Skip to main content

वेज+नॉनवेज रेस्टोरेंट की वास्तविकता

*यह लेख आँखें खोल देने वाला है उनके लिए जो पूर्णतः शाकाहारी है और अज्ञानतावश ऐसे रेस्टोरेन्ट में खाना खाते हैं जहाँ शाकाहारी-मांसाहारी दोनों तरह का भोजन परोसा जाता है।*

रेस्टोरेन्ट का अन्तःसच

*लेखक : नितिन सोनी (१०२, पार्क रेजीडेंसी, २/४, रेसकोर्स रोड, इन्दौर (म. प्र.)*
_______________________

*मैंने पिछले एक साल एक ऐसे रेस्टोरेन्ट में प्रबन्धन का कार्य सम्भाला, जहाँ पर शाकाहारी और माँसाहारी दोनों तरह का खाना बनता है। अपनी आँखों के सामने ऐसा प्रदूषित वातावरण देखना एक ऐसा पीड़ाजनक अनुभव है जिसे शब्दों में बयान करना बहुत ही कठिन है*। मैं स्वयं अपने को दोषी मानता हूँ, ऐसे नारकीय वातावरण में कार्य करने के लिये। परन्तु कभी-कभी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ ऐसे काम करने को विवश कर देती है।

मुझे इस अनुभव को आप तक पहुँचाना इसलिए जरुरी लगा क्योंकि वे लोग जो ऐसे रेस्टोरेन्ट में खाना खाते हैं और सोचते हैं कि वो पूर्णतः शाकाहारी भोजन ही ग्रहण कर रहे हैं तो वे पूर्णतः गलत है। आइये, आज आपको एक ऐसे ही शाकाहारी-माँसाहारी रेस्टोरेन्ट की रसोईघर यानि किचन की झलक दिखलाते हैं।

सर्वप्रथम तो परिचित करवाते हैं किचन की बनावट से जो सामान्यतः सभी रेस्टोरेन्ट में तीन भागों में बँटी रहती है:

तन्दूर सेक्शन
इण्डियन सेक्शन
चायनीज़ सेक्शन

तन्दूर सेक्शन

v यहाँ पर शाकाहारी व माँसाहारी यानि वेज एवं नानवेज तन्दूरी भोजन सामग्री तैयार होती है।

v तन्दूरी रोटी के साथ नान का आटा भी लगाया जाता है, जिसमें खमीर उठाने के लिए और नरम और सुस्वादु बनाने के लिए अण्डे का इस्तेमाल किया जाता है।

v जो टेबल तन्दूर उस्ताद के पास होती है वो एक ही होती है जिस पर रोटी का आटा और नानवेज के सारे आइटम एक साथ रखे रहते हैं।

v जब तन्दूरी मुर्गा या अन्य माँसाहारी तन्दूरी आइटम बनाना होता है तो पहले उस पर मक्खन व तेल का मिश्रण लगाया जाता है। इसके लिए एक डिब्बे में तेल व मक्खन का मिश्रण भरा होता है तथा एक लकड़ी पर कपड़ा बान्ध कर मिश्रण में डाल देते हैं, जिसके द्वारा वह मिश्रण तन्दूरी मुर्गे पर लगाया जाता है तथा उसी लकड़ी व उसी मिश्रण का शाकाहारी लोगों की रोटी / नान पर भी उपयोग किया जाता है।

v किसी भी तन्दूरी डिश जैसे पनीर टिक्का, पनीर पुदीना टिक्का, वेज सीक कबाब को तैयार करने के लिए पहले टिक्का व कबाब बनाये जाते हैं, जिन्हें लोहे की सलाखों में लगाकर तन्दूर में डाला जाता है। यहाँ ध्यान देने योग्य यह है कि इन्हीं तन्दूर की सलाखों का उपयोग मांसाहारी व्यञ्जन जैसे तन्दूरी मुर्गा, चिकन टिक्का, तन्दूरी फिश इत्यादि के लिए भी किया जाता है तथा चाहे आर्डर वेज का हो या नानवेज का, इन सलाखों को कभी धोया भी नहीं जाता है।

v इन सिके हुए, मक्खन लगे तन्दूरी व्यंजन पर मसाला लगाया जाता है, जो एक बड़े बर्तन में रखा होता है तथा इसी में चाहे शाकाहारी हो या मांसाहारी व्यञ्जन, दोनों को लपेट लपेट कर मसाला लगाया जाता है।

