Skip to main content

अन्तर की मांग - क्षु.जिनेंद्र वर्णी

धर्म कर्म की जीवन में आवश्यकता ही क्या है ? जीवन के लिए यह कुछ उपयोगी तो भासता नहीं , यदि बिना किसी धार्मिक प्रवृत्ति के ही जीवन बिताया जाए तो क्या हर्ज है ?

फिलोस्फर बनने के लिए कहा गया है ना मुझे , प्रश्न बहुत सुंदर है, और करना भी चाहिए था , अंतर में उत्पन्न हुए प्रश्न को कहते हुए शर्माना नहीं चाहिए । नहीं तो यह विषय स्पष्ट ना होने पाएगा । प्रश्न बेधड़क कर दिया करो डरना नहीं ।  वास्तव में ही धर्म की कोई आवश्यकता नहीं होती यदि मेरे अंदर की सभी अभिलाषाओं की पूर्ति साधारणतः हो जाती ।

कोई भी पुरुषार्थ किसी प्रयोजनवश ही करने में आता है किसी अभिलाषा विशेष की पूर्ति के लिए ही कोई कार्य किया जाता है । ऐसा कोई कार्य नहीं जो बिना किसी अभिलाषा के किया जा रहा हो ।
अतः उपरोक्त बात का उत्तर पाने के लिए मुझे विश्लेषण करना होगा अपनी अभिलाषाओं का । ऐसा कहने से अस्पष्टता कुछ ध्वनि अंतरंग में आती प्रतीत होगी इस रूप में कि 'मुझे सुख चाहिए ,मुझे निराकुलता चाहिए'-  यह ध्वनि छोटे बड़े सभी प्राणियों की चिर परिचित है ,क्योंकि कोई भी ऐसा नहीं है जो इस ध्वनि को बराबर उठते ना सुन रहा हो और यह ध्वनि कृत्रिम भी नहीं है ।
किसी अन्य से प्रेरित होकर यह सीख उत्पन्न हुई हो ऐसा भी नहीं है, स्वाभाविक है ।

कृत्रिम बात का आधार वैज्ञानिक लोग नहीं लिया करते परंतु इस स्वाभाविक ध्वनि का कारण तो अवश्य जाना पड़ेगा ।

 अपने अंदर की ध्वनि से प्रेरित होकर इस अभिलाषा की पूर्ति के लिए मैं कोई प्रयत्न ना कर रहा हूं ऐसा भी नहीं है ।

मैं बराबर कुछ ना कुछ उद्यम कर रहा हूं ,जहां भी जाता हूं कभी खाली नहीं बैठता और कब से करता आ रहा हूं , यह भी नहीं जानता परंतु इतना अवश्य जानता हूं कि सब कुछ करते हुए भी बड़े से बड़ा धनवान या राजा आदि बन जाने पर भी यह ध्वनि आज तक शांत होने नहीं पाई है ।

यदि शांत हो गई होती या उसके लिए किया जाने वाला पुरुषार्थ जितनी देर तक चलता रहता है उतने अंतराल मात्र के लिए भी कदाचित शांत होती हुई प्रतीत होती तो अवश्य ही धर्म आदि की कोई आवश्यकता ना होती ।उसी पुरुषार्थ के प्रति और अधिक उद्यम करता और कदाचित सफलता प्राप्त कर लेता ।

वह शांति की अभिलाषा ही मुझे बाध्य कर रही है कोई नया अविष्कार करने के लिए, जिसके द्वारा मैं उसकी पूर्ति कर पाऊं । आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है इसी कारण धर्म का आविष्कार ज्ञानीजनों ने अपने जीवन में किया और उसी का उपदेश सर्व जगत को भी दिया तथा दे रहे हैं किसी स्वार्थ के कारण नहीं बल्कि प्रेम व करुणा के कारण कि किसी प्रकार आप भी सफल हो सके अभिलाषा को शांत करने में।

शांतिपथ प्रदर्शक : पृष्ठ १४

Comments

Popular posts from this blog

क्या जैन का मतलब बनिया होता है ?

