकड़ा और कहा-हाथी तो पेड़ की शाखा जैसा होता है। पाँचवे ने हाथी के कान को पकड़ा और कहा-हाथी न खम्भे जैसा होता है, न दीवार जैसा, अपितु वह तो सूपे जैसा होता है। पाँचों अपनी-अपनी बात को सत्य साबित करने का आग्रह करने लगे। विवाद बढ़ गया। एक बुद्धिमान् व्यक्ति ने उनके बीच समन्वय स्थापित करवाकर उस विवाद को समाप्त किया। उसने कहा आप सभी हाथी के एक अंश को जानकर उसे पूर्ण हाथी समझ रहे हैं, जो कि ठीक नहीं। पांचों ने जो जाना है, उसका समन्वय करके ही आप हाथी के सही रूप को समझ सकते हैं।
इस समन्वयवाद में वैयक्तिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सभी समस्याओं का सुन्दर समाधान समाहित है।
         अनेकान्त व्यापक सिद्धान्त है। इसका उपयोग हर क्षेत्र में किया जा सकता है। सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर व्यक्ति या वस्तु वर्तमान में जो क्रिया कर रहे होते हैं, उसी स्वरूप वाले प्रतीत होते हैं। पर वृहद दृष्टि से विचार करने पर ऐसा प्रतीत नहीं होता। अतः, अपनी प्रतिक्रिया देते समय  तथा दूसरे की सुनते समय अपनी तथा दूसरों की दृष्टि पर ध्यान देने से अंतर्वैयक्तिक एवं सामाजिक संघर्ष को नियंत्रित किया जा सकता है. 
*🖋️आभार (20अप्रैल, 2024)*

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