इण्डियन सेक्शन

v यह रसोई का वह हिस्सा है जहाँ पर सभी सब्जियाँ व दालें बनती हैं। यहाँ पर एक-दो भट्टियाँ व दो टेबलें पास-पास रखी होती हैं।

v टेबल पर सारा कच्चा माल जैसे मावा, पनीर, दूध, दही, क्रीम रखा होता है। उसी टेबल पर मांसाहारी खाने की कच्ची सामग्री जैसे अण्डे, मछली, चिकन रखा होता है।

v भट्टी के पास ही सारे मसाले रखे होते हैं। अब यदि कोई भी आर्डर आता है, चाहे वह शाकाहारी हो या मांसाहारी, कुक (रसोइया) उसको बनाते समय एक ही फ़्रायपान व चम्मच का इस्तेमाल करता है। जैसे उदाहरण के लिए बटर चिकन का आर्डर है तो कुक पहले अपनी बड़ी चम्मच से फ़्रायपान में घी डालेगा, फिर फ़्रायपान में चिकन डालकर उसी चम्मच से हिलायेगा, फिर उसी चम्मच से क्रीम, काजूपेस्ट या कोई भी मसाले जो लेने हैं लेता है, फिर पहले से बनी ग्रेवी, जो हर सब्जी या नानवेज के लिए इकट्ठी बनती है, उसी चम्मच से लेता है। बटर चिकन बनने के बाद फ़्रायपान तो धुलता है, पर चम्मच वहीँ पास रखे पानी भरे तपेलों में डाल देते हैं। किसी दाल को पतला करना हो या ग्रेवी में पानी मिलाना हो तो इसी तपेले का पानी मिलाया जाता है जिसमें हर तरह की वेज-नानवेज लगी चम्मच डालते हैं।

चायनीज़ सेक्शन

v चायनीज़ बनाने के लिए भी मुख्यतः दो भट्टियाँ लगी होती हैं एवं साइड टेबल कच्चा माल रखने के लिए होती है।

v यदि आप स्प्रिंग रोल खा रहे हैं तो उसको चिपकाने के लिए अण्डे की जर्दी का उपयोग होता है।

v चिली पनीर के घोल व मंचूरियन के पकोड़ों में भी अण्डे का इस्तेमाल होता है।

v सूप में व कोई भी ग्रेवी की चीज़ बनाने में जो पानी इस्तेमाल होता है वह चिकन स्टाक (चिकन को उबालकर उसका जो पानी बचता है उसे चिकन स्टाक कहते हैं)

v तलने के लिए एक ही कढ़ाई होती है, जिसमें शाकाहार जैसे पापड़, चिप्स व मांसाहार जैसे मछली, चिकन दोनों ही तले जाते हैं।

अन्य ध्यान देने योग्य बातें

v सब्जी काटने के लिए लकड़ी की पट्टियों को काम में लाया जाता है। उन्हीं पट्टियों पर रखकर जो चाकू सब्जी काटने के काम में आते हैं उन्हीं से मटन, चिकन काटा जाता है तथा इन चाकूओं व पट्टियों को कभी धोया भी नहीं जाता है।

v डीप फ्रिज जो प्रिजर्वेशन के लिए होता है उसमें वेज-नानवेज दोनों रखे जाते हैं।

v तन्दूरी पर उस्ताद जिन हाथों से चिकन काटते हैं, रोटी का आर्डर आने पर बिन हाथ धोये, रोटी भी बना देते हैं।