Dr Amit Rai Jain के फेसबुक वाल से साभार क्या जैन मतलब बणिया होता है ? #Jain_Bania  सोशल मीडिया पर चल रहे माहौल को देखते हुए मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं,कि क्या जैन का अर्थ बणिया होता है,आमतौर पर सबकी यह धारणा होती है कि जैन से आशय बणिया/वैश्य वर्ण की एक जाति है।अगर आप भी ऐसा मानते हैं तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी के शिकार है।   जैन कोई जाति या वर्ण नहीं है,बल्कि यह स्वतंत्र धर्म है,इसे समझने के लिए हमें इसके इतिहास की ओर जाना पड़ेगा, जैन धर्म का अपना स्वतंत्र इतिहास है,यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना धर्म है,यहां तक कि वैदिक के भी पहले भी यहां के मूलनिवासियों का धर्म यही था,और इसके अनुयायी ही जैन थे, जिन्हें तत्कालीन समय में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता था।    अधिकतर लोग जानकारी के अभाव में जैन-धर्म को वैष्णव या हिंदू से जोड़कर देखते हैं,किंतु मूलनिवासी देवता शिव और प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव एक ही पुरुष थे, यहां का धर्म ऋषभदेव का अनुयायी ही था !    अंतिम तीर्थंकर महावीर के बाद जैन-धर्म दो परंपराओं में बंट गया,दिगंबर व श्वेतांबर। दिगंबर दक्षिण भारत में अधिक प्रचार...

जैनदर्शन नास्तिक नहीं, आस्तिक दर्शन है

*जैनदर्शन नास्तिक नहीं, आस्तिक दर्शन है* डॉ. शुद्धात्मप्रकाश जैन  निदेशक, क. जे. सोमैया जैन अध्ययन केन्द्र, सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय, मुम्बई                   समस्त भारतीय दर्शनों को दो विभागों में विभाजित किया गया है- आस्तिक और नास्तिक। इस विभाजन का आधार पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, लोक-परलोक, आत्मा-परमात्मा आदि के आधार पर न होकर मात्र यह परिभाषा है- ‘‘वेदनिन्दको नास्तिकः’’ अर्थात् जो वेदों को अस्वीकार करे, वह नास्तिक है, इस आधार पर जैन, बौद्ध और चार्वाक- ये तीन दर्शन नास्तिक कहे जाते हैं।                 इस सन्दर्भ में दो बातें विचारणीय हैं, जिनमें से प्रथम यह है कि- जिन वेदों और पुराणों में ऋषभदेव, अरिष्टनेमि और पाश्र्वनाथ आदि जैन तीर्थंकरों का नामस्मरण किया गया है, उन वेदों की जैनदर्शन निन्दा कैसे कर सकता है? वहां कई स्थानों पर ऋषभदेव,  उनके पुत्र भरत, अरिष्टनेमि आदि का बहुत आदर से उल्लेख किया गया है। दूसरी बात यह है कि- वेदों पर जैन अहिंसा का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। जहां जैन तीर्थं...

ब्रह्मी लिपि उद्भव और विकास Brahmi Lipi origin and Devolopment

ब्राह्मी लिपि : उद्भव और विकास - श्रीमती डा. मुन्नी पुष्पा जैन, वाराणसी          भाषा के बाद अभिव्यक्ति का सबसे अधिक सशक्त माध्यम ‘लिपि' है। ‘लिपि' किसी भाषा को चिन्हों तथा विभिन्न आकारों में बांधकर दृश्य और पाल्य बना देती है। इसके माध्यम से भाषा का वह रूप हजारों वर्षों तक सुरक्षित रहता है। विश्व में सैकड़ों गाषाए तथा सैकड़ों लिपियों हैं। भाषा का जन्म लिपि से पहले होता है, लिपि का जन्म बाद मे। प्राचीन शिलालेखों से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में ब्राह्मीलिपि ही प्रमुखतया प्रचलित रही है और यही बाह्मी लिपि अपने देश के समृद्ध प्राचीन ज्ञान-विज्ञान ,संस्कृति,इतिहास आदि को सही रूप में सामने लाने में एक सशक्त माध्यम बनी। सपाट गो मापवं ने/ इस ब्राह्मी लिपि में शताधिक शिलालेख लिखवाकर ज्ञान लिाप और भाषा को सदियों तक जीवित रखने का एक क्रांतिकारी कदम उठाया था।   सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में ब्राह्मी लिपि के रहस्य को समझने के लिए पश्चिमी तथा पूर्वी विद्वानों ने जो श्रम किया उसी का प्रतिफल है कि आज हम उन प्राचीन लिपियो को पढ़-समझ पा रहे है...