v स्टील की एक बड़ी टेबल, जिस पर कटा हुआ चिकन मटन रखते हैं उसी पर वक़्त आने पर चावल भी बनाकर ठण्डा करने के लिए फैलाये जाते हैं जिसमें कई बार खून व मांस भी मिल जाता है।

v फ्रूट सलाद जिसका नानवेज से कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए, उसे भी टेस्टी बनाने के लिए अण्डा फेंटकर मिलाते हैं।

v रविवार या छुट्टी के दिनों में या पार्टी होने पर जब भीड़ अत्यधिक होती है तब किचन की सफाई, स्वच्छता पर ध्यान न देते हुए ग्राहक के आर्डर समय पर लगाने पर ध्यान होता है। ऐसे समय में किचन को देखना नरक की अनुभूति करने के समान है, क्योंकि हर स्थान पर नानवेज के अवशेष भरे पड़े रहते हैं। ऐसे समय कई बार ग्राहकों को गलतफहमी में वेज की जगह नानवेज डिश भी लग जाती है।

v पानी की शुद्धता भी प्रमाणित नहीं होती है, क्योंकि वह टंकियों में एकत्रित होता है जिसकी साफ - सफाई महीनों से नहीं होती है।

स्टाफ के सदस्यों के अनुभव के आधार पर यह निष्कर्ष सामने आता है कि चाहे छोटा सा रेस्टोरेन्ट हो या बड़ा होटल, यदि वेज-नानवेज साथ-साथ बनता है तो वहाँ इसी प्रकार कार्य होता है।

देखा जाये तो गलत वे लोग नहीं हैं जो ऐसे प्रतिष्ठानों के मालिक हैं या उनमें कार्यरत हैं, क्योंकि वे लोग अधिकांशतः मांसाहारी होते हैं, इसलिए उन सबके लिए एक पूर्ण शाकाहारी की भावना समझना कठिन कार्य है।

साथ ही किचन स्टाफ का कहना है कि बगैर अण्डा या चिकन स्टाक मिलाये कोई व्यञ्जन बनाते हैं तो ग्राहक को वह स्वाद ही नहीं आता जिसकी आदत उसे वर्षों से पड़ी हुई है.

अन्त में मैं केवल इतना ही कहना चाहूंगा कि यह लेख केवल उन लोगों की जानकारी के लिए है जो अज्ञानतावश ऐसे रेस्टोरेन्ट में खाना खाते हैं और उन लोगों के लिए भी जो कुछ सच्चाई जानते तो हैं, पर हाई सोसाइटी व पाश्चात्यता का नकाब ओढ़ने के कारण यह सब अनदेखा कर देते हैं। यदि इस लेख को पढ़कर एक भी पाठक ऐसे रेस्टोरेन्ट (जहाँ शाकाहार एवं मांसाहार दोनों मिलते हैं) में भोजन करना बन्द कर देता है तो मेरा लेख लिखने का उद्देश्य सफल हो जायेगा.

Comments

  1. This article enlightened us on many realities. Hope now people will be more alert and aware before choosing to eat in mixed restaurants.
    Thank you.

    ReplyDelete
  2. Non vegetarian foods should strictly be restricted, & also the mixed food chain should b stopped to write vegetarian, this is the culture to destroy the balance of nature, & human health..

    ReplyDelete
  3. This post clears more realities for the people enjoying veg foods in non-veg mix kitchens..

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

क्या जैन का मतलब बनिया होता है ?

Dr Amit Rai Jain के फेसबुक वाल से साभार क्या जैन मतलब बणिया होता है ? #Jain_Bania  सोशल मीडिया पर चल रहे माहौल को देखते हुए मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं,कि क्या जैन का अर्थ बणिया होता है,आमतौर पर सबकी यह धारणा होती है कि जैन से आशय बणिया/वैश्य वर्ण की एक जाति है।अगर आप भी ऐसा मानते हैं तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी के शिकार है।   जैन कोई जाति या वर्ण नहीं है,बल्कि यह स्वतंत्र धर्म है,इसे समझने के लिए हमें इसके इतिहास की ओर जाना पड़ेगा, जैन धर्म का अपना स्वतंत्र इतिहास है,यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना धर्म है,यहां तक कि वैदिक के भी पहले भी यहां के मूलनिवासियों का धर्म यही था,और इसके अनुयायी ही जैन थे, जिन्हें तत्कालीन समय में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता था।    अधिकतर लोग जानकारी के अभाव में जैन-धर्म को वैष्णव या हिंदू से जोड़कर देखते हैं,किंतु मूलनिवासी देवता शिव और प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव एक ही पुरुष थे, यहां का धर्म ऋषभदेव का अनुयायी ही था !    अंतिम तीर्थंकर महावीर के बाद जैन-धर्म दो परंपराओं में बंट गया,दिगंबर व श्वेतांबर। दिगंबर दक्षिण भारत में अधिक प्रचार...

जैनदर्शन नास्तिक नहीं, आस्तिक दर्शन है

*जैनदर्शन नास्तिक नहीं, आस्तिक दर्शन है* डॉ. शुद्धात्मप्रकाश जैन  निदेशक, क. जे. सोमैया जैन अध्ययन केन्द्र, सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय, मुम्बई                   समस्त भारतीय दर्शनों को दो विभागों में विभाजित किया गया है- आस्तिक और नास्तिक। इस विभाजन का आधार पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, लोक-परलोक, आत्मा-परमात्मा आदि के आधार पर न होकर मात्र यह परिभाषा है- ‘‘वेदनिन्दको नास्तिकः’’ अर्थात् जो वेदों को अस्वीकार करे, वह नास्तिक है, इस आधार पर जैन, बौद्ध और चार्वाक- ये तीन दर्शन नास्तिक कहे जाते हैं।                 इस सन्दर्भ में दो बातें विचारणीय हैं, जिनमें से प्रथम यह है कि- जिन वेदों और पुराणों में ऋषभदेव, अरिष्टनेमि और पाश्र्वनाथ आदि जैन तीर्थंकरों का नामस्मरण किया गया है, उन वेदों की जैनदर्शन निन्दा कैसे कर सकता है? वहां कई स्थानों पर ऋषभदेव,  उनके पुत्र भरत, अरिष्टनेमि आदि का बहुत आदर से उल्लेख किया गया है। दूसरी बात यह है कि- वेदों पर जैन अहिंसा का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। जहां जैन तीर्थं...

ब्रह्मी लिपि उद्भव और विकास Brahmi Lipi origin and Devolopment

ब्राह्मी लिपि : उद्भव और विकास - श्रीमती डा. मुन्नी पुष्पा जैन, वाराणसी          भाषा के बाद अभिव्यक्ति का सबसे अधिक सशक्त माध्यम ‘लिपि' है। ‘लिपि' किसी भाषा को चिन्हों तथा विभिन्न आकारों में बांधकर दृश्य और पाल्य बना देती है। इसके माध्यम से भाषा का वह रूप हजारों वर्षों तक सुरक्षित रहता है। विश्व में सैकड़ों गाषाए तथा सैकड़ों लिपियों हैं। भाषा का जन्म लिपि से पहले होता है, लिपि का जन्म बाद मे। प्राचीन शिलालेखों से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में ब्राह्मीलिपि ही प्रमुखतया प्रचलित रही है और यही बाह्मी लिपि अपने देश के समृद्ध प्राचीन ज्ञान-विज्ञान ,संस्कृति,इतिहास आदि को सही रूप में सामने लाने में एक सशक्त माध्यम बनी। सपाट गो मापवं ने/ इस ब्राह्मी लिपि में शताधिक शिलालेख लिखवाकर ज्ञान लिाप और भाषा को सदियों तक जीवित रखने का एक क्रांतिकारी कदम उठाया था।   सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में ब्राह्मी लिपि के रहस्य को समझने के लिए पश्चिमी तथा पूर्वी विद्वानों ने जो श्रम किया उसी का प्रतिफल है कि आज हम उन प्राचीन लिपियो को पढ़-समझ पा रहे